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राइट विंग के वेब पोर्टल ऑपइंडिया की असली कहानी क्या है, कारवाँ मैगज़ीन ने विस्तार से खबर ली

अमृता सिंह कारवां की असिस्टेंट एडिटर हैं. इन्होंने बहुत मेहनत से ऑपइंडिया पोर्टल की लम्बी चौड़ी कुंडली तैयार की है। अमृता की मूल रिपोर्ट अंग्रेज़ी में है जो काफ़ी पहले आ गई थी। पारिजात ने इसका हिन्दी अनुवाद कारवाँ की वेबसाइट पर पेश किया है। डिजिटल जर्नलिज्म के इस उफनते दौर में एक कंटेंट को अपना अपना रंग देकर हर कोई प्रकाशित करता है। ऑपइंडिया को कारवाँ ने ‘एजेंट ऑरेंज’ का तमग़ा दिया है। मूल अंग्रेज़ी रिपोर्ट का शीर्षक भी ‘एजेंट ऑरेंज’ है। अमृता की हिंदी रिपोर्ट का एक बीच का अंश देखिए….

मीडियाविद कल्याणी चड्ढा और प्रशांत भट लिखते हैं कि, “जिस तरह दूरदर्शन ने हिंदू महाकाव्य रामायण के प्रसारण के जरिए 1980 के दशक में हिंदुत्व से संबंधित विचारधाराओं के उदय में योगदान दिया, बढ़ी हुई कनेक्टिविटी और नए वर्चुअल का संयोजन दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को विभिन्न प्रकार की वेबसाइटों और समाचार और कमेंट्री पोर्टलों में स्थापित करने में सक्षम बनाते हैं. मोदी के सत्ता में आने के कुछ महीनों बाद स्थापित हुए ऑपइंडिया उनकी सरकार के सूचना युद्धों में एक प्रमुख सिपाही के रूप में उभरा है और इसे सरकार द्वारा महत्वपूर्ण समर्थन के साथ पुरस्कृत किया गया है.

फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने ऑपइंडिया को “एक बहुत प्रभावी प्रचार आउटलेट” और “जितना कोई और मुख्यधारा का हो सकता है, उतना” कहा. वेबसाइट न्यूजलॉन्ड्री के सीईओ अभिनंदन सेखरी ने इसकी तुलना ऑल्ट-राइट वेबसाइट ब्रेइटबार्ट से की जो ऐसा है यदि “ब्रेइटबार्टबच्चों द्वारा चलाया जाए.” उन्होंने कहा कि ब्रेइटबार्ट के उलट, जिसने अपनी वैधता खो दी, ऑपइंडिया का मंत्रियों द्वारा विज्ञापन और सिग्नल-बूस्टिंग के रूप में सरकारी संरक्षण प्राप्त करना जारी है. “अगर एक गधे को इतनी मेहनत से धक्का दिया गया होता, तो वह घोड़े में बदल जाता,” उन्होंने कहा. “परन्तु वे गधे ही रह गए हैं.” फिर भी, ऑपइंडिया को नियमित रूप से एक महीने में 10 मिलियन से अधिक विजिट प्राप्त होती हैं. हालांकि किसी भी तरह से एनडीटीवी या हिंदुस्तान टाइम्स जैसे लेगेसी मीडिया घरानों की वेबसाइटों से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है लेकिन अधिकांश अन्य ऑनलाइन समाचार आउटलेट्स की तुलना में यह कहीं बेहतर है.

सत्ता से उनकी निर्विवाद निकटता को देखते हुए, चड्ढा और भट तर्क देते हैं कि ऑपइंडिया “पेशेवर पत्रकारिता के तरीकों, सामग्री और ऐसी पत्रकारिता करने वालों की निरंतर आलोचना द्वारा देश के मीडिया परिदृश्य में अपनी तथाकथित ‘वैकल्पिकता’ को रेखांकित करना चाहता है.” वे छह अलंकारिक रणनीतियों की पहचान करते हैं जो इसका विरोध करने वाले समाचार आउटलेट्स को बदनाम करने के लिए यह अपनाता है : “अपमानजनक लेबलिंग, आक्रामक मूल्यों और विचारधाराओं के साथ मुख्यधारा के मीडिया को जोड़ना, उनके कार्यों को असंगत या पाखंडी के रूप में परिभाषित करना, यह दावा करना कि मुख्यधारा के मीडिया के इरादे नेक नहीं, बार-बार आहत होना, और समाज के लिए हानिकारक नतीजे पैदा करना. इन रणनीतियों का एक परिणाम पत्रकारिता के मानदंडों की धज्जियां उड़ाते हुए उन घटनाओं का एक संस्करण पेश करने का आग्रह रहा है जो इसकी विचारधारा के अनुरूप है. इन दो दृष्टिकोणों के संयोजन से ऑपइंडिया ने समाज के प्रमुख वर्गों को उत्पीड़ित के आख्यानों की कल्पना से अपने प्रभुत्व को अस्पष्ट करने में मदद की है. सरकार के आलोचकों पर लगातार हमला करके सरकार का बचाव किया है और घृणास्पद सामग्री को लगातार परोसकर, जिनका तथ्यों से कम ही लेना देना है, काफी अनुयायी बनाए हैं.

चड्ढा और भट लिखते हैं कि जो चीज इन कोशिशों को “खासतौर पर ताकतवर” बनाती है, वह है “कि इसके दर्शक पहले से ही कई आस्थाओं और विचारों को स्वीकार करते हैं जिनका यह समर्थन करता है.” संक्षेप में, अपने पाठकों को समाचार के आधार पर अपनी राय बनाने की इजाजत देने के बजाए ऑपइंडिया अपने पाठकों की पहले से मौजूद राय के आधार पर समाचार तैयार करता है.

पूरा पढ़ने के लिए ऑपइंडिया की स्टोरी के इस लिंक पर क्लिक करें- https://hindi.caravanmagazine.in/media/toxic-business-opindia-anti-journalism-hindi

मूल अंग्रेज़ी रिपोर्ट का लिंक- https://caravanmagazine.in/media/toxic-business-opindia-anti-journalism

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2 Comments

2 Comments

  1. Mkd

    December 26, 2022 at 6:50 pm

    चड्डा और भट्ट क्या है, ये तो नहीं पता, पर कारवां और alt-news के बारे मे आँख बंद कर के बोला जा सकता है। शुद्ध बौद्धिक नक्सली हैं।

  2. ranjit

    December 27, 2022 at 1:32 am

    opindia truth ka path dikhata haiz sacchai se awgat akarata hai, tum nazyaz aulaad ho , jihadiyo ki or kuch nai

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