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राहुल गांधी का ‘फोकस’ नीट-यूजी पर, हेडलाइन मैनेजमेंट के समय सवाल टाल गये, टीओआई की खबर

संजय कुमार सिंह

वैसे तो आज बजट पेश किये जाने का दिन है। कल संसद में आर्थिक समीक्षा पेश की गई और आज उसकी भी खबर होनी थी। यही नहीं, आरएसएस की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों के शामिल होने पर लगा प्रतिबंध हटा लिये जाने की खबर भी है लेकिन नीट का मामला आज पहले पन्ने पर है और इस तरह कहा जा सकता है कि हेडलाइन मैनेजमेंट काम नहीं कर रहा है। यही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने के पीछे की एक खबर का उपशीर्षक है, राहुल गांधी ने (आरएसएस मामले में) टिप्पणी से इनकार कर दिया, कहा इस वक्त मैं नीट पर फोकस कर रहा हूं। इसका असर  टेलीग्राफ में पहले पन्ने की खबर और उसका शीर्षक है, “एग्जाम फ्रॉड के लिए शिक्षा मंत्री को बर्खास्त किया जाये : विपक्ष”। इसके अलावा, आज की खबरों में बिहार और आंध्र प्रदेश को आर्थिक सहायता तथा विशेष दर्जा देने का मामला खत्म होने की खबर के साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांवर यात्रा मार्ग में फल बेचने वालों के लिए जारी विवादास्पद आदेश सुप्रीम कोर्ट वारा स्थगति कर दिये जाने की खबर भी है। लेकिन यह सब अलग मुद्दा है। 

कुल मिलाकर, आज ‘खबर’ यह है कि नीट की परीक्षा 5 मई को हुई थी। प्रश्नपत्र लीक होने का मामला तभी से चल रहा है और अगर तब यह खबर छपती, इसे स्वीकार किया जाता या परीक्षा रद्द कर दी जाती तो विपक्ष को चुनाव के लिए एक मुद्दा मिल जाता और देश के मध्यमवर्गीय परिवार के बड़े हिस्से को सरकार से निराशा या नाराजगी होने की संभावना बनती। इसका असर चुनाव नतीजों पर पड़ सकता था और तब यह खबर गोपनीय रखी गई (मीडिया की मेहरबानी से यह संभव भी हुआ)। दिलचस्प यह कि परीक्षा परिणाम समय से पहले लेकिन उसी दिन घोषित किये गये जिस दिन आम चुनाव के नतीजे आये। इसका मकसद यह हो सकता है कि परीक्षा रद्द भी हो तो दोबारा जल्दी से जल्दी आयोजित हो जाये जिससे शिक्षा सत्र पर प्रभाव कम से कम पड़े। लेकिन अब जैसा आरोप है, प्रश्नपत्र लीक कराना कुछ लोगों का काम है और वे नहीं चाहते हैं कि परीक्षा रद्द हो इसलिए परीक्षा रद्द नहीं हो रही है और शिक्षा मंत्री शुरू से कह रहे हैं कि मामला प्रश्नपत्र लीक होने का नहीं है जबकि तमाम कारण उस ओर इशारा कर रहे हैं। हालांकि, अभी वह मुद्दा नहीं है।

तथ्य यह है कि सरकार ने आईआईटी मद्रास की रिपोर्ट के हवाले से यह बताने की कोशिश की कि नतीजों में ऐसा कुछ नहीं है जो प्रश्नपत्र लीक होना साबित करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शहरवार-केंद्रवार नतीजे सार्वजनिक करने के आदेश से सीकर के परीक्षा केंद्रों का कमाल दिखता है और ऐसा नहीं है कि सीकर ने पहली बार कमाल किया है। सीकर के नतीजे पहले भी ऐसे आये हैं, पहले भी प्रश्नपत्र लीक होने की शंका रही है, खबरें छपी हैं पर कुछ हुआ नहीं। इस लिहाज से सीकर का कमाल सामान्य हो सकता है पर मामला यह है कि सीकर का प्रदर्शन पिछले साल के प्रदर्शन से काफी बेहतर है और यह राष्ट्रीय औसत से मेल नहीं खाता है। दिलचस्प यह है कि सरकार की पूरी कोशिशों के बावजूद मामला ठंडा नहीं पड़ रहा है। विपक्ष ने अगर संसद में इस मामले को जोर-शोर से उठाया तो कल सुप्रीम कोर्ट में इसपर सुनवाई भी हुई। इसलिए खबरें सरकार का पीछा नहीं छोड़ रही हैं और राहुल गांधी धुन के इतने पक्के हैं कि आरएसएस पर सवाल का जवाब नहीं दे रहे हैं जबकि वह उनकी राजनीति के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।   

नीट मामले में सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प डाक्टरी तर्क दिया गया है। वह यह कि अगर लगता है कि मरीज को कैंसर है, पुष्टि नहीं हो रही है तो जोखिम नहीं लिया जायेगा। कीमो थेरापी शुरू कर दी जायेगी। जाहिर है इसका नुकसान कैंसर को निर्बाध बढ़ने देने के मुकाबले कम होगा, संभाला जा सकता है। यह भी कहा गया कि प्रश्नपत्र लीक करना कुछ लोगों का यह पेशा है और सबूत न मिले तो सब कुछ जानने के बाद यह नहीं कहा जा सकता है कि अच्छा किया, पकड़े नहीं गये। लीक होने की खबर पर परीक्षा रद्द होनी ही चाहिये थी पर चुनाव के समय शायद निर्देश नहीं मिला या निर्देश चुनाव को ध्यान में रखकर दिया गया। जो भी हो, मामला सुप्रीम कोर्ट में है और छात्रों के साथ बहुत सारे शिक्षक, अभिभावक, कोचिंग संस्थान आदि अपनी क्षमता के अनुसार इस मामले में तथ्य और तर्क दे रहे हैं। इससे मामला दिलचस्प और बहुप्रचारित हो गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्थागत विफलता साबित करने के लिए कहा है और यह हो या नहीं, आज जो खबरें और शीर्षक हैं, वही बताते हैं कि इस परीक्षा का हाल क्या है।

यह इस तथ्य से अलग है कि पिछले 10 साल में कितने प्रश्नपत्र लीक हुए, कितनी परीक्षाएं रद्द हुई, परीक्षाएं अच्छी तरह आयोजित करने के लिए सरकार ने क्या किया (या नहीं किया) और जो स्थिति है वह इसी का नतीजा है। स्थिति का पता हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में पहले पन्ने पर छपी खबरों से भी लगता है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक लगभग वही है जो द टेलीग्राफ में है। इसमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पलटवार भी शामिल है। इसलिए आइये, पहले पलटवार को ही देखें। नवोदय टाइम्स ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के आरोप और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के जवाब की एक लाइन को हाइलाइट किया है। इसके अनुसार, राहुल गांधी ने कहा है, नीट का मुद्दा उठाते रहेंगे सरकार पर दबाव बनाएंगे। धर्मेंन्द्र प्रधान ने कहा है, जमीनी हकीकत बढ़ा देगी राहुल, अखिलेश की मुश्किलें।   

मुझे नहीं पता शिक्षा मंत्री किस जमीनी हकीकत की बात कर रहे हैं पर एक जमीनी हकीकत आज अखबारों में छपी है और यह अमर उजाला में भी है। इस खबर के अनुसार इस बार की नीट-यूजी परीक्षा में एक ही प्रश्न के दो सही उत्तर होने का मामला भी है और यह प्रश्नपत्र लीक होने के संदेह से अलग, जमीनी हकीकत है। खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर तीन लोगों की एक टीम बनायें जो इस प्रश्न की जांच करके रिपोर्ट देगी। मामला यह है कि एक सवाल के दो सही जवाब हैं और जांच करने वाले ने एक ही जवाब को सही माना है और उसी के लिए अंक दिये हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लगता है कि वह सही उत्तर जानकर सही जवाब को ही अंक देना सुनिश्चित करेगा। पर वह अलग मुद्दा है। मेरा मानना है कि ऐसे विवादास्पद सवाल पूछे ही नहीं जाने चाहिये थे और यह सुनिश्चित करना परीक्षा आयोजित करने वालों का काम था और सारा विवाद बताता है कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी एनटीए इसमें नाकाम रही है।

आप जानते हैं कि एनटीए का गठन सरकार ने किया है इसके प्रमुख अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं और जब प्रमुख का यह मामला सार्वजनिक हो गया तो सरकार ने एक आईएएस प्रमुख को हटाकर कार्रवाई करने का प्रचार कर लिया। शुरू में इस मामले की जांच बिहार पुलिस कर रही थी उसने आरोप लगाया था कि एनटीए जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। इसके बाद मामला सीबीआई को दे दिया गया और एनटीए अपने बचाव में लग गया। आईआईटी मद्रास की रिपोर्ट इसका उदाहरण है। बिहार में जांच और गिरफ्तारियों को तेजस्वी यादव से जोड़ने की कोशिश हुई है, हजारीबाग के एक मुस्लिम प्राचार्य और उनके मुस्लिम सहयोगी तथा मुस्लिम पत्रकार की गिरफ्तारी के बाद इसे मुस्लिम एंगल देने की कोशिश भी हो चुकी है। पर प्रश्नपत्र के सवाल और उसके जवाब सबसे दिलचस्प हैं।  

द हिन्दू की खबर के अनुसार इस सवाल के चार अंक दिये गये हैं और आईआईटी से मिलने वाला जवाब चार लाख से ज्यादा उम्मीदवारों के कुल अंकों को प्रभावित करेगा और इनमें वो 44 छात्र ही होंगे जिन्हें अंततः 720 में 720 यानी शत प्रतिशत अंक प्राप्त हुए हैं या दिये गये हैं। ऐटम से संबंधित इस सवाल के दो जवाब हैं और इस वस्तुनिष्ट प्रश्न के चार जवाबों में दोनों सही जवाबों का विकल्प था। ऐसे में 4.2 लाख छात्रों ने एनसीईआरटी की पुरानी किताबों के अनुसार सही जवाब को चुना और 9.28 लाख छात्रों ने एनसीईआरटी की नई किताबों के आधार पर सही जबाव चुना है। यहां यह विवाद तो हो ही सकता है कि दोनों सही जवाब को सही माना जाये, किस एक को सही माना जाये पर आसान तो यही होता कि ऐसा सवाल पूछा ही नहीं जाता। यह तब संभव होता जब प्रश्नपत्र तैयार करने वालों को मामले की जानकारी होती। अगर होती तो कोई भी ऐसे विवादास्पद सवाल को नहीं रहने देता। फिर भी शिक्षा मंत्री ने जमीनी हकीकत की बात की है तो आपको बता दूं कि राहुल गांधी ने कहा है, परीक्षा प्रणाली में बहुत खामियां हैं। मंत्री ने अपने आपको छोड़कर सबको जिम्मेदार ठहराया है ….. मुझे नहीं लगता कि जो चल रहा है उसकी बुनियादी जानकारी भी उन्हें है।  

यहां यह बताना दिलचस्प है कि अपने तथाकथित पलटवार में शिक्षा मंत्री ने सवाल किया कि क्या 2010 में (जी हां, 2024 में 2010) कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने शिक्षा में सुधार से  जुड़ा विधेयक निजी मेडिकल कालेजों के दबाव में वापस ले लिया था? मुझे नहीं पता कि ले लिया था तो उसका अब के सवाल या विवाद से क्या संबंध हो सकता है और अगर वापस लेना गलत था तो 2014 से भाजपा की सरकार है उसने फिर से लागू क्यों नहीं किया और अगर उसी से गड़बड़ी नहीं होनी थी तो एनटीए किसलिये बनाया गया और उससे आईएएस अफसर को हटाकर अब की सरकार ने क्या साबित किया। अखबार (नवोदय टाइम्स) ने इस बारे में कुछ नहीं बताया है। आपको बता दूं कि 2010 में शिक्षा मंत्री कपिल सिबल थे और शिक्षा राज्य मंत्री दग्गुबती पुरन्देश्वरी थीं। धर्मेंद्र प्रधान के मुकाबले कपिल सिबल आपको अयोग्य लगते हों तो मैं कुछ नहीं कर सकता। वैसे ऐसा दावा धर्मेंद्र प्रधान ने भी नहीं किया है। 2014 में शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी थीं। उनने 2010 में वापस लिये गये विधेयक को (अगर जरूरी था) तो 2014 में क्यों नहीं लागू किया यह वही बता सकती हैं। मैं इंजतार करूंगा।

इसके अलावा आज की कुछ और प्रमुख खबरें इस प्रकार हैं :

1. इंडियन एक्सप्रेस

– आरएसएस से संबंधित केंद्र के आदेश को लेकर विवाद : विपक्ष ने कहा दफ्तर, स्टाफ का राजनीतिकरण किया जा रहा है।

– आईएएस प्रशिक्षु और परिवार कृषि से खेती तक की 8 फर्मों के केंद्र में जो रिश्तेदारों, मित्रों से जुड़े हैं।

2. हिन्दुस्तान टाइम्स

– अनुसूचित जाति / जनजाति कल्याण कोष के धन का उपयोग धार्मिक जगहों, गायों के लिए किया गया

– कांवर यात्रा मार्ग में नाम की पट्टी लगाने का आदेश स्थगित, विपक्ष ने फैसले का स्वागत किया, भाजपा पर हल्ला बोला

3. द हिन्दू

– ‘अवैध’ शपथग्रहण पर पश्चिम बंगाल के राजभवन ने तृणमूल कांग्रेस के दो नव निर्वाचित विधायकों पर जुर्माना लगाया

– हाथरस सामूहिक बलात्कार पीड़ित का परिवार दैनिक आवाजाही में मुश्किलों का सामना कर रहा है, उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक उन्हें दूसरी जगह स्थानांतरित नहीं किया है

4. टाइम्स ऑफ इंडिया

– सर्वेक्षण अर्थव्यवस्था को लेकर उत्साहित है, व्यापार के लिए अधिक स्वतंत्रता का समर्थन करता है। यह विडंबना ही है कि ऐसा तब किया गया है जब सरकार ईज ऑप डूइंग बिजनेस का प्रचार कर रही है। इसका पता कांवर मार्ग के लिए आदेश से लगता है और सरकार ने नियमों में जो बदलाव किये हैं उनकी कहानी अपनी जगह है ही।

– राहुल ने कहा कि पूरी परीक्षा प्रणाली एक ‘फ्रॉड’ है; प्रधान ने जवाब दिया हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नही है। इसके साथ अखबार ने दो कॉलम के शीर्षक से छापा है, “विपक्ष ने मेरी आवाज दबाने की कोशिश की : संसद में प्रधानमंत्री”। प्रधानमंत्री का यह बयान आज मेरे किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है।      

5. द टेलीग्राफ

ट्रेलर खत्म हुआ, वास्तविकता अब खुलकर सामने है (लीड का फ्लैग शीर्षक) मुख्य शीर्षक है, मोदी ने सरकार और आरएसएस के बीच के विभाजन को खत्म किया। अखबार ने अपनी इस मुख्य खबर के साथ बताया है कि खाकी निकर का इतिहास उतार-चढ़ाव वाला रहा है। यह खबर आरएसएस की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों के शामिल होने पर लगा प्रतिबंध हटा लिये जाने से संबंधित है। यह 9 जुलाई का आदेश है जो कल सार्वजनक हुआ। अगले साल आरएसएस का शताब्दी वर्ष है और ऐसे में इस आदेश का खास मतलब है। अब जब आदेश आ गया है तो आरएसएस प्रमुख के दो बयान याद करने योग्य हैं। एक है, राक्षसों की प्रवृत्ति हर चीज पर नियंत्रण रखने की होती है। इससे पहले झारखंड के गुमला में उन्होंने कहा था, एक आदमी सुपरमैन बनना चाहता है, फिर एक देव और फिर भगवान। आंतरिक और बाह्य दोनों ही प्रकार के विकासों का कोई अंत नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है। बहुत कुछ किया जा चुका है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बाकी है।

6. अमर उजाला  

भर्ती घोटाला : असम लोकसेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष पॉल व 33 अन्य दोषो करार, कोर्ट ने कहा – भर्ती को बनाया मजाक।

7. नवोदय टाइम्स

– पूर्व सैनिक ने मां, भाई, बच्चों समेत परिवार के छह लोगों को मार डाला।  

– संघ से प्रतिबंध हटाने का स्वागत, विपक्ष ने मचाई रार

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