
संजय कुमार सिंह
द टेलीग्राफ की आज की एक खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, “सिरदर्द हसीना :मेजबानी करें या वापस भेजें”। दूसरी खबर अमर उजाला में लीड और टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है। अमर उजाला में शीर्षक है, पाकिस्तान से अब बातचीत का युग खत्म, उसी की भाषा में देंगे जवाब। उपशीर्षक है, विदेशमंत्री जयशंकर ने कहा, बांग्लादेश के साथ आपसी हितों का तलाशना होगा आधार। आप जानते हैं कि शेख हसीना का मामला अभी सिरदर्द न भी हो तो आगे हो सकता है। उस पर सरकार क्या कर रही है, पता नहीं है। दूसरी ओर, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मामले में विदेश मंत्री ने यह राय जताई है। आप जानते हैं कि कांग्रेस और उसकी सरकार को नाकारा साबित करने का कोई मौका नरेन्द्र मोदी नहीं छोड़ते हैं और नरेन्द्र मोदी की टीम में कोई विदेशी मामलों का एक्सपर्ट नहीं है। श्री जयशंकर नौकरशाह रहे हैं और रिटायर होने के बाद से लगभग अपनी शर्तों पर विदेश मंत्री का काम कर रहे हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस की सरकार ने जरूरत पर उपयुक्त समझकर अटल बिहारी वाजपेयी को भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था।
मेरी शिकायत विदेश मंत्री से नहीं, भारत सरकार से है और इसलिए है कि यह तमाम मामले को अपने आप टल जाने का इंतजार करती दिखती है। मीडिया उसकी चर्चा नहीं करता और जब करता है तो सरकार को सक्षम बताने के लिये। इंडियन एक्सप्रेस की कल की लीड के बाद आज द टेलीग्राफ ने बांग्लादेश मामले को याद किया है तो आज अखबारों ने विदेशमंत्री जयशंकर के बयान को महत्व दिया है। ऐसे में पेश है टेलीग्राफ की खबर का गूगल अनुवाद। आपकी सुविधा के लिए मैंने इसका संपादन कर दिया है। देवदीप पुरोहित की बाईलाइन वाली इस खबर को कूटनीतिक दुविधा कहा गया है। इसके अनुसार, इस समय भारत की शरण में रह रही अपदस्थ बांग्लादेशी नेता शेख हसीना वाजेद, नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक मुश्किल हैं। सरकार उन्हें प्रत्यर्पित करने के लिए ढाका में बढ़ती राजनीतिक मांगों के आगे झुकने को तैयार नहीं है। वह उनकी मेजबानी करते रहने के प्रतिकूल नतीजों से भी समान रूप से अवगत है।
5 अगस्त को हिंसक विद्रोह के बीच बांग्लादेश से भागकर दिल्ली के पास हिंडन एयरबेस पर उतरने के बाद से हसीना भारत में किसी अज्ञात लेकिन सुरक्षित स्थान पर रह रही हैं। विदेश मंत्रालय (एमईए) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को इन सवालों को टाल दिया कि क्या हसीना का राजनयिक पासपोर्ट रद्द किया जा रहा है और क्या उनके निर्वासन के लिए कोई आधिकारिक मांग आई है। जायसवाल ने कहा, “आपने जो पूछा है वह परिकल्पना के दायरे में है और काल्पनिक सवालों का जवाब देना हमारा काम नहीं है।” बांग्लादेशी मीडिया के एक हिस्से ने विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया को एक विचलित करने वाली रणनीति के रूप में चित्रित किया और हसीना को शरण देने के लिए भारत की आलोचना की, दोनों देशों के वरिष्ठ राजनेताओं के साथ बातचीत से पता चला कि प्रत्यर्पण वास्तव में अभी एक काल्पनिक प्रश्न है।
हसीना पर हत्या से लेकर मानवता के खिलाफ अपराध तक के 100 से अधिक मामले दर्ज हैं। “यह मुहम्मद युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्यर्पण की मांग करे और उन्हें इसकी मांग करनी चाहिये। शेख हसीना की अवामी लीग की मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने इस संवाददाता को फोन पर बताया, “हम यूनुस से उनके प्रत्यर्पण की मांग करने को कहते हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए।” आप समझ सकते हैं कि इस मामले में चुप्पी से कुछ हल होने वाला नहीं है। उसी तरह पाकिस्तान से बातचीत का युग खत्म होने का मतलब युद्ध नहीं है? अगर हां तो इसे साफ-साफ क्यों नहीं बताना चाहिये और नहीं है तो क्यों, यह कैसे समझ में आयेगा।
संदिग्ध न्याय व्यवस्था
आज की दूसरी बड़ी खबर है, 1984 के सिख दंगा मामले में अदालत ने कहा है कि कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर पर अभियोग तय किया जाए। अदालत के अनुसार इस मामले में पर्यापत सबूत है। आज यह खबर इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर के साथ बताया है कि इस मामले में सीबीआई की तीन क्लोजर रिपोर्ट खारिज कर दी गई है। आप जानते हैं कि यही सीबीआई इस समय की सरकार की पार्टी की शाखा के रूप में काम कर रही है पर वह अलग मुद्दा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित विवरण के अनुसार अप्रैल 2013 में सत्र न्यायालय ने सीबीआई की दूसरी क्लोजर रिपोर्ट को नहीं माना था और आगे जांच का निर्देश दिया था। दिसंबर 2014 में सीबीआई ने तीसरी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की, टाइटलर को क्लीन चिट दी। दूसरी ओर, ऐसे ही क्लीन चिट को भुनाया जाता है। कई मामलों में वह सुप्रीम कोर्ट का नहीं है और
क्लीन चिट के खिलाफ ऊपर की अदालत में अपील करनी है कि नहीं, इस संबंध में कोई स्पष्ट नीति नहीं है। फैसला कौन करेगा, किस स्तर पर तय होगा यह सुनिश्चित कर दिया जाये तो भी सरकार बदलने पर यह राजनीति से मुक्त कैसे हो यह भी विचारणीय मुद्दा है। पर मामला अभी उससे पहले ही उलझा हआ है। अभी यह मामले के आधार पर तय किया जाता है। टाइटलर के मामले में दिसंबर 2015 में हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को खारिज कर दिया और जांच को जारी रखने का आदेश दिया। 2018 में हाईकोर्ट ने पुल बंगश मामले की फिर से जांच के आदेश दिये। जांच और चार्जशीट क बाद अब हाईकोर्ट ने आरोप तय करने के आदेश दिये हैं। साफ दिख रहा है कि कांग्रेस के शासन में सीबीआई ने टाइटलर को छोड़ दिया भाजपा के शासन में फिर से आरोप तय करने के आदेश हैं।
इससे भाजपा की ईमानदारी नहीं, सीबीआई की निष्ठा का पता चलता है। सीबीआई ने 10 साल में भाजपा के किसी नेता के खिलाफ भी कार्रवाई की होती तो ऐसा नहीं लगता। पर जो है सो सामने है और आपको वही पता चलेगा जो मीडिया बतायेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया है वह ऊपर है। आपका अखबार क्या कहता है वह आप देखिये और समझिये। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि गुजरात दंगे से संबंधित 11 याचिकाओं का सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2022 में निपटारा कर दिया था। ये गुजरात में गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने वाली याचिकाएं थीं जो 2002-2003 से लंबित थीं। न्यायालय ने कहा कि मामले में बाद के घटनाक्रमों के मद्देनजर ये याचिकाएं निरर्थक हो गई हैं।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ समय निकल जाने के कारण अपेक्षाकृत कम पुराने मामलों को निरर्थक करार दिया जबकि उससे पहले के मामले को सीबीआई ने जिन्दा कर दिया है। दोनों मामलों का संबंध अगर सत्तारूढ़ पार्टी से नहीं है तो क्या अदालत के फैसलों के रूप में विचार करने योग्य नहीं है। कानून मेरा विषय नहीं है लेकिन जिसका है उसे इसपर ध्यान देना चाहिये। अदालत की (और सीबीआई की भी) निष्पक्षता पर सवाल न उठे इसके लिए यह जरूरी है। शंका के कारणों की चर्चा यहां जरूरी नहीं है क्योंकि सब कुछ सार्वजनिक है। कांग्रेस नेता और जगदीश टाइटलर से संबंधित फैसले से मुझे लगता है कि 42 साल तक न्याय नहीं होना, सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को नहीं माना जाना अगर मी़डिया के लिए मुद्दा नहीं है तो एसआईटी की रिपोर्ट को चुनौती भी मुद्दा नहीं रही। जो भी हो अदालतों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होना चाहिये और अगर इसमें संदेह है तो मीडिया के लिए मुद्दा होना चाहिये। पर नहीं है तो समझना मुश्किल है कि मुद्दा है नहीं या किसी कारण से नहीं है।
कारण अगर हो तो वह सरकार की कार्यशैली और मनमानी होगी। पर कार्यशैली से संबंधित एक और मामला आज लीड और सेकेंड लीड है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, पहली तिमाही में झटका डीपी उम्मीद से नीचे। उपशीर्षक है, आठ बनियादी उद्योगों में सुस्त रही रफ्तार। आज यह खबर इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। खबरों में बताया गया है कि वित्तवर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी में वृद्धि अनुमान से कम 6.7 प्रतिशत रही। यह पिछली पांच तिमाही में सबसे कम है। जाहिर है, इस सरकार में व्वस्था ऐसी है कि जीडीपी विकास नुमान से कम है। भाजपा नेताओं के खिलाफ मामलों में क्लीन चिट आम है जबकि विपक्षी नेताओं के खिलाफ न सिर्फ पुराने मामले भी जिन्दा हैं (और अपने खत्म करा लिये) बल्कि पीएमएल कानून भी आ गया है। भिन्न मामलों में अदालतों की भूमिका संदेह से परे नहीं है और यह साफ है कि सारा जोर विपक्षी नेताओं के खिलाफ है। भाजपा के लोग तो पॉस्को मामले में भी कवच पा जाते है पर रेल यात्रियों के लिये योजना बननी है।
प्रधानमंत्री का माफी मांगना
आज की एक खबर प्रधानमंत्री का माफी मांगना भी है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में यह खबर प्रमुखता से है। अंग्रेजी के अखबारों में यह टाइम्स ऑफ इंडिया में दो कॉलम में, हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू में चार कॉलम में है। लाइव हिन्दुस्तान डॉट कॉम की खबर के अनुसार, पीएम मोदी ने कहा, ‘मैं आज सिर झुकाकर अपने आराध्य देव शिवाजी से माफी मांगता हूं। उनके चरणों में सिर झुकाकर माफी मांगता हूं। हमारे संस्कार अलग हैं। हम वे लोग नहीं हैं, जो आए दिन भारत मां के महान सपूत वीर सावरकर को अनाप-शनाप गालियां देते रहते हैं।’ कहने की जरूरत नहीं है कि वीर सावरकर को गाली देना और परमात्मा प्रेषित का शिवाजी को परमात्मा कहना और चरणों में सिर झुकाकर माफी मांगना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं।
माफी इसलिए मांगनी पड़ रही है कि ना खाउंगा ना खाने दूंगा के बावजूद छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा लगाने में भ्रष्टाचार हुआ और इस कराण पिछले दिनों प्रतिमा गिर गई थी। यह ‘आराध्य देव’ की प्रतिमा बनवाने में भ्रषटाचार की पोल खुल जाने का मामला है और माफी मांगने वाले वीर सावरकर को माफी वीर कहने से बहुत अलग है। सिंधुदुर्ग के किले में शिवाजी महाराज की जो प्रतिमा गिरी है, उसका उद्घाटन खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने ही नौसेना के एक कार्यक्रम के दौरान किया था। इस घटना को लेकर एनडीए पर विपक्ष निशाना साध रहा था। उद्धव सेना के नेता संजय राउत ने तो कहा था कि शिवाजी महाराज का ऐसा अपमान मुगलों ने भी नहीं किया था।
जूनियर डॉक्टर की हड़ताल द टेलीग्राफ में आज भी कोलकाता में जूनियर डॉक्टर की हड़ताल को लेकर लीड है। अखबार की लीड का शीर्षक है, “अगला कार्यस्थल : लाल बाजार”। असल में लाल बाजार कोलकाता पुलिस का मुख्यालय है और अब वे वहां मार्च करने वाले हैं उनकी मांग कोलकाता के पुलिस प्रमुख के इस्तीफे की है। आप समझ सकते हैं कि कार्यस्थल पर बलात्कार और हत्या के इस एक मामले ने न सिर्फ चिकित्सकों को आंदोलित कर रखा है, राष्ट्रपति भी कह चुकी हैं कि बहुत हुआ और वे भयभीत हैं। इससे पहले देश के उपराष्ट्रपति ने कहा था कि मुसलमान डरे हुए हैं। अह राष्ट्रपति खुद डरी हुई हैं पर प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देंगे। उनसे कोई मांग भी नहीं रहा है। यह स्थिति है जो बहुत कुछ जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली है।


