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आज के अखबार : विदेश मंत्री के इस्लामाबाद जाने की खबर ऐसे छपी है जैसे कोई बड़ी रणनीति या उपलब्धि

संजय कुमार सिंह

आज दो बड़ी खबरें हैं, विदेश मंत्री जयशंकर पाकिस्तान जायेंगे और छत्तीसगढ़ में 28 माओवादी मारे गये। ज्यादातर अखबारों में दोनों खबरें पहले पन्ने पर हैं। इंडियन एक्सप्रेस में माओवादियों को मारने की खबर दो कॉलम में लीड है जबकि जयशंकर के पाकिस्तान जाने की खबर पांच कॉलम में है। इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में बताया है कि वे एससीओ मीटिंग के लिए पाकिस्तान जायेंगे और 9 साल पहले सुषमा स्वराज के दौरे के बाद पहला होगा। नौ साल का समय वैसे चाहे जितना ज्यादा या कम हो।

नरेन्द्र मोदी लगातार प्रधानमंत्री हैं और अगर नौ साल विदेश मंत्री नहीं गये तो अब विदेशमंत्री क्यों जा रहे हैं और कोई नहीं भूला होगा कि दिसंबर 2015 में अफगानिस्तान से लौटते हुए प्रधानमंत्री अचानक लाहौर में रुक गये थे और सबको चौंकाने का काम किया था। अगर पाकिस्तान का संबंध आतंकवाद से है तो 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पुलवामा हुआ और नरेन्द्र मोदी को उसका लाभ मिला या उन्होंने उसका लाभ उठाया। अब यह सब किसी से छिपा हुआ नहीं है और भारत अपने हवाई हमले में 300 से ज्यादा आतंकवादियों को मार डालने का दावा पहले ही कर चुका है। फिर भी आज इस खबर को ऐसे पेश किया गया है जैसे जयशंकर का जाना कोई बड़ी उपलब्धि या बदलाव हो। अगर ऐसा कुछ है भी तो नरेन्द्र मोदी की योजना का हिस्सा है और इसका सिर-पैर समझना मुश्किल है। बताया तो नहीं ही गया है।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी खबर के साथ पाकिस्तान के साथ संबंधों की खास बातें छापी हैं और इसका शीर्षक लगाया है, क्या यह कोई महत्वपूर्ण मौका है? दि एशियन एज़ ने इसे पांच कॉलम में छापा है, एससीओ अक्तूबर 15-16 के लिए जयशंकर पाकिस्तान जायेंगे। यहां उपशीर्षक में दो बिन्दु हैं, 1. नौ साल में जाने वाले पहले भारतीय विदेश मंत्री 2. किसी द्विपक्षीय बैठक की उम्मीद नहीं। जाहिर है, एससीओ बैठक में जा रहे हैं और पाकिस्तान के साथ किसी द्विपक्षीय बैठक की उम्मीद नहीं है। ऐसे में जाने से कुछ खास होना भी नहीं है और जाना बहुत औपचारिक है। इसलिए, खबर के रूप में यह लिखते हुए कि नौ साल में पहली बार जा रहे हैं यह बताया जाना चाहिये था कि बीच के समय कोई विदेश मंत्री क्यों नहीं गये। अगर भारत ने पाकिस्तान से कुट्टी कर ली है तो वह भी बताया जाना चाहिये। लेकिन खबर से तो लगता है कि कोई मौका नहीं आया तो नहीं गया वरना बिना बुलाये जा ही चुके हैं और इस बार बुलाया गया था तो प्रधानमंत्री नहीं जा रहे हैं, विदेश मंत्री जा रहे हैं। यह भी ‘पहली बार’ जैसा कोई बड़ा मामला नहीं है।

आप जानते हैं कि हरियाणा में आज मतदान है और संभव है भाजपा सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बहुत बड़े रणनीतिकार या विजयी जैसी छवि देने की सेवा में ऐसी प्रस्तुति हुई हो। यह इरादतन न भी हो तो लग ऐसा ही रहा है। इससे पहले कि दूसरे शीर्षक से हम यह जानने समझने की कोशिश करें कि अखबारों ने अपनी तरफ से कुछ जानने-बताने की कोशिश की है या वही परोस दिया है जो सरकार ने चाहा या बताया, दि एशियन एज की लीड की चर्चा कर लेना उपयुक्त रहेगा। इस खबर के अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा है, भारत अच्छी स्थिति में है, आर्थिक विकास जारी रहेगा। यह मुख्य शीर्षक है जबकि फ्लैग शीर्षक है, मोदी के तीसरे कार्यकाल का फोकस रोजगार, कौशल, द्रुत विस्तार है। इस खबर से जाहिर है कि तीसरे कार्यकाल के फोकस से भारत अपना कथित आर्थिक विकास जारी रखेगा और जैसा प्रधानमंत्री ने कहा है, भारत अच्छी स्थिति में है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका कोई आधार या आंकड़ा नहीं है और प्रधानमंत्री का दावा सिर्फ प्रचार है और इसके अलावा कुछ नहीं। वे कौटिल्य एनक्लेव में बोल रहे थे और ऐसे ही आयोजनों पर वे तरह-तरह की कहानियां सुनाते रहे हैं और तालियां भी बजती रही हैं। वास्तविकता जो है वह अपनी जगह है।

दि एशियन एज की इस खबर के साथ एक खबर यह भी है कि प्रधानमंत्री आज महाराष्ट्र के लिए 56 हजार करोड़ की परियोजनाएं शुरू करेंगे। आप जानते हैं कि चुनावी राज्यों के लिए वे लगातार ऐसी घोषणाएं करते रहते हैं और इन घोषणाओं का क्या होता है। माओवादियों को मारने की खबर सेकेंड लीड है। विदेशमंत्री के दौरे की खबर की चर्चा पहले कर चुका हूं। टाइम्स ऑफ इंडिया में विदेश मंत्री के दौरे की खबर तीन कॉलम की लीड है। इसका इंट्रो है, भारत ने एससीओ बैठक के लिए जयशंकर को भेजने का विकल्प चुना न कि कनिष्ठ मंत्री को। एक दूसरी खबर का शीर्षक है, भगोड़े जाकिर नाइक की मेजबानी के लिए भारत ने पाकिस्तान की आलोचना की। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत अगर भगोड़े जाकिर नाइक का पाकिस्तान में गर्मजोशी से स्वागत किये जाने पर कड़ी आपत्ति जता रहा है तो उसके पास पाकिस्तान नहीं जाने का कारण है। प्रधानमंत्री नहीं जा रहे हैं औऱ विदेश मंत्री जा रहे हैं तो यह विरोध हो सकता है पर खबरें ऐसे पेश की गई हैं जैसे इस दौरे से कुछ अच्छा होने की उम्मीद है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की स्थिति बहुत खराब हो जायेगी या ऐसा ही कुछ। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार भारत के पास इस बैठक में ‘वर्चुअली’ शामिल होने का भी विकल्प था।  

इस मामले को ठीक से समझने की कोशिश में मुझे पत्रिका डॉट कॉम की एक खबर मिली। शीर्षक है, पीएम मोदी नहीं जाएंगे पाकिस्तान, जानिए कैसे पाक को उसके ही घर में बेनकाब करेगा भारत। पाकिस्तान में 15-16 अक्तूबर को होने वाली एससीओ समिट में शामिल होने के लिए शहबाज़ शरीफ ने पीएम मोदी को निमंत्रण दिया था, जिसे पीएम मोदी ने अस्वीकार कर दिया है। खबर के अनुसार, मोदी ने पाकिस्तान के नापाक हरकतों से बाज़ ना आने तक पाकिस्तान से कोई भी संबंध ना रखने को लेकर इस यात्रा से मना कर दिया है। विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव ने पीएम मोदी की यात्रा पर बड़ा खुलासा करते हुए कहा है कि पीएम मोदी पाकिस्तान नहीं जाएंगे। ऐसा भी नहीं है कि भारत एससीओ जैसे ग्रुप के शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए पाकिस्तान जाएंगे और इस समिट में हिस्सा लेंगे। वैसे तो यह राष्ट्राध्यक्षों की बैठक है, लेकिन प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति जानबूझकर किए गए कमतर आंकलन को दर्शाती है। ये महत्वपूर्ण है कि जयशंकर इसमें शामिल हो रहे हैं, लेकिन ये भी साफ है कि पाकिस्तान की हरकतों को देखते हुए भारत ने इस आयोजन को उतनी प्राथमिकता नहीं दी है। यहां मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया का इंट्रो समझ में नहीं आ रहा है। द हिन्दू की खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, एससीओ के सरकार प्रमुखों की बैठक में भाग लेने जयशंकर पाकिस्तान जायेगे।

यह एक सामान्य शीर्षक है और स्पष्ट है कि समय और स्थितियों के अनुकूल एक सामान्य निर्णय लिया गया है पर कुछेक अखबारों की प्रस्तुति से लग रहा है कि वह सरकार की सेवा में सरकार से भी आगे निकल जाने की कोशिश कर रहे हैं। नवोदय टाइम्स में यह तीन कॉलम में लीड है। शीर्षक तो सामान्य है लेकिन यहां भी इंट्रो है, नौ साल बाद किसी विदेश मंत्री की होगी पाक यात्रा। सिगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, भारत का बड़ा फैसला। मुझे ऐसा नहीं लगता है और संभव है, विज्ञप्ति में जो लिखा हो उसी आधार पर शीर्षक, उपशीर्षक और हाईलाइट करने के लिए अन्य बातें चुनी गई हों। यात्रा नौ साल बाद हो रही है और आतंकवाद नहीं रुकने के कारण प्रधानमंत्री नहीं जा रहे हैं तो उसका खबर में प्रत्यक्ष व स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये था। अगर प्रधानमंत्री के नहीं जाने का कोई कारण है तो उसे स्वीकार करना होगा मकसद है तो बताना भी चाहिये और यह सब कायदे से किया जाना चाहिये। ऐसे नहीं कि एक अखबार कुछ कहे और दूसरे में कुछ दिखे।

संभव है यह यह मोदी सरकार की नीति के तहत किया गया हो। अगर ऐसा है तो इसे स्पष्ट बताना चाहिये ताकि अखबार अटकल ना लगायें और विदेश मामलों में सरकार की छवि खराब या कमजोर की न बने। सरकार को ऐसे मामलों का मीडिया का सहयोग खुलकर मांगना चाहिये और मीडिया को भी देशहित में ऐसा करना चाहिये। हालांकि वह अलग मुद्दा है। जहां तक पाकिस्तान से भारत के संबंध की बात है, तीन खबरें देखिये 

1. जीओसी का दावा, कश्मीर में आतंकवाद ले रहां अंतिम सांस, केवल 80 आतंकी बचे – 04 अक्तूबर 2024

2. आतंकवाद को दफना दिया गया है, अब लौटने नहीं देंगे – अमित शाह 25 सितंबर 2024

3. जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के बीच पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर पलटवार किया। उन्होंने पूछा था, 370 हटने बाद क्या खत्म हो गया आतंकवाद? 08 सितंबर 2024

इस संबंध में 29 सितंबर को मैंने यहां लिखा था, फारूक अब्दुल्ला ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर पलटवार किया। 29 सितंबर को मैंने लिखा था, ना आतंकवाद खत्म हुआ, ना घुसपैठ रुकी; बलात्कारी ही नहीं, ‘बल्लेबाज’ भी बचाये जाते रहे! अब पता चला कि फारुक अब्दुल्ला कहा कि उनकी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन सत्ता में आया तो जम्मू कश्मीर को फिर राज्य बनाने का वादा पूरा किया जायेगा। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से आतंकवाद को खत्म करने में कामयाब रहे। फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि जिस भारत को वो बनाना चाहते हैं, हम उस भारत के खिलाफ हैं। भारत सभी का है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और अन्य सभी लोग इसमें रहते हैं। जो लोग मुसलमानों पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए कि मुसलमानों ने भी आजादी के लिए अहम भूमिका निभाई थी और अपनी जानें भी गवाईं थी। मोदी सरकार और उनके समर्थक प्रचारक अपनी इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए सत्ता में बने रहना चाहते हैं और इसके लिए न सिर्फ हवा-हवाई प्रचार कर रहे हैं बल्कि विपक्ष के सभी नेताओं को बदनाम किया जा रहा है और इसमें राहुल गांधी की आलोचना खास है।

दो उदाहरण ट्वीटर से देता हूं। इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा ने एक्स पर लिखा है, “दिल्ली में 5600 करोड़ की ड्रग्स का पकड़ा जाना, एक सीरियस इश्यू  है। इसके सप्लायर का कांग्रेस से कनेक्शन मिलना और भी गंभीर बात है। ये सही है किसी के साथ तस्वीरें होना नेताओं के संबंध होने का सबूत नहीं होता, पर हैरानी की बात ये है राहुल गांधी ने आज हरियाणा में ड्रग्स का ज़िक्र तो किया पर अडानी के पोर्ट पर कई साल पहले पकड़ी गई ड्रग्स को लेकर। कल रात दिल्ली में बरामद हुई 500 किलो कोकेन को वो गोल कर गए। (प्रधानमंत्री ही नहीं पूरी सरकार और तमाम सरकारी एजेंसियों ने गोल कर रखा है सो नहीं)  अगर मसला उठाया ही था तो ताज़ा इश्यू की बात भी करते। कांग्रेस और सप्लायर के रिश्ते पर भी सफाई देते।”

स्पष्ट है कि रजत शर्मा अपने आका की तारीफ में राहुल गांधी की आलोचना कर रहे हैं वरना करोड़ों की ड्रग्स बरामदगी जैसे सीरियस इश्यू पर प्रधानमंत्री को बोलना चाहिये या विपक्ष के नेता को? राहुल गांधी ने ड्रग्स के मुद्दे को उठाया आप बाकी चीजें भी सामने ले आइये। इसमें यह भी कि नरेन्द्र मोदी या प्रधानमंत्री ने इसपर कुछ नहीं कहा है और राहुल गांधी बोल रहे हैं। पर नरेन्द्र मोदी तो छोड़िये अदाणी की भी चर्चा नहीं है और राहुल गांधी की आलोचना है जबकि उनकी तारीफ होनी चाहिये कि वे किसी पूर्व कांग्रेसी के कथित रूप से शामिल होने के बावजूद मुद्दे को छोड़ नहीं रहे हैं। मैंने इसपर लिखा था, बचाव छोड़िये। पहले आरोप तो लगाइये कि कांग्रेस से संबंध हैं। मुझे तो आरोप का पता आपसे चल रहा है। वे चर्चा करते तो आप चोर की दाढ़ी में तिनका कहते। उन्होंने अदाणी का नाम लिया है आप उनका नाम लीजिये – खुलकर आइये। लुका-छिपी क्यों। अदाणी पोर्ट वाले मामले में आप क्या कहते हैं? रजत शर्मा का यह ट्वीट 3 अक्तूबर 2024 को रात 1054 पर किया गया है। आज 5 अक्तूबर को दिन में 1.30 बजे तक भाजपा या सरकार या किसी सरकारी एजेंसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया है। इसपर कार्रवाई की कोई खबर मुझे नहीं दिखी है।

ऐसे राहुल गांधी के खिलाफ किरेन रिजिजू ने कहा है और पीटीआई न्यूज ने ट्वीट किया है, “राहुल गांधी जैसे व्यक्ति का विपक्ष के नेता के रूप में होना हमारे देश के लिए अभिशाप है। जिस व्यक्ति ने न तो संविधान पढ़ा है और न ही इसकी भावना को समझता है, ऐसे व्यक्ति के लिए ‘संविधान’ शब्द बोलना भी अपमान है। ‘मेरा मानना ​​है कि उनके जैसे किसी व्यक्ति के लिए संविधान को छूना भी अनुचित है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि ऐसा व्यक्ति नेता प्रतिपक्ष बन गया है, और मुझे उससे निपटना होगा। इसपर मेरा कहना है कि किरेन रिजिजू भाजपा के उन नेताओं में हैं जो 2015 में ही सरेआम बीफ खाना स्वीकार कर चुके हैं और उसके बाद भाजपाइयों की मेहरबानी से कितने कथित गो तस्कर लिंच किये जा चुके हैं। गलती से एक ब्राह्मण भी मारा जा चुका है पर वे भाजपा में बने हुए हैं। मंत्री रहे हैं। अब उनसे ऐसा काम कराया जा रहा है औऱ वे कर रहे हैं जबकि उन्हें खाने की पसंद में हस्तक्षेप के लिए भाजपा का विरोध करना चाहिये। राहुल गांधी अगर विपक्ष के नेता हैं तो जनता की पसंद हैं और यह वैसे ही है जैसे नरेन्द्र मोदी या खुद किरेन रिजिजू हैं। ऐसा नहीं है कि किसी ने बहुमत के नाम पर निर्वाचित मुख्यमंत्री के ऊपर किसी को बैठा दिया है जो संवैधानिक पद पर होने के नाते मार पीट के मुकदमे पर कार्रवाई से आजाद है। किरेण रिजिजू ये सब समझते तो ऐसा बोलते? यही भाजपा की राजनीति है।

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