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आज के अखबार : साक्षी मलिक की आत्मकथा, ‘विटनेस’ का जिक्र द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर

संजय कुमार सिंह

आज का दिन कश्मीर में आतंकी हिन्सा, विमान में बम की झूठी खबर, दिल्ली में विस्फोट और भाजपा के चुनाव प्रचार का है। कबाब में हड्डी एक खबर है और वह है साक्षी मलिक की किताब का उल्लेख। खबर का शीर्षक है, राज्य सत्ता से टक्कर लेने वाली साक्षी।खराब राजनीतिक हालत के बावजूद भाजपा की जीत का ठीकरा भले ईवीएम के सिर फूटता रहा हो, जब आरोपों का कोई ठोस या संतोषजनक जवाब नहीं है तब भी झारखंड और हरियाणा के चुनाव की घोषणा हो गई तो विपक्ष क्या करे? इस चिन्ता से संबंधित कोई खबर नहीं है। ऐसे चुनाव का क्या मतलब होगा इसकी कोई चर्चा नहीं है। तब विपक्ष क्या करे बायकाट? कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव तब भी होंगे और नतीजा वही आयेगा जिसकी व्यवस्था कर ली गई है। विपक्ष अगर ईवीएम का विरोध नहीं कर रहा है तो चुनाव लड़कर हर बार नए खुलासे कर ही रहा है। जब पूरी कायनात भाजपा या संघ परिवार के पक्ष में कर ली गई है तो आंदोलन करके कार्यकर्ताओं को पिटवाने से बेहतर है जो विपक्ष कर रहा है। संभव है ऐसा वह इसलिए भी कर पा रहा हो कि उसे जल्दी नहीं है। ऐसे में अखबार जो कर रहे हैं उसे दर्ज करते जाने का अपना महत्व है क्योंकि इतिहास बदलने वाले नहीं चाहते हैं कि इस दौर में ही सब दर्ज हो और भविष्य में वे इतिहास बदलें तो इन किताबों का हवाला दिया जा सके। आइये, समझें कैसे।

आज के ज्यादातर अखबारों में कश्मीर में आतंकवादी हमले की खबर लीड है। चुनाव प्रचार के दौरान जब यह दावा किया जाता रहा कि आतंकवाद खत्म हो गया है, अंतिम सांसे ले रहा है तो आज लीड के शीर्षक हैं, इंफ्रा कंपनी के सात कर्मचारी मरे (इंडियन एक्सप्रेस); आतंकियों ने जम्मू कश्मीर के निर्माण स्थल पर हमला बोला, सात मारे (टाइम्स ऑफ इंडिया); जम्मू व कश्मीर के आतंकी हमले में सात मरे, इनमें डॉक्टर भी (हिन्दुस्तान टाइम्स) और कश्मीर में फिर आतंकी हमला…. अंधाधुंध फायरिंग कर छह मजदूरों व डॉक्टर की हत्या (अमर उजाला)। आप नहीं पूछ सकते हैं कि आतंकवाद खत्म हो गया तो यह क्या है और पूछता तो चुनाव आयोग भी नहीं है। एआई यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुसार, भारत सरकार और गृह मंत्रालय ने माओवादी हिंसा खत्म करने के लिए कई दावे किए हैं:

1. गृह मंत्रालय का दावा है कि 2010 में देश में 107 ज़िले माओवाद प्रभावित थे, जो अब घटकर 42 रह गए हैं।

2. गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि 2022 में चार दशक में पहली बार, मृत्यु संख्या 100 से नीचे गई।

3. गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि 2014 से 2024 तक सबसे कम वामपंथी उग्रवादियों द्वारा की गई घटनाएं दर्ज की गईं। 

4. गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि माओवाद को पूरी तरह से खत्म करने के लिए मार्च 2026 की तारीख़ तय की गई है। 

5. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसे माओवाद के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक सफलता बताया था।

6. छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने इसे बस्तर पुलिस का नक्सलवाद पर सर्जिकल स्ट्राइक बताया था।

इसके बावजूद महाराष्ट्र में 288 सीटों के लिए एक चरण में मतदान होगा जबकि झारखंड में 81 विधानसभा सीटों के लिए दो चरण में मतदान होगा। चुनाव आयोग ने इसका कारण यह बताया है कि झारखंड माओवादी हिंसा प्रभावित क्षेत्र है।

आज की लीड आपको सामान्य लगे या साहसिक पत्रकारिता का उदाहरण मेरे आठ में से पांच अखबारों में यही लीड है। मैं इसे रूटीन की आम खबर ही मानता हूं और इसके लिए जरूरी है कि पहले यह माना जाये कि कश्मीर में कुछ नहीं बदला है। हाल में सिर्फ एक नई और निर्वाचित सरकार बनी है। ऐसे में दूसरी महत्वपूर्ण खबरों के मुकाबले इसे कम महत्व दिया जा सकता है और बाकी के तीन अखबारों ने यही किया है। नवोदय टाइम्स में यह सेकेंड लीड है, टेलीग्राफ में सिंगल कॉलम में है और दि एशियन एज में पहले पन्ने पर है ही नहीं। नवोदय टाइम्स ने दिल्ली के रोहिणी इलाके में बम धमाके की खबर को लीड बनाया है। द टेलीग्राफ में कोलकाता के डॉक्टर्स के आंदोलन से संबंधित खबर लीड है। सूचना यह है कि आंदोलनकारी डॉक्टर मुख्यमंत्री से मिलने के लिए सहमत हो गये हैं। आप जानते हैं कि यह आंदोलन आरजी कर अस्पताल में एक महिला डॉक्टर से बलात्कार और उसकी हत्या के बाद से ही चल रहा है।

तीसरे अखबार एशियन एज में  नरेन्द्र मोदी की वाराणसी यात्रा की खबर लीड है। शीर्षक में बताया गया है कि इस दौरान उन्होंने 6.7 हजार करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन किया।। मुख्य शीर्षक है – कांग्रेस, समाजवादी पार्टी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की आवश्यकताओं को नजरअंदाज किया। इसमें प्रधानमंत्री का दावा हाईलाइट भी किया गया है। ठीक नीचे दूसरी खबर में बताया गया है कि ब्रिक्स सम्मेलन के सिलसिले में कल प्रधानमंत्री रूस में रहेंगे और चीन के प्रमुख से वार्ता की पुष्टि नहीं हुई है। दि एशियन एज ने विमान में बम होने की झूठी खबरें जारी रहने की खबर भी पहले पन्ने पर छापी है। खबर के अनुसार हफ्ते भर में ऐसी 90 धमकियां मिली हैं यानी औसतन रोज 12 से ज्यादा और रोज 13 से एक कम। ऐसा लगातार कई दिनों से चल रहा है। जाहिर है कि मकसद विस्फोट नहीं है खबर से जो होता है वही करना है और इसमें हेडलाइन मैनेजमेंट शामिल है। वरना सरकारी एजेंसियों के लिए यह पता लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिये कि अचानक कुछ लोगों को यह शौक चढ़ा है, बीमारी लगी है या किसी समूह, गिरोह या संगठन-परिवार की चाल है। इतने दिनों तक हवाई यात्रियों और उसके साथ पूरी विमान कंपनियों को डर की स्थिति में नहीं रखा जाना चाहिये। जो नुकसान हो रहा है वह अलग। यहां, महाराष्ट्र में भाजपा ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी भी पहले पन्ने पर है।

सरकार की नीति यानी भाजपा का प्रचार

इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने की खबरों में प्रमुख है, भारतीय राजनयिक ने कहा, त्रूदो ने संबंध चौपट कर दिये। खालिस्तानी आतंकवादी कनाडा के खास सूत्र हैं। अपने आप में यह महत्वपूर्ण है कि एक आरोपी को अपने विचार रखने का मौका मिल रहा है और वह आरोप लगाने वाले की आलोचना कर रहा है। मेरे ख्याल से साहब जी के पास कोई विकल्प ही नहीं है। कनाडा के आरोपों को भारत सरकार पहले खारिज कर चुकी है और यह खबर में लिखा है तब इसे इतनी प्रमुखता देने का मतलब यही है कि भारत की जनता या इंडियन एक्सप्रेस के पाठकों को सरकार की बात बताई जाये, आरोपी के श्रीमुख से भी कहलवाया जाये और उसे प्रचारित किया जाये। मुझे लगता है कि यह सरकार का काम हो सकता है और उच्चायुक्त महोदय सभा-कार्यक्रम में (मुख्य न्यायाधीश की तरह) अपनी बात रख सकते हैं। यह खबर भले हो इसे प्रचार देना मीडिया का काम नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में एक दिलचस्प खबर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और सरकार के दो प्रमुख समर्थकों (इन दिनों बैसाखी कहा जा रहा है) में से एक, चंद्रबाबू नायडू की है। उन्होंने राज्य की बुढ़ाती आबादी का मु्द्दा उठाया है और दंपत्तियों से अपील की है कि ज्यादा बच्चे पैदा करें। ज्यादा बच्चों वाले परिवार को प्रोत्साहन देने पर भी विचार कर रहे हैं। एक और खबर बताती है कि गौरी लंकेश की हत्या के आरोपी श्रीकांत पंगारकर को शिन्दे सेना ने पार्टी में शामिल करके निकाल दिया है। इससे लगता है कि पार्टी जीत के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं है और छवि की चिन्ता रख रही है। हालांकि, इससे जो नुकसान होना था, हो चुका और अब निकाल देने से आंतरिक राजनीति पर जो असर पड़े बाहर आम लोगों को जो संदेश जाना था, चला गया और फिर भी ऐसा किया गया है तो इसका मकसद पार्टी की ‘जरूरत’ है। यह जरूरत महाराष्ट्र में पार्टी या गठबंधन की स्थिति भी बताती है।

आप जानते हैं कि विधानसभा चुनावों के साथ उत्तर प्रदेश में उपचुनाव भी है और प्रधानमंत्री इसकी भी तैयारी कर रहे हैं। शुरुआत 10 में से एक सीट पर उपचुनाव छोड़कर की गई है। आधिकारिक तौर पर इसका कारण तो यह बताया गया है कि उस सीट से संबंधित एक चुनाव याचिका लंबित है। पर असली कारण यह समझा जा रहा है कि मिल्कीपुर सीट अयोध्या की सीट हैं जहां पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा हार गई थी। समाजवादी पार्टी के विधायक, अवधेश प्रसाद ने फैजाबाद (अयोध्या) लोकसभा सीट से जीत दर्ज की है। इसी कारण यह सीट खाली हुई है और इसपर उपचुनाव होने हैं। अयोध्या में मंदिर की राजनीति (या मुद्दे) पर देश की सत्ता पर काबिज होने के बाद अयोध्या में ही हार जाने वाली भाजपा की भारी किरकिरी हुई है और लगता नहीं है कि विधानसभा का चुनाव जीत पाती तो चुनाव टलते। जाहिर है, भाजपा इस हार का जोखिम नहीं लेनी चाहती होगी इसलिये ये उपचुनाव नहीं हो रहे हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा के प्रचार (भ्रष्टाचार, 15 लाख और स्विस बैंक में काला धन आदि जुमलों के अलावा) का दूसरा मुद्दा था कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाना। 5 अगस्त 2019 को हटाये जाने के बाद राज्य में चुनाव नहीं हुए थे और जब हुए तो भाजपा वहां बुरी तरह हार गई है। इसलिए मिल्कीपुर में हारने से छवि का भारी नुकसान होना था और उसी से बचाने के लिये ये उपचुनाव नहीं हो रहे हैं और प्रधानमंत्री एक लाख नौजवानों को राजनीति में लाने की योजना का प्रचार कर रहे हैं।

अमर उजाला में आज टॉप पर सात कॉलम का शीर्षक है, परिवारवाद खत्म करने के लिए राजनीति में एक लाख नौजवानों को लाउंगा : मोदी। कहने की जरूरत नहीं है कि टिकट वितरण से पता चल गया है कि उनकी पार्टी परिवारवाद को खत्म करने के लिए कितना गंभीर है। एक उदाहरण तो चंपई सोरेन का ही है जिन्हें पार्टी में शामिल होने के तुरंत बाद पुत्र के साथ टिकट मिला है। फिर भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं तो खबर है और दूसरे अखबारों में भी छपी है। मुद्दा यह है कि परिवारवाद तो बुरा है लेकिन ‘मोदी के परिवार’ और ‘संघ परिवार’ में जो बुराई है और जो बुरे लोग हैं उसे सब जानते हैं फिर भी बृहत परिवार खासकर उसकी सरकार परिवार के सदस्यों की सुरक्षा और संरक्षण में कोई कसर नहीं छोड़ती है। इसके लिए देश के ओलंपिक खिलाड़ियों को नाराज करना पड़े, वे ओलंपिक पदक से वंचित हो जायें तब भी। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे के बावजूद सरकार की महिला विरोधी छवि बन रही है तो उसकी भी परवाह नहीं की जा रही है। संभव है इसका कारण प्रचार और प्रचारकों की ताकत हो। इसमें मीडिया के बड़े हिस्से का प्रचारक हो जाना शामिल है।    

नरेन्द्र मोदी के शासन में न सिर्फ मीडिया यानी अखबार और टेलीविजन की पत्रकारिता चौपट हुई है, पुस्तक  प्रकाशन उद्योग भी सरकार विरोधी किताबों का प्रकाशन करने में सकुचाता, लजाता रहा है। ऐसे में आज टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर साक्षी मलिक की आत्मकथा, ‘विटनेस’ का जिक्र है। अंग्रेजी की इस किताब को खेल पत्रकार जॉनाथन सेलवराज के साथ मिलकर लिखा गया है। पत्रकार और यू ट्यूबर रवीश कुमार ने हाल में इसके बारे में लिखा था, “जॉनाथन सेल्वाराज की एक-एक लाइन रोमांच से भर देती है। उनकी रिपोर्टिंग लंबे समय से खेल को समझने और देखने से बनी है। कितने साल की मेहनत होगी। साल में हर दिन की मेहनत होगी। मैं कितने लोगों को जानता हूँ जिन्होंने दो-चार महीने शानदार रिपोर्टिंग की, किताब भी अच्छी लिखी लेकिन उसके बाद मूल काम छोड़ कर अपनी पत्रकारिता का प्रचार करने निकल गए। पहचान बनाने के खेल में लग गए। लेकिन ये वो लोग हैं जो जीवन भर साधना की तरह अपना काम करते रहे। निरतंरता से किसी काम को करने का अपना ही महत्व है। आप कभी जॉनाथन का लिखा पढ़िएगा। उन्हीं की यह किताब आई है। जगरनॉट ने छापा है। क़ीमत 799 है। यह पेड प्रमोशन नहीं है। खेल के एक शानदार पत्रकार की किताब का ज़िक्र भर है। 

टेलीग्राफ की आज की रिपोर्ट का शीर्षक अंग्रेजी में Witness who wrestled State might है का आम हिन्दी अनुवाद होगा, गवाह जिसने सत्ता से टक्कर ली। लेकिन यहां गवाह का मतलब साक्षी यानी साक्षी मलिक से है। इसलिए सही अनुवाद होगा, राज्य सत्ता से टक्कर लेने वाली साक्षी। कहने की जरूरत नहीं है कि शीर्षक है तो इसमें खबर भी होगी। और उस खबर को द टेलीग्राफ ने सबसे पहले, अपने पहले पन्ने पर छापा है। इसमें कहा गया है कि पुस्तक में उनके मामले दरअसल देश में खेल की स्थिति का विवरण साक्षी के नजरिये से है। इसके जरिये जनता को यह सब जानने-देखने का एक मौका मिलता है और यह वह है जिसके बावजूद साक्षी और उसके साथ शानदार प्रदर्शन करते हैं। मेरे एक मित्र पूर्व खिलाड़ी हैं, बच्चों को बुला-बुला कर खेलने का प्रशिक्षण देते हैं, खेल के सामान जूते आदि अपनी तरफ से बांटते रहते हैं अपने प्रशिक्षुओं की सफलता के संबंध में खुली पेशकश की है और चुनौती दी है पर जनहित में उनकी योग्यता, क्षमता और समय का कोई उपयोग नहीं हुआ है। बीच में वे काफी सक्रिय हुए थे तो उन्हें उनके साथियों ने समझाया कि सिस्टम को ठीक नहीं कर पाओगे, कहां पंगा ले रहो हो छोड़ दो। उसके बाद से उन्होंने पंगा नहीं लिया और यह कहानी बहुत कम लोगों को मालूम है।    

ऐसे में जब खबरें नहीं छपती हैं और किताबें छप सकती हैं तो अच्छा मौका है पर उसका भी लाभ नहीं उठाया जा रहा है। मुख्यधारा के सैकड़ों प्रकाशनों ने सरकार विरोधी गिनती की किताबें भी नहीं छापी हैं। सरकार विरोधी ज्यादातर किताबें नए और अपेक्षाकृत अनजान प्रकाशकों की हैं। राफेल सौदे पर अपनी पुस्तक, फ्लाइंग लाइज (उड़ते झूठ) का प्रकाशन लेखक और पत्रकार रवि नायर व परंजय गुहा ठकुराता ने स्वयं किया है। राणा अयूब की किताब, गुजरात फाइल्स का अनुवाद कई भाषाओं में आ चुका है पर प्रकाशक (उस समय) अपेक्षाकृत नया और अनजाना ही था। मुख्य धारा के प्रकाशकों ने दस साल में नरेन्द्र मोदी के प्रचार में सैकड़ों किताबें छापी हैं, लेकिन ईवीएम पर किसी किताब की चर्चा मैंने नहीं सुनी है। 2010 में ईवीएम पर दो किताबें थीं। जब ईवीएम पेश किया जाना था और 2019 में एक पूर्व चुनाव आयुक्त ने अपनी किताब में लिखा कि सब सोच-समझकर, जांच करके, आलोचनाओं का जवाब देकर लांच किया गया था इसलिए इससे शिकायत नहीं होनी चाहिये। लेकिन ईवीएम पर जो आरोप हैं, जो जवाब हैं या नहीं हैं वे किसी और किताब का विषय नहीं हैं? पर कोई किताब क्यों नहीं है?

खासकर तब जब भाजपा के राज्यसभा सदस्य (पूर्व) सुब्रमण्यम स्वामी की किताब है, “इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स : अनकांस्टीट्यूशनल एंड टैम्परेबल” (असंवैधानिक और छेड़छाड़ योग्य)। एक और पुस्तक भाजपा नेता, जीवीएल नरसिम्हा राव की है, “डेमोक्रेसी ऐट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स?” (लोकतंत्र खतरे में! क्या हम अपनी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर भरोसा कर सकते हैं?) दोनों पुस्तकें 2010 में आई थीं। 2019 में एक भारतीय हैकर ने आरोप लगाया था कि “2014 के लोकसभा चुनाव भाजपा के पक्ष में हैक किए गए थे” और “मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में हाल में हुए चुनाव में ईवीएम हैक नहीं किए जा सके” (इसलिए कांग्रेस जीत गई) और दिल्ली का विधानसभा चुनाव भी “हैक नहीं किया जा सका था”। भाजपा सरकार ने कोशिश की कि इसके बाद मामला शांत हो जाये लेकिन 2019 के चुनाव पर अशोका यूनिवर्सिटी का रिसर्च लीक हो गया। उसके बाद जो सब हुआ वह भी अभी तक किताब का विषय नहीं बना तो कारण समझना मुश्किल नहीं है।

खासकर तब जब पूर्व सेना प्रमुखों की दो किताबों का लोकार्पण टल चुका है। दूसरी ओर, इमरजेंसी पर कई किताबें हैं। हाल तक आई हैं। पूर्व सेना प्रमुखों की दो किताबों में एक 2002 से 2005 तक सेना प्रमुख रहे एनजी विज की, अलोन इन द रिंग है जबकि 2019 से 2022 तक सेना प्रमुख रहे जनरल एमएम नरवने की किताब, फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी पहले से लंबित है और छह महीने से ज्यादा में उसे भी क्लियरेंस मिलने की खबर नहीं है। ऐसे में जो किताब आ रही है उसकी चर्चा में तो मीडिया को कोई खतरा नहीं मानना चाहिये। लेकिन ऐसी कितनी किताबों की चर्चा आपने अखबारों में पढ़ी? अरविन्द नारायण की पुस्तक, इंडियाज अनडिक्लेयर्ड इमरजेंसी तो अघोषित इमरजेंसी पर ही थी। मोदी राज के खिलाफ शुरुआती चर्चित किताबों में एक आकार पटेल की थी। उसके लिए उन्हें जितना परेशान किया गया वह भी सबको पता है।

इतिहास बदलने वाले नहीं चाहते कि किताबें लिखी जायें

फिल्म अभिनेता शाहरुख खान के बेटे को फंसाने वाले अधिकारी के शिन्दे सेना में शामिल होने की खबरों से पहले चर्चा थी कि मामला वसूली का था। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा था और नहीं होने का कोई कारण नहीं है तो कार्रवाई होनी चाहिये थी। नहीं हुई और खबर आई भले पुष्टि नहीं हुई। आज खबर है कि गौरी लंकेश की हत्या के आरोपी को शिन्दे सेना में शामिल करने के बाद निकाल दिया गया। ऐसे में कुछ दिन पहले खबरे थी, रेमो डिसूजा और उनकी पत्नी लिजेल पर 11.96 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोप है। डांस ट्रूप ने केस दर्ज करवाया है। महाराष्ट्र में चुनाव के समय ऐसी खबरें कान खड़ी करने वाली हैं पर क्या सरकार और प्रशासन पर कोई असर है? मीडिया में कोई विवरण है? दूसरी ओर, इसी क्रम में आज एकता कपूर तथा उनकी मां पर पॉक्सो ऐक्ट में केस किये जाने की खबर अखबारों में है। नवोदय टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, वेब सीरिज गंदी बात में नाबालिग लड़कियों से आपत्तिजनक सीन्स फिल्माने का आरोप है। जीएसटी अधिकारियों द्वारा भी लोगों को फंसाने और उनसे वसूली की कोशिश के भी मामले हैं। आरोप तो हैं ही। कहने की जरूरत नहीं है अखबारों में अगर वसूली की कोशिश से संबंधित खबरें छपतीं तो ऐसा नहीं होता और जब खबरें छपती थीं तो मामला दर्ज होने के बाद कोई शक नहीं करता था। यह झूठ बोलने का असर है। सोशल मीडिया पर जर्मन इतिहासकार और दार्शनिक (अक्तूबर 1906-दिसंबर 1975) का कहा काफी पसंद किया जा रहा है। उन्होंने जो कहा है वह हिन्दी में कुछ इस प्रकार होगा,  “…. बार-बार झूठ बोलने का मकसद लोगों को झूठ पर विश्वास दिलाना नहीं होता है, बल्कि यह सुनिश्चित करना होता है कि अब कोई किसी चीज पर विश्वास न करे। जो लोग सच और झूठ में अंतर करना भूल जाते हैं, नहीं कर पाते हैं वे सही और गलत में भी अंतर नहीं कर पाते हैं…. .ऐसे लोगों के साथ आप जो चाहे सो कर सकते हैं।”   

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