
संजय कुमार सिंह
आज के ज्यादातर अखबारों में अमेरिका चुनाव और निजी संपत्तियों पर सरकार के अधिकार के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला लीड और सेकेंड लीड है। इसलिए आज इन दोनों खबरों को छोड़कर उसकी चर्चा जो दि एशियन एज में लीड है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “राजग और इंडिया समूह के बड़े नेताओं ने लड़ाई तेज की”। इस खबर के दो फ्लैग शीर्षक हैं, (पहला) योगी आदित्यनाथ और राजनाथ सिंह ने भ्रष्टाचार पर झारखंड मुक्ति मोर्चा को निशाना बनाया दूसरा फ्लैग शीर्षक और बुलेट प्वाइंट है, खरगे ने कहा भाजपा की योजना काला सोना (कोयला) लूटने की है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राष्ट्रपति से कहा कि चुनावों में लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित किया जाये। कहने की जरूरत नहीं है झारखंड बनने के बाद से ज्यादातर समय भारतीय जनता पार्टी वहां सत्ता में रही है और किसी भी शर्त पर सत्ता में बने रहने की कोशिशों के कारण राज्य का विकास उसके लिए मुद्दा नहीं रहा और अब उसे राज्य में तमाम कमियां नजर आ रही हैं जबकि हेमंत सरकार को भी ढंग से काम नहीं करने दिया है और सरकार गिराने के लिये उन्हें भी जेल भेज दिया और एक-एक कर कई आदिवासी नेताओं को अपने पाले में करती गई। ताजा मामला हेमंत सोरेन के जेल में होने के दौरान मुख्यमंत्री बनाये गये चंपई सोरेन का है जो सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने से उन्हें तकलीफ हुई और इस तकलीफ के कारण वे भाजपा में चले गये। भाजपा ने न सिर्फ उन्हें, उनके बेटे को भी टिकट दिया है। इसके बावजूद आप मानना चाहें तो मान सकते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाया जाता तो वे अपने और भाजपा के लिए नहीं, राज्य की जनता के लिए काम करते और झामुमो ने उन्हें हटाकर गलत किया है।
बात सिर्फ अस्थायी तौर पर मुख्यमंत्री बनाये गये चंपई सोरेन को स्थितियां बदलने पर हटा देने की नहीं है। हटाया तो राबड़ी देवी और जीतन राम मांझी को भी गया था और राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने का विरोध करने वाले देख रहे हैं कि वे अभी तक लालू यादव के साथ हैं जबकि जीतन राम माझी और चंपई सोरन भाजपा के समर्थक बन गये। भाजपा ने महाराष्ट्र में भी सत्ता में बने रहने के लिए हर संभव उपाय किया है और वहां विरोधी दलों में तोड़फोड़ कर सरकार बनाने और चलाने में कामयाब रही है। आर्थिक राजधानी में सरकार होने की जरूरत आप समझ सकते हैं और झारखंड के बारे में मल्लिकार्जुन खरगे ने जो कहा उसे आप ऊपर पढ़ चुके हैं। खरगे ने ऐसा आरोप लगाया है तो वह यूं ही नहीं है। आपको याद होगा कि आदिवासी हित की बात करने वाली भाजपा ने रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाया था और उनपर भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद पार्टी ने कुछ नहीं किया और फिर टिकट दे दिया तो भाजपा के ही बागी सरयू राय ने उन्हें निर्दलीय चुनौती दी और मुख्यमंत्री को हरा दिया। भाजपा आलाकमान ने उन्हें उड़ीशा का राज्यपाल बना दिया। अगर भाजपा में आदिवासी नेता की बात की जाये तो मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष बाबू लाल मरांडी एक बार भाजपा छोड़कर जा चुके हैं और दोबारा पार्टी में शामिल होने की अटकलों पर कहा था, कुतुबमीनार से कूदना पसंद करेंगे, लेकिन बीजेपी में जाना नहीं। मरांडी ने तब कहा कि चुनाव नजदीक देख भाजपा यह शिगूफा छोड़ रही है। ऐसा पहले भी हो चुका है। अगर भाजपा में जाने और जहर की पुड़िया खाने में से एक मजबूरी चुननी पड़ी तो वे जहर खाना पसंद करेंगे। लेकिन बाबू लाल मरांडी ही भाजपा के अध्यक्ष हैं और हारे हुए मुख्यमंत्री रघुवर दास उड़ीशा के राज्यापल हैं।
रघुवर दास के चुनाव क्षेत्र, जमशेदपुर (पूर्व) से उड़ीशा की राजधानी भुवनेश्वर ट्रेन से सवा चार सौ किलोमीटर के करीब है और राजधानी एक्सप्रेस से लेकर रात भर में तथा सुबह चलकर शाम में पहुंचाने वाली ट्रेन भी है। ऐसे में राज्यपाल के पुत्र पर आरोप है कि उन्हें लेने के लिए राजभवन से लक्जरी कार स्टेशन नहीं गई तो उन्होंने राजभवन के एक कर्मचारी से मारपीट की। यह इसी साल मध्य जुलाई की घटना है और अब राज्यपाल की बहू चुनाव लड़ रही हैं। इस तरह रघुवर दास पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद न सिर्फ उन्हें टिकट दिया गया, हार जाने के बावजूद गवरनर बना दिया गया और बेटे के सरकारी कर्मचारी से मारपीट करने के बावजूद बहू को उम्मीदवार बनाया गया है और अब भाजपा के नेता जेएमएम पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं जो सही हो तो पहले लगाना चाहिये था और नहीं था तो जमीन कब्जाने का आरोप लगाया जिसमें जमानत मिल गई। ऐसा कई दूसरे विपक्षी नेताओं के साथ हो चुका है और अब लगने लगा है कि यह विपक्षी नेताओं को भाजपा में शामिल करने का भाजपाई तरीका है। जो भी हो, पिछली बार रघुवर दास का मुकाबला भाजपा के बागी, सरयू राय से ऐसा हुआ कि कांग्रेस में नए शामिल हुए, संबित पात्रा से पांच ट्रिलियन में जीरो की संख्या पूछकर उनका मजाक बनाने वाले कांग्रेस उम्मीदवार गौरव बल्लभ तीसरे स्थान पर रहे। अब वे भाजपा में हैं और इस बार उन्हें टिकट नहीं दिया गया है। ऐसे में झारखंड मुक्ति मोर्चा पर भ्रष्टाचार के आरोप में कितना दम है आप समझ सकते हैं । अखबार ने लिखा है कि इससे मामला गर्माया तो मैं मान लेता हूं पर मेरा मानना है कि इस बार कोई टक्कर नहीं है (हालांकि भाजपा है तो बागी और ईवीएम भी हैं ही)।
आप जानते हैं कि चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड न होना भी चुनाव आयोग के साथ मिलकर चुनाव जीतने के लिए भ्रष्टाचार करना है। ईवीएम से शिकायतें और उनपर संतोषजनक जवाब न होना, चुनाव आयोग के भाजपा के पक्ष में नजर आना भी भ्रष्टाचार है लेकिन भाजपा ने अपनी राजनीति, प्रचारकों और पैसे के दम पर लोगों को यह यकीन करा दिया है कि ईवीएम के खिलाफ आंदोलन या लेवल प्लेइंग फील्ड की मांग करना चुनाव लड़ने वालों का काम है। मैं इससे सहमत नहीं हूं और मुझे लगता है कि यह वैसे ही है कि क्रिकेट खेलने वाले से अपेक्षा की जाये कि वह स्टेडियम और पिच ही नहीं, पंसद के अंपायर के लिये भी लड़े या आंदोलन करे। जो भी हो, आज दि एशियन एज की यह लीड दिलचस्प और सबसे अलग तो है ही। आज की दूसरी दिलचस्प खबर द टेलीग्राफ में है। वही खबर द एशियन एज में भी है। यहां इसका शीर्षक वह है जो केंद्रीय विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा है, कनाडा खालिस्तानियों को राजनीतिक जगह दे रहा है। इस खबर का उपशीर्षक है, कनाडा के निराधार आरोपों, मंदिर पर हमले की आलोचना की।
मुझे लगता है खालिस्तान समर्थकों को कनाडा में मरवाने या इसकी कोशिशों के आरोप गलत और निराधार भी हों तो भारत अपनी लड़ाई ढंग से नहीं लड़ रहा या लड़ पा रहा है। वैसे भी, यह बात भारत ही कहे और हर बार सिर्फ वही कहे तो इसके बहुत मायने नहीं हैं। द टेलीग्राफ का शीर्षक ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोग के अंग्रेजी हिज्जे का मेल अंग्रेजी के शब्द रांग यानी गलत के हिज्जे से मिलाते हुए इसी रूप में किया है। मोटे तौर पर इसका अर्थ होगा, कनाडा मामले में गलत या कमजोर बचाव करते दिखे जयशंकर। अनिता जोशुआ ने नई दिल्ली डेटलाइन से इसमे लिखा है, ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने मंगलवार को कहा कि उन्होंने खालिस्तानी कार्यकर्ता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की जांच के सिलसिले में भारत के खिलाफ कनाडा के आरोपों को विदेश मंत्री एस जयशंकर के समक्ष उठाया था और उनकी मौजूदगी में कनाडा की न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
कैनबरा में जयशंकर के साथ एक मीडिया कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, वोंग ने जांच से जुड़े सवालों के जवाब में यह खुलासा किया। उनसे पूछा गया था कि क्या उन्हें उस देश की धरती पर एक कनाडाई नागरिक की हत्या में भारत सरकार की संलिप्तता के बारे में “आपके फाइव आईज पार्टनर्स की खुफिया जानकारी” पर भरोसा है। फाइव आईज ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, अमेरिका और ब्रिटेन का एक एंग्लोस्फीयर खुफिया गठबंधन है। “हमने जांच के तहत आरोपों के बारे में अपनी चिंताओं को स्पष्ट कर दिया है। हमने कहा है कि हम कनाडा की न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हैं। हम भारत को अपने विचार बताते हैं जैसा कि आप हमसे उम्मीद करेंगे। और कानून के शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सभी देशों की संप्रभुता जैसे मामलों के संबंध में हमारा एक सिद्धांत है,” वोंग ने कहा। इसी सवाल का जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा: “एक, कनाडा ने बिना कोई विशेष जानकारी दिए आरोप लगाने का एक पैटर्न विकसित कर लिया है। दूसरे, जब हम कनाडा को देखते हैं, तो हमारे लिए यह तथ्य कि वे हमारे राजनयिकों पर निगरानी रख रहे हैं, यह कुछ ऐसा है जो अस्वीकार्य है। तीसरे, जिन घटनाओं के बारे में सज्जन ने वहां बात की, उसका वीडियो देखें; मुझे लगता है कि वे आपको एक तरह से बताएंगे कि आज चरमपंथी ताकतों को राजनीतिक स्थान दिया जा रहा है। इसलिए हम स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं, हम यह भी मानते हैं कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। और, क्या हमने इस बारे में बात की है? बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से मैंने बात की है।” “वीडियो” से जयशंकर रविवार को कनाडा के शहर ब्रैम्पटन में एक हिंदू मंदिर के बाहर खालिस्तान समर्थक विरोध प्रदर्शन के कारण हुए “हिंसक व्यवधान” का उल्लेख कर रहे थे।
इससे पहले, पिछले हफ़्ते कैनबरा के दो मंदिरों में हुई तोड़फोड़ पर एक सवाल का जवाब देते हुए, वोंग ने कहा: “पूरे ऑस्ट्रेलिया में लोगों को सुरक्षित और सम्मानित होने का अधिकार है। लोगों को शांतिपूर्ण विरोध करने का भी अधिकार है, लोगों को शांतिपूर्वक अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है, हम इसके और हिंसा, घृणा भड़काने या तोड़फोड़ के बीच एक रेखा खींचते हैं और उन्हें उचित कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा निपटाया जाना चाहिए। हम एक बहु-सांस्कृतिक लोकतंत्र हैं। हम इस तथ्य को संजोते हैं, लेकिन हम उन सिद्धांतों को भी संजोते हैं जो उस बहु-सांस्कृतिक लोकतंत्र को पनपने में सक्षम बनाते हैं और वे हैं एक-दूसरे का सम्मान करना और अलग-अलग विचारों को शांतिपूर्वक व्यक्त करने का अधिकार।” दोनों बयानों (या स्थितियों) में भिन्नता स्पष्ट थी क्योंकि भारत कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी देशों द्वारा विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर खालिस्तान समर्थक तत्वों को दी जाने वाली जगह से असहमत है। फिर भी मेरा मानना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि इस कारण कनाडा में खालिस्तानियों को मरवा दिया जाये या इसकी साजिश की जाये। भारत ने इस मामले में अभी तक स्पष्ट कुछ नहीं कहा है। इस तरह खबरों की प्रस्तुति में मीडिया का खेल समझने लायक है। देखते हैं, आगे क्या-क्या होता है।
आज के अखबारों में कश्मीर में एक और मुठभेड़ की एक खबर है। इसमें एक आतंकी के मारे जाने और दो सैनिकों के जखमी होने की सूचना है। यह कश्मीर से आंतकवाद खत्म होने के सरकारी दावों के बावजूद है और विधानसभा चुनाव के समय जो सब कहा गया वह तो है ही, नोटबंदी से भी आतंकवाद खत्म होने वाला था। पिछले दिनों फारुक अबदुल्ला ने इसपर शंका जताई थी और तब भाजपा प्रवक्ता के दाढ़ी का तिनका आप देख चुके हैं। अमर उजाला में आज यह खबर सवा कॉलम में है। इसके साथ ही बुलेट ट्रेन कॉरिडोर में निर्माणाधीन पुल गिर जाने की खबर भी आज है। यह भ्रष्टाचार खत्म करने के वायदे के बावजूद है और अक्सर सुनने में आते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के समय कोलकाता में एक पुल गिर गया था। तब ममता बनर्जी ने उसे ऐक्ट ऑफ गॉड कहा तो नरेन्द्र मोदी उसे ऐक्ट ऑफ फ्रॉड कहकर उसका मजाक उड़ाया था। उसके बाद से देश भर में कई पुल गिर चुके हैं पर प्रधानमंत्री की कोई टिप्पणी सुनने में नहीं आ रही है। अखबारों में जो हेडलाइन मैनेजमेंट चल रहा है सो अलग। जहां तक आतंकवाद पर नियंत्रण की बात है, आज नवोदय टाइम्स में खबर है – पड़ोसी (यानी पाकिस्तान) अशांति फैलाने का प्रयास कर रहा है। यह खबर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के हवाले से छपी है। मुख्य खबर का शीर्षक है, आतंकियों की मदद करने वालों के गर पर चलेगा बुलडोजर। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार की विदेश नीति और उसका हाल किसी से छिपा नहीं है। इस बयान के साथ उपराज्यपाल ने भी अपनी लाचारी जता दी है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज भारत 2026 के ओलंपिक गेम्स की दौड़ में शामिल हुआ शीर्षक खबर को सेकेंड लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर बताती है कि हर साल रणथंभौर के 25 से 75 टाइगर लापता हो जाते हैं। द हिन्दू की पहले पन्ने की एक खबर के अनुसार, सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने विकीपीडिया को कंटेंट प्रकाशक की तरह मानने का घालमेल किया। इस संबंध में विकीपीडिया के नाम लिखी चिट्ठी उसे भेजी नहीं गई है पर पूछा गया है कि क्यों न उसे प्रकाशक माना जाये। इस तरह विकीपीडिया में जो कुछ भी लिखा होगा उससे संबंधित सामग्री के लिए कानूनी तौर पर विकीपीडिया को सीधे जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा। इससे पहले, एएनआई के बारे में विकीपीडिया ने जो लिख रखा है उसके लिए एएनआई ने भी उसके खिलाफ मुकदमा दायर किया है।


