
मुझे लगता है कि राहुल गांधी के लेख में मुख्य बात ईस्ट इंडिया कंपनी और उसकी कार्यशैली है। मौजूदा समय में और इस लेख में ऐसा कुछ नहीं है कि रजवाड़ों के पक्ष में राहुल गांधी का विरोध किया जाये। रजवाड़ों की तुलना अभी के चुनाव आयोग से कीजिये या 2014 के चुनाव से पहले भाजपा और संघ समर्थकों द्वारा बनाई गई स्थितियों में तबके राजा-महाराजा से कीजिये मामले तो अब बिल्कुल साफ हैं। अभी की ईस्ट इंडिया कंपनी को पहचानना, समझना या महसूस करना मुश्किल नहीं है। चूंकि लेख सही समय पर सही जगह चोट करता है इसलिए इसे निष्प्रभावी करने की कोशिशें कम नहीं हुई हैं। इनमें रतन टाटा के निधन के कई दिनों बाद उनपर लेख लिखना और राहुल गांधी को उद्योग विरोधी बताना शामिल है।
संजय कुमार सिंह
आज के मेरे सभी अखबारों की लीड अलग है। आठ अखबारों की आठ लीड लेकिन किसी में ऐसी कोई खबर लीड नहीं है जो सरकार के खिलाफ हो, उसकी पोल खोलती हो या जनहित से उसका दूर का भी कोई संबंध हो। यही नहीं, एक अखबार दूसरे की लीड हो या पहले पन्ने पर भी हो – यह भी जरूरी नहीं है और मीडिया दिशाहीन (या एक खास दिशा में) जाता लगता है। आज की इन खबरों में दि एशियन एज में चीन से रिश्ते सुधरने की सूचना देने वाली खबर है। शीर्षक है, भारत-चीन जब अपने संबंधों का पुनर्निर्माण कर रहे हैं तो रियो में मीदी-शी की वार्ता की संभावना। यह लाल आंख दिखाने की अपेक्षा से शुरू होकर, ‘ना कोई घुसा था ना घुसा हुआ है’ जैसी झूठ के बाद का प्रचारक सच है। बीच में, जो कभी पास नहीं आये थे उनके अलग होने की खबर कई दिन छप चुकी है। द टेलीग्राफ में अभी भी आरजी कर ही लीड है भले अब न्याय में देरी का आरोप सीबीआई पर है। कुल मिलाकर कोलकाता से छपने वाला अच्छा खासा राष्ट्रीय अखबार स्थानीय हो गया है। बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं जैसे नारों पर जब कार्रवाई नहीं होनी है तो खबर भी क्या हो। वैसे, सच्चाई यह है कि खबर नहीं होती है इसलिए कार्रवाई नहीं होती और कार्रवाई नहीं होती है इसलिए खबर नहीं होती है। पर वह अलग मुद्दा है।
मैं इस स्थिति की खबर देने की कोशिश करता हूं। यह सब कोई नई बात नहीं है। जब ‘कार्रवाई’ हुई ही थी तो प्रधानमंत्री के भाषण के तथ्यों से संबंधित शिकायत के लिए पार्टी अध्यक्ष को पत्र लिखा गया था। वह भी कई दिनों के बाद। लोकसभा चुनाव के समय विपक्षी नेताओं को जेल में रखने की कोशिशों और उसका सच अब सर्वविदित है। यह अनैतिक तो है ही, लेवल प्लेइंग फील्ड न होने के साथ-साथ निष्पक्ष चुनाव के मार्ग में बाधा भी है। इसलिए जो हो रहा है वह बाकायदा सोच समझ कर और मिलकर ही किया जा रहा होगा और वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। मेरा मुद्दा यह है कि ऐसे मामलों को अखबारों में प्रमुखता मिलनी चाहिये और जनता को यह बताया जाना चाहिये कि विपक्ष चुनाव में किन मुश्किलों का सामना कर रहा है या सत्तापक्ष चुनाव जीतने के लिए क्या सब कर रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम से पाकिस्तान चले जाओ, घुसपैठिये और शेख हसीना को संरक्षण से लेकर कनाडा के साथ विवाद और अबकी बार फिर ट्रम्प के बावजूद अखबारों में उतनी खबरें नहीं होती हैं जितनी हो सकती हैं।
ऐसे में आज इंडियन एक्सप्रेस की की लीड शरद पवार से बातचीत पर है तो हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड मुख्य न्यायाधीश (रिटायर) डीवाई चंद्रचूड़ से इंटरव्यू पर आधारित है। कहने की जरूरत नहीं है कि कार्यकाल के अंतिम समय में प्रधानमंत्री के उनके घर पूजा करने जाने और उसका वीडियो सार्वजनिक होने के बाद से मुख्य न्यायाधीश, इतिहास मेरे कार्यकाल को कैसे याद करेगा – को लेकर परेशान हो गये थे। शीर्षक से यह यह इंटरव्यू उनकी इसी चिन्ता को कम करने का प्रयास लगता है। शीर्षक है, “न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि आदेश एक ही दिशा में हों” (या हमेशा सरकारके खिलाफ हों। कहने की जरूरत नहीं है कि यह ऐसा विषय नहीं है कि इतने भर से मान लिया जाये कि मुख्यमंत्री के रूप में न्यायामूर्ति चंद्रचूड़ का कार्यकाल अच्छा या बुरा या संतोषजनक था। इसपर कारवां में छपी 44 पेज की युवा पत्रकार सौरव दास की रिपोर्ट चर्चा में है। इसपर रवीश कुमार ने लिखा है, “अदालतों की प्रक्रियाओं की समीक्षा रिपोर्टिंग डेस्क पर की जाने लगी है। रिपोर्टिंग की इस धारा का नायक बन कर उभरा है एक नौजवान पत्रकार सौरव दास। सौरव ने कम उम्र में ही क़ानून की रिपोर्टिंग की सारी बदबूदार इमारतें ध्वस्त कर दी हैं। यह लड़का आज अदालत के सामने अपनी कलम से अदालत बन गया है।”
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, शरद पवार ने माना कि महायुति की योजनाओं में कुछ प्रभाव हो सकता है लेकिन कहा कि लोग बदलाव चाहते हैं। द हिन्दू की आज की लीड का शीर्षक राजनीति से अलग खेल पर है लेकिन राजनीति का असर या उसके बावजूद है। “बीसीसीआई ने आईसीसी से कहा, टीम इंडिया पाकिस्तान में नहीं खेलेगी”। उपशीर्षक में अखबार ने बताया है कि चैम्पियनंस ट्रॉफी पर यह निर्णय पाकिस्तान के इस आश्वासन के बाद आया है कि वह विशेष सुरक्षा व्यवस्था और स्थान के चयन की पेशकश करेगा; भारत ने हाईब्रिड मॉडल के तहत अपने मैच पाकिस्तान से बाहर रखना पसंद किया। ऐसे में आज एक खबर महत्वपूर्ण है पर कहां दिखी और कैसे दिखी उसकी चर्चा आपको दिलचस्प लगेगी। लोकसभा चुनाव से पहले हेमंत सोरेन को जेल में रखने का नफा-नुकसान देखने के बाद भाजपा (सरकार) के लिए हेमंत सोरेन को फिर जेल में रखने के लिए नया (या अलग) मामला ढूंढ़ना निश्चित रूप से मुश्किल रहा होगा और ऐसे में विधान सभा चुनाव के समय उनके सहयोगी पर आयकर का छापा मारना, उन्हें परेशान और बदनाम करने का सबसे आसान तरीका है। खासकर तब जब प्रधानमंत्री ने कहा है और इंडियन एक्सप्रेस की लीड के साथ छपा है। कांग्रेस शासित राज्य शाही परिवार के लिए एटीएम बन जाते हैं, महाराष्ट्र में ऐसा नहीं होने दूंगा।
यहां दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली तो यह कि महाराष्ट्र में भाजपा या भाजपा समर्थकों की सरकार कैसे बनी है। सबको पता है और यह कोई नई बात नहीं है कि वे कांग्रेस को सरकार नहीं बनाने देंगे। उन्होंने इसके लिए जो उपाय किये हैं वो सबको मालूम है और ऐसा क्यों करते और चाहते हैं, समझना मुश्किल नहीं है लेकिन जो कहा है वह कांग्रेस को बदनाम करने के लिए। अगर इसमें कुछ गलत है तो वे रोक सकते हैं और गलत नहीं है फिर भी ऐसा होता है तो परेशानी क्यों और बात इतनी ही नहीं है। इलेक्टोरल बांड की कहानी सार्वजनिक होने के बाद ऐसा कहा जा रहा है। इसके अलावा, यह बात इतनी ही महत्वपूर्ण होती तो और अखबारों में छपी होती। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की सेकेंड लीड का शीर्षक है, महाराष्ट्र में मोदी ने कांग्रेस की आलोचना बंटवारे की उसकी राजनीति के लिये की। इसके साथ खरगे का आरोप भी है, भाजपा लोगों को बांट रही है।
ईडी और सीबीआई की कार्रवाई हो और बाद में कुछ न मिले तो जो शर्मिन्दगी होनी चाहिये वह होती है कि नहीं पता नहीं लेकिन आयकर के छापे तो अपेक्षाकृत आम हैं। यह ऐसा तरीका है जिससे सत्तारूढ़ दल लाभ पाता है। इसलिए, चुनाव के समय सत्तारूढ़ दल को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिये जिससे उसे फायदा हो और विपक्ष को नुकसान। इस मामले में विपक्ष की बदनामी तो हो ही रही है। विपक्षी दलों को बदनाम करने के आरोपों के बाद उन मामलों में क्या निकला हम सब जानते हैं और उसका नुकसान भी देख रहे हैं। बहुत सारे लोगों का कहना है कि इसके लिए विपक्ष को सड़कों पर आंदोलन करना चाहिये। मेरा मानना है कि इसके लिए वेतनभोगी सरकारी कर्मचारियों से कहा जाना चाहिये कि वे अपना काम ठीक से करें। वरना उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिये। दोनों नहीं हो रहा है। हालांकि, अभी वह भी मेरी चिन्ता का विषय नहीं है पर मुझे लगता है कि अखबार अपनी खबरों से यह काम कर सकते हैं और उन्हें यह काम जरूर करना चाहिये। इस लिहाज से झारखंड में कल हेमंत सोरेन के सहयोगी के परिसरों पर आयकर छापा बड़ी खबर है और आज इसे दिल्ली के अखबारों में महत्व मिलना चाहिये था। मिला भी है, नवोदय टाइम्स के अलावा यह दि एशियन एज में भी है और नवोदय टाइम्स में एक कॉलम की छोटी सी खबर है तो दि एशियन एज में यह तीन कॉलम में फोटो और मुख्यमंत्री के आरोप के साथ छपी है। मुख्यमंत्री ने कहा है यह दबाव डालने की राजनीति है जबकि भाजपा ने कहा है कि चुनाव से संबंध नहीं है। मुद्दा यह है कि आयकर विभाग ने यह बात क्यों नहीं कही और क्यों नहीं बताया कि किन पक्की सूचना पर छापा मारा गया और छापे में क्या मिला? सामान्य स्थिति में भाजपा को ऐसा कहने और खबर के साथ छपवाने की जरूरत ही नहीं थी।
खबर में यह नहीं बताया गया है कि छापे में विभाग को क्या मिला या किन, अथवा किसकी शिकायत पर यह कार्रवाई हुई है। निश्चित रूप से यह कार्रवाई स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के मार्ग में बाधा है इसलिए छापा मारने वालों का काम था कि वे अपनी कार्रवाई को उचित साबित करने के लिए बताते कि क्या मिला है। चुनाव के पहले ऐसी कार्रवाई को चुनाव से जोड़कर देखा ही जायेगा और संबंधित दल को इसका नुकसान हो सकता है। मतदान के बाद इसकी भरपाई नहीं हो सकेगी। ऐसे में कायदे से छापा पड़ना ही नहीं चाहिये था वरना छापे में क्या मिला बताया जाना चाहिये था और कुछ नहीं मिला – यही बता दिया जाता तो भी यह समझा जा सकता था कि रूटीन कार्रवाई थी, कुछ नहीं मिला तो बता दिया गया। चुनाव में काले धन के उपयोग पर रोक के लिए ऐसी कार्रवाई हो सकती है। पहले सभी विभागों की इतनी कार्रवाई नहीं होती थी लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि नहीं होती थी। चूंकि यह कोई नई बात नहीं है और चुनाव लड़ने वालों को राहत नहीं मिल रही है इसलिए मुझे हाल में प्रकाशित और चर्चित राहुल गांधी का लेख याद आता है। वैसे तो वह भारतीय कारोबार और व्यवसाय पर है लेकिन उसमें सच्चाई का बयान है और सच कड़वा होता है इसलिए सरकार समर्थक इकोसिस्टम की परेशानी दिखाई दे रही है। यह छापा और भाजपा का स्पष्टीकरण उसका हिस्सा हो सकता है।
राहुल गांधी ने लिखा था, “ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत की आवाज कुचल दी थी। यह आवाज अपनी व्यापारिक शक्ति से नहीं, बल्कि अपने शिकंजे से कुचली थी। कंपनी ने हमारे राजा महाराजाओं और नवाबों से साझेदारी की, उन्हें रिश्वत देकर और धमका कर भारत पर शासन किया। उसने हमारी बैंकिंग, नौकरशाही और सूचना नेटवर्क को नियंत्रित कर लिया था। हमने अपनी आजादी किसी दूसरे देश के हाथों नहीं गंवाई हमने इसे एक एकाधिकारवादी निगम के हाथों खो दिया जो हमारे देश में दमन चक्र चलाता था …..।” मुझे लगता है कि राहुल गांधी के लेख में मुख्य बात ईस्ट इंडिया कंपनी और उसकी कार्यशैली है। मौजूदा समय में और इस लेख में ऐसा कुछ नहीं है रजवाड़ों के पक्ष में राहुल गांधी का विरोध किया जाये। रजवाड़ों की तुलना अभी के चुनाव आयोग से कीजिये या 2014 के चुनाव से पहले भाजपा और संघ समर्थकों द्वारा बनाई गई स्थितियों में तबके राजा-महाराजा से कीजिये मामले तो अब बिल्कुल साफ हैं। अभी की ईस्ट इंडिया कंपनी को पहचानना, समझना या महसूस करना मुश्किल नहीं है। चूंकि लेख सही समय पर सही जगह चोट करता है इसलिए इसे निष्प्रभावी करने की कोशिशें कम नहीं हुई हैं। इनमें रतन टाटा के निधन के कई दिनों बाद उनपर लेख लिखना और राहुल गांधी को उद्योग विरोधी बताना शामिल है।
इन स्थितियों में झारखंड में कल का छापा खास तौर से महत्वपूर्ण खबर है। यह छापा किसी गैर चुनावी राज्य में पड़ा होता तो इसके वो मायने नहीं होते और तब यह अंदर की खबर ही थी लेकिन दो अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर छापा है तो जाहिर है कि बाकी ने इस मामले में को इतना महत्व नहीं दिया है या इस सरकार के काम या कार्यशैली को ईस्ट इंडिया कंपनी की कार्यशैली की तरह नहीं देखा जा रहा है। वह भी तब जब अपने तमाम आदर्शों और विपक्ष की आलोचना करने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही उनके लिए चुनावी आचार संहिता को आसान बना लिया गया था। डेक्कन हेरल्ड की एक खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय ने चुनाव आयोग से अक्टूबर 2014 में ही उन्हें चुनाव के समय लागू आदर्श आचार संहिता के एक प्रावधान से छूट दिलाने का आग्रह किया था। ऐसा नहीं होता तो उनके लिए आधिकारिक यात्राओं के साथ चुनाव प्रचार करना संभव नहीं होता। मई 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के छह महीने से भी कम समय बाद, उनके कार्यालय ने चुनाव आयोग से उन्हें आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) के अध्याय VII के पैरा (1) (ए) से छूट दिलाने में सफलता प्राप्त कर ली। इससे उन्हें भाजपा उम्मीदवारों के लिए वोट मांगने के लिए देश भर में सरकारी दौरों पर जाने की अनुमति मिल गई। मोटे तौर पर प्रधान प्रचारक के प्रचार दौरे आधिकारिक हो गये।
चुनाव आयोग ने चुनाव संहिता में प्रधानमंत्री को असामान्य तत्परता के साथ ढील दी। उसी दिन, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने छूट के लिए आयोग को पत्र लिखा था। आयोग ने मोदी को अक्टूबर 2014 में आधिकारिक यात्राओं और प्रचार दौरों को जोड़ने की अनुमति दी थी। चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से छूट देने के अनुरोध को स्वीकार किया उसके करीब डेढ़ महीने बाद झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों के लिए मतदान भी शुरू हुये थे। प्रधानमंत्री को आदर्श आचार संहिता से छूट की चर्चा पांच साल बाद तब हुई जब चुनाव आयोग ने इसका हवाला दिया और कहा कि नीति आयोग ने कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानीय अधिकारियों से जानकारी मांगकर उन्हें पीएमओ को सौंपकर चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया है। इससे लोकसभा चुनाव लड़ रहे भाजपा उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने के लिए मोदी की यात्राओं की तैयारी में मदद मिली थी। लगभग ऐसे ही पर इससे कम गंभीर आरोप पर इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द हो गया था और तब भाजपा व संघ परिवार ने इसपर जो हंगामा किया था उसका वर्णन भाजपा वालों ने ही अपनी किताबों में किया है। अभी वह मुद्दा नहीं है लेकिन संघ परिवार की कार्यशैली जरूर बताती है। यह अलग बात है कि इसीलिए उसपर प्रतिबंध लगा था और बार-बार देश भक्ति की याद आती है। बाद में 2024 के चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर गलत और झूठे आरोप लगाये तो इसकी शिकायत की गई पर कार्रवाई नहीं हुई। बहुत समय बाद पार्टी अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी गई और यह भी ऐसे किसी ‘नये नियम’ के तहत हुआ था। उसपर फिर कभी। लेकिन इस व्यवस्था में अभी की ईस्ट इंडिया कंपनी और रजवाड़ों को पहचानना मुश्किल नहीं है।
इस तरह, आज सिर्फ एक खबर की चर्चा करके मैं बताना चाहता हूं कि आजकल ज्यादातर अखबार क्या कर रहे हैं। लंबे समय तक मेरा पसंदीदा अखबार रहा द टेलीग्राफ भी अब ऐसी खबरें नहीं देता है कि उसका उल्लेख भी किया जाये। और यह इसलिए है कि यहां प्रचारकों वाली खबर नहीं होती हैं। वरना, नवोदय टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, ट्रुडो ने स्वीकारा, कनाडा में हैं खालिस्तान के समर्थक। मुझे लगता है कि यह कोई नई बात नहीं है और इसमें ट्रुडो का स्वीकारना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत सरकार उनकी हत्या कराने का अभियान यहां से चलाये और ट्रूडो उसकी आजादी दें। मैं नहीं कहता कि भारत सरकार ऐसा करती है या करना चाहती है। मैं जानना चाहता हूं कि अखबार ये बताकर क्या कहना चाहता है? खालिस्तान समर्थक या भारत विरोधी किसी देश में रहते हैं तो वह देश क्या करे? करेगा तभी तभी भारत उनके प्रत्यर्पण की मांग करे और पर्याप्त सबूत दे। और यह मामला बैंकों से कर्ज लेकर भागे लोगों से अलग भी हो तो नतीजा किसका पहले आना चाहिये और कितना पहले?


