
संजय कुमार सिंह
महाराष्ट्र में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं। 2019 के चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन था। भाजपा को 105 और शिव सेना को 56 सीटें मिलीं और दोनों मिलकर सरकार बना सकते थे। लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर नतीजे आने के बाद बीजेपी-शिवसेना में विवाद बढ़ा और उद्धव ठाकरे एनडीए से अलग हो गये। तब भाजपा ने अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बनाने की डील की और सुबह-सुबह का शपथग्रहण हो गया। यह सरकार कुछ ही दिन चली क्योंकि अजीत पवार पलट गये। अब इन्होंने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सरकार बनाई और खुद डिप्टी सीएम रहे। जून 2022 में शिवसेना में बगावत हुई और उद्धव मुख्यमंत्री नहीं रहे। भाजपा के समर्थन से शिवसेना के बागी एकनाथ शिन्दे मुख्यमंत्री बने। साल भर बाद एनसीपी भी टूट गई और अजीत पवार एनडीए सरकार में शामिल हो गये। नतीजतन महाराष्ट्र में अब दो शिवसेना और दो एनसीपी हैं। इनमें एक-एक भाजपा के साथ है जबकि एनसीपी और शिवसेना का आधा हिस्सा कांग्रेस के साथ है। ऐसे में जनता ने किसी को वोट दिया था किसी और की सरकार बनी तथा किसी और की चलने दी गई जो पूरी तरह सिस्टम का खेल रहा।
मुख्य बात यह है कि भाजपा के साथ की शिवसेना टूट गई है। एनसीपी भी टूटी है लेकिन वह पहले भी अलग थी और एक थी तो पूरी भाजपा के साथ जा सकती थी और 105 सीट वाली भाजपा के साथ अपनी 54 सीटों के साथ राज्य विधानसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। कुल 159 सीटों के साथ 145 के बहुमत के निशान से ऊपर थी। लेकिन पूरी एनसीपी भाजपा के साथ जाने को तैयार नहीं थी, अजीत पवार गये तो वापस आना पड़ा और बाद में एनसीपी भी टूट गई। अजीत पवार के नेतृत्व वाला एनसीपी भाजपा के साथ है। इस तरह अगर भाजपा से शिवसेना का एक गुट अलग हुआ है तो एनसीपी का एक गुट जुड़ा है। भाजपा का प्रदर्शन अगर पहले जैसा रहता है और टूटे हुए दोनों दलों का उसके साथ वाला हिस्सा पहले के मुकाबले आधी सीटें ले आता है तो तीनों को मिलाकर बहुमत हो जायेगा और फिर तीनों पार्टियों की सरकार बन सकती है। लेकिन पिछले पांच साल के दौरान भाजपा ने विपक्षी दलों में जो तोड़फोड़ की है उस राजनीति से राज्यपाल ने भी तौबा कर ली है। ऐसे में जनता इसे कैसे देखती है और तोड़ फोड़ करने वालों के साथ टूटने वालों के प्रति जनता का रुख क्या होता है यह देखने वाली बात होगी।
मामला इतना ही होता तो चुनाव दिलचस्प नहीं होता। भाजपा ने कुछ नहीं किया है और कांग्रेस ने काफी कुछ बेहतर किया है इसलिए चुनावी टक्कर है और तोड़फोड़ के बाद विधानसभा अध्यक्ष की मेहरबानी से उपचुनाव नहीं हुए इसलिए जनता का गुस्सा इसी बार फूटना है (या फूटना चाहिये)। इसलिए चुनाव नतीजे का अनुमान मुश्किल है। पर अखबारों की खबरें ऐसी नहीं हैं। भाजपा का चुनाव प्रचार तो होना भी नहीं था। इसलिए भाजपा ने जो ‘काम’ किये हैं उसे भूलकर कांग्रेस विरोध की राजनीति कर रही है। चुनाव आयोग का साथ है और इसलिए नतीजे दिलचस्प हो सकते हैं। पिछली बार भाजपा के 105 के मुकाबले शिवसेना अगर 56 और राष्ट्रवादी कांग्रेस 54 पर थी तो कांग्रेस बहुत पीछे सिर्फ 44 पर थी। अब देखा जाना है कि कांग्रेस ने कितनी बेहतरी की है और भाजपा को नुकसान होता है कि नहीं। शिवसेना और एनसीपी आधे-आधे होते हैं या भाजपा अथवा कांग्रेस के साथ जाने वालों को ज्यादा लाभ होता है। यह सब जानना और इस लिहाज से नतीजों का इंतजार करना किसी के लिए दिलचस्प होगा। पर अखबारों में चुनावी खबरें इस लिहाज से नहीं छप रही हैं। इसका कारण घटिया होती राजनीति है।
इसका असर पत्रकारिता या खबरों पर भी है और शायद इसीकारण चुनाव के समय भाजपा की पिछली राजनीति का उल्लेख जितना होना चाहिये नहीं होता है और इसमें यह शामिल है कि इस बार महाराष्ट्र के चुनाव देर से हो रहे हैं और इसका कारण भी राजनीतिक हो सकता है। उसपर कोई अटकल या खबर भी वैसे नहीं है जैसे होनी चाहिये। खासकर इसलिए कि पिछले चुनाव के बाद राज्य विधानसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी और दूसरी व तीसरी पार्टी उसकी आधी थी। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी यहां चौथे नंबर पर थी और इस बार उसके कार्य व राजनीति के कारण उसका कितना विकास होता है और यह सरकार बनाने लायक है कि नहीं और अगर नहीं है तो क्यों? दिल्ली के अखबारों के पहले पन्ने पर ऐसा उत्साह नहीं है लेकिन आज द टेलीग्राफ में जेपी यादव की एक खबर मुंबई डेटलाइन से है। फ्लैग शीर्षक है, पहचान की दुविधा : बाल ठाकरे की पार्टी का टूटना मराठी मतदाताओं की परीक्षा। मुख्य शीर्षक है, भाजपा सेना के लोगों ने मुंबई में गड़बड़ की। इसका पता, इस खबर के पहले पैरे में दिये गये उदाहरण से चलता है।
सदा सर्वणकर को माहिम विधानसभा सीट से लड़ाई में बने रहने के लिए दो शक्तिशाली ताकतों – वरिष्ठ सहयोगी भाजपा और राज ठाकरे – से लड़ना पड़ा। भाजपा ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना के उम्मीदवार सर्वणकर पर दबाव बनाया था कि वे अपना नाम वापस लें और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख के बेटे अमित ठाकरे का समर्थन करें। लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। अब, देखना है कि वे माहिम से लगातार तीसरी बार और कुल मिलाकर चौथी बार, जीतते हैं कि नहीं। वे 2004 में दादर से जीत चुके हैं। उनका जीतना इस बात पर निर्भर करता है कि “मराठी माणुस” उनका कितना समर्थन करते हैं। माहिम मुंबई के बीचों-बीच स्थित है, जहाँ बाल ठाकरे ने “मराठी माणुष” के हित के लिए शिवसेना की स्थापना की थी। यह निर्वाचन क्षेत्र इस बात का उदाहरण है कि राज्य में भाजपा के प्रभुत्व में आने से इस क्षेत्रीय पार्टी के गुटों को किस तरह से अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। भाजपा नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के उम्मीदवार सरवणकर का मुकाबला उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के महेश सावंत से है, जो विपक्षी महा विकास अघाड़ी का हिस्सा है, और एमएनएस के नए उम्मीदवार अमित ठाकरे से। भाजपा चाहती थी कि सरवणकर अपना नाम वापस ले लें और माहिम को अमित के लिए सुरक्षित सीट बना दें, ताकि वह राज को खुश कर सकें और उद्धव गुट के वोटों को अन्यत्र बांटने में उनकी मदद ले सकें। राज्य भाजपा नेताओं ने आगे बढ़कर राज के बेटे को अपना समर्थन देने की घोषणा की, न कि अपने सहयोगी दल के उम्मीदवार सरवणकर को।
सरवणकर ने द टेलीग्राफ से कहा, “मैं यहां से मौजूदा विधायक हूं। एमएनएस उम्मीदवार की घोषणा मेरी पार्टी द्वारा मेरा नाम घोषित करने और मेरे नामांकन दाखिल करने के बाद की गई थी। मैंने अपने नेता एकनाथ शिंदे से कहा कि मैं अपना नाम वापस नहीं ले रहा हूं। मैंने समझाया कि अमित ठाकरे सीट नहीं जीत पाएंगे।” शिंदे ने सरवणकर से कहा कि वे राज से जाकर मिलें और उन्हें सारी बातें समझाएं। माहिम में अपने केंद्रीय चुनाव कार्यालय से चुनाव प्रचार अभियान पर निकलने से पहले कहा, “राज ठाकरे मेरे पड़ोसी हैं। मैंने उनसे मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। अब जनता तय करेगी कि उनका विधायक कौन होना चाहिए”। भाजपा ने अब अपना रुख बदल लिया है और सरवणकर को समर्थन देने की घोषणा की है। लेकिन, निर्वाचन क्षेत्र में आधे से अधिक मतदाता मराठी हैं, जो शिवसेना के तीन गुटों के उम्मीदवारों के बीच बंटे हुए हैं। यह पेचीदा जाल माहिम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक मुंबई महानगर क्षेत्र के लगभग 50 विधानसभा क्षेत्रों में फैला हुआ है, जो कभी अविभाजित शिवसेना का गढ़ हुआ करता था। यह उलझन करीब 25 सीटों पर और मुश्किल है। यहां मनसे ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं। माहिम बाजार में किराने की दुकान चलाने वाले सदाशिव पाटिल ने कहा, “यहां ‘महा कन्फ्यूजन’ है।
तीनों मुख्य उम्मीदवार मजबूत हैं। जो मराठी वोटों का बहुमत हासिल करेगा, वही जीतेगा।” जून 2022 में उद्धव की सेना को विभाजित करने और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस-शिवसेना-एनसीपी सरकार को गिराने के लिए भाजपा की परदे के पीछे की साजिशों ने महाराष्ट्र की राजनीति को दागदार बना दिया है। इस साल के आम चुनाव में यह तय होना था कि दोनों पार्टियों में से कौन सी पार्टी ‘असली शिवसेना’ है – शिंदे या उद्धव की – लेकिन यह मामला अनसुलझा रहा और दोनों को लगभग बराबर सीटें मिलीं। शिंदे की पार्टी ने सात लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि उद्धव की पार्टी ने नौ सीटें जीतीं। शिंदे ने 39 विधायकों के साथ उद्धव की सेना से नाता तोड़ा था। इस बार उन्होंने पूरी तरह से टकराव का रास्ता चुना है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के दलबदलू मिलिंद देवड़ा को उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे के खिलाफ वर्ली से मैदान में उतारा है। यहां आदित्य को मनसे के संदीप देशपांडे से भी मुकाबला करना होगा। उद्धव गुट ने शिंदे के गुरु आनंद दिघे के भतीजे को मुख्यमंत्री के गढ़ ठाणे क्षेत्र से मैदान में उतारा है। तथ्य यह है कि शिंदे 2022 में जब उद्धव के ज़्यादातर विधायकों को अपने साथ ले गए थे, ज़्यादातर कार्यकर्ता यानी शिवसैनिक उद्धव के साथ खड़े थे।
यह तो महाराष्ट्र और मराठी माणूस की राजनीति का हाल है और सिर्फ सत्ता में बने रहने की भाजपा की कोशिशों और चाल के कारण है। जनता इसपर जो फैसला दे, प्रधान प्रचारक के नेतृत्व में पूरा देश चुनाव लड़ रहा है क्योंकि मामला देश की आर्थिक राजधानी पर कब्जे का है। राज्य में भाजपा की सरकार बनती है तो डबल इंजन वाली सरकार होती जो वर्षों बाद बंटेंगे तो कटेंगे की चेतावनी देती है और प्रचारक प्रधानमंत्री को इतनी पसंद आई कि वे एक हैं तो सेफ हैं के नारे पर चल पड़े हैं। इसके बाद देश में जो चल रहा है वह आज के अखबारों में है। इनमें हिन्दी के एक अखबार (अमर उजाला) की लीड अगर जम्मू-कश्मीर में जेसीओ बलिदान, तीन जवान घायल… जैस आतंकियों को घेरा है नवोदय टाइम्स की लीड आतंकी अर्श डल्ला की गिरफ्तारी है। यहां सेकेंड लीड का शीर्षक है, किश्तवाड़ में आतंकियों से मुठभेड़, जेसीओ शहीद। अमर उजाला की खबर का उपशीर्षक है, ग्राम रक्षकों के हत्यारे दहशतगर्दों के साथ कोंतवाड़ा के जंगलों में सुरक्षाबलों की मुठभेड़। कहने की जरूरत नहीं है कि यह 2016 की नोटबंदी से आतंकवाद खत्म होने के प्रचार के बावजूद 2024 की स्थिति है और सरकार अगला चुनाव जीतने के लिए अपने काम नहीं बता रही है, कांग्रेस की खामियां गिना रही है और इसमें भी स्तर यह है कि राहुल गांधी जिसे संविधान कहकर अपनी जनसभाओं में दिखाते हैं उसे कोरे पन्ने वाली लाल किताब कहा गया और कल कांग्रेस अध्यक्ष ने खुलासा किया कि कोरे पन्ने वाली यही किताब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द को दी थी। इससे आप समझ सकते हैं कि प्रधानप्रचारक चुनाव प्रचार में पिछड़ने लगें तो क्या कर सकते हैं। अपने किसी काम की कभी तारीफ नहीं की और कांग्रेस, विपक्षी गठबंधन और शाही परिवार की आलोचना करके ही कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं।
इसके लिए इनके प्रिय मुद्दे घुसपैठ या घुसपैठिये तथा आतंकवाद है। 10 साल से ज्यादा सत्ता में रहते हो गये। 2019 में घुस कर मारूंगा का नारा था पर सच्चाई यह है कि सरकार ने घुसपैठ रोकने के लिए कुछ नहीं किया है और आतंकवाद रोकने के मामले में भी यही स्थिति है। लेकिन चुनाव जीतने के लिए प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और दूसरे लोग जो कह-कर रहे रहे हैं उनमें से कुछ आज के अखबारों में प्रमुखता से है। पेश है इनमें से कुछ खास खबरें। ये आज ऊपर वर्णित तीन लीड के अलावा हैं।
1. अमेरिका को लेकर कई सारे देश घबराये हुए हैं, हम उनमें से एक नहीं हैं, विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा (इंडियन एक्सप्रेस)
2. महायुति ने महिलाओं, किसानों, युवाओं को सहायता की पेशकश की (हिन्दुस्तान टाइम्स)
3. निज्जर के कनाडाई सहयोगी के दो ‘सहायक’ पंजाब में गिरफ्तार (द हिन्दू)
4. मोदी ने कहा कांग्रेस-झामुमो एसटी-एससी-ओबीसी की एकता तोड़ने पर आमादा (दि एशियन एज)
5. अमित शाह ने महाराष्ट्र में धर्म परिवर्तन रोकने के लिए कानून का वादा किया, विपक्ष ने जातिवार जनगणना का (टाइम्स ऑफ इंडिया)

भारत को आरएसएस, मोदी और अमितशाह से खतरा
इसके अलावा, नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है, भारत को आरएसएस, मोदी और अमितशाह से खतरा है। अखबार ने इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान, समाज की सामूहिक ताकत को तोड़ना चाहती है कांग्रेस के साथ छापा है। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 2016 में कुछ लोग दिल्ली के पास दादरी में अखलाक के घर में घुस गये थे फ्रीज में रखे मांस को गाय का बताकर उसकी हत्या कर दी। यह सब तब हुआ जब उत्तर प्रदेश में डबल इंजन की सरकार नहीं थी लेकिन गोहत्या और गोमांस बेचने पर प्रतिबंध है। ऐसे में किसी के घर गोमांस तभी मिलेगा जब कहीं गोहत्या होगी, कोई वधशाला होगी आदि आदि। अगर किसी को शक हो तो इसकी जांच होनी चाहिये और मांस नहीं, वधशाला का पता लगाया जाना चाहिए। घर में बकरे का मांस और गाय का मांस नंगी आंखों से पहचानना मुश्किल है और ऐसी जांच का कोई मतलब नहीं है। फिर भी अनधिकृत लोग अखलाक के घर घुस गये उसकी हत्या कर दी। सरकार और सरकारी पार्टी ने लोगों को इससे रोकने, समझाने की कोई अच्छी कोशिश नहीं की और अगर गो मांस मिले भी तो किसी को किसी की हत्या का अधिकार नहीं है – यह सब नहीं बताया गया।
बाद में डबल इंजन की सरकार आ गई और अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि मांस गाय का था, बकरे या या पक्का नहीं हुआ। मेरी समझ कहती है कि गोहत्या पर प्रतिबंध के बावजूद गोमांस तभी मिलेगा जब कहीं गोहत्या होती होगी और मांस बिकता होगा। आम घर में कोई गाय की हत्या करके उसका मांस खा जाये और बाहर पता न चले यह सामान्य तौर पर असंभव है। वैसे भी पुलिस और उसका खुफिया तंत्र किसलिये होता है। अभी गूगल पर दोनों तरह की खबरें हैं – गोमांस था और नहीं था। मुद्दा वह नहीं है पर मांस किसका था पर यह तो होना ही चाहिये कि इस तरह की जांच आम लोगों को नहीं करनी चाहिये और अगर किसी तरह कोई मामला संज्ञान में आये तो पुलिस को सूचना दी जानी चाहिये। संबंधित परिवार के किसी व्यक्ति की हत्या या मौत की स्थिति बेहद अनुचित है पर यह सब कहां हुआ। दूसरी ओर, हत्यारों के सम्मान और सेवा की भी खबरें आईं। उसके बाद के आठ वर्षों में देश भर के डबल और सिंगल इंजन वाले राज्यों में ऐसे कई मामले हुए, मुसलमानों को लिंच किया गया, मुसलमानों की जमानत नहीं होती है फिर भी सरकार की तरफ से कार्रवाई तो छोड़िये, अपील भी नहीं है और अब प्रधान प्रचारक जो देश के प्रधानमंत्री भी हैं, यह कहने की हिमाकत कर रहे हैं कि कांग्रेस समाज की सामूहिक ताकत तोड़ना चाहती है। इस लिहाज से कांग्रेस अध्यक्ष का जवाब सही भी हो तो इसकी स्थिति नहीं बननी चाहिये थी पर है और खबर दूसरे अखबारों के पहले पन्ने पर नहीं छपी है।
न्यायिक व्यवस्था में सुधार का गुड़ गोबर इन राजनीतिक खबरों के बीच आज टाइम्स ऑफ इंडिया में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ से संबंधित एक खबर है जो उनके साक्षात्कार पर आधारित है। शीर्षक के अनुसार उन्होंने कहा है, मैं समझता हूं कि मैं ने सिस्टम को जैसा प्राप्त किया था उससे बेहतर करके छोड़ा है। मुझे लगता है कि यह उनकी गणना हो सकती है और संभव है कि तकनीकी तौर पर सही भी हो लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था बहुत ही चिन्ताजनक स्थिति में है। अन्याय खुलेआम और सरेआम है और यह कोई नई बात नहीं है। अदालतों की खराब स्थिति पर कई किताबें हैं। मुख्य न्यायाधीश ने भले ए टू जेड को जमानत देने का दावा किया पर बीच के कई अक्षर हैं जिनपर ध्यान नहीं दिया गया और वे जेल में ही हैं से लेकर कई ऐसे मामले हैं जिनसे लगता है कि सिस्टम में सुधार नहीं हुआ है। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनके घर जाना पड़ा और उनके साथ पूजा करके उन्हें विवाद में घसीटा गया – यह इस बात का सबूत हो सकता है कि उन्होंने अपनी ओर से अच्छी कोशिश की। पर जो हुआ और फिर मुख्य न्यायाधीश ने जो सब कहा उससे गुड़ गोबर हो गया। उन्होंने इसे खुल कर स्वीकारने की बजाय बचने की कोशिश की और संभव है बेदाग होने के कारण निश्चिंत रहे हों पर सिस्टम को ठीक करने के लिए कुछ कर नहीं पाये – और क्यों नहीं कर पाये यह बताये बगैर वे सिर्फ बचाव में हैं। हो सकता है उन्हें इसका ईनाम मिले पर ईनाम स्वीकारते ही मामला खत्म हो जायेगा और नहीं मिला, या स्वीकार नहीं किया बताये बगैर बात नहीं बनेगी। यह सिस्टम है और संभव है पहले के लोग भी इसी कारण सिस्टम को ठीक करने के लिए कुछ बेहतर नहीं कर पाये हों। इस सिस्टम में एक जज की हत्या (या संदिग्ध मौत) की जांच नहीं हुई (या हो पाई) तो किसी के लिए भी कुछ नहीं कर पाना बहुत बड़ी बात नहीं है और स्वीकार लेना बड़ी बात होती। स्वीकार नहीं करना भी लीपा-पोती ही है और मुझे लगता है चंद्रचूड़ साब भी यही कर रहे हैं।


