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आज के अखबार : महाराष्ट्र में गृहमंत्रालय की मांग मुद्दा नहीं है, ‘परिवार’ का विरोधाभास भी सामान्य ‘खबर’

संजय कुमार सिंह

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे अब स्वस्थ हैं और कल गांव से वापस मुंबई आ गये। आज द हिन्दू और दि एशियन एज ने आज अपनी लीड से बताया है कि महाराष्ट्र भाजपा में कोई विवाद नहीं है, नए मुख्यमंत्री का फैसला आज हो जायेगा। यही बात हिन्दुस्तान टाइम्स ने सिंगल कॉलम की खबर में कही है। यहां शीर्षक है, शिन्दे ने चुप्पी तोड़ी अगले मुख्यमंत्री का फैसला भाजपा करेगी, मैं इसका पालन करूंगा”द हिन्दू का शीर्षक है, महायुती की वार्ता जारी; शिन्दे भाजपा की पसंद का समर्थन करेंगे। महाराष्ट्र में भाजपा की अप्रत्याशित जीत, ईवीएम पर आरोप और मुख्यमंत्री बनाने के रास्ते में रोड़ा न होने की घोषणा के बाद शिन्दे का गांव जाकर बीमार हो जाना, गृहमंत्रालय की मांग करना और उसके पक्ष में तर्क देना भाजपा की राजनीति का रायता है जो फैल गया है और मैं कल इस बारे में लिख चुका हूं। आप जानते हैं कि अखबार (पूरा मीडिया) निष्पक्ष खबरें नहीं देता है और कल मैंने एक वीडियो देखा जिसमें एकनाथ शिन्दे से गृहमंत्रालय के बारे में पूछा गया और वे टालते रहे, अनसुना करते रहे। जोर देने पर कहा, आप ही कुछ बोलोगे या मुझे बात करने दोगे? कहने की जरूरत नहीं है कि इस तर्क-संगत लग रही मांग का जवाब नहीं होने के कारण ही संबंधित सवाल को टाला जा रहा है और खास तेवर दिखाने पड़ रहे हैं तो आम तौर पर नेताओं में नहीं होते हैं। प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाले भाजपा नेताओं और उसके सहयोगियों की बात अलग है। 

इसके बावजूद आज के अखबारों की खबरें महाराष्ट्र भाजपा में सब ठीक बताने की कोशिश कर रही हैं जबकि इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार शिन्दे ने कहा है कि उन्होंने आम आदमी के रूप में काम किया है इसलिए जनता उन्हें फिर से मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है। इसके साथ दोहराया गया (उपशीर्षक) है कि उनकी सेना मोदी और शाह के निर्णय का समर्थन करेगी। लेकिन इन खबरों से यह पता नहीं चल रहा है कि गृहमंत्रालय की मांग का क्या हुआ या उसके बिना भी मान जायेंगे। ठीक है कि यह भाजपा का आंतरिक मामला है लेकिन जानने की इच्छा तो किसी की होगी। खासकर तब जब चुनाव नतीजों से नजर आ रहा है कि सत्तारूढ़ पार्टियां चुनाव जीत जा रही हैं और अपवाद कम होते हैं और उसका कारण समझना मुश्किल नहीं होता है। ऐसे में कांग्रेस या विपक्ष ने चुनाव सुधार के लिए आंदोलन की घोषणा कर रखी है। दूसरी ओर, आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है, मुंबई पुलिस ने झूठे दावों के लिए ईवीएम के आलोचक सैयद शुजा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। आपको बता दूं कि सैयद शुजा ने इस मामले में 2019 में प्रेस कांफ्रेंस की थी और तब दैनिक जागरण का शीर्षक था, “इस बार ईवीएम पर लंदन से सवाल उठे”।

वैसे जागरण की खबर, “हर चुनाव से पहले ईवीएम पर यूं तो राजनीतिक दलों की ओर से सवाल उठते रहे हैं। अब लंदन में एक भारतीय हैकर ने न सिर्फ यह आरोप लगाया है बल्कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जीत का श्रेय भी खुद ले लिया है –  से शुरू होती है। आगे खबर है, उसने दावा किया है कि उसकी टीम ने इन राज्यों में कांग्रेस को बचा लिया। अमेरिका में राजनीतिक शरण लिए हुए भारतीय हैकर सैयद शुजा ने लंदन में चल रही हैकथॉन में यह दावा किया है।” मुझे लगता है इस खबर में कुछ तथ्यात्मक गलतियां हैं। जैसे उसने श्रेय नहीं लिया उसने बताया कि चुनाव कब हैक किए गए थे और कब नहीं। संभवतः वह भी पूछने पर। लंदन में हैकाथॉन नहीं था, प्रेस कांफ्रेंस थी जिसे वह टीवी पर, वीडियो कॉल के जरिए संबोधित कर रहा था। फिर भी, तथ्य गंभीर थे तो अखबार ने इसे अपनी टिप्पणी के साथ ही सही, पहले पन्ने पर छापा तो।

तब यह खबर सबसे कायदे से दैनिक भास्कर में छपी थी। तब मैंने लिखा था,  “इसमें यह भी बताया है कि हैकर ने यह दावा भी किया कि भाजपा के साथ कांग्रेस, सपा, बसपा और आम आदमी पार्टी ने भी उससे संपर्क किया है। उसने कुल मिलाकर 12 पार्टियों के नाम गिनाए। अखबार ने गोपी नाथ मुंडे के भतीजे और एनसीपी नेता धनंजय मुंडे की प्रतिक्रिया, “शुजा का बयान हैरान करने वाला” भी छापा है और कांग्रेस की मांग, “ईवीएम को फूलप्रूफ बनाने की जरूरत” भी छापा है। दैनिक भास्कर की संबंधित खबर यह रही – उसी सैयद शुजा के खिलाफ अब एफआईआर हुई है तो वह सिंगल कॉलम की खबर नहीं है पर पहले पन्ने में कहीं और नहीं दिखी। इन आरोपों के बावजूद चुनाव आयोग न तो वीवीपैट की पर्चियां गिनने के लिए तैयार है ना भारी फीस के बावजूद जांच कराने के लिए तैयार हुआ। देखना है आगे क्या होता है पर एफआईआर से लोगों को डराने कार्रवाई तो चल ही रही है।

आज की एक महत्वपूर्ण खबर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यह कहना है कि हर दंपति कम से कम तीन बच्चे पैदा करे। यह खबर आज इंडियन एक्सप्रेस (दो कॉलम), दि एशियन एज (पांच) कॉलम और नवोदय टाइम्स में टॉप पर (चार कॉलम) में है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी इस खबर के साथ छपी दूसरी खबर में बताया है कि आंध्र प्रदेश के बाद तेलंगाना भी दो बच्चों की नीति को खारिज करने वाला है। खबर के अनुसार आंध्र प्रदेश में दो से ज्यादा बच्चे वाले स्थानीय निकाय के चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। अब इसे खत्म कर दिया गया है और तेलंगाना में भी ऐसा होने वाला है। खबर के अनुसार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने पहले कहा है कि उनकी सरकार ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को प्रोत्साहन देगी। दि एशियन एज में इस खबर के साथ छपी खबर का शीर्षक है, (अमित शाह के बेटे) जय शाह आईसीसी के सबसे कम उम्र के प्रमुख बने। नवोदय टाइम्स ने एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की टिप्पणी छापी है। इसमें उन्होंने कहा है कि अब आरएसएस वालों को शादी कर लेनी चाहिये। देश में जब रोजगार की कमी है, सरकार ज्यादा आबादी का रोना रोती रही है तो ज्यादा बच्चे पैदा करने की राय यूं ही नहीं बनी होगी पर यह सरकार और उसके परिवार का विरोधाभास है जिसे हिन्दुओं को बताया जाना चाहिये

पहले तो बहुमत वाला हिन्दुत्व खतरे में था, अब आबादी कम होने की चिन्ता है और आबादी बढ़ेगी तो नौकरी नहीं मिलेगी। रोजगार की संभावनाएं सरकार पहले ही खत्म कर चुकी है। ऐसे में क्या होगा और सरकार क्या चाहती है यह सब समझना मुश्किल है पर अखबारों ने बताया नहीं है। यह सब देखकर मुझे फिल्म थ्री इडियट्स का गाना याद आ रहा है – जब लाइफ़ हो आउट ऑफ कंट्रोल होठों को करके गोल सीटी बजाके बोल आल इज़ वेल। मुर्गी का जाने, अंडे का क्या होगा? अरे लाइफ़ मिलेगी या तवे पे फ़्राई होगा कोई ना जाने अपना फ़्यूचर क्या होगा होंठ घुमा सीटी बजा, सीटी बजा के बोल भैया आल इज़ वेल, अरे भैया आल इज़ वेल अरे चाचू आल इज़ वेल, अरे भैया आल इज़ वेल ….। आज याद आया कि 2014 का चुनाव ईवीएम हैकिंग से जीतने का दावा किया गया था। अब लग रहा है कि वाकई इस सरकार और परिवार के पास कोई योजना नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और ईवीएम का चाहे जितना बचाव किया हो तथ्य यह है कि वीवीपैट लगाने के आदेश के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव के समय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि हारने वाले पहले और दूसरे नबंर के उम्मीदवार पैसे देकर ईवीएम के चिप की जांच करवा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की इस खबर का शीर्षक इंडियन एक्सप्रेस में इस प्रकार था, “मतदाता के लिए कुछ नहीं बदला, दूसरे और तीसरे नंबर के उम्मीदवारों को यह विकल्प मिला कि वे ईवीएम चिप की जांच की मांग करें”। यह खबर 27 अप्रैल 2024 की है। इस संबंध में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का एक पत्र सोशल मीडिया पर है। इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने हारने वाले उम्मीदवारों को पैसे देकर ईवीएम से संबंधित चिप की जांच कराने का मौका दिया तो चुनाव आयोग ने उससे संबंधित नियम ही नहीं बनाये। पीआईबी ने ऐसे आवेदनों का विवरण तो जारी किया था पर जांच का क्या हुआ कुछ पता नहीं चला। अब खबर है महाराष्ट्र में चुनाव हारने वाले एक उम्मीदवार ने 19 माइक्रोकंट्रोलर चिप की जांच के लिए नौ लाख रुपये की फीस जमा की है। आदेश के अनुसार कुल पांच प्रतिशत ईवीएम की ही जांच का अनुरोध किया जा सकता है। फिर भी फीस इतनी ज्यादा और शर्त ऐसी रखी गई है कि शायद ही कोई जांच करा पाये। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों ने जांच के लिए आवेदन दिये हैं। यह सब ईवीएम पर शंकाओं को मजबूत करता है लेकिन चुनाव आयोग एफआईआर करके शिकायतकर्ताओं को डरा रहा है, परेशान कर रहा है।

जहां तक अखबारों का मामला है महाराष्ट्र की खबर को लीड बनाने वालों के अलावा सबकी लीड का शीर्षक अलग है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, मंदी के बीच आरबीआई और सरकार का अंतर बढ़ा, होल्डिंग दर में वृद्धि। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, तेलंगाना मुठभेड़ में मारे गये सात लोगों में प्रमुख माओवादी नेता शामिल हैं। दि एशियन एज और द हिन्दू का शीर्षक पहले बता चुका हूं, टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड बताती है, ट्रम्प ने एफबीआई के अगले निदेशक के रूप में काश पटेल को चुना। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, संभल की जांच के लिए अजीब चुनाव। मस्जिद का दौरा करने वाली टीम में भाजपा का बचाव करने वाला। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, आम आदमी पा लड़ेगी विधानसभा चुनाव, किसी से गठबंधन नहीं केजरीवाल। नवोदय टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, रूस रक्षा पर बजट का 32 प्रतिशत खर्च करेगी।

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