
संजय कुमार सिंह
नवोदय टाइम्स उत्तर प्रदेश के हिन्दी और दिल्ली व कोलकाता के अंग्रजी अखबार से काफी अलग है। यहां लीड का शीर्षक है, डल्लेवाल की सुरक्षा में डटे किसान। जीएसटी कौंसिल वाली खबर का शीर्षक यहां है, “राज्य एटीएफ को जीएसटी के दायरे में लाने के पक्ष में नहीं : सीतारमण”। आज की खबरों में एक खबर अगर यह बताती है कि विदेश में रहने वाले भारतीयों से भी भारत को फायदा होता है तो नवोदय टाइम्स में एक शीर्षक है, “विदेश में दलित छात्र कर सकेंगे मुफ्त पढ़ाई : केजरीवाल”। नवोदय टाइम्स में आज ही इस शीर्षक से ऊपर एक शीर्षक है, एलजी ने केजरीवाल के खिलाफ ईडी को दी मुकदमे की मंजूरी। यह मंजूरी आबकारी नीति मामले में है और आप जानते हैं कि इसमें केजरीवाल जेल हो आये हैं और अगर भ्रष्ट, हों पैसे भी लिये हों तो एक मुख्यमंत्री के लिए इतनी सजा कम नहीं है। सच्चाई यह है कि कुछ नहीं मिला, कुछ साबित नहीं हुआ, इससे बहुत ज्यादा की चोरी के आरोपी वाशिंग मशीन में धुल चुके हैं फिर भी केजरीवाल के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी एलजी दे रहे हैं और खबर भी छप रही है। मामले के विस्तार में नहीं जाऊं तो भी सबको पता है कि मामला क्या है। जो जेल भेज रहे हैं उनके काम और जो जेल जा रहा है उसके काम – के साथ अखबारों की निष्पक्षता भी आज सार्वजनिक हैं।
खबर देने की बजाय सरकार का प्रचार करने में लग और लगा दिये गये आज के ज्यादातर अखबार नहीं बताते कि पुरानी कारों पर जीएसटी बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। मेरे आठ अखबारों में आज सिर्फ अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, पुराना वाहन खरीदना होगा महँगा…अब 12 के बजाय 18 फीसदी जीएसटी लगेगा। जीएसटी कौंसिल की 55वीं बैठक शनिवार को जैसलमेर में हुई। उसमें कई निर्णय लिये गये और किसी को भी शीर्षक बनाया जा सकता था। पर अमर उजाला ने इसे शीर्षक बनाया है और लीड लगाया है जो किसी और अखबार ने नहीं किया। वह भी तब जब आज लीड के लायक कोई सर्व सम्मत खबर नहीं है और भिन्न अखबारों की लीड अलग है। उसपर आने से पहले जीएसटी कौंसिल के निर्णयों और उनकी प्रस्तुति की बात कर लें। वैसे, अमर उजाला ने यह भी बताया है “…आपको यह जानना जरूरी है कि टैक्स में वृद्धि पुरानी कार बेचने वाले डीलर या कंपनियों पर लागू होगी। अगर आप किसी व्यक्ति से पुरानी कार खरीदते हैं तो उसपर टैक्स की पुरानी दर यानी 12% ही लागू रहेगा। यानी इस फैसले से व्यक्तिगत खरीदारों और विक्रेताओं पर कोई असर नहीं होगा। मुझे शक है कि ऐसा संभव है पर अभी रहने देता हूं।
खबर की ये लाइनें शीर्षक से लगने वाली आग (या होने वाली तकलीफ) पर पानी डालने की कोशिश है। अमर उजाला जो आपको बताना चाहता है उसके अलावा तथ्य यह भी है कि जीएसटी या कोई भी टैक्स वही लेता है जो इसके लिए सरकार से अधिकृत है। और ऐसा नहीं है कि आप कार बेचने जायें तो आपको खरीदने वाले से टैक्स लेकर सरकारी खजाने में जमा कराने के लिए सरकारी अनुमति लेनी होगी। यह बात मकान किराये पर टैक्स लगाये जाने के बाद या उसी समय स्पष्ट हो गई थी। जो लोग यह काम व्यवसाय दरअसल सेवा के रूप में नहीं करते हैं और इस सेवा के पंजीकृत प्रदाता नहीं हैं उन्हें ऐसी सेवा के लिए टैक्स काटने की अनुमति है ही नहीं है। और वे टैक्स काट नहीं सकते हैं। इसलिए यह फैसला आम कार विक्रेताओं और खरीदारों पर लागू नहीं होगा। यह बताने की जरूरत नहीं है लेकिन शीर्षक जैसा है उससे लोगों की नाराजगी होगी तो पानी भी डाल दिया गया है। पर मुद्दा यह है कि अब अपनी कार कोई खुद कहां बेच पाता है या आप किससे पूछने जायेंगे कि आपको अपनी पुरानी कार बेचनी है?
बड़े शहरों में जमाने से पुरानी कारों के डीलर हैं और होते आये हैं। ऐसे में कुछ लोग यही काम करते हैं उनके पास लोग हैं जो किसी को भी फोन करके पूछते हैं कि पुरानी गाड़ी बेचनी या खरीदनी है। भ्रष्ट सरकार के समय ऐसे फोन आते थे, उसकी शिकायत होती थी और कार्रवाई भी होती थी। अब कोई उपाय नहीं है और झेलना मजबूरी। ऐसे में पुरानी कार खरीदनी हो तो आप इन्हीं में से किसी को हां कह देंगे। यह बड़ा धंधेबाज हुआ तो पंजीकृत सेवा प्रदाता होगा और टैक्स लगेगा ही। नया या छोटा हुआ तो संभव है पंजीकृत न हो और आपको टैक्स न देना पड़े लेकिन अगर वह विक्रेता ऐसा काम बार-बार करेगा औऱ पंजीकरण नहीं करायेगा तो मामला जीएसटी चोरी का बनता जायेगा और देर-सबेर उसके खिलाफ जीएसटी विभाग भी कार्रवाई कर सकता है और अब यह सरकार को वसूली में मदद देने वाली उसकी पुरानी ईडी-सीबीआई के अलावा है। अब जो भी धंधे में उतरता है यह सब जान-समझ लेता है उसे बता दिया जाता है और जो नहीं जानते हैं वो फंसते हैं। इसलिए इस बात का कोई मतलब नहीं है कि आप अपने मित्र की कार खरीदेंगे तो टैक्स नहीं लगेगा। आखिर सरकार हमपर यह अहसान करे उससे बेहतर नहीं होता कि पिताजी और दादाजी की पुरानी कार मुझे रखने औऱ चलाने दी जाती। पर आप जानते हैं कि 15 साल से पुरानी कार नहीं चलाई जा सकती है। ऐसे में पुरानी कारों की बिक्री की संभावना कम करके सरकार उसपर टैक्स बढ़ा रही है। दूसरे शब्दों में अपने नुकसान की भरपाई तो कर ली आम जनता को हर तरह का झटका। इसमें विन्टेज कारों का शो और उससे संबंधित व्यवसाय शामिल है।
पर्यावरण का यह हाल अगर कुछ सौ या हजार पुरानी गाड़ियों का धुंआ नहीं झेल पाने के कारण है तो यह सोचना जरूरी है कि दीवाली पर पटाखे चलाना कितना पड़ा अपराध है। और किन लोगों ने किन हालात में किया है। अखबारों का काम था कि वह आम लोगों को यह सब ठीक से बताते समझाते लेकिन मुझे नहीं लगता है कि अमर उजाला में खबर लिखने वाले को पूरे मामले की सही समझ है या पूरे मामले को समझने वाले किसी जानकार ने इस खबर को पढ़कर इसका संपादन किया है। हालांकि अब यह महत्वपूर्ण नहीं रहा और जनता सस्ते में खराब गुणवत्ता वाली खबरें स्वीकार करती है। इसलिए अमर उजाला ने इस खबर को लीड बनाया यही कम नहीं है। पानी डालने की कोशिश की है तो मैंने उसे भी रेखांकित कर ही दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि पुरानी कारों पर टैक्स बढ़ाना और 12 से 18 करना उन गरीबों को लूटना है जो नई कार भी नहीं खरीद सकते। अव्वल तो पुरानी कारों की खरीद बिक्री पर टैक्स होना ही नहीं चाहिये और हिन्दुओं का भला करने आई सरकार उसपर टैक्स तो लेती ही थी वह भी कोई मामूली नहीं था और उसे 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर देने का एक ही मतलब है कि सरकार को आम गरीबों की चिन्ता तो नहीं ही है उसके पास कमाने (वसूली) के साधन भी बहुत सीमित हैं। यह सब तब है जब तंबाकू-बीड़ी सिगरेट आदि पर टैक्स बढ़ाने की मांग कई साल से की जाती रही है और अब उसपर सुगबुगाहट शुरू हुई थी।
आज की इस खबर से देश की खराब आर्थिक स्थिति के साथ एक-एक पैसे की किल्लत का पता चलता है लेकिन इस लीड (सूचना या जानकारी) से जो खबर होनी चाहिये वह अब नहीं होती है। खास बात यह कि इसे भी आज अखबारों ने महत्व नहीं दिया है। आइये, देखते हैं कि जीएसटी कौंसिल की बैठक की खबर किस अखबार में क्या है और कितनी बड़ी। इंडियन एक्सप्रेस में यह दो कॉलम की खबर है, भोजन पहुंचाने और बीमा पर जीएसटी कम करने का प्रस्ताव टला, पॉपकॉर्न पर कई दरें नया विवाद। जाहिर है, भोजन पहुंचाने और बीमा पर टैक्स कम करने की मांग या प्रस्ताव पर फैसला नहीं हुआ लेकिन जैसा मैंने बताया है, पुरानी कारों पर गब्बर सिंह टैक्स बढ़ाने का फैसला हो गया। यह मीटिंग की खास बात हो सकती थी। इंडियन एक्सप्रेस ने उसी को शीर्षक बनाया है लेकिन आप देख सकते हैं कि इसमें कोई धार नहीं है या सारी संपादकीय प्रतिभा का उपयोग करके इस शीर्षक को भोथरा बनाया गया है। पहली बार हो तो इसे संयोग या प्रयोग माना जा सकता है लेकिन बार-बार नहीं होना चाहिये। पाठक बेहतर तय करेंगे कि यह पहली बार है या ऐसा पहले भी हुआ है। जो भी हो, खबर तो यही है कि टैक्स कम करने पर निर्णय़ नहीं हुआ और पुरानी कार खरीदने जैसी ‘सेवा’ पर टैक्स बढ़ाने का फैसला हो गया।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे अपने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है और शीर्षक है, जीएसटी कौंसिल ने दर फिर बढ़ाये, बीमा पर (दर कम करने की) मांग टाली। हिन्दुस्तान टाइम्स की यह खबर नई दिल्ली डेटलाइन से है और इसमें बाइलाइन भी है। इससे पता चलता है कि बैठकों तो देश के भिन्न शहरों में और पर्यटक स्थलों पर होती है लेकिन रिपोर्टिंग दिल्ली या महानगरों से ही होती है और यह विज्ञप्ति से ही होगी। विज्ञप्ति की खबर वही होगी जो सरकार बतायेगी और सरकार की एक विज्ञप्ति का शीर्षक भी एक ही हो सकता है जो इंडियन एक्सप्रेस जैसा बिना धार वाला होगा। जब भिन्न अखबारों के भिन्न रिपोर्टर दिन भर की बैठक या फैसला सुनाने वाली प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद रहकर जो बताया जाये उसके आधार पर खबर लिखेंगे तो शीर्षक अलग होंगे। मैंने गौर किया है कि अब एक खबर का शीर्षक कई अखबारों में एक होता है और इसका कारण यही है। एक देश, एक चुनाव के शोर में जीएसटी कौंसिल के सदस्य मंत्रियों की बैठक घूम-घूम कर देश के भिन्न पर्यटन स्थलों पर होगी। इसके लिए स्थानीय रिपोर्टर बुलाए जाते हों या नहीं, दिल्ली वालों के लिए दिल्ली में विज्ञप्ति भेज दी जायेगी। यह सही हो या गलत इससे खबरों की विविधता खत्म हो गई है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे पहले पन्ने पर अंतिम कॉलम में टॉप पर लेकिन 16 लाइनों में निपटा दिया है। शीर्षक यही है जीएसटी कौंसिल ने बीमा दरों पर मांग को टाला। आपको याद दिला दूं कि 28 जुलाई 2024 को नितिन गडकरी ने एक पत्र लिखकर वित्त मंत्री से जीवन और मेडिकल बीमा पर लागू जीएसटी हटाने की मांग की थी। 6 अगस्त 2024 को इंडिया समूह के सांसदों ने इस मांग पर प्रदर्शन किया था और मेडिकल व जीवन बीमा पर जीएसची वापस लेने की मांग की थी। तब एक कांग्रेस नेता ने कहा – ‘सरकार कफन टैक्स लगा रही’। उसके बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया टैक्स कम नहीं हुआ। दूसरी ओर बढ़ाने वाला बढ़ा दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया में जीएसटी की खबर का हाल जानने के बाद लीड के बारे में बता दूं कि यह एक सरकारी रिपोर्ट के हवाले से है जिसमें भारत का 25 प्रतिशत क्षेत्र वन और बृक्ष के तहत है। इसका इंट्रो है, 2021 से अभी तक संपूर्ण हरित पट्टी में 1445 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। टाइम्स ने व्हाट्सऐप्प और पेगासस मामले में अमेरिकी कोर्ट के फैसले की एक खबर को भी सिंगल कॉलम में छापा है।
इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, अमेरिकी अदालत ने इजराइली कंपनी एनएसओ को व्हाट्सऐप्प उपयोगकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। द हिन्दू में जीएसटी कौंसिल की बैठक की खबर चार कॉलम की लीड है। शीर्षक है, जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी की समीक्षा टाली गई। सेकेंड लीड चुनाव से संबंधित फुटेज हासिल करने से संबंधित नियम में संशोधन से जुड़ी है। यहां सिंगल कॉलम की एक छोटी सी खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कुवैत में रहने वाले भारतीय लोगों को मिनी हिन्दुस्तान कहा। और अपने हिन्दुस्तान टाइम्स में आज लीड का शीर्षक है, “भारत, कुवैत रणनीतिक साझेदार बनेंगे :मोदी ने कहा”। चार कॉलम के इस लीड के साथ तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा विकसित भारत का लक्ष्य विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बिना हासिल नहीं हो सकता है। मेरा सवाल है कि भारत को विदेशों में रह रहे भारतीयों पर आश्रित क्यों होना चाहिये? भारत में विकास उनके बिना नहीं हो सकता है तो कनाडा से संबंध खराब क्यों किये और क्या इसका मतलब यह माना जाये कि जो लोग कनाडा नहीं जा पाये उन्हें तो नुकसान हुआ ही, इसका असर विकसित भारत के लक्ष्य पर भी पडे़गा?
मैं नहीं जानता सच क्या है, वास्तविकता क्या है और प्रधानमंत्री जो बोल रहे हैं उसपर कितना यकीन करना चाहिये। पर जो बोल रहे हैं उसका साफ मतलब है कि विकसित भारत के लिए भारतीयों का विदेश जाना (रहना, कमाना और वहां से धन भेजना) जरूरी है। भारत सरकार ने अभी तक उस दिशा में क्या किया वह तो नहीं ही पता है, कनाडा के साथ जो हुआ उससे इस लक्ष्य को नुकसान हुआ होगा पर अभी तक ना सरकार ने और ना अखबारों ने यह सब बताया है। प्रचार यह कि सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। और इसीलिए चुनाव जीत जा रही है। इसमें ईवीएम गड़बड़ हो सकती है वह मुद्दा नहीं है और जब सीटें कम हुईं तो ईवीएम जिन्दा है कि मर गया कहकर उसका समर्थन कर दिया और जब हरियाणा व महाराष्ट्र में फायदा हुआ तो चुप रहे या कह दिया कि झारखंड में कैसे जीते। मुद्दा यह है कि ईवीएम की सेटिंग संबंधित अफसरों की मिलीभगत से होती है और सबको पता है कि यह मिली भागत राज्य में सरकार हो तो आसान हो जाती है और झारखंड में ऐसा हुआ हो सकता है। हालांकि, भाजपा को इससे मतलब नहीं रहा है उसे तो सीटों की संख्या से खेल करना रहता है और विधायक खरीद कर, तमाम अनैतिकता से भी सत्ता हथियाई गई है और महाराष्ट्र में उसका फायदा मिला है।
यही नहीं, अगर विदेशों में रहने वाले भारतीय विकसित भारत के लिए जरूरी है तो क्यों अवैध रूप से अमेरिका जाना चाहने वालों में ज्यादातर भारतीय होते हैं, क्यों नहीं अवैध ढंग से विदेश भेजने और इसके नाम पर लोगों को लूटने वालों के खिलाफ कार्रवाई रोकी जा रही है और बाकी सब तो छोड़िये जो मामले सामने आये उनमें सरकार ने क्या किया? जाहिर है सरकार कुछ कर नहीं रही है, चीजें उसके नियंत्रण में नहीं है और जो हो रहा उसे अखबारों में ठीक से छापकर हेडलाइन मैनेजमेंट चल रहा है। संभव है मैं गलत होऊं पर सरकार क्या कर रही है, उसकी कोई योजना है और उसके लिए उसने क्या किया है यह सब अखबार नहीं बतायें तो कौन बतायेगा। सरकार नहीं बता रही है तो यही बताइये पर जो कह दिया जाये उसी पर ताली पीटने के क्या मायने हैं?
जीएसटी कौंसिल की बैठक की खबर अमर उजाला के बाद सबसे कायदे से दि एशियन एज़ ने छापी है और शीर्षक में ही कहा है, स्वास्थ्य, जीवन बीमा के लिए टैक्स दरों पर अभी तक कोई राहत नहीं है। आज के समय में इस तरह का शीर्षक लगाना वीरता पुरस्कार जीतने से कम नहीं है और आश्चर्य है यह काम दि एशियन एज ने किया है। यहां लीड का शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने कहा : भारत के पास ‘नया कुवैत’ बनाने में सहायता करने के लिए कौशल और प्रौद्योगिकी है”। मैं नहीं जानता प्रधानमंत्री के पास ऐसा कहने का आधार क्या है और इसका फायदा भारत को कैसे होगा या होगा भी कि नहीं। पर मुद्दा यह है कि जिस अखबार ने इस खबर को लीड बनाया है उसने भी नहीं बताया है कि उसे यह खबर लीड लायक क्यों लग रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह कनाडा से संबंध खराब करने के बाद कुवैत से सुधारने का प्रयास और उसका प्रचार लगता है। इससे अलग कुछ हो तो वह खबर और हाईलाइट किये हुए अंशों से लगता है। आप समझ सकते हैं कि अभी तक मैंने जिन खबरों की चर्चा की वो हेडलाइन मैनेजमेंट के भाग हो सकते हैं और बहुत धारदार भी हों तो सरकार का उससे कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। सरकारी प्रचार तो जो है सो है ही। यह लीड और सेकेंड लीड या आज की दूसरी प्रमुख खबर के मामले में है।
ये खबरें इस समय या राजनीति की जरूरत के हिसाब से नहीं हैं। द टेलीग्राफ की आज की लीड का शीर्षक है, अंबेडकरवादियों ने दो बड़ी पार्टियों को नकारा। नई दिल्ली डेटलाइन से बसंत कुमार मोहंती की बाईलाइन वाली खबर कहती है, भीमराव अंबेडकर की विरासत को हथियाने के लिए भाजपा और कांग्रेस द्वारा की जा रही “प्रतिस्पर्धी राजनीति” ने कुछ शिक्षाविदों और अधिकार कार्यकर्ताओं को बाबा साहेब के 1951 के भाषण का हवाला देने के लिए प्रेरित किया है। इसमें दलित वर्गों को अगड़ी जाति द्वारा नियंत्रित मुख्यधारा की पार्टियों के साथ गठबंधन करने के खिलाफ चेतावनी दी गई थी।
इन अंबेडकरवादियों ने सुझाव दिया है कि बाबासाहेब के अनुयायियों को भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को खारिज कर देना चाहिए, जो उच्च जाति के लोगों के वर्चस्व वाली हैं और एक स्वतंत्र रास्ता तैयार करना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि संसद में हाल ही में संविधान पर बहस, जहां कांग्रेस और भाजपा ने खुद को अंबेडकर के सच्चे अनुयायी के रूप में पेश करने की होड़ की, में बाबासाहेब के दर्शन के आवश्यक घटकों, जैसे कि जातिविहीन और भाईचारे वाले समाज को नजरअंदाज कर दिया। मुख्यधारा की पार्टियों की आलोचना कांग्रेस और भाजपा के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा अंबेडकर के कथित “अपमान” को लेकर चल रही लड़ाई के बीच हुई है।
बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ने शनिवार को राज्यसभा में शाह की टिप्पणी के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की। उन्होंने जो कहा है वह यह कि “अंबेडकर का नाम लेना एक फैशन बन गया है”। भाजपा ने इस बात से इनकार किया है कि शाह ने अंबेडकर का अपमान किया है और कांग्रेस पर संविधान निर्माता का कभी सम्मान नहीं करने का आरोप लगाया है। पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया (डेमोक्रेटिक) के सचिव और अंबेडकरवादी बीडी बोरकर ने मुख्यधारा की पार्टियों पर अंबेडकर के नाम पर सामाजिक रूप से वंचित वर्गों का भावनात्मक शोषण करने की कोशिश का आरोप लगाया है। उन्होंने रेखांकित किया कि कैसे अंबेडकर ने दलित वर्गों को ब्राह्मणों या उच्च जातियों के वर्चस्व वाली पार्टियों से हाथ मिलाने के खिलाफ चेतावनी दी थी। “29 अक्टूबर 1951 को अंबेडकर ने पटियाला में एक राजनीतिक भाषण दिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि अगर दलित वर्ग ब्राह्मणों से जुड़ता है या उनके साथ कोई राजनीतिक पार्टी बनाता है, तो उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी। अगड़ी जातियां पिछड़ी जातियों को दबा देंगी। अगर आप संविधान पर बहस देखें, तो किसी ने अंबेडकर के विचारों को नहीं छुआ है,” बोरकर ने कहा।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह सूचना जनहित की न भी तो सामयिक है। फिर भी आज (मेरे) किसी अन्य अखबार में नहीं है और अन्य अखबारों में जो है उसमें भाजपा को कैसे बचाया जाता है वह मैं बताता रहा हूं। उसमें कांग्रेस की आलोचना और उपेक्षा भी रहती है लेकिन आज द टेलीग्राफ यह लीड तो कांग्रेस के पक्ष या समर्थन में भी नहीं है लेकिन सिर्फ टेलीग्राफ में है। इसके कई कारण हो सकते हैं। मुझे उसमें नहीं जाना। मैं सिर्फ यह जानता हूं कि बसंत कुमार मोहंती द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नियमित छपने वाले नहीं हैं और उनका यह लिखा आज के लिए विशेष तौर से पेश किया गया है जो अब दूसरे अखबार नहीं करते हैं। कहा जा सकता है कि विज्ञापनों के लालच में अखबार प्रचारक तो बन गये हैं पर खबर देने का अपना मूल काम ईमानदारी से नहीं करके ग्राहकों और उपभोक्ताओं के साथ बेईमानी और ठगी भी कर रहे हैं।


