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आज के अखबार : मतदाता सूची से खेल करने की भाजपाई चालों को गंभीरता से नहीं बताते

संजय कुमार सिंह

आज भाजपा के खिलाफ दो खबरें या आरोप हैं। कुछ अखबारों की प्रस्तुति खबर देने की नहीं, भाजपा के बचाव या तथाकथित पलटवार की है। आइये देखें पलटवार कितना दमदार और दिलचस्प है। पहले मतदाता सूची से नाम कटवाने का आम आदमी पार्टी का आरोप। आप जानते हैं कि भाजपा कैसे चुनाव जीतती है इसपर किताबें है। लगतार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतने पर राजदीप सरदेसाई की किताब है और 2014 में पहली तैयारियों पर आई थी। फिर 2019 में और अब 2024 में भी आई है। पर मुद्दा वह नहीं उसका अंश है। इसमें बताया गया है कि अमितशाह जब छात्रसंघ का चुनाव लड़ रहे थे तो मुकाबला कांग्रेस की एक छात्रा से था और लड़कियों की संख्या ज्यादा थी। इसलिए डर था कि लड़कियों ने लड़की को वोट दिया जो वो हार जायेंगे। लिहाजा उन्होंने मतदान से पहले लड़कियों के अभिभावकों को फोन करवा दिया कि कल मतदान है, हंगामा हो सकता है इसलिए बेटियों को कॉलेज न भेंजे। यह कहानी अब सार्वजनिक हुई है। उससे पहले भाजपा ने अमित शाह को अपने चाणक्य के रूप में प्रचारित किया। और पूर्व तड़ीपार होने के बाद भी गृहमंत्री बनाने की भूमिका बनाई। जवाब में उन्होंने पी चिदंबरम को लगभग उतने ही समय जेल में रखा जितने समय खुद थे। इसके बाद देश की राजनीति का जो होना था हुआ पर मीडिया ने आपको वही सब बताया जो अब भी बताये चला जा रहा है। हालांकि, इतने समय में यह बात खुलकर सामने आ गई है कि भाजपा न सिर्फ मतदाता सूचियों पर ध्यान रखती है बल्कि विरोधियों का मतदान हो ही नहीं पाये, ऐसी व्यवस्था भी करती है। पिछले 10 साल से ज्यादा समय में इस तरह की चर्चा और प्रशंसा आम है और पार्टी ने कभी इससे इनकार भी नहीं किया। संभव है, चर्चा इस ढंग से हुई ही नहीं हो कि इनकार करने या खंडन करने की जरूरत या संभावना रही हो। मेरा मुद्दा है कि भाजपा यह सब करती है। यह उसकी तारीफ में भी कहा जाता रहा है। मेरा पुराना अनुभव है कि एक बीएलओ की मदद से मेरी 11 बिल्डिंग के ढेरों मतदाताओं के नाम हटा दिये गये क्योंकि उसे यह बिल्डिंग नहीं मिली। शिकायत करने पर वह भागा आया और जिस तरह की दलीलें दीं उससे लगा कि वह अपने काम में चूक गया होगा। मैंने उसे माफ कर दिया पर अब पूरी बात समझ में आ गई है। बाद के अनुभव तो हैं ही। उसपर फिर कभी।  

ऐसे में आम आदमी पार्टी ने यह आरोप लगाया है (आज छपी खबर के अनुसार) कि भाजपा ने केजरीवाल के चुनाव क्षेत्र में 12 प्रतिशत वोटों का खेल (अंग्रेजी में अलटरिंग) किया है। केजरीवाल यह आरोप काफी समय से लगा रहे हैं, भिन्न चुनाव क्षेत्रों के लिए लगाया है और बहुत स्पष्ट रूप से लगया है और इतनी बार लगा चुके हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को इसे गंभीरता से लेना चाहिये और (फिर भी) विधानसभा चुनाव में लगातार बुरी तरह हारने के लिए शर्मिन्दा होना चाहिये। अगर उसे पता है कि आरोप गलत या झूठे हैं तो हर संभव तरीके से उसे साबित करना चाहिये और जैसा भाजपा करती रही है जरा भी आधार हो तो एफआईआर भी कराना चाहिये। पर भाजपा ने अभी तक ऐसा कुछ किया है – इसकी खबर नहीं है जबकि पहले की खबरें आती रही हैं और हम पढ़ते-देखते रहे हैं। भाजपा के गंभीर पलटवार के कारण मैंने इसे कभी कायदे से पढ़ा नहीं। लेकिन रोज लगते आरोप और वही रटा-रटाया जवाब मामले की गंभीरता बढ़ा रहा है और इसमें चुनाव आयोग नजर नहीं आ रहा है जबकि जवाब चुनाव आयोग को भी देना है।

आज दि एशियन एज में यह खबर तीन कॉलम में आप नेताओं की फोटो के साथ है। मुख्य शीर्षक वही है जो आज की खबर है, आप ने भाजपा पर केजरीवाल के चुनाव क्षेत्र में 12 प्रतिशत वोट अलटरिंग करने (बदलने) का आरोप लगाया है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, भाजपा ने कहा, सरकार की नाकामियों से ध्यान खींचने के लिए निराधार कोशिश। फोटो कैप्शन से पता चलता है कि आम आदमी पार्टी ने नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस करके ये आरोप लगाये हैं और इनमें दिल्ली की मुख्यमंत्री के साथ पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल और पार्टी के सांसद राघव चड्ढ़ा भी हैं। ऐसे में भाजपा का जवाब अलग से आना चाहिये था और अलग खबर भी हो सकती थी। कायदे से प्रेस कांफ्रेंस होती तो आज का मीडिया उसी को मूल खबर बना देता और इसे आरोप। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, “केजरीवाल ने बड़े पैमाने पर वोटर खत्म करने के आरोप लगाये चुनाव आयोग और भाजपा ने दावों से इनकार किया”। खबर बताती है कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने और हटाने में अस्वाभाविक वृद्धि हुई है। 

दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय से कहा गया है कि जमीनी जांच की गई है और मृतकों, मकान बदलने वालों और जिनके नाम एक से ज्यादा बार थे उन्हें हटाया गया है। इसमें आपको सब ठीक लगे तो लगे, एक बार से ज्यादा नाम क्यों थे और थे तो कार्रवाई क्यों नहीं? इन सबसे अलग क्यों नहीं माना जाये कि गड़बड़ी थी। कायदे से वोट हटाने का काम चुनाव आयोग को खुद करना होता है। यह किसी पार्टी का काम नहीं है। इसमें इजाफा क्यों हुआ है और वह सामान्य से ज्यादा है तो खबर से इनकार क्यों? फिर तो खबर या आरोप सही ही है। द हिन्दू में यह खबर टॉप पर लीड के बराबर में हैं। आप, भाजपा के बीच दिल्ली में वोटर लिस्ट फ्रॉड पर आरोप-प्रत्यारोप। यहां खबर कहती है कि दोनों दलों ने एक दूसरे पर गड़बड़ी करने के आरोप लगाये हैं। खबर में कहा गया है कि आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सदस्य संजय सिंह ने आरोप लगाया कि भाजपा उनकी पत्नी का नाम भी कटवाने की कोशिश कर रही है। खबर के अनुसार भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि वह दिल्ली में फर्जी वोट नहीं पड़ने देगी। भाजपा ने कई सबूत देने के दावे किये हैं और केजरीवाल पर अपने गलत कामों को छिपाने के लिए भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है। 

दि हिन्दू की खबर में इसके बाद सबूतों की चर्चा नहीं है, केजरीवाल के आरोप हैं – “आज मैं अपने नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के कुछ आंकड़े पेश करना चाहता हूं। इस चुनाव क्षेत्र में भाजपा के ऑपरेशन लोटस की शुरुआत की शुरुआत 15 दिसंबर को हुई। इस दौरान उनलोगों ने करीब 5000 आवेदन वोट हटाने के लिए और 7500 आवेदन नए नाम जोड़ने के लिए दिये हैं”। उन्होंने दावा किया कि ये सब फर्जी हैं। मैं नये आवेदनों की बात नहीं कर सकता लेकिन नाम हटाने का नियम यह है कि मतदाता सूची के निरीक्षण के समय जब बीएलओ घर-घर जाता है तो नए आये लोगों के साथ घर छोड़कर कहीं और रहने चले गये लोगों के बारे में भी पूछताछ कर लेता है। मृतकों की जानकारी इसमें शामिल होती है। चुनाव आयोग का नियम है कि आप अपना निवास बदलेंगे तो नये स्थान से आवेदन करेंगे और उसमें पुराने का विवरण देंगे ताकि नई जगह नाम से साथ पुराना नाम हटाया जा सके। इसमें किसी राजनीतिक दल की भूमिका नहीं है। मृतक वोट डालने आयेगा नहीं और जो वहां रहता था पर अब नहीं है वह आकर वोट दे ही सकता है। इसमें कुछ गलत या गैर कानूनी नहीं है। हम जानते हैं कि मतदान के लिए लोग अपने मूल निवास स्थान तक भी जाते हैं। कुछ लोग तो विदेश से भी आते हैं। ऐसे में पते पर नहीं रहने के कारण नाम कटवाना किसी तरह से ठीक नहीं है। गैर जरूरी तो है ही। कई बार व्यक्ति मकान या शहर ऐसे समय में बदलता है जब मतदाता सूची में संशोधन नहीं हो रहा होता है और उसका नाम पुरानी जगह से कट जाये, नई जगह में नहीं हो तो वह वोट डाल ही नहीं पायेगा और यह चुनाव में अधिकतम भागीदारी के खिलाफ है। 

अपने पते पर नहीं रहने वालों का नाम काटना इसलिए भी गैर जरूरी है कि मतदाता पहचान पत्र आने के बाद कोई फर्जी वोट डाल ही नहीं सकता है। उंगलियों पर निशान इसीलिए लगाये जाते हैं कि एक व्यक्ति दोबारा वोट न दे। यही नहीं जब मतदाता सूची नहीं होती थी तब भी मतदान केंद्र पर उम्मीदवार के प्रतिनिधि होते थे (अब भी होते हैं) जो छोटे शहरों में मोहल्ले के अंकल-आंटी, भैया भाभी को पहचानते थे। पहली बार मतदाता सूची में नाम आने पर मैं एक मतदान केंद्र पर काम कर चुका हूं। तब परिचय पत्र नहीं होता था। मतदाता अपना नाम बताता था भिन्न दलों के प्रतिनिधियों से पूछा जाता था कि किसी को एतराज है। अक्सर कोई न कोई पहचानता था और अगर कोई ऐसे ही आ गया तो हमलोग पड़ोसी का नाम पूछ लेते थे। पड़ोसी के यहां कितने लोग रहते हैं आदि से यह तब भी सुनिश्चित किया जा सकता था कि फर्जी वोट नहीं पड़े। अगर किसी का निधन हो जाये तो मोहल्ले वालों को पता होता ही है। इसलिए नियम पहले से हैं और नये नाम जोड़ने के लिए तो सिफारिश की जरूरत है पर काटने के लिए नहीं तो उसका यही कारण है। फिर भी भाजपा की राजनीति और खेल के अपने नियम हैं। वह अलग मुद्दा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक आप का आरोप और चुनाव अधिकारी का जवाब है। खबर से पता चलता है कि मतदाता सूची को 24 दिसंबर को अंतिम रूप दिया जा चुका है और केजरीवाल के आरोप सही हैं या गलत आराम से जांचे जा सकते हैं। यही नहीं अगर किसी राजनीतिक दल की सलाह पर नाम हटाये गये हैं तो उसे भी स्वीकार किया जाना चाहिये और चुनाव आयोग भले उसे सामान्य कहे, जैसा मैंने ऊपर कहा है, दिल्ली के किसी और मोहल्ले में रहने वाले अगर मतदान करने आयेंगे तो क्या वोट दे पायेंगे और अगर नहीं दे पायेंगे तो उनके साथ ज्यादती नहीं होगी। अगर ऐसा हुआ है तो चुनाव आयोग दोषी है और उसे स्वीकार करना चाहिये। नाम हटाया जाना नियमानुसार भी हो तो नई जगह नामांकन होने से पहले हटाना अनुचित है। खासकर तब जब मतदाता की जिम्मेदारी है कि उसका नाम दो जगह नहीं हो। फिर भी चुनाव आयोग मानता है कि नाम दो जगह थे वही हटाये गये हैं और किसी के खिलाफ कार्रवाई की सूचना नहीं है और अगर किसी का नाम एक ही जगह था तो उसे हटाना भी गलत है। हटाया गया है कि नहीं चुनाव आयोग नहीं बताता है। और मैं नहीं मानता कि अखबारों को खबर लिखने की तमीज नहीं है। मेरा मानना है कि यह भाजपा, सरकार और हिन्दुत्व की सेवा में हो रहा है जो संविधान के खिलाफ है और इसीलिए भाजपा संविधान बचाने के नाम से इतना परेशान हो जाती है। यह खबर बाकी अखबारों में दिखी नहीं या मैं देख नहीं पाया।

अब आज की दूसरी खबर पर आता हूं। यह मनमोहन सिंह की अंत्येष्टि से संबंधित है। आज द हिन्दू में यह खबर फोटो के साथ तीन कॉलम में छपी है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, भाजपा-कांग्रेस विवाद के बीच मनमोहन सिंह के अवशेष यमुना में प्रवाहित किये गये। शीर्षक में भाजपा कांग्रेस विवाद का जिक्र है, खबर परिवार की है और फोटो में भी परिवार के लोग ही दिख रहे हैं। लेकिन खबर का अंतिम पैरा है, भाजपा नेता मनजिन्दर सिंह सिरसा ने इस ‘समारोह’ में गांधी परिवार की अनुपस्थिति पर सवाल उठाया। खबर से यह पता नहीं चल रहा है कि वे खुद इसमें शामिल थे कि नहीं। मनमोहन सिंह के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर छिड़े विवाद के बाद आज जो खबर हो सकती थी वह आधी-अधूरी ही सही, टाइम्स ऑफ इंडिया में तीन कॉलम में है। इसके अनुसार मनमोहन सिंह के स्मारक के लिए जो जगहें तय हुईं हैं उनमें राष्ट्रीय स्मृति स्थल, किसान घाट भी हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इनमें कनाट प्लेस नहीं हो सकता था और नहीं होगा फिर भी आज खबर है तो यही कि सरकार अभी भी तय नहीं कर पाई है। समय क्यों लग रहा है यह भी खबर हो सकती थी पर अब नहीं होती।

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है, मनमोहन सिंह के अंतिम संस्कार से संबंधित कांग्रेस के दावों पर भाजपा का पलटवार। खबर बताती है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निधन के तीन दिन बाद उनके अंतिम संस्कार के मौके पर जिस प्रोटोकोल का पालन किया गया उसे लेकर राजनीतिक टकराव जारी है और केंद्रीय मंत्री शर्मनाक राजनीति के लिए कांग्रेस की आलोचना कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस सत्ता में नहीं है और सत्ता के लिए अपनी राजनीति करेगी ही। भाजपा की नजर में वह शर्मनाक भी हो सकता है पर अखबारों के लिए तो मनमोहन सिंह पूर्व प्रधानमंत्री हैं ही। बिल्कुल वैसे ही जैसे अटल बिहारी वाजपेयी या पीवी नरसिंह राव थे। प्रणब मुखर्जी की बेटी ने इस विवाद में अपने पिता को भी घसीट लिया है और कुछ अखबार उसकी भी सेवा कर रहे हैं लेकिन एक पूर्व प्रधानमंत्री के निधन के बाद जो हुआ या किया गया वह अगर भाजपा के हिसाब से ठीक है और कांग्रेस की आलोचना नाजायज तो आवश्यकता इस बात की है कि जो हुआ वह कैसे सामान्य या सही है उसपर केंद्रित रहा जाये। अगर वह कांग्रेस के लिए संतोषजनक नहीं था और भाजपा के लिए है तो भाजपा (या सरकार) बता सकती है कि कैसे जो हुआ वह जायज या सही है।

कांग्रेस ने अगर अपने किसी नेता की इज्जत नहीं की तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह उनके निधन के बाद या वैसे उन्हें सरकार से उनका वाजिब हक दिलाने की लड़ाई न लड़े। सरकार और भाजपा यह सब नहीं कर रही है और ऐसा नहीं कर रही है तो अखबार देश के पूर्व प्रधानमंत्री के हित में किसी भी पक्ष का साथ देने या नहीं देने के लिए स्वतंत्र हैं। और एक मृत प्रधानमंत्री का मामला अगर तीन दिन उनकी योग्यता और चर्चा के कारण पहले पन्ने पर था तो अब टुच्ची राजनीति के कारण उसे पहले पन्ने से हटाया जा सकता था। जैसा मैंने पहले लिखा है, भाजपा के नेता ने कहा कि अस्थियां प्रवाहित करते समय गांधी परिवार से कोई नहीं था। क्यों नहीं था बताये बिना किसी तीसरे को यह कहने का अधिकार कैसे हो सकता है कि कोई नहीं था। दिलचस्प यह है भाजपा के लिए यह काम हरदीप सिंह पुरी कर रहे हैं। पुरी साब यह नहीं बता रहे हैं कि जो हुआ वह सब ठीक था या कांग्रेस जो कह रही है वह क्यों गलत या बेजरूरत है। बल्कि वे यह साबित करने में लगे हैं कि उनकी कांग्रेस के नेता उनकी याद के साथ बुरी सेवा कर रहे हैं। हरदीप पुरी ने कहा है कि मनमोहन सिंह का शव तिरंगे में लिपटा था इसलिए सब ठीक हुआ तो उन्हें याद दिलाना चाहिये कि तिरंगे में शव तो दादरी के हत्यारों का भी लिपटा था। आरोप है कि निगम बोध घाट पर जगह कम थी लोग ज्यादा थे पुरी साब ने बताया है कि सिख संगत के लोग भी थे। अखबार ने यह भी बताया है कि पुरी साब ने अपना यह दुखड़ा एक्स पर लिखा है इसमें खबर क्या है यह किसी ने नहीं बताया है। इसी तरह कांग्रेस की ओर से मनमोहन सिंह का सम्मान करने में आगे रह सकने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के हवाले से हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि जब वे जिन्दा थे तो कांग्रेस को उनका सम्मान करना चाहिये था। पर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है ये सिंधिया से बेहतर कौन जानेगा। दुखद यह है कि सिंधिया ने उसके बावजूद अपने पूर्व प्रधानमंत्री का ख्याल नहीं रखा अब चूक जाने पर भी कांग्रेस को दोषी ठहरा रहे हैं। इस पूरे विवाद में यह पता नहीं चल रहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी के मामले में सारे फैसले कम समय में कैसे हो गये और अब अभी तक क्यों नहीं हुए हैं और नहीं हुए तो कांग्रेस की आलोचना गलत कैसे है। जहां तक कांग्रेस पर आरोपों का सवाल है, उससे भाजपा पर जो आरोप हैं वो कम नहीं होते हैं। दि एशियन एज में आज सीधी सरल सिंगल कॉलम की खबर है, मनमोहन सिंह की अस्थियां यमुना में प्रवाहित। नवोदय टाइम्स में भी यह खबर किसी विवाद की चर्चा के बिना है। एक तरफ तो अखबारों में सरकार और भाजपा के साथ यह पक्षपात है दूसरे सोशल मीडिया पर रोज कोई न कोई लिख दे रहा है कि मनमोहन सिंह के स्मारक की जगह तय हो गई पर आज भी ऐसी कोई खबर नहीं है। लोग कहते हैं कांग्रेस भाजपा को जवाब नहीं देती। सवाल है कि क्या कांग्रेस को भी झूठ बोलने वाले प्रचारक रख लेने चाहिये अपने (ईडी की मदद से वाशिंग मशीन में धुले) नेताओं से ऐसे ही पलटवार करवाने चाहिये? अगर हां, तो जाहिर है कांग्रेस के पास इतने पैसे होते तो स्विस बैंक कैसे चलते मोदी सरकार ने तो भारतीय बैंकों का बाजा बजा दिया है।

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