मनीष दुबे-
देश की बड़ी मीडिया कंपनियों की स्क्रीन पर सब कुछ ‘बढ़िया’ दिख रहा है—विकास की रफ्तार तेज है, देश “विश्वगुरु” बनने की ओर अग्रसर है और मोदी सरकार की नीतियों को ‘ऐतिहासिक’ बताया जा रहा है। लेकिन जब कैमरे का एंगल ज़मीन पर आता है, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है—महंगाई से जूझती जनता, बेरोजगारी से हताश युवा, और न्यूनतम सुविधाओं के लिए लड़ते किसान-मजदूर।
मीडिया की बनावट: ‘गोडी मीडिया’ का उदय
2014 के बाद मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता की भक्ति में लीन हो चुका है। ‘गोडी मीडिया’ जैसा शब्द अब आम बोलचाल का हिस्सा बन चुका है। प्रमुख न्यूज़ चैनलों पर विपक्ष की आवाज़ या आम जन के मुद्दों की जगह ‘सांप्रदायिक विमर्श’ और ‘भारत माता की जय’ के जयकारे छाए रहते हैं। 2024 में Reporters Without Borders की रिपोर्ट में भारत प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 159वें स्थान पर पहुंच गया।
बेरोजगारी: जॉबलेस ग्रोथ का सच
CMIE के मुताबिक फरवरी 2025 में भारत की बेरोजगारी दर 7.5% रही। शिक्षित युवाओं में ये दर 15% से ज्यादा है। लाखों नौजवान प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितताओं में फंसे हैं—पेपर लीक, परीक्षा टालने और घोटालों से भरी व्यवस्था ने उनका भविष्य दांव पर लगा दिया है।
महंगाई: आंकड़े छुपते नहीं
सरकार भले ही थाली में ‘न्यू इंडिया’ परोस रही हो, लेकिन आम आदमी की रसोई महंगाई से झुलसी पड़ी है। खुद सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि मार्च 2025 में खुदरा महंगाई दर 5.1% रही, जिसमें सब्ज़ियों और अनाज की कीमतें प्रमुख कारण रहीं। गैस सिलेंडर की कीमत 1000 रुपये के पार है, जो 2014 में मात्र 450 रुपये थी।
कृषि संकट: MSP की बात तक नहीं
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लंबे संघर्ष के बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा, लेकिन MSP पर कोई ठोस क़ानून आज भी नहीं है। किसानों की आत्महत्या के आंकड़े हर साल हज़ारों में हैं—राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2023 में 11,290 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की।
कुल मिलाकर 15 से 25 तक मीडिया के परदे पर सिर्फ और सिर्फ सत्ता की ‘ब्रांडिंग’ हो रही है, असहमति को ‘देशद्रोह’ और ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ से जोड़ दिया गया है। मगर असल भारत अब भी काम, रोटी और इलाज के लिए तरस रहा है। सवाल ये नहीं कि कैमरे में क्या दिख रहा है, सवाल ये है कि कैमरे को क्या दिखाने की इजाजत है।
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