
दयाशंकर शुक्ल सागर-
पीओके कार्ड केवल दुनिया का ध्यान कश्मीर से हटाने के लिए है। भारत को पीओके की केवल खाली ज़मीन चाहिए वहां आतंक की ट्रेनिंग लिए हुए 50 लाख कठमुल्ले नहीं। भारत, पीओके की आबादी को देश की नागरिकता देकर उन्हें आतंक फैलने का वीज़ा कभी नहीं दे सकता। भारत के पीओके राग का एकमात्र मकसद है पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाना। पीओके एक तुरुप का पत्ता है जो भारतीयों के लिए दुनिया और पाकिस्तान को दिखाने के लिए है।
पीओके के जो हालात हैं उसे देखते हुए कोई भारतीय नहीं चाहेगा कि वह भारत का हिस्सा बने। कठमुल्लों वाला पीओके किसी को नहीं चाहिए। इसलिए भारत की मांग है कि पाकिस्तान पीओके खाली करे यानी भारत को केवल पीओके की खाली ज़मीन चाहिए। और ये कभी संभव नहीं। सीज़फायर के बाद अपने पहले संबोधन में दुनिया भर के देशों के नाम संदेश देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, ‘मैं आज विश्व समुदाय को भी कहूंगा, हमारी घोषित नीति रही है, अगर पाकिस्तान से बात होगी, तो टेरेरिज्म पर ही होगी, अगर पाकिस्तान से बात होगी तो पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर, POK पर ही होगी।” भारत दुनिया को संदेश देना चाहता है कि संविधान से अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद कश्मीर अब भारत का अभिन्न हिस्सा है जैसे देश के और प्रान्त हैं। अब कश्मीर पर किसी से कोई बात नहीं होगी।
जैसे पाकिस्तान ने पिछले 70 साल से कश्मीर राग छेड़ रखा है वैसे ही अब भारत पीओके को बातचीत के केन्द्र में रखना चाहता है। पीओके के वर्तमान हालात पर दस्तक टाइम्स के जून अंक में वरिष्ठ पत्रकार व पत्रिका के संपादक दयाशंकर शुक्ल सागर ने विस्तार से एक रिपोर्ट छापी है।
सीज़फायर की ख़बर ने ‘आपरेशन सिंदूर’ से उत्साहित और आतंक से आजीज आये बहुत सारे हिंदुस्तानियों को मायूस किया। उन्होंने उम्मीद थी कि इस बार भारत पाकिस्तान से पीओके यानी पाक अधिकृत कश्मीर वापस ले लेगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति वाली भारतीय सेना में इतनी काबिलियत है कि वह 24 घंटे के भीतर पीओके में तिरंगा लहरा सकती है। लेकिन फिलहाल पीओके पर कब्जा भारत सरकार के कूटनीतिक एजेंडे में नहीं है। आखिर क्यों? इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि आज का पीओके पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी मुसलमानों व आतंकियों का गढ़ है। पीओके की करीब 50 लाख कठमुल्ले मुसलमानों की निरंकुश भीड़ को भारत में शामिल कर उन्हें नागरिकता देना, नई मुसीबत मोल लेना है। ये कट्टर मुसलमान न केवल जम्मू कश्मीर बल्कि पूरे भारत की डेमोग्राफिक और राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करेंगे।
‘आपरेशन सिंदूर’ पर कांग्रेसी नेता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री से चार सवाल किए थे। इनमें मोदी से एक बड़ा सवाल यह भी था कि जब पूरा देश और समूचा विपक्ष आपके साथ था, तो PoK क्यों नहीं लिया? बेशक ये सवाल आम लोगों के मन में भी है। पिछले कई सालों से बीजेपी संसद से लेकर सड़क तक यह जुमला दोहरा चुकी है कि पीओके हमारा है और हम इसे पाकिस्तान से लेकर रहेंगे। बीते महीने लंदन में एक कार्यक्रम के दौरान जयशंकर ने एक पाकिस्तानी पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि कश्मीर का मुद्दा तभी सुलझेगा जब कश्मीर का चोरी हुआ हिस्सा, जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है वापस आ जाएगा। विदेश मंत्री के बयान के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार से पूछा है कि आखिर पीओके को वापस लेने से किसने रोका है? उन्होंने आगे कहा कि चलिए, एक हिस्सा पाकिस्तान के पास है। हमने कभी कहा कि मत लाओ? उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर आप वापस ले सकते हैं, तो ले लीजिए।
‘आपरेशन सिंदूर’ एक अच्छा मौका था जब भारत की सेना पीओके पर कब्जा जमा सकती थी। पाकिस्तान के आधे से ज्यादा आतंकी कैंप और लॉन्चिंग पैड पीओके में है। यह अच्छा अवसर था कि इन आतंकी कैंपों को हटाने के बहाने सेना पीओके पर कब्जा कर लेती। लेकिन सेना ने इन आतंकी कैंपों को तबाह करके लड़ाई रोक दी। पीओके को लेकर यह बहुत बड़ा भ्रम है कि यह ज़मीन का एक टुकड़ा है जिसे आसानी से कब्जे में लिया जा सकता है। जबकि सच यह है, पीओके के ज़मीनी हालात कहीं ज्यादा पेचीदे और जटिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय दबावों को छोड़ भी दें तो पीओके की राजनीतिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक व जनसांख्यकीय परिस्थितियां ऐसी हैं कि उस पर सैन्य बल से या राजनीतिक रूप से कब्जा करना लगभग नामुमकिन है। पीओके की तुलना आप पश्चिम एशिया के गाजापट्टी इलाके से कर सकते हैं जिस पर प्रभुत्व होने के बावजूद इज़राइल उसे अपने होमलैंड के साथ नहीं मिलाना चाहता। पाकिस्तान ने पीओके को कथित तौर पर आजाद छोड़ रखा है। पीओके के पास अपना प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अपनी सरकार है। लेकिन ये सब पाकिस्तान की कठपुतली हैं। कहने को पाकिस्तान सरकार पीओके के केवल विदेश मामलों, रक्षा, संचार आदि का प्रबंधन करती है पर सच यह है कि पीओके का पत्ता भी उसकी मर्जी से सांस लेता है। पाक के लिए पीओके भारत के खिलाफ एक बड़ा लॉन्चिंग पैड है।
ऐसे हाथ से निकला पीओके
पीओके से हमारे रिश्ते को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का एक ग़ैरजरूरी हिस्सा समझ कर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने छोड़ दिया था। 1947-48 के पहले पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना ने उत्तर पश्चिम में, कश्मीर घाटी और लेह लद्दाख तक का हिस्सा अपने कब्जे में वापस ले लिया था। लेकिन कश्मीर के दक्षिणी हिस्से में 8 जिले नीलम, मीरपुर, भीमबार, कोटली, मुजफ्फराबाद, बाग, रावलकोट और सुधनोटी और उत्तरी के ‘गिलगित-बाल्टिस्तान’ अभी भी पाकिस्तान के कब्जे में रह गए थे। भारतीय फौज आगे बढ़कर इन जिलों को भी मुक्त कराना चाहती थी। इतिहासकार रामचन्द्र गुहा लिखते हैं कि ‘कुछ कमांडर चाहते थे कि नीचे मैदान से और तीन ब्रिगेड फौज बुला कर कर आगे बढ़ा जाए और कश्मीर के दक्षिणी हिस्से को भी पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त करा लिया जाये। लेकिन उनकी मांग को नहीं माना गया।’ (भारत, गांधी के बाद में, पेज नं. 95) इसकी एक वजह तो यह थी कि सर्दियां शुरू होने वाली थीं।
दूसरी वजह थी कि लड़ाई को आगे बढ़ाने का मतलब था कश्मीर में फौज का न केवल जमावड़ा करना बल्कि उसे भारी हवाई सुविधा भी मुहैया कराना। (सिलेंडर वाज द थ्रेड, सेन पेज नं. 242) इसी लड़ाई के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच यथास्थिति बनाये रखने पर समझौता हो गया। जो जिले पाकिस्तान ने हथियाए थे वे उसके पास ही रह गए। इन्हीं हथियाए गए जिलों को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहा जाता है जिन्हें पाकिस्तान, आजाद कश्मीर कहता है।
यह एक बड़ी भूल थी। नेहरू नहीं समझ पाए कि आने वाले वक़्त में ये इलाके भारत के लिए कितनी बड़ी मुसीबत बन जाएंगे। दरअसल भारत और पाकिस्तान की सीमा के बीच में करीब 400 किमी. की ये हरित पट्टी के इलाके रणनीतिक व समारिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहां की पहाड़ियां और जंगल, पाक फौजियों और आतंकियों के छुपने और घात लगाने के लिए बेहद माकूल हैं। इसलिए कोई हैरत की बात नहीं कि पाकिस्तानियों के सबसे ज्यादा आतंकी ट्रेनिंग कैंप और लॉन्चिंग पैड यहीं हैं। आपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 21 आतंकी ठिकानों की जो लिस्ट जारी की उसमें 12 ठिकाने पीओके में हैं। आतंकी कश्मीर या देश में दहशतगर्दी की घटनाओं को अंजाम देकर पीओके के जंगलों में छुप जाते हैं। चूंकि ये इलाका एलओसी यानी नियंत्रण रेखा के उस पार है इसलिए हमारी सेना वहां कोई कार्रवाई नहीं कर पाती। एलओसी पर 740 किलोमीटर की बाड़ के बावजूद आतंकियों की घुसपैठ जारी रहती है।
पाकिस्तान ने प्रशासनिक सुविधा के लिए POK को दो हिस्सों में बांट रखा है- एक दक्षिणी इलाका ‘आजाद जम्मू और कश्मीर’ (एजेके) और दूसरा उत्तरी इलाका ‘गिलगित-बाल्टिस्तान’ । इन दोनों इलाकों के ज़मीनी हालात इस बात की इज़ाज़त नहीं देते कि पीओके को, अभी जिस हाल में वह है, भारत में मिलाया जा सकता है।
pok आज भी मनाता है काला दिन
पाकिस्तान ने बड़ी चालाकी से कूटनीतिक चाल चलते हुए पीओके को पाकिस्तान के प्रान्तों में शामिल नहीं किया। आज की तारीख में पाक अधिकृत ‘आजाद कश्मीर’ कहने को खुदमुख़्तार राज्य है लेकिन पाकिस्तान ने इसे अपने मुल्क में शामिल किए बगैर इस पर कब्ज़ा कर रखा है। ग़ाज़ा पट्टी के राफ़ा शहर की तरह आजाद कश्मीर की राजधानी व सबसे बड़ा शहर मुजफ्फराबाद है। आजाद कश्मीर का अपना अलग निर्वाचित राष्ट्रपति है। प्रधानमंत्री, विधानसभा और हाईकोर्ट है। इसका अपना अलग झंडा भी है। यानी पीओके के लिए केवल पाकिस्तान एक पार्टी नहीं, ‘आजाद कश्मीर’ सरकार भी एक पार्टी है। आजाद कश्मीर में भारत के खिलाफ इतना ज़हर भरा गया कि ‘आजाद कश्मीर’ हर साल 27 अक्टूबर को ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाता है क्योंकि इसी दिन जम्मू और कश्मीर राज्य का भारत में विलय हुआ था। कांग्रेस के जमाने में तो भारत की तरफ वाले कश्मीर में भी इस दिन को ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाया जाता था।
पीओके 24 अक्टूबर को ‘आजाद जम्मू और कश्मीर डे’ में मनाता है। ये वह दिन है जब 1947 में आजाद जम्मू और कश्मीर सरकार बनाई गई थी।
एक अमेरिकी एनजीओ ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया निदेशक, ब्रैड एडम्स ने आजाद कश्मीर का दौरा करने के बाद 2006 में अपनी रिपोर्ट में लिखा- “हालांकि ‘आजाद’ का मतलब ‘स्वतंत्र’ है, लेकिन आजाद कश्मीर के निवासियों के लिए इस शब्द का कोई मतलब नहीं है। पाकिस्तानी अधिकारी बुनियादी स्वतंत्रता पर कड़े नियंत्रण के साथ आजाद कश्मीर सरकार पर शासन करते हैं।” ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर स्नेडेन का ऑब्जर्वेशन था कि कड़े नियंत्रण के बावजूद, आजाद कश्मीर के लोगों ने पाकिस्तान द्वारा उनके साथ किए गए हर व्यवहार को स्वीकार कर लिया है। इसका एक कारण यह था कि आजाद कश्मीर के लोग हमेशा पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहते थे। (अंडरस्टैंडिंग कश्मीर एंड कश्मीरी, क्रिस्टोफर स्नेडेन पेज नं. 93)
‘आजाद कश्मीर’ के पास पाक के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। मुस्लिम आबादी के कारण वह अपने ब्रदरहुड के साथ ही रहना चाहता था। इसलिए पाकिस्तान भी उसे लेकर बेफिक्र हो गया। कश्मीर का मामला यूएन में चल रहा था इसलिए पाकिस्तान ने आजाद कश्मीर को अपना हिस्सा बनाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। क्योंकि पाक अगर ‘आजाद कश्मीर’ को अपना प्रान्त बना लेता तो यह संदेश जाता कि भारत अधिकृत कश्मीर पर उसका कोई दावा नहीं है। और यूएन में उसका मुकदमा कमज़ोर पड़ जाता। पाक ने आजाद कश्मीर को सशर्त स्वशासन का अधिकार दे दिया। 1970 के दशक में तैयार किए गए आजाद कश्मीर के अंतरिम संविधान के अनुसार, पाक ने केवल उन्हीं राजनीतिक दलों को अस्तित्व में रहने की इजाजत दी जो पाकिस्तान के प्रति निष्ठा रखते थे।
पीओके पर कब्जा करने में भारत की सबसे बड़ी दिक्कत है कि यहां 99 फीसदी आबादी कट्टर मुसलमानों की है। इनकी गैर मुसलमानों के साथ मिलजुल कर रहने की आदत छूटे करीब सत्तर साल हो गए हैं। आजादी के ठीक पहले 1941 में हुई जनगणना में इस इलाके में करीब 9 फीसदी हिंदू व चार फीसदी सिख आबादी भी थी। लेकिन इनमें अधिकांश को जबरन मुसलमान बना दिया गया। जो इस्लाम स्वीकार नहीं कर पाए वे पलायन कर गए। आजाद कश्मीर के लोगों में न केवल विविध आदिवासी कबीले (बिरादरी) शामिल हैं, बल्कि वे सांस्कृतिक और भाषाई रूप से भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य की मध्य घाटी के कश्मीरियों से काफ़ी अलग हैं। आजाद कश्मीर में सांस्कृतिक प्रथाएं कश्मीर घाटी के बजाए जम्मू व पंजाब से ज़्यादा मिलती-जुलती हैं।
मुसलमानों में यहां बिरादरियां गुज्जर, सुधान, राजपूत मुस्लिम व जाट में बटी हैं। सुधानों की संख्या पांच लाख से ज्यादा और राजपूतों की संख्या पांच लाख से थोड़ी कम है। आजाद कश्मीर के लगभग सभी स्थानीय राजनेता और नेता इन दो समूहों में किसी एक से संबंधित हैं। आजाद कश्मीर में लगभग तीन लाख मीरपुरी जाट रहते हैं जो पंजाबी कल्चर के हैं। अब मीरपुरी बड़ी संख्या में यूनाइटेड किंगडम (यूके) में चले गए हैं और वे यूके में ‘कश्मीरी’ के रूप में जाने जाते हैं।
पीओके में कई स्कूल कॉलेज हैं। जो लोग पढ़ लिख गए वह विदेशों में जाकर बस गए और जो बाहर नहीं जा सके वह बेरोजगारों की फौज में शामिल हो गए। पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस्लाम के नाम पर इन बेरोजगारों को आतंक का पाठ पढ़ाया। उल्लेखनीय है पहले इसके लिए आईएसआई फंडिंग भी करती थी। पर अब वह फंडिंग भी बंद हो गई है। करीब दस लाख बेरोजगारों की फौज आए दिन अपनी स्थानीय सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करती रहती है। पीओके में चाहे कितनी भी समस्याएं हैं, फिर भी यहां के मुसलमान खुश हैं। वे अगर भारत से जुड़ना भी चाहें तो भी स्थानीय सरकार जो पाक के रहमोकरम पर है ऐसा होने नहीं देगी।
जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट जैसे कुछ संगठन थे जो पाक से सचमुच आजादी चाहते थे। लेकिन पाक ने ‘आजाद कश्मीर’ में उन्हें चुनाव लड़ने की इज़ाज़त कभी नहीं दी। चूंकि उनका अंतरिम संविधान उन्हें कोई विकल्प नहीं देता था इसलिए आजाद कश्मीर के लोगों ने पाकिस्तान में शामिल होने के अलावा किसी अन्य विकल्प पर विचार नहीं किया। इस तरह बड़ी सफाई से आजाद कश्मीर को पूरी तरह से पाकिस्तान में एकीकृत कर लिया गया।
ऐसे शुरू हुए आतंक के मदरसे
इस तरह पाक ने धीरे-धीरे पूरे पीओके को आतंकी ट्रेनिंग कैंप में बदल दिया। इसकी शुरूआत 80 के दशक में पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी ISI, यानी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस सक्रिय होने के साथ हो गई थी। आईएसआई पाकिस्तान की सेना, नौसेना और वायु सेना के खुफिया अधिकारियों का एक संगठन था जिसका मुख्य एजेंडा ही भारत के कश्मीर में अशांति फैलाना था। आईएसआई ने ‘आजाद कश्मीर’ के बेकार मुस्लिम युवाओं को इस्लाम के नाम पर जिहाद की ट्रेनिंग देनी शुरू की। आईएसआई ने यह काम बड़े पैमाने पर शुरू किया। पाक के रावलपिंडी सेना हेडक्वाटर से आजाद कश्मीर आकर सैन्य अधिकारी इन आतंकियों को ऐसे ट्रेनिंग देने लगे जैसी फौज में भर्ती होने वाले रंगरुटों की होती है। इसके लिए आईएसआई ने न केवल भारी फंड का इंतजाम किया बल्कि पाकिस्तान के मौलाना भी यहां के मदरसों में जिहाद का जहर भरने के लिए भेज दिए।
‘आजाद कश्मीर’ से आतंकियों को सरहद पार कश्मीर घाटी में भेजना शुरू किया गया। इन आतंकियों ने आजादी के नाम पर कश्मीर घाटी के कश्मीरी युवाओं को भी बहकाना शुरू किया। देखते-देखते घाटी में हिजबुल-मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार, जमीयत-उल-मुजाहिदीन और अल-जिहाद जैसे आतंकी संगठन कश्मीर में सक्रिय हो गए। चार साल में ही आईएसआई ने कश्मीर में सक्रिय तेरह समूहों को संयुक्त जिहाद परिषद में संगठित कर लिया। घाटी के कश्मीरी मुस्लिम युवाओं को ट्रेनिंग के लिए सीमापार आजाद कश्मीर भेजा जाने लगा। उस दौर में एलओसी की बाड़ेबंदी भी नहीं हुई थी। कई जगह सीमाएं खुली थीं। इस तरह आजाद कश्मीर में आतंक की फैक्ट्री शुरू हो गई। घाटी आतंकवाद और सेना की गिरफ्त में आ गई। 1990 में एक लाख से ऊपर कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी छोड़ कर पलायन करना पड़ा। कश्मीर में तैनात सेना और सुरक्षाबलों पर जानलेवा हमले होने लगे क्योंकि इस जिहाद में सीधे तौर पर कश्मीरी लड़के शामिल थे।
इसलिए देखते-देखते पूरा कश्मीर सेना और भारत के खिलाफ हो गया। अमेरिका में 9-11 के आतंकी हवाई हमले तक यह सब खुलेआम चल रहा था। 2001 में पाकिस्तान को मजबूरन अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘आतंकवाद के खिलाफ़ वैश्विक युद्ध’ का समर्थन करना पड़ा। तब यूनाइटेड जिहाद काउंसिल ने सार्वजनिक रूप से काम करना बंद कर दिया। लेकिन आजाद कश्मीर में आतंकी ट्रेनिंग कैंप चलते रहे।
जन्नत से जहन्नुम बनी नीलम घाटी
नीलम घाटी गुलाम कश्मीर का सबसे खूबसूरत जिला है। ये घाटी कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर में तंगडार के सामने नियंत्रण रेखा के उस पार केवल 3 किमी दूर है। प्राकृतिक सौंदर्य से ओतप्रोत गुलाम कश्मीर की नीलम और लीपा घाटी को पाकिस्तानी हुकूमत ने ‘जन्नत’ से ‘जहन्नुम’ बना दिया है। कश्मीर से सटे गुलाम कश्मीर में नीलम घाटी में आकाश छूते पहाड़, हरी-भरी घाटियां, बहती नदियां और खूबसूरत झीलें हैं। लेकिन आईएसआई, पाक सेना और कट्टरपंथी इस खूबसूरत वादी का इस्तेमाल आतंक को बढ़ावा देने में कर रहे हैं। नीलम घाटी में कई आतंकी संगठनों ने अपने अड्डे बना रखे हैं और यहीं से भारत के खिलाफ साजिशों का खेल रचा जाता है। पाक सेना नीलम घाटी से आतंकियों की घुसपैठ के अलावा भारतीय सेना और गांवों में सबसे अधिक गोलाबारी करती है। यहां आतंकी संगठनों जैश-ए-मुहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा ने सबसे अधिक कैंप बनाए हैं।
कभी नीलम जिले का नाम किशनगंगा घाटी था, जिसे पाक सेना ने बदलकर नीलम रख दिया। यह किशनगंगा नदी के किनारे 1981 मीटर की ऊंचाई पर बसा हुआ है। लीपा घाटी भी पाक अधिकृत कश्मीर के हट्टियां बाला जिले में स्थित एक पर्वतीय घाटी है। नीलम और लीपा घाटी साथ जुड़े हैं। यह मुजफ्फराबाद से 105 किमी दूर रेशियां गली नामक पहाड़ी दर्रे के दूसरी ओर है। आतंकियों के कैंप व पाक सेना की अधिक सक्रियता के चलते यहां सैलानी आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। उल्लेखनीय है कि सबसे अधिक आतंकी कैंप हैं।
रिपोर्टो के मुताबिक आईएसआई ने यहां स्थानीय युवाओं को आतंक की राह अपनाने के लिए गुमराह किया। आतंकियों ने लॉन्चिंग पैड भी यहीं बना रखे हैं। ‘आपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय सेना ने नीलम और लीपा घाटी में सक्रिय आतंकी कैंपों को तबाह किया।
जासूसों ने खोजे आतंकी कैंप
भारत की खुफिया एजेंसी रॉ ने पीओके को अच्छे से खंगाला। रॉ की रिपोर्ट के आधार पर ‘आपरेशन सिंदूर’ के दौरान सेना ने पीओके और पाक में चल रहे आतंकी ठिकानों की सूची जारी की इसमें आधे से ज्यादा ठिकाने पीओके में चल रहे हैं। आजाद कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद आतंक का सबसे बड़ा केन्द्र है। ये इलाका लाइन ऑफ कंट्रोल के नजदीक है। यहां के आतंकी कैंप भारत में घुसपैठ का एक बड़ा केन्द्र हैं। भारतीय फौज ने यहां के आतंकी ठिकानों पर भी एयरस्ट्राइक की। मुजफ्फराबाद में शावई नल्लाह और मरकज़ सैयदना बिलाल, ये दोनों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैंप हैं। शावई नल्लाह कैंप साल 2000 से एक्टिव है, वहीं मरकज़ सैयदना बिलाल घुसपैठियों के लिए एक ट्रांजिट कैंप की तरह है। भारत में घुसने से पहले आतंकी यहां हॉल्ट लेते हैं। ये काफ़ी घने जंगलों वाला पहाड़ी इलाका है। यहां एलओसी पार करना चुनौती भरा तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं है। इसलिए आतंकी यहां से घुसपैठ करते हैं।
‘आपरेशन सिंदूर’ में सेना ने कोटली के आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। ये जगह मेंढर सेक्टर में है। पूंछ से सड़क मार्ग से इसकी दूरी मात्र 56 किलोमीटर है। यही वजह है कि घुसपैठ के लिए आतंकी इस जगह पर कैंप बना कर रहते हैं। इस सेक्टर में पाकिस्तानी सेना के कई चेक पोस्ट्स हैं। पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी की आड़ में आतंकी यहां से घुसपैठ करने की कोशिश करते हैं। पीओके का गुलपुर कस्बा लाइन ऑफ कंट्रोल से केवल 35 किलोमीटर की दूरी पर है। अप्रैल 2023 में पूंछ में हुए हमले की प्लानिंग इसी लॉन्चपैड पर हुई थी। जून 2024 में रियासी में बस पर हुए हमले के आतंकी इसी लॉन्चपैड से आए थे। इसी तरह सवाई नाला नामक कस्बा तंगधार सेक्टर में है। इस आतंकी लॉन्चपैड का इस्तेमाल भारत में हमले के लिए किया जाता रहा है। अक्टूबर 2024 में सोनमर्ग और गुलमर्ग में हुए आतंकी हमलों की प्लानिंग यहीं हुई थी। साथ ही 22 अप्रैल को पहलगाम हमले की साज़िश भी इसी लॉन्चपैड पर रची गई थी। पीओके का बरनाला कैंप, जम्मू के राजौरी के पास लोओसी से केवल 10 किलोमीटर दूर है।
गिलगित-बाल्टिस्तान
पीओके का दूसरा हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान से एकदम अलग है जो लद्दाख की सीमा से लगता है। इसकी कहानी और ज्यादा दिलचस्प है। 1947 में आजादी के बाद मुस्लिम बाहुल यह इलाका पाकिस्तान के साथ जाना चाहता था। लेकिन जम्मू और कश्मीर के साथ सीमाएं मिलने के कारण पाक ने विलय से इंकार कर दिया। जब आजाद कश्मीर बना तो यह सैद्धांतिक रूप से उसी का हिस्सा हो गया। लेकिन दोनों हिस्से दो कोनों पर थे। भौगोलिक क्षेत्र के संदर्भ में गिलगित-बाल्टिस्तान आजाद कश्मीर से छह गुना बड़ा है। 1949 में, आजाद कश्मीर सरकार ने कराची समझौते के तहत गिलगित-बाल्टिस्तान का प्रशासन संघीय सरकार को सौंप दिया।
यह इलाका मूल रूप से शिया मुस्लिम गूजर व आदिवासी आबादी का था, जिन्हें पाक सरकार ने ‘बर्बर और असभ्य’ माना और सामूहिक जुर्माना व दंड लगा दिया। फिर भी इन लोगों ने पाक का साथ नही छोड़ा। 1999 के कारगिल में यहां के लोगों ने पाकिस्तान की ओर से युद्ध में भाग भी लिया था। कारगिल युद्ध में यहां के 500 से अधिक सैनिक मारे गये। ललक जान, जो यासीन घाटी का एक शिया मुस्लिम (निज़ारी) सैनिक था, उसे कारगिल युद्ध के दौरान उसके साहसी कार्यों के लिए पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित पदक निशान-ए-हैदर से सम्मानित किया गया।
गिलगित-बाल्टिस्तान की सीमाएं चीन से भी जुड़ी हैं। पाकिस्तान ने सितम्बर 2009 में बड़ी चालाकी से गिलगित-बाल्टिस्तान में एक बड़ी ऊर्जा परियोजना लगाने का करार चीन से कर लिया। 2021 में लद्दाख पर और दबाव बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन अपने तोपखाने और सैन्य कर्मियों को ले जाने के लिए यारकंद से पीओके तक 33 किलोमीटर लंबी एक सड़क बनानी शुरू कर दी। ये सड़क पाकिस्तान में अस्तोर के साथ 800 किलोमीटर के काराकोरम राजमार्ग को गिलगित बाल्टिस्तान से जोड़ेगी। पीओके में इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए। भारत ने भी इसका विरोध किया लेकिन पाक ने इस विरोध को अनसुना कर दिया।
कश्मीर (पीओके) से निर्वासित कार्यकर्ता अमजद अयूब मिर्जा कहते हैं कि हर दिन गिलगित बाल्टिस्तान, पीओजेके में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और पाकिस्तानी मीडिया इसकी रिपोर्ट नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय मीडिया को उन इलाकों में जाने की अनुमति नहीं है।”
तो कैसे जीतेंगे पीओके?
गिलगित-बाल्टिस्तान से लेकर आजाद कश्मीर तक पीओके में हालात हमारे पक्ष में नहीं हैं। वहीं न अंतराष्ट्रीय माहौल हमारे साथ है और न स्थानीय लोग। इन हालात में पीओके भारत के किस काम का? ज्यादा से ज्यादा भारत पीओके पर वैसा कब्ज़ा कर सकती है जैसे इजराइल ने ग़ाज़ापट्टी पर किया था। ग़ाज़ापट्टी भी पीओके की तरह एक लंबी पट्टी है जिसकी एक सीमा इजराइल से लगती है। तकनीकी रूप से ग़ाज़ा पर इजराइल का कब्जा था लेकिन वहां हमास की सरकार चलती थी। इजरायल ने अपने और गाज़ा के बीच एक अदृश्य लौह दीवार बना रखी है।
इजराइल का ग़ाज़ा पर प्रत्यक्ष तौर बाहरी नियंत्रण और ग़ाज़ा के भीतरी जीवन पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। ग़ाज़ा की तरफ से एक भी फलस्तीनी नागरिक इजराइल की तरफ नहीं आ सकता। ग़ाज़ा पानी, बिजली, दूरसंचार और अन्य सुविधाओं के लिए इजरायल पर निर्भर है। ग़ाज़ा एक तरह की खुली जेल है जिस पर अंकुश बनाए रखने के लिए इजराइल को हर साल करोड़ों डालर बेवजह खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि भारत पीओके को ग़ाज़ा क्यों बनाना चाहेगा?
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Rajesh Chauhan
June 18, 2025 at 1:09 am
Thanx for your information