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सियासत

मोदी युग में यह पहली बार हुआ है कि संघ प्रमुख को अपने ही लोगों ने इस कदर ट्रोल किया हो!

के पी सिंह-

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मामले में संघ की स्थिति न उगलते बनने और न निगलते बनने की हो गई है। यह अचानक नहीं हुआ। भाजपा जो पार्टी विथ ए डिफरेंस की बात न केवल कहती रही थी बल्कि उसके नेता आचरण में भी इस उसूल को दिखाने के लिए जोखिम उठाने को तत्पर रहते थे। ऐसा न होता तो अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता में रहते हुए सिर्फ एक वोट से पद न गंवाना पड़ गया होता। इस पराजय को नैतिक जीत में उन्होंने बदल दिया था जब संसद में कहा था कि सत्ता का दुरुपयोग करके वे अपनी सरकार को बचा सकते थे लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं है।

उन्होंने गर्वोन्नत भाव से कहा कि अगर ऐसे हथकंडों से सत्ता मिलती या बचती हो तो उन्हें वैसी पतित सत्ता चिमटे से भी छूना मंजूर नहीं है। लोगों ने इसे बलिदान माना था और सत्ता की लड़ाई हारकर भी वाजपेयी के चेहरे पर विजेता जैसा दर्प चमचमा उठा था। लेकिन आज की भाजपा से ऐसा करने की कल्पना भी की जा सकती है।

वर्तमान भाजपा ऐसे मुकाम पर जाकर खड़ी हो गई है जिसे कोई लक्ष्मण रेखा मंजूर नहीं है। सत्ता में बने रहने के लिए उसे कुछ भी कर गुजरना गवारा है। राजनीतिक शुचिता के पतन का कीर्तिमान रच रही भाजपा ने मनमानियों से सदा सत्ता में बने रहने का मंत्र सिद्ध कर लिया है।

संघ की विचारधारा की आलोचना की जा सकती है लेकिन उसने अपने आचरण का आवरण को लोगों के सामने उज्ज्वल बनाये रखने का ख्याल हमेशा रखा। नैतिक भीरूता के सहज संस्कारों के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बेलगाम कार्यशैली से संघ के कर्ताधर्ताओं का विचलित होना स्वाभाविक था। संघ ने प्रकारातंर से कई बार मोदी को संदेश देने की कोशिश की कि वे उन्मत्त होकर काम करने की कार्यशैली से बाज आयें और लोकलाज के लिहाज को ध्यान में रखें। पर मोदी को किसी से नियंत्रित होना मंजूर नहीं रहा है भले ही वह संघ ही क्यों न हो।

उन्होंने संघ की सांकेतिक टोकाटोकी तक को झटक दिया। केन्द्र की सत्ता में 10 वर्ष का समय गुजार लेने के बावजूद उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात करना गवारा नहीं किया था जो संघ की अवहेलना का स्पष्ट इशारा था। इतना ही नहीं 2024 के लोकसभा चुनाव की बेला में उन्हीं के इंगित पर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने यह कह डाला था कि कभी वह दौर था जब पार्टी संघ पर आश्रित थी लेकिन आज भारतीय जनता पार्टी इतनी सक्षम हो चुकी है कि उसे संघ का मुंह देखने की कोई जरूरत नहीं रह गई। संघ के कर्ताधर्ताओं को एक तरह की इस खुली अवमानना से बहुत ठेस लगी थी लेकिन वे कुछ कह न सके थे। लेकिन मतदाताओं ने ऐसा जनादेश दिया कि भाजपा का नेतृत्व अर्श से फर्श पर आ गया। 400 पार के आंकडे की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के लिए खुद के दम पर बहुमत लायक सीटें भी नहीं जुटा सके।

ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सारी शेखी भूल गये थे। उन्हें संघ के लिए विनम्रता ओढ़नी पड़ी। हालांकि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इसके बाद सार्वजनिक मंचों पर कई बार उन्हें धोया ताकि उन्हें आत्मावलोकन के लिए मजबूर कर सकें। उन्होंने कहा कि कोई खुद को कहने से भगवान नहीं बन जाता। हर व्यक्ति को चाहिए कि वह सच्चे मन से सेवा के कार्य करें और अपने कार्यों को लेकर अहंकार न पाले। लोग उसे किस रूप में मानने लगें यह निर्णय लोगों पर छोड़ें। इस तरह के ताने मोदी ने चुप रहकर सुने क्योंकि उन्हें अपना काम निकालना था। इस बीच उनकी 75 वर्ष की आयु पूरी होने का समय जब आ गया तो मोदी संघ के दरबार में प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार मत्था टेकने पहुंचे ताकि संघ के अधिकारी पसीज सकें।

वे चाहते थे कि 75 वर्ष की उम्र में राजनीति से रिटायर कर देने की जो परंपरा तात्कालिक परिस्थितियों में अपने को सुरक्षित करने के लिए उन्होंने पार्टी में लागू कराई थी वर्तमान में संघ उसे भूल जाये। संघ के मुख्यालय पर उनका स्वागत तो गर्मजोशी से हुआ पर 75 वर्ष की उम्र में रिटायरमेंट की परंपरा को लेकर उन्हें संघ प्रमुख से कोई आश्वासन नहीं मिला बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन संबंधी चर्चा में संघ प्रमुख के तेवरों से यह स्पष्ट हो गया कि उन्हें मोदी का एकाधिकारवादी रवैया स्वीकार्य नहीं है और वे चाहते हैं कि नया अध्यक्ष ऐसा चुना जाये जो स्वतंत्र रूप से बात कहने में सक्षम हो।

पर मोदी इससे घबराने की बजाय बगावती रूख अपनाने पर आमादा हो गये हैं। दरअसल मोदी को यह एहसास है कि संघ की किसी आपत्ति से उनकी लोकप्रियता पर कोई आंच आने वाली नहीं है। संघ प्रमुख ने हाल ही में फिर 75 वर्ष की उम्र में पहुंचने पर पद त्याग का मुद्दा उठा दिया। इससे चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। मोहन भागवत ने अगर यह शिगूफा जनमत की नब्ज टटोलने के लिए उछाला था तो इसके नतीजे उन्हें बहुत निराश करने वाले रहे हैं। सोशल मीडिया पर संघ के लोगों तक ने मोदी को रिटायर करने की उनकी कोशिशों के खिलाफ गुस्सा जताया है और उन्हें तमाम लानत भेजी हैं।

मोदी युग में यह पहली बार हुआ है कि संघ प्रमुख को अपने ही लोगों ने इस कदर ट्रोल किया हो। उन्होंने जब जाति व्यवस्था को अप्रासंगिक करार दिया था और जातिगत अन्याय के लिए ब्राह्यणों को दोषी ठहराया था तभी उन्हें बहुत भला बुरा कहा गया था। बेबाक राय देने की दिलेरी दिखाने की कोशिश में मोहन भागवत ने अपने पद की महिमा को घटाने का सिलसिला बना बैठे थे। मोदी के संदर्भ में इसमें वे एक सीढ़ी और नीचे गिरते नजर आ रहे हैं।

मोदी मैजिक और उनके लिए लोगों में इस कदर अंध भक्ति को समझना है तो भारतीय समाज की ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण निर्मित हो चुकी मानसिकता को समझना पड़ेगा। राजनैतिक रीतिनीति के निर्धारण में समाज का सामूहिक मनोविज्ञान भी एक बड़े कारक की भूमिका अदा करता है। एक समाज जिसने इतिहास के लंबे दौर में बार-बार पराजय का दंश झेला हो उसकी कुंठा स्वाभाविक है। वह पराक्रम और उद्दंडता का अंतर भूल जाता है और न्यूसेंस वेल्यू को पराक्रम के रूप में मान्यता देने लगता है। कुछ दिनों पहले पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की जयंती थी। देखा गया कि लोग चन्द्रशेखर की चर्चा इस बात को लेकर मुग्ध भाव से कर रहे थे कि उन्होंने शुरूआत में ही तय कर लिया था कि वे कोई और पद न लेकर एक दिन सीधे प्रधानमंत्री पद पर कब्जा करेंगे और अंततोगत्वा वे ऐसा करने में सफल हो गये इसलिए उनका कार्य बहुत उपलब्धि परक रहा जिस पर देश को नाज होना चाहिए।

अगर किसी की श्रेष्ठता को मापने का यही पैमाना है तो ज्योति बसु जिन्होंने पार्टी के आदेश के कारण सामने थाली में परोसकर रखे गये प्रधानमंत्री पद को स्वीकार करने से मना कर दिया था उन्हें अक्षम मानकर धिक्कारा जाना चाहिए। नाना जी देशमुख और मधु लिमये को निकम्मा करार दिया जाना चाहिए जिन्होंने जनता पार्टी के सत्ता में आने पर मंत्री पद के लिए मिले ऑफर को संगठन में काम करने के लिए नामंजूर कर दिया था। दरअसल सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले किसी व्यक्ति के लिए पद पर दावा जताने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उसका कोई वैचारिक लक्ष्य होना चाहिए जिसको प्राप्त करने में वह जुटे। इस दौरान उसे किसी भी तरह की भूमिका में काम करने के लिए तत्पर रहना चाहिए न कि पद विशेष के लिए अड़ने का उसका दुराग्रह मान्य किया जाना चाहिए।

चन्द्रशेखर ने विरासत में मिली जनता पार्टी के विशाल संगठन को अपनी महत्वाकांक्षा के लिए एक जेबी पार्टी में तब्दील करके भारी अनर्थ किया था। हालत यह थी कि जो भी उनके सामने अध्यक्ष का चुनाव लड़ने आता उसकी मार-पिटाई हो जाती थी। इसके शिकार बड़बोले चन्द्रास्वामी से लेकर खग्गी विधिवेक्ता राम जेठमलानी तक हुए। उनकी इस तानाशाही से एक से एक दिग्गज नेताओं को जनता पार्टी से दूरी बनानी पड़ी। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी सरकार क्या थी एक भानुमती का पिटारा था। मंत्रिमंडल के लोगों में कोई एकरूप विचारधारा नहीं थी जिसकी कोई नीतिगत दिशा नहीं थी।

सरकार खत्म होते ही उनके सारे मंत्रिमंडलीय सहयोगी बिखर गये क्योंकि उनका पार्टी संगठन एक गिरोह की तरह का था जिसमें कोई स्थायित्व हो ही नहीं सकता था। ऐसी सरकार का कायम होना देश की प्रगति के लिए गतिरोध के दौर के बतौर याद किया जाना चाहिए। चन्द्रशेखर की इस मनमानी राजनीति की निंदा होनी चाहिए लेकिन उसे पवित्र भीष्म प्रतिज्ञा के नमूने के तौर पर याद किया गया।

ऐसी ही विशेषता के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी लोकप्रियता का इतना लंबा चौड़ा वितान बनाया है। उद्दंड व्यक्ति की मनमानी को प्रोत्साहन देने के लिए हमारा सामाजिक पर्यावरण बहुत उर्वरा है। जब कोई ऐसा व्यक्ति सत्ता में बैठ जाता है जो किसी संस्था या व्यक्ति, नैतिकता या मूल्य के प्रति किसी तरह की जबावदेही न माने और स्वैच्छाचारी ढंग से देश या समाज को हांके तो पराजित मानसिकता वाले भारतीय समाज को अपने बहुत बड़े अभाव की पूर्ति की रूप में उसका आचरण सुहाता है जो उसके साहस और पुरुषार्थ के अभाव का पूरक है। इसी कारण मोदी के संदर्भ में हमारे समाज को उनसे किसी तरह का तकाजा बेमानी है।

निष्कर्ष यह है कि संघ चाहे जितने हाथ पैर पटक ले जब तक मोदी शारीरिक रूप से सक्षम हैं तब तक उन्हें प्रधानमंत्री पद से डिगा नहीं पायेगा। फिलहाल देश का यही भवितव्य है।

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