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आज के अखबार : अमर उजाला में ‘मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त’, हिन्दुस्तान टाइम्स में मुकरते गवाहों की कहानी

संजय कुमार सिंह

बिहार चुनाव ने भारतीय जनता पार्टी की गंदी राजनीति को नंगा कर दिया है। इसमें मीडिया को लोग जान ही चुके हैं। आज की लीड से अगर अमर उजाला का उत्साह दिख रहा है तो हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर बताती है कि लखीमपुर खीरी के मंत्री पुत्र मामले में गवाह मुकर रहे हैं। यह सब तब हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम कह चुका है कि जज का तबादला सरकार के दबाव में बदला। पहले अमर उजाला – लीड का शीर्षक है – “नीतिश ही बिहार में एनडीए के सीएम पद के उम्मीदवार : शाह”। उपशीर्षक है – गृहमंत्री ने दरभंगा में की घोषणा, विपक्ष पर बोला तीखा हमला। बिहार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और मोदी राजनीति फंस गई लगती है। वोट चोरी के आरोपों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बावजूद अमित शाह के खास, ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने तथा उनके नेतृत्व में जबरन एसआईआर कराने, सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के अपने दावे और उसकी जो लाचारी सार्वजनिक हुई उसमें बिहार चुनाव जीतना राजग की मजबूरी है और हारने का मतलब यह हो सकता है कि राजनीति के शीर्ष से वास्तविक फिसलन अब शुरू हो। इसमें केंद्र सरकार को मिली बैसाखी और उसका टिके रहना भी जरूरी है। ऐसे में भाजपा की राजनीति के ही कारण राज्य में राजग गठबंधन के मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं है। महागठबंधन ने जब तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया था तो खबरों के जरिए उसपर ऐसा करने के लिए दबाव डाला गया और यह भी कहा गया कि इसपर दोनों प्रमुख दलों में सहमति नहीं है आदि आदि। यह राजग के मुकाबले महागठबंधन को कमजोर दिखाने की राजनीति का हिस्सा था। तथ्य यह है कि भाजपा ने नीतिश कुमार को या किसी और को भी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया है। भाजपा ऐसा करती रही है और उसी ने बाद में पर्ची निकालकर तमाम अनजाने, अनअपेक्षित लोगों को मुख्यमंत्री भी बनाया है।

ऐसे में भाजपा की घोषणा नहीं होने के अपने मायने हैं और विपक्ष अपने हिसाब से इसका उपयोग कर सकता है। ऐसे में भाजपा का समर्थन कर रहे मीडिया की मजबूरी है कि वह भाजपा या राजग गठबंधन को आगे दिखाएं। भ्रामक खबरों से लाभ पहुंचाएं। ऐसे में अमर उजाला की लीड का शीर्षक ‘मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त’ जैसा मामला है। मैं कल शाम से ही बिहार की सारी खबरों को फॉलो करता रहा और मुझे ऐसी कोई खबर देर रात तक नहीं मिली थी। सुबह अमर उजाला की लीड देखकर चौंका लेकिन दूसरे किसी अखबार में ऐसी खबर नहीं है। पूछने पर चैट जीपीटी ने भी कहा, “इसलिए, संक्षिप्त में — हाँ, खबरें हैं जो इस तरह का संदेश देती हैं, लेकिन नहीं, ऐसा प्रतीत नहीं होता कि “अभिनिर्धारित उम्मीदवार” की ऑफिशियल और अंतिम घोषणा पूरी तरह हो गई हो”। जाहिर है, अमर उजाला ने खबर को क्रॉस चेक नहीं किया और अति उत्साह में ऐसी खबर दी है जो सही नहीं है, एक्सक्लूसिव या पूर्व सूचना भी नहीं है। यह अत्यधिक समर्थन का नुकसान और उदाहरण दोनों है। मुझे सिर्फ रेखांकित करना था। आज की मेरी दूसरी प्रमुख खबर भी भाजपा की घटिया राजनीति को उजागर करने वाली है। इस चुनावी मौसम में इसके अपने नुकसान हैं लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर छपी है तो अखबार ने प्रमुखता दी ही है। इस खबर का शीर्षक है, लखीमपुर खीरी ट्रायल घिसट रहा है क्योंकि मुकरे हुए गवाहों ने ब्रेक लगा दिये हैं। खबर के अनुसार, अदालत में पेश होने वाले अभियोजन के गवाहों में करीब 40 प्रतिशत होस्टाइल हो चुके हैं। यह अदालती शब्द है जिसमें यह माना जाता है कि अब यह गवाह अपने कहे से मुकर रहा है।

लखनऊ डेटलाइन से पवन दीक्षित की बाईलाइन वाली खबर के अनुसार, 3 अक्टूबर, 2021 को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी ज़िले में एक एसयूवी ने चार किसानों और एक पत्रकार को कुचल दिया था। इसमें पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष मिश्रा भी सवार थे। इसके बाद हुई हिंसा में तीन अन्य लोग मारे गए। इनमें दो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ता थे और एक कार का चालक था। इस घटना के बाद देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए। सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) का गठन किया और आशीष मिश्रा सहित 13 लोगों को गिरफ़्तार किया। इस मामले की सुनवाई आखिरकार जनवरी 2023 में शुरू हुई। लेकिन दो साल बाद, सुप्रीम कोर्ट द्वारा दैनिक कार्यवाही के आदेश के बावजूद प्रगति धीमी रही है। अदालत में पेश हुए अभियोजन पक्ष के लगभग 40% गवाह मुकर गए हैं। अभियोजन पक्ष द्वारा अंतिम रूप दिए गए 103 गवाहों में से अब तक केवल 47 ने ही अतिरिक्त जिला न्यायाधीश डीएन सिंह की अदालत में गवाही दी है। अभियोजन पक्ष के वकील ने बताया कि इनमें से 20 मुकर गए हैं और 27 ने अपने बयान दर्ज करा दिए हैं। राज्य सरकार की ओर से ज़िला सरकारी वकील (आपराधिक) अरविंद त्रिपाठी ने बताया, “अदालत में बयान दर्ज कराने वाले 27 चश्मदीदों में से 25 हिंसा में घायल हुए हैं और दो अन्य चश्मदीद गवाह हैं।” उन्होंने आगे कहा, “बचाव पक्ष के वकील ने भी सभी 27 से जिरह की है।” कायदे से, सरकार का काम था कि वह इस मामले में निष्पक्ष नजर आती और आरोप तथा शुरुआती सबूतों के बाद तबके मंत्री को पद से हटा दिया जाता। यह सब नहीं हुआ। मंत्री के बेटे को जमानत मिलने में आसानी, गवाहों को धमकाने के मामले आदि सुनने में आए और अब अगर 47 प्रतिशत गवाह मुकर गए हैं तो आप समझ सकते हैं कि राजनीति क्या कर रही होगी या क्या चाहती होगी। मध्य प्रदेश में सेना के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने वाले जज का तबादला (फिर भी देश भक्ति का दावा) और उसमें भी ज्यादा नुकसान वाली जगह पर कराने का दबाव बहुत कुछ कहता है। इससे पता चलता है कि सरकार अपने लोगों को बचाकर भी हिन्दुओं की रक्षा कर रही है। विरोधियों का हिन्दू होना कोई मायने नहीं रखा है, वह पुरानी बात है। अखबारों का काम था कि वह इन्हें प्रचारित-प्रसारित करता रहता। पर मीडिया में संघियों की तैनाती पहले ही हो गई थी। वह भी दिख रहा है।  

आज खबर वह होनी चाहिए थी जो राहुल गांधी ने कहा है और भाजपा परेशान है। लेकिन ऐसी खबरें अब छपती नहीं हैं। फिर भी यह तथ्य है कि आज मेरे नौ अखबारों में सिर्फ दो, द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया में बिहार चुनाव की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां और खबरों के अलावा एक खबर है जो बताती है कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के खिलाफ उनकी पत्नी गीतांजलि जे अंगमो केंद्र सरकार के खिलाफ एक गंभीर चुनौती की शुरुआत करने वाली है। आप समझ सकते हैं कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और उन्हें जमानत नहीं मिलने की खबर, आज के समय में पहले पन्ने पर जगह नहीं पाती है। अमर उजाला ने पहले पन्ने पर खबर दी है, राष्ट्रपति ने राफेल से 700 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तय किया सफर। यह खबर का उपशीर्षक है और मुख्य शीर्षक है, नारी शक्ति…. आत्म निर्भरता की उड़ान। उपराष्ट्रपति को मिली सुविधा अगर नारी शक्ति है तो खबर यह होनी चाहिए थी कि प्रसार भारती कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर की हत्या पर बन रही फिल्म का समर्थन करने का विचार कर रहा है (हिन्दुस्तान टाइम्स) जबकि अपने शिक्षा संस्थान की महिला छात्र से नंगे होकर तेल मालिश कराने वाले शिक्षा संस्थान के स्वामी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। हाल में अपनी ही संस्था की छात्राओं के यौन शोषण के एक और आरोपी को गिरफ्तार किए जाने के बाद की खबर नहीं है। उस पर फिल्म नहीं बन रही है लेकिन पश्चिम बंगाल की घटना हमेशा केंद्र की भाजपा सरकार के लिए महत्वपूर्ण होती है। इस मामले की सीबीआई जांच कराई जा चुकी है और कई मामलों में जरूरत नहीं समझी गई है। एक जैसे दो मामलों में किसमें जरूरत समझी गई और किसमें नहीं इसके उदाहरण साफ हैं। फिर भी अमर उजाला के पहले पन्ने की खबर का चयन दिलचस्प है। बंगाल वाले मामले में पीड़िता के परिवार ने खुद को फिल्म बनाने के प्रयास से अलग कर लिया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि जिला न्यायपालिका से दूर रहे, यह हमारा अधिकार (कार्य) क्षेत्र है। इस खबर के नीचे छपी खबर बताती है कि शामली के चीफ मेडिकल सुपरिनटेंडेंट ने पुलिस पर फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाया है और कहा है कि डॉक्टर पर गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने के लिए दबाव डाला जाता है। चोरी के एक मामले में पुलिस की कथित निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए डॉ. दीपक चौधरी ने कहा है कि पुलिस वाले 20 गोलियों से छलनी शव लाते हैं और हमें मजबूर करते हैं कि सिर्फ एक गोली का दस्तावेज बनाया जाए। आप समझ सकते हैं कि डडबल इंजन की सरकार जनहित के कितने काम कैसे कर रही है और इसी उत्तर प्रदेश की पुलिस ने जब सांसद के खिलाफ कार्रवाई की थी तो तब के सांसद अब मुख्यमंत्री को संसद में रोना पड़ा था। अब वही मुख्य मंत्री चुनाव के समय बंटेंगे तो कटेंगे जैसे नारे लगाते हैं और बुलडोजर न्याय कर रहे हैं। जहां तक बिहार के चुनावों की खबर की बात है, इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, असंतोष की आवाज पर तेजस्वी की चुनौती चादर कैसे बड़ी की जाए, उन्हें भी शामिल किया जाए। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, जब चुनाव प्रचार गर्मा रहा है जब विपक्ष आरोप लगा रहा है। दि एशियन एज में यह खबर लीड है। शीर्षक, शाह, राजनाथ, राहुल ने बिहार में चुनाव प्रचार किए, प्रण, आरोप दोहराए। द टेलीग्राफ का शीर्षक दिलचस्प है, महागबंधन को चुनावी लस्सा मिला। उपशीर्षक से यह स्पष्ट है – राहुल गांधी मोदी और प्रिय विषयों पर तथा तेजस्वी रोजगार पर केंद्रित रहे। हिन्दी अखबारों में अमर उजाला की बात पहले कर चुका हूं। नवोदय टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है। मुख्य शीर्षक है, “नीतिश का रिमोट भाजपा के पास : राहुल”। इंट्रो है, मोदी कहकर दिखाएं कि ट्र्म्प झूठ बोल रहे हैं। मुझे लगता है कि यह पुराना हो चुका है और खबर नई वाली बात थी जिससे भाजपा का पूरा इकोसिस्टम परेशान है। राहुल गांधी ने कहा है कि वोट के लिए मोदी से कहा जाए कि मंच पर नाचिए तो वे भरत नाट्यम कर देंगे। जीतने के बाद वे अंबानी-अदाणी के लिए सरकार चलाते हैं। देशबन्धु ने बिहार चुनाव की खबर को लीड बनाया है। छह कॉलम का शीर्षक राहुल गांधी का आरोप है तो दो कॉलम में अमित शाह का यह बयान कि मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री का पद खाली नहीं है। सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री का पद खाली होने वाला है और इसीलिए चुनाव हो रहे हैं। व्यवस्था है कि कार्यकाल पूर्ण होने से पहले नए का चुनाव हो जाए। इसलिए अति आत्मविश्वास में वे जो चाहें बोल सकते हैं और बोलेंगे तो खबर होगी ही लेकिन मुद्दा यह है कि वे क्या बोल रहे हैं खासकर तब जब राहुल गांधी ने कहा है कि वोट चोरी का कांफिडेंस यह सब बोलने की ताकत देता है। मीडिया का काम था ऐसे बयानों पर नजर रखना लेकिन अमर उजाला ने इसका मतलब लगाया – नीतिश ही बिहार में सीएम पद के उम्मीदवार। जयश्रीराम।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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