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आज के अखबार : शेख हसीना को मौत की सजा और प्रत्यर्पण की मांग के बाद भारत का रुख ‘खबर’ नहीं है

संजय कुमार सिंह

आज इंदिरा गांधी की जयंती है। अखबारों में पहले पन्ने पर संबंधित खबर, चर्चा तो नहीं ही है। इसी तरह, शेख हसीना को बांग्लादेश में मौत की सजा के बाद उनके प्रत्यर्पण की मांग पर भारत सरकार क्या कर रही है – यह आज के अखबारों की सबसे महत्वपूर्ण खबर होनी चाहिए थी। होनी तो कल ही चाहिए थी पर दूसरी जरूरी खबरों के कारण कल नहीं हो पाई तो आज यह छोड़ने लायक खबर नहीं है। इस मामले में भारत सरकार चाहे जो करे – जो भी करे वही खबर है। कुछ नहीं करे तो वह भी खबर है। सामान्य तौर पर भारत सरकार को खुद कुछ कहना चाहिए था ऐसे मौकों पर सरकार की ओर से कुछ नहीं कहा जाए तो पूछ लेने का रिवाज रहा है जो अब कहीं बिला गया है। इसे अघोषित इमरजेंसी की स्थिति कहते हैं लेकिन सरकार समर्थकों को मंजूर नहीं है और 1975 के बाद पैदा होने वालों की जानकारी इस बारे में सबसे पुख्ता है। यह भारत की राजनीतिक स्थिति और मंदिर का परिणाम है लेकिन पूछना और बताना अब आसान भी नहीं रहा। पहले यह काम सरकारी प्रवक्ताओं के जरिए होता था। अब की स्थिति में तो मंत्रियों का ही पता नहीं रहता है। सरकारी प्रवक्ताओं को कौन जानता होगा या जानना कितना मुश्किल होगा। इसलिए आइए आज देखें कि शेख हसीना से संबंधित क्या खबर किस अखबार में पहले पन्ने पर है। देशबन्धु में सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, गुटेरेस ने हसीना को मौत की सजा दिए जाने का विरोध किया। खबर के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सुनाई गई मौत की सजा का विरोध किया है। उनके प्रवक्ता स्टेफेन दुजारिक ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र हर स्थिति में मौत की सजा के खिलाफ खड़ा होता है। दुजारिक ने यह बात अपनी दैनिक प्रेस ब्रीफिंग में एक सवाल के जवाब में कही।

वैसे भी भारत के लिए बांग्लादेश, शेख हसीना और वहां की मौजूदा स्थिति तथा वहां के नागरिक भी महत्वपूर्ण है। मौटे तौर पर इसे इस सोशल मीडिया की एक पोस्ट से समझा जा सकता है। मुझे यह पोस्ट फेसबुक पर मिली और विनोद चंद की है। उन्होंने अंग्रेजी में जो लिखा है वह इस प्रकार है, मोदी बांग्लादेश जाते हैं और उन्हें बताते हैं कि भारत उन्हें बिजली दे सकता है। दो साल बाद, अदाणी बांग्लादेश के साथ बिजली आपूर्ति के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करते हैं, जबकि उस देश में या आस-पास कोई बिजली संयंत्र भी नहीं है। फिर मोदी बांग्लादेश को ऋण देते हैं। बांग्लादेश भारत सहित किसी भी आपूर्तिकर्ता से अधिक दरों पर 25 साल का बिजली खरीद समझौता करता है। शेख हसीना प्रधानमंत्री हैं। बाद में, एक क्रांति होती है, शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़कर भागना पड़ता है। अब बांग्लादेश उन्हें मौत की सजा सुनाता है। वह इस समय भारत में राजकीय अतिथि हैं। बांग्लादेश 25 साल के बिजली खरीद समझौते में अदाणी द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की जाँच कर रहा है। तो, यह इस तरह हुआ। मोदी ने बांग्लादेश से भारत से बिजली लेने को कहा। अदाणी ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। मोदी ने बांग्लादेश को ऋण दिया। बांग्लादेश ने अदाणी के साथ बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर किए। भूटान में भी यही हुआ, जहाँ मोदी ने एक बिजली परियोजना के लिए ऋण दिया और परियोजना अदाणी को मिल गई। श्रीलंका में भी यही हुआ। राफेल सौदे में भी यही हुआ, जहाँ मोदी ने 30,000 करोड़ अतिरिक्त भुगतान किए जो अनिल अंबानी के लिए ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट के रूप में वापस आए।

अगर 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी के सभी दौरों से लेकर 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बनने तक का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि अदाणी संदिग्ध सौदों के ज़रिए करदाताओं का पैसा प्राप्त करते रहे हैं। समस्या यह है कि इन सौदों का आम नागरिकों पर रोज़ाना कोई असर नहीं पड़ता और न ही अल्पअवधि में उन पर आर्थिक रूप से कोई असर पड़ता है। सच्चाई यह है कि जो पैसा नागरिकों को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने पर खर्च किया जा सकता था, उसे निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। लंबे समय में, इससे देश को नुकसान होगा। जैसे श्रीलंका और अब बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन से निवेश के रद्द होने का खतरा है। इसलिए अदाणी मामले में सरकार जो भी करे खबर है। देर कर रही है तो वह भी खबर है। लेकिन देश के मीडिया को देखिए ज्यादातर कितने शांत बैठे हुए हैं और कितने सरकारी विज्ञापन एक जैसे छपते हैं।

आज नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में शेख हसीना की कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ और दि एशियन एज में भी पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर दो कॉलम की एक खबर है। इसके अनुसार, हसीना की पार्टी के नेताओं ने मौत की सजा की निन्दा की है और कहा है कि भारत को उनके संघर्ष में उनकी सहायता करनी चाहिए। खबर के अनुसार, शेख हसीना ने कहा है कि वे वापस जाकर चुनाव लड़ना चाहती है बशर्ते वहां लेवल प्लेइंग फील्ड हो। इसके अलावा हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया में भी शेख हसीना से संबंधित कोई खबर नहीं है। दि हिन्दू में पहले पन्ने पर तो कोई खबर नहीं है लेकिन अंदर पेज 10 पर एक खबर होने की सूचना है। इसके अनुसार, भारत प्रत्यर्पण अनुरोध पर प्रतिक्रिया करने पर विचार कर रहा है। अखबार ने लिखा है, हसीना के लिए बांग्लादेश के प्रत्यर्पण आग्रह पर भारत के पास उपयोग के लिए कई विकल्प हैं। हालांकि, 2013 में हस्ताक्षरित प्रत्यर्पण संधि के अनुसार कार्रवाई के लिए आगे बढ़ने से पहले बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को काफी कुछ करना है और तब तक वे भारत की सम्मानित अतिथि हैं और बनी रहेंगी। अमर उजाला समेत कई अखबारों में आज इस खबर की बजाय पर्यावरण मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मुठभेड़ में एक करोड़ का इनामी नक्सली मारा गया और बाबा सिद्दीकी की हत्या के आरोपी अनमोल का अमेरिका से प्रत्यर्पण जैसी बड़ी खबरें हैं। आमतौर पर अखबारों ने यह नहीं बताया कि नीरव मोदी या मेहुल चोकसी के प्रत्यर्पण में समय क्यों लग रहा है या देरी क्यों हो रही है। इसके उलट मेहुल चोकसी को लाने के लिए भारतीय विमान भेजकर हेडलाइन मैनेजमेंट किया जा चुका है।

नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार झारखंड में नियुक्तियों और पदोन्नति में अनियमितता की जांच शुरू करने वाली सीबीआई की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है और कहा है, आप राजनीतिक लड़ाई के लिए मशीनरी का इस्तेमाल क्यों करते हैं। इसी तरह, देशबन्धु की लीड का शीर्षक है – एसआईआर के खिलाफ दिल्ली में रैली करेगी कांग्रेस। द टेलीग्राफ ने लालू परिवार में विवाद की खबर को प्रमुखता दी है और बताया है कि अब इसमें लालू यादव पर दबाव का कोण भी है। दि एशियन एज में जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का बयान प्रमुखता से है। उन्होंने कहा है, सभी कश्मीरियों को शैतान मत बनाइए। टाइम्स ऑफ इंडिया में लाल किला विस्फोट के आरोपी उमर के मोबाइल में बरामद एक वीडियो की खबर है। अखबार ने विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि आत्मघाती हमलों पर इस वीडियो से ब्रेनवाशिंग का पता चलता है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खास खबर, इनामी नक्सली के मारे जाने की खबर के साथ छपी है। इसके अनुसार, खतरनाक लड़ाके ने बागियों के लिए हमलावरों का चुनाव खुद खासतौर से किया। इस तरह, आप देख सकते हैं कि ज्यादातर अखबारों का पहला पन्ना भी अमूमन भर्ती की खबरों से भरा हुआ है और आज की तारीख या आज की खबरों के लिहाज से विशेष खबरें पाठकों को मुहैया कराई गई हो या ऐसा कुछ करने की इच्छा रही हो तो उसका पता खबरों से नहीं चलता है। 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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