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सियासत

फिर चर्चा में हैं संजय जोशी!

भाजपा को एक के बाद एक कई राज्य जिताने वाला ये शख्स क्या अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बन सकता है?

पंकज शुक्ला-

क्या आपको उस शख़्स के बारे में पता है जिसके अथक प्रयासों और कुशल प्रांतीय सांगठनिक नेतृत्व के चलते गुजरात में पहली बार साल 1995 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी? या कि उस शख़्स के बारे में जिसे जब भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय सांगठनिक ज़िम्मेदारी मिली तो भारतीय जनता पार्टी ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश में सरकारें बनाईं?

नाम है, संजय जोशी। पूरा नाम संजय विनायक जोशी। जन्म 6 अप्रैल 1962 को नागपुर में। शुरुआती पढ़ाई लिखाई नागपुर में और नागपुर से ही इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद वह महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में व्याख्याता भी बने। नौकरी ज़्यादा दिनों तक उन्हें रास नहीं आई और वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में पूर्णकालिक प्रचारक बन गए।

संजय जोशी का व्यक्तित्व आकर्षक है। उनकी जानकारी कमाल की है। संगठनात्मक क्षमता उनकी ऐसी है कि उन्हें 1988 में गुजरात भेजा गया, जहां उस समय पार्टी राजनीतिक रूप से कमजोर थी। वे जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ अपने अच्छे संबंधों के लिए जाने जाते हैं। जिन लोगों ने उनका काम उन्नाव के गांवों, कस्बों और शहरों में देखा है, वह इसे जानते हैं।

संजय जोशी ने 1988 से 1995 तक नरेंद्र मोदी के साथ सूबे में बहुत कठिन परिश्रम किया। कहते हैं कि अगर वह ब्राह्मण न होकर किसी पिछड़ी जाति के होते तो गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री वही बनते। ख़ैर, 1995 में पहली बार गुजरात में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई और सूबे की कमान मिली केशुभाई पटेल को। संजय जोशी का कद अब सूबे की राजनीति से बड़ा हो चला था।

उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय संगठन महासचिव बनाकर दिल्ली भेजा गया। 2001 से 2005 तक अपने कार्यकाल में उन्होंने संगठन को इस तरह मजबूती से संचालित किया कि भाजपा हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश, इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रही।

संजय जोशी की लोकप्रियता भारतीय जनता पार्टी में आज भी इस कदर है कि उनका नाम बीते कई महीनों से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चलता रहा है। उनका ब्राह्मण होना और राजहठ, यदि उनके कार्यों की सार्वजनिक प्रशस्ति में बाधा न बना, तो बहुत संभव है कि पार्टी के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष वह ही बनें।

और, अगर ऐसा न हुआ तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नागपुर के इस लाल को पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए अगला चेहरा भी घोषित करने पर विचार मंथन करता रहता है। राजनीति में सब कुछ संभव है और संजय जोशी तो अभी हैं भी सिर्फ़ 63 साल के। जै जै..!


नितिन त्रिपाठी-

वर्ष 2014 – मैं उन्नाव भाजपा जिला उपाध्यक्ष था. दिन था 26 may. मोदी जी प्रधान मंत्री पद की शपथ ले रहे थे. मैं कार्यकर्ताओं के साथ जश्न मनाने के पश्चात वापस आ रहा था. सफीपुर चकलवंशी में एक सख्श दिखा लोकल शॉप में रसगुल्ला खाता हुआ. मुझे लगा ये संजय जी जोशी हैं, वापस गया वही थे. मैंने मजाक में बोला भाई साहब मोदी जी प्रधान मंत्री बन गए आप चकलवंशी के रसगुल्ले खा रहे हैं- मेरा आपसे वादा था कि आप चाय मेरे साथ ही पियेंगे चाय न सही रसगुल्ला सही. संजय जी ने हँस कर गले लगा लिया.

संजय जी कभी मोदी जी के लिए वही थे जो आज अमित शाह के लिए मोदी जी हैं. बीच में ईगो क्लैश कुछ ऐसे हुवे कि संजय जी राजनीति में किनारे हो गए. किनारे हैं, विलुप्त नहीं. कल हो सकता है वो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और परसों प्रधान मंत्री भी. लेकिन आज वह गुमनाम हैं पर वह शिकायत नहीं करते.

पनिशमेंट पोस्टिंग है, आदिवासी इलाके में लगाए जाते हैं भाजपा को नार्थ ईस्ट जिता देते हैं सब जानते समझते हुवे कि इसका क्रेडिट मोदी जी पायेंगे. मोदी जी का क़द अब इतना बड़ा है कि हो सकता है संजय जी गुमनाम ही अंत पायें और हो सकता है प्रधान मंत्री भी बन जायें- दोनों ही सिनेरियो में उन पर फ़र्क़ नहीं पड़ता. न हार में न जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं को सार्थक कर रहे हैं, इस समय लाख परिस्थिति विपरीत है पर फिर भी वह संगठन मजबूत कर रहे हैं. संजय जी भारत में टॉप लेवल पर आते हैं. उनकी शिकायत नहीं कि आज भाजपा का स्वर्णिम काल है, वह गुमनाम जी रहे हैं.

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