सौमित्र रॉय-
ऑस्ट्रेलिया में पर्यावरणविद बेन पैनिंग्स ने अदानी के कारमाइकल कोयला खदान के ख़िलाफ़ कानूनी लड़ाई जीत ली है। पैनिंग्स ने साढ़े 5 साल यह मुकदमा लड़ा।
जीत के बाद उन्होंने कहा, “अदानी ने मेरे खिलाफ 5 अलग-अलग दावे किए और कोर्ट सिस्टम का दुरुपयोग किया। मेरे बच्चों का स्कूल से पीछा कराया गया। मेरे घर पर दो बार छापा मारा गया, लेकिन कोर्ट ने ये कोशिशें रोकीं।”
उनके परिवार में दो बड़ी त्रासदियां हुईं, साथ ही वे दिवालियेपन की कगार पर भी थे।
अदानी ने पैनिंग्स के ऊपर लगभग 10 मिलियन डॉलर की कानूनी कार्रवाई की, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
जब अडानी विदेश में अपने प्रोजेक्ट के लिए इस हद तक गुंडागर्दी कर सकता है तो सोचिए…. खुद के देश में किस हद तक जाता होगा?
कारमाइकल खदान वही प्रोजेक्ट है, जिसके लिए मोदी सत्ता ने अदानी की तरफ़ से सीधे डीलिंग की थी।
अब पैनिंग्स के मुकदमा जीतने से अदानी की खदान खतरे में है।
ऑस्ट्रेलिया में अदानी (Bravus) के खिलाफ चल रहा हाई-प्रोफाइल मुकदमा आखिरकार ऐसे मुकाम पर पहुंचा है जहां कंपनी की छवि धूल-धूसरित हुई है और कंपनी के तौर-तरीकों पर बड़े सवाल उठ खड़े हुए हैं।
पर्यावरणविद बेन पैनिंग्स ने साढ़े पाँच साल की थकाऊ कानूनी लड़ाई के बाद वह जीत हासिल की, जिसके बाद अदानी की बदनाम Carmichael कोल माइन पर दोबारा खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।
अदानी ने 5 दावे ठोके, परिवार का पीछा कराया, घर पर छापे, पर कोर्ट ने रोका
पैनिंग्स ने खुलकर कहा कि: अदानी ने 5 अलग-अलग मुकदमे ठोके, उनके बच्चों तक का स्कूल से पीछा कराया, घर पर दो बार छापा मरवाने की कोशिश हुई, और यह सब कंपनी का नंगा कानूनी दुरुपयोग था। लेकिन अदालत ने कंपनी की कई कोशिशों को “अत्यधिक” माना और रोक लगा दी। क्या यह कॉरपोरेट मुकदमेबाज़ी थी या विरोधियों को चुप कराने की धौंस? सवाल गंभीर है।
10 मिलियन डॉलर की कानूनी मार के बावजूद नहीं झुके पैनिंग्स
अदानी ने पैनिंग्स को लगभग 10 मिलियन डॉलर की कानूनी कार्रवाई में घसीट दिया, इतना भारी दबाव कि वे दिवालियेपन की कगार पर पहुँच गए। इसके बीच उनके परिवार में दो भारी त्रासदियाँ भी आईं। लेकिन पर्यावरणविद झुके नहीं, टूटे नहीं। SLAPP केस (सार्वजनिक विरोध दबाने की रणनीति) का यह सबसे बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
अदानी ने आख़िर में दुम दबाई, करोड़ों की माँग वापस
लंबी लड़ाई के बाद अदानी को अपने बड़े-बड़े दावे वापस लेने पड़े। कंपनी ने आर्थिक मुआवज़े की मांग छोड़ दी। यानी पाँच साल की धमक-धमकी के बाद अदानी ने खुद ही कदम पीछे खींचे।
इसका सीधा मतलब: अदानी की कानूनी रणनीति खुद अदालत में ढह गई। ऑस्ट्रेलिया में ऐसा हाल… तो सोचिए भारत में? जब विदेश में अदानी की हालत यह है कि अदालतें रोक लगा रही हैं, उनकी रणनीतियाँ उजागर हो रही हैं, और विरोध के दमन के आरोप साबित हो रहे हैं, तो बड़ा सवाल उठता है: भारत में जहां सरकारें और सिस्टम अदानी का खुला समर्थन करते दिखते हैं, वहां क्या-क्या होता होगा?
कारमाइकल खदान वही प्रोजेक्ट है जिसके लिए मोदी सरकार पर अदानी की तरफ़ से “सीधी लॉबिंग/हस्तक्षेप” के आरोप समय-समय पर आते रहे हैं।
अब पैनिंग्स की जीत ने ऑस्ट्रेलिया में कंपनी की छवि को बड़ा झटका दिया है और इसका असर भारत की छवि पर भी पड़ रहा है कि कैसे एक भारतीय कॉरपोरेट पर दुनिया आरोपों की नज़र से देख रही है। कॉरपोरेट दबदबे के इस दौर में पैनिंग्स जैसे लोग ही असल “पब्लिक इंटरेस्ट” की लड़ाई लड़ रहे हैं। अदानी जैसे समूह को हर जगह सत्ता की ठसक मिली हुई है, मगर ऑस्ट्रेलियाई अदालतें बता रही हैं कि कानून का असली मतलब क्या होता है और कॉरपोरेट दबाव की औकात क्या।
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