प्रधानमंत्री ने संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन जब ड्रामा और डिलीवरी की बात की तो आज के अखबार दिलचस्प हो गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने एसआईआर के ड्रामे पर एक खबर डिलीवर की है। जाहिर है, एसआईआर का ड्रामा देश भर में चल रहा है और प्रधानमंत्री ने कहा है कि संसद ड्रामे की जगह नहीं है। डिलीवरी उनका काम है यह कभी मुद्दा ही नहीं बना। ऐसे में आज दि एशियन एज की लीड है, “मोदी ने विपक्ष से कहा कि संसद ‘ड्रामा करने की जगह’ नहीं है तो हंगामा मच गया”। द टेलीग्राफ की खबर है, (संसद के शीतकालीन सत्र के) पहले दिन विपक्ष पर ड्रामा करने का प्रहार किया। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, एसआईआर पर हंगामे ने शीतकालीन सत्र की शुरुआत को बाधित किया। जाहिर है, प्रधानमंत्री ने ड्रामा का आरोप नहीं लगाया होता तो एसआईआर पर हंगामे की खबर बड़ी थी और ड्रामा के उनके आरोप को भले अखबारों ने महत्व दिया है प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। उनके प्रशंसकों और प्रचारकों के लिए यह भी उनकी योग्यता ही है जबकि एसआईआर और जनहित का मामला पिट गया। विपक्ष के मुद्दे की तो बात ही नहीं है। भारतीय जनता पार्टी जब एक्स पर अपने आधिकारिक हैंडल से यह कहने और प्रचारित करने की हिमाकत कर सकती है कि, “कांग्रेसी शहजादे के वोट चोरी के झूठ की देश की जनता और पत्रकारों ने खोली पोल”! इस मामले में पत्रकारों के बारे में क्या कहना – पत्रकारों में यू ट्यूब वाले भी हैं और यू-य्टूब से सरकार की परेशानी सबको पता ही है। भाजपा यह प्रचार तब कर रही है जब देश के 272 सम्मानित नागरिकों या प्रचारकों की पोल खुल चुकी है। दूसरी तरफ आज देशबन्धु का शीर्षक है, एसआईआर पर चर्चा को अड़ा विपक्ष। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, एसआईआर के दोनों सदनों में घमसान। उपशीर्षक है, “एसआईआर वापस लो, लोकतंत्र की हत्या बंद करो के नारे लगे”।
स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री के बेसिर-पैर के बयान के कारण खबरों को महत्व कम मिला है और इसमें प्रधानमंत्री के कहे का विरोध शामिल है। खबरों के अनुसार, कांग्रेस ने कहा है कि प्रधानमंत्री संसद शुरू होने से पहले जैसे मीडिया को संबोधित करते हैं, लेकिन खुद सदन में मौजूद नहीं होते हैं और विपक्ष से सीधे संवाद नहीं करते हैं यह सिर्फ दिखावा / पाखंड हैं। द प्रिंट की खबर का शीर्षक है, संसद सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री का बयान सिर्फ पाखंड है: कांग्रेस। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि यह “ड्रामा” है। असली मुद्दों पर बात करने की बजाय, सिर्फ मीडिया-मंच पर चुनावी / सांप्रदायिक रौब दिखाने का प्रयास है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने जिस मीडिया ब्रीफिंग में ड्रामा और डिलीवरी की बात की वह संसद के अंदर होने वाली बहस की जगह नहीं ले सकता। इस प्रकार, अगर सरकार पहले दिन मीडिया को संबोधित करके सार्वजनिक इम्प्रेशन बना लेती है, तो बाद में संसद में जो बहस होती है, वह सिर्फ औपचारिकता हो सकती है। नवोदय टाइम्स ने प्रियंका गांधी का कहा, जनता के मुद्दे उठाना नाटक नहीं के साथ शीर्षक लगाया है, विपक्ष ने दी कड़ी प्रतिक्रिया। दूसरी ओर, सरकार के ‘ड्रामे’ को महत्व मिलता रहता है। उदाहरण के लिए अमर उजाला के साथ द हिन्दू में खबर है, 467 करोड़ के फेमा मामले में केरल के सीएम पिनराई विजयन को ईडी का नोटिस। द हिन्दू का शीर्षक है, केआईआईएफबी मसाला बांड की जांच में ईडी ने केरल के सीएम को नोटिस जारी किया। मामला यह है कि केरल सरकार के इंफ्रास्ट्रकंचर इनवेस्टमेंट फंड बोर्ड ने फेमा के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। जाहिर है, मामला राज्य सरकार द्वारा दूसरे सरकारी नियम के उल्लंघन का है। इसमें राज्य सरकार के प्रमुख से पूछताछ, नोटिस, कार्रवाई की बजाय मिल बैठ कर मामला निपटाए जाने की जरूरत है और निर्वाचित सरकार का सरकार के लिए काम करना किसी सरकारी एजेंसी के लिए जांच का मुद्दा कैसे हो सकता है। अगर ऐसा है तो पुरानी गाड़ियों के संबंध में केंद्र सरकार का फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक दिए जाने के बाद क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए। पर अनिल मसीहों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने का उदाहरण है जबकि शराब नीति बनाने के लिए दिल्ली की केजरीवाल सरकार को परेशान किया जाना सर्वविदित है। इस तरह के मामलों का खुलासा करने का काम अखबारों का है पर वे जो कर रहे हैं उसी को मैं यहां बताता रहता हूं।
गौरतलब है कि मार्च 2025 में, ईडी ने तमिलनाडु सरकार की शराब बेचने वाली कंपनी, तमिलनाडु स्टेट मार्केटिंग कॉरपोरेशन (टीएएसएमएसी) और उससे जुड़ी कई ड्रिंक्स/डिस्टिलरी कंपनियों पर छापा मारा था। आरोप था कि शराब लाइसेंस, टेंडर, सप्लाई आदि में भ्रष्टाचार हुआ है और ₹1,000 करोड़ से ज्यादा का मनी-लाउंड्रिंग स्कैम है। इसके तहत ईडी ने कई स्थानों पर तलाशी, दस्तावेज जब्त, अधिकारियों और निजी कंपनियों के घर/कार्यालयों पर छापा मारा और टीएएसएमएसी के प्रबंध निदेशक को पूछताछ के लिए बुलाया गया। ईडी की इस कार्रवाई को तमिलनाडु सरकार और टीएएसएमएसी ने चुनौती दी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। 22 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ईडी की कार्रवाई पर रोक लगा दी और राज्य सरकार के स्वामित्व वाले टीएएसएमएसी के खिलाफ ईडी की कार्रवाई को “संघीय ढांचे” का उल्लंघन माना था। न्यायालय ने कहा कि “कौन सी धारा है जो एक राज्य-कॉर्पोरेशन को सीधे मनी-लॉन्ड्रिंग अपराधी घोषित करती है?” सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ईडी “सीमाएँ पार कर रहा है” और टीएएसएमएसी के खिलाफ उसकी कार्रवाई “अस्वीकार्य” हो सकती है। ड्रामे और डिलीवरी के इन मामलों के बीच आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड उल्लेखनीय है। कहने की जरूरत नहीं है कि इंडियन एक्सप्रेस ही ऐसी खबर कर पाता है या करता है तथा इस मामले में विकास यही हुआ है कि बोफर्स के मामले में पहले द हिन्दू भी इसका साथ देता था। पता नहीं अब उसे नियंत्रित कर लिया गया है या वह स्वयं ऐसी खबरें नहीं (कम) करता है।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर 24 जून के दो ऑर्डर की कहानी है। इसमें बिहार से शुरू होकर पूरे देश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) की घोषणा की गई थी। खबर के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने ‘आम नागरिकों’ को परेशान करने के खिलाफ लिखित चेतावनी दी थी। अंतिम एसआईआर आदेश में नागरिकता कानून का ज़िक्र हटा दिया गया। इस तरह, 24 जून का ड्राफ्ट ऑर्डर उसी दिन व्हाट्सऐप्प पर मंज़ूर हो गया; नागरिकता वाला वाक्य अचानक खत्म होता है और इसमें पूर्ण विराम नहीं, सेमी कोलन है। इंडियन एक्सप्रेस की यह पड़ताल दामिनी नाथ की है। खबर के अनुसार, दि इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि संधू ने ड्राफ्ट ऑर्डर की फाइल में लिखा था, “इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि असली वोटर/नागरिक, खासकर बूढ़े, बीमार, विकलांग, गरीब और दूसरे कमज़ोर ग्रुप के लोगों को परेशानी महसूस न हो और न ही उन्हें विशेष सुविधा मिले।” साफ़ तौर पर यह उस काम का ज़िक्र था जिसमें सभी मौजूदा वोटर्स को एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरने और कुछ श्रेणी के लोगों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज देने की ज़रूरत बताई गई थी। अखबार ने आज इस खबर के साथ तीन कॉलम की फोटो छापी है। इसका कैप्शन है, सोमवार को कोलकाता म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ़िस में लंबी लाइन लगी थी क्योंकि राज्य में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के लिए लोगों को अपने जन्म प्रमाणपत्र की जरूरत थी। एक्सप्रेस ने अपनी इस पड़ताल के साथ फोटो के नीचे छपी एक खबर का शीर्षक दिया है, चुनाव आयोग की टिप्पणी एक शुरुआती चेतावनी थी, और इसीलिए सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इसके साथ ‘राजनीति’ की भी एक एक खबर है। शीर्षक है, एसआईआर पर शक बेबुनियाद, ईसी ने सर्वोच्च अदालत को बताया। लेकिन मामला यह है कि मेरा नाम वोटर लिस्ट में है। मुझसे अब फिर फॉर्म भर कर देने के लिए कहने का मतलब यही है कि मैं फिर से आवेदन करूं – जबकि इसकी जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। फोटो मुझे अपने पैसे से खर्च करके देना है – यह भी मेरा काम नहीं होना चाहिए और मतदाता सूची बनाने का भाग होना चाहिए पर एसआईआर में चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी मतदाता के सिर डाल दी गई है।
जो हालत और प्रचार है उसमें बिना फोटो कोई आवेदन देगा ही नहीं और फोटो नहीं हो, खिंचवाना संभव नहीं हो, पैसे नहीं हों तो आवेदन रह जाएगा और बीएलओ को कागज नहीं दिए जाएं -तो आपका नाम कटना ही है। इसमें बीएलओ का फॉर्म देने जाना या इंतजार करना और नहीं आए तो परेशान होना शामिल है। अंततः नहीं आए, वोटर इंतजार करता रहे (प्रेरणा प्रोत्साहन न होने के कारण या जागरूक नहीं हो तो भी) तो मतदाता होने से छूट सकता है। यह कोई मतदाता छूटे ना – के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। चुनाव से बहुत पहले, एक दो या तीन महीने चलने वाले एसआईआर के दौरान अगर कोई मतदाता अपने घर पर न हो तो उसका नाम मतदाता सूची से कट जाएगा जबकि चुनाव के समय वह उस क्षेत्र का सामान्य निवासी होने के कारण मतदाता होने के लिए अधिकृत है और दूसरी जगह नाम लिखवाकर मतदान नहीं कर सकता है। यह भी कोई वोटर छूटे ना – के मूल सिद्धांत के खिलाफ है और घुसपैठियों का पता लगाने में किसी भी तरह से सहायक नहीं माना जा सकता है। फिर भी सब चल रहा है। (समाप्त)
पहला हिस्सा पढ़िये – शीतकालीन सत्र की शुरुआत ‘ड्रामा’ और ‘डिलीवरी’ से, हेडलाइन मैनेजमेंट के काम आया!
लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/drama-aur-delivery-se-headline-management/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


