संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत के मौके पर कल ड्रामा जैसी अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा, ‘संसद ड्रामा-नारेबाजी की जगह नहीं है, नीतियां बनाने की जगह है। आज यह ‘खबर’ कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। अमर उजाला के अनुसार, प्रधानमंत्री ने विपक्ष को हार की हताशा से बाहर आने की नसीहत दी और कहा – इसे बौखलाहट का मैदान नहीं बनाएं। लेकिन अखबारों ने यह नहीं बताया है कि मोदी राज्यसभा में खड़गे के बयान के दौरान सदन छोड़कर चले गए। एक यू ट्यूब वीडियो में दावा किया गया है — “Modi Ji Walks Out of Rajya Sabha After Kharge’s Savage Dig on Dhankar”। इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है, Full Drama Explained। मामला यह है कि कल राज्यसभा के नए सभापति का पहला दिन था। प्रधानमंत्री समेत कई नेताओं ने उनका स्वागत किया और अपने स्वागत में मल्लिकार्जुन खरगे ने नए सभापति को जगदीप धनखड़ के हश्र की याद दिलाते हुए कहा कि हम उन्हें ढंग से विदा भी नहीं कर पाए। सोशल मीडिया पर कल इसकी खूब चर्चा थी लेकिन आज मुझे अखबारों में खबर नहीं दिखी। मतलब यह कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष से यह तो कहा कि संसद ड्रामा की जगह नहीं है लेकिन खुद जो किया उसे मीडिया ने खबर भी नहीं माना। उसकी खबर नहीं दिखी। सोशल मीडिया पर नियंत्रण की सरकार की कोशिशों और उसमें मिली या मिल रही कामयाबी का मामला अलग है।
यूट्यूब पर 4पीएम के वीडियो के अनुसार खरगे ने कहा – प्रधानमंत्री बहुत जोरदार तकरीर करके आए हैं …. लेकिन उसका जवाब तो हम मुंहतोड़ यहां देंगे। डीएस4न्यूज में दिखा, खरगे ऐसा क्या बोले कि चलती संसद छोड़ मोदी चलते बने। आमतौर पर यह कहा जाता है और यह माहौल बनाने की कोशिश भी चल रही है कि सोशल-मीडिया या यूट्यूब पर ऐसे वीडियो होते हैं जो “विवाद / वायरल” बनने के लिए एडिटेड होते हैं — ऑडियो-विडियो क्लिप को काटकर, जोड़कर, या फैलाए गए शीर्षक (“Thumbnails”) में असली घटना से अलग दिखाया जाता है। मेरा मानना है कि ऐसा है तो इसपर कार्रवाई होनी चाहिए। पर कार्रवाई की खबर नहीं होती है और सरकार अपनी सुविधा का कानून बनाना चाहती है। वह अलग मामला है लेकिन यह बताना जरूरी है कि इन दिनों पीआईबी फैक्ट चेक के नाम पर तमाम वीडियो को मिसलीडिंग कह दिया जाता है और दिलचस्प यह है कि ऐसा बहुत जल्दी हो जाता है। इसमें यह भी दावा किया जाता है कि वीडियो संपादित है या एआई से बनाया हुआ है या एआई से बदल दिया गया है। तकनीक है तो यह सब संभव है और इसे बताने की सरकारी व्यवस्था है तथा सरकार कानून बनाने के प्रयास में है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मौजूदा “स्व-नियमन” तंत्र पर्याप्त नहीं है। इसलिए एक “स्वतंत्र नियामक संस्था” की ज़रूरत है जो सोशल मीडिया कंटेंट की समीक्षा, मॉनिटरिंग और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई कर सके। मामला यह है कि कन्हैया से संबंधित 2016 के जेएनयू के मामले में कार्रवाई नहीं हुई है और चर्चा है कि वह वीडियो भी संपादित या फर्जी था। अब जब तकनीक है और पीआईबी रोज जांच कर ही रहा है तो उस मामले को भी निपटाया जाना चाहिए। कन्हैया दोषी हैं तो सजा हो, निर्दोष हैं तो मामले को खत्म किया जाए और जिसने यह सब किया उसका खुलासा हो, उसे सजा हो – लेकिन यह सरकार की प्राथमिकता वाला मामला नहीं है। इसपर अलग चर्चा हो सकती है पर हुई नहीं।
इस तरह, स्पष्ट है कि मीडिया की रिपोर्टिंग में भी डिलीवरी नहीं है। जहां है उसे रोकने की कोशिशें हैं और ड्रामा की रिपोर्ट नहीं हो रही है जबकि सीधा प्रसारण में सबने देखा और जो वीडियो यू ट्यूब पर हैं सीधा प्रसारण से ही लिए गए हैं। वैसे भी डिलीवरी विपक्ष को नहीं करना है और सरकार ने क्या डिलीवर किया है वह मीडिया की चिन्ता नहीं है। इसमें दिल्ली के प्रदूषण पर सरकार की कार्रवाई और कल प्रधानमंत्री का यह कहना कि मौसम का मजा लीजिए भी अच्छी खबर डिलीवर कर सकती थी पर वह भी मुझे पहले पन्ने पर तो नहीं दिखा। आइए, देखते हैं कि आज के अखबारों में कौन से ड्रामे की रिपोर्ट है और कितनी डिलीवरी दिखाई देती है। आज की एक बड़ी खबर है, सु्प्रीम कोर्ट ने डिजिटल गिरफ्तारी के मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी। यह खबर अमर उजाला में लीड है। डिजिटल अरेस्ट स्कैम का इतिहास बहुत पुराना नहीं है; विकीपीडिया के अनुसार यह एक “साइबर फ्रॉड” का रूप है जिसमें जालसाज़ खुद को पुलिस, एजेंसी या बैंक अधिकारी बता कर वीडियो कॉल या कॉल पर लोगों को डराते-धमकाते हैं और पैसे वसूलते हैं। तमाम छोटे-बड़े लोग इसके शिकार हो चुके हैं और पुलिस या सरकार इसे रोकने में नाकाम रही है। मामलों की जांच और अपराधियों के पकड़े जाने के भी कोई खास उदाहरण नहीं हैं। धन बैकों से ट्रांसफर होता है पर बरामदगी के मामले बुहत कम हैं और मिलीभगत की आशंका है। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि 2024–2025 में यह फ्रॉड तेजी से बढ़ा है। ऐसे में आज छपी खबर का एक उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई को नोटिस जारी करके पूछा है कि साइबर अपराधियों के बैंक खातों का पता लगाने और फ्रीज करने के लिए एआई का इस्तेमाल क्यों नहीं होता है।
जाहिर है कि अभी तक की जांच में यह सब नहीं किया जाता रहा होगा पर चुनाव आयोग का उदाहरण सामने है। उसपर सुप्रीम कोर्ट और सरकार का रुख हम देख चुके हैं। मोटा-मोटी ड्रामा यह है कि पीआईबी तो एआई का उपयोग करके सरकार का बचाव कर रहा है या उसे इस काम में लगा दिया गया है लेकिन हजारों लोगों से करोड़ों की ठगी रोकने और ठगों को पकड़ने के लिए एआई का इस्तेमाल नहीं किए जाने की आशंका है। चुनाव आयोग के मामले में तो घोषित है कि वह डुप्लीकेशन चेक करने वाले सॉफ्टवेयर का उपयोग नहीं करता है, डिजिटल इंडिया में डिजिटल मतदाता सूची नहीं देता है और डिजिटल डाटा को डिलीट कर देता है। मुख्य चुनाव आयोग बहुचर्चित सवाल सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं, “क्या अपनी माताओं, बहुओं, बेटियों सहित किसी भी मतदाता का सीसीटीवी वीडियो चुनाव आयोग को साझा करना चाहिए?” लेकिन जब बीएलओ मर रहे हैं तो कल चुनाव आयोग ने नाचते हुए बीएलओ और स्वयंसेवकों के वीडियो जारी किए थे। प्रधानमंत्री के कल के ड्रामा वाले बयान के बाद यह सवाल तो उठता ही है कि जब बहुत सारे बीएलओ की तेरहवीं नहीं हुई है, सरकार ने कोई मुआवजा घोषित नहीं किया है तब चुनाव आयोग द्वारा डांस का वीडियो ट्वीट करना ड्रामा है या डिलीवरी? द हिन्दू में भी आज यह खबर लीड है। शीर्षक है, डिजिटल अरेस्ट का घोटाला रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पूरी आजादी दी। द हिन्दू का उपशीर्षक है, अदालत ने सीबीआई को जांच करने का आदेश सीधे दिया है और इसमें राज्य की सहमति नहीं है और इसलिए यह एक असाधारण कदम है। जाहिर है, यह ऐसी डिलीवरी है जो सरकार को करना था नहीं की गई तो सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ा।
सरकारी की डिलीवरी पर आज सुप्रीम कोर्ट का एक और सवाल है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह लीड है। खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और एनसीआर की सरकारों से कहा है कि प्रदूषण रोकने के लिए किए गए उपायों के परिणाम बताएं। प्रधानमंत्री जब विपक्ष पर ड्रामा करने का आरोप लगा रहे थे तब विपक्ष संसद में एसआईआर पर चर्चा करने की मांग कर रहा था। मुद्दा बीएलओ की मौत का ही था और सिस्टम का ड्रामा चल रहा था कि उनके नाचने का वीडियो जारी कर उन्हें तनाव मुक्त दिखाने की कोशिश की गई थी। उसी दिन प्रधानमंत्री ने मौसम का आनंद लेने की सलाह डिलीवर की और सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर की डबल इंजन की सरकार से पूछा कि प्रदूषण रोकने के जो उपाय किए उसका नतीजा दिखाइए। दोनों एक ही दिन होना, संयोग हो या प्रयोग – खबर तो है ही। पर यह सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। इसका जवाब यह दिया जा सकता है (हालांकि देने की हिम्मत किसी की नहीं होगी) कि सरकार ने दिल्ली में पुरानी कारें रोकने का नियम तो बनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया तो प्रदूषण कैसे कम हो। ड्रामा करने वाले लोग ऐसे ही काम करते हैं। सवालों के जवाब ऐसे ही देते हैं। पर मामला सुप्रीम कोर्ट का है इसलिए ऐसा नहीं होने वाला है। फिर भी खबर तो है ही। उसकी डिलीवरी नहीं होती पर सरकार को राहुल गांधी या विपक्ष की चिन्ता है। जहां तक सुप्रीम कोर्ट की बात है, चुनाव आयोग, एसआईआर, वोट चोरी, चुनाव चोरी से संबंधित मांग, आदेश और कानून बनाए जाने के संबंध में जो किया, नहीं किया के बाद अब लगता है प्रदूषण को लेकर गंभीर है। मुझे याद आता है कि मुख्य न्यायाधीश ने खुद ही कहा था कि टहलने निकले तो तबीयत खराब हो गई। इसलिए कार्रवाई तो होनी ही थी। इसका पता हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड के शीर्षक से चलता है, दिल्ली के वायु संकट पर सुप्रीम कोर्ट ने कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) पर दबाव डाला : ‘हम चुप नहीं बैठ सकते’। (जारी)
आगे पढ़िए – सरकारी कंपनी के खिलाफ ईडी की जांच का ड्रामा और बोफर्स जैसी पत्रकारिता का मुद्दा
लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/drama-aur-delivery-se-headline-management/
लेखक, संजय कुमार सिंह से [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है


