संजय कुमार सिंह
आज का यह शीर्षक देशबन्धु के संपादकीय के शीर्षक से शुरू होता है। संसद में जो हो रहा है उस पर देशबन्धु के संपादकीय पन्ने का लेख भी दिलचस्प है। लेकिन अमर उजाला पहले पन्ने की अपनी खबर से यह प्रचार कर रहा है कि, आम आदमी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री सत्येन्द्र जैन समेत 14 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई है। यह मामला 1943 करोड़ के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में टेंडर घोटाले से 17.70 करोड़ की अवैध कमाई का है। ईडी ने यह चार्जशीट पूर्व मंत्री सत्येन्द्र जैन समेत 14 लोगों के खिलाफ पीएमएलए के तहत दाखिल की है। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला राजनीतिक है और अधिकारियों को भी लपेट कर (या ईनाम देकर) उन्हें भी सरकार और विपक्ष के खेमे में बांटा जा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है। स्थिति संसद में खतरनाक खेल तक पहुंच गई है। उसकी चर्चा से पहले यह बताना जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी और दूसरे भाजपा नेताओं की ही तरह चुनाव जीत कर मंत्री बने सत्येन्द्र जैन पर पहले भी आरोप लगे थे, वे जेल रहे लेकिन सीबीआई की जांच के बाद अदालत ने पाया कि “कोई दोष साबित नहीं हुआ”। अदालत ने स्वीकार किया कि “कोई आपराधिक तथ्य स्थापित नहीं हुआ” और कहा कि जो आरोप थे वे “प्रशासनिक निर्णय” से जुड़े थे, न कि “भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश या निजी लाभ” से। दूसरी ओर, यह तथ्य है कि आम आदमी पार्टी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए और दिल्ली में भाजपा भले वोट चोरी से चुनाव जीती हो, प्रचार यही रहा कि पार्टी भ्रष्टाचारी थी जबकि मामला साबित नहीं हुआ। दूसरी ओर, प्रशासनिक निर्णय की बात हो तो इंडिगो और इससे संबंधित विमानन क्षेत्र के तमाम मामले चर्चा में हैं, जनता की परेशानी सर्वविदित है, आर्थिक नुकसान का मामला भी है ही लेकिन जांच कहां हो रही है? सुनवाई कहां है? सरकार 50 साल पुरानी इमरजेंसी को तो अभी भी कोसती है लेकिन मीडिया इस अघोषित इमरजेंसी की चर्चा नहीं करता है। सत्येन्द्र जैन (और तमाम विरोधियों) के खिलाफ मामले पर मामले दायर हो रहे हैं, चुनाव चोरी के आरोपों का जवाब नहीं है, इंडिगो का एकाधिकार सर्वविदित है पर मामला स्वतः संज्ञान का तो छोड़िए, सुनवाई लायक भी नहीं है। सुनवाई हो रही है तो वंदे मातरम पर लेकिन चुनाव जोरी पर नहीं, चुनाव सुधार पर।
इसीलिए इसे संसद में खतरनाक खेल की शुरुआत कहा गया है। आज मेरे सभी अखबारों में यही खबर लीड है। द टेलीग्राफ ने शीर्षक में जरूर कहा है कि मामला असल में नेहरू को बदनाम करने का था (या रहा)। इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में यह भी लिखा है कि विपक्ष ने इसे ध्यान बांटने की कोशिश कहा। द हिन्दू ने लिखा है कि लोकसभा में वंदेमातरम पर सरकार और विपक्ष भिड़े। लेकिन मुद्दा तो यह है कि अभी वंदेमातरम पर चर्चा होनी ही क्यों चाहिए थी। असल में इसके जरिए प्रधानमंत्री ने अपनी राजनीति की है और इसके लिए असत्य का भी उपयोग किया है। संसद में वह सब भी कहा गया और प्रधानमंत्री के कार्यालय के बारे में जो कहा गया उसे रिकार्ड के निकाल दिए जाने की खबर सोशल मीडिया में थी लेकिन अखबारों में नहीं है। आज जब अखबारों की यह हालत है तो देशबन्धु का संपादकीय प्रशंसनीय है। इसमें कहा गया है, “देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खेल को भाजपा अब एक खतरनाक स्तर पर ले आई है। इसे रोकना या इसका हल निकालना आसान नहीं है, क्योंकि अब ध्रुवीकरण हिंदू या मुसलमान बोलकर नहीं हो रहा है, राष्ट्रवाद के नाम पर हो रहा है। इस खेल में इतिहास को बदला जा रहा है, तथ्यों पर झूठ चढ़ाया जा रहा है। खास बात यह है कि यह सब संस्थागत तरीके से हो रहा है। सोमवार को संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर चर्चा करना इसी का प्रमाण है। …एसआईआर के कारण बीएलओ की मौत, इंडिगो संकट के कारण लाखों यात्रियों पर आई मुसीबत, दिल्ली में आतंकी हमला, प्रदूषण, रुपए की गिरती कीमत, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पेंच, महंगाई, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, किसान-मजदूर हित, युवाओं में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति ऐसे ढेरों मुद्दे हैं जिन पर संसद का कीमती वक्त लगना चाहिए था। …देश में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि डेढ़ सौ साल पहले लिखे गीत को लेकर अकारण बहसबाजी की जाए। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी यह दुस्साहस कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें हर हाल में देश को उन ताकतों से मुक्त करना है, जिनके कारण संविधान बना हुआ है। यह संविधान ही है जो देश में तानाशाही कायम नहीं होने देता। लोगों को हिम्मत देता है कि अगर उन्हें सरकार का कोई फैसला पसंद न आए या अपने हित खतरे में पड़ते दिखें तो उसके खिलाफ आवाज़ उठाएं। …. संसद में श्री मोदी के भाषण से यह समझ आ गया कि चर्चा शब्द का मुखौटा लगाकर भाजपा देश को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतों को बढ़ावा दे रही है, ठीक ऐसा ही काम भाजपा के पुरखों यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा ने किया था।”
मुझे लगता है कि यह संपादकीय पहले पन्ने पर विशेष भी हो सकता था। पहले ऐसा होता रहता था, अब नहीं होता है। इसके अलावा संपादकीय पन्ने पर छपे मुख्य लेख का शीर्षक हैं, फिर वे “वंदे मातरम्” के लिए आए! राजेन्द्र शर्मा के इस लेख की शुरुआत इस तरह होती है, “मोदी राज में संसद समेत देश को चलाने वाली सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं की प्राथमिकताओं को जान-बूझकर सिर के बल खड़ा कर दिया गया है। इसके लिए अगर अब भी किसी प्रमाण की आवश्यकता थी, तो वह भी संसद के चालू सत्र में आंखों में चुभने वाले तरीके से सामने आ चुका है। पहले ही कतर कर बहुत छोटे कर दिए गए शीतकालीन सत्र में पहली ही विस्तृत बहस “वंदे मातरम्” पर हो रही है। यह तब है जबकि देश का मीडिया अधिकांशतः शासन द्वारा गोद लिए जाने के बावजूद, उसकी सुर्खियों में कम से कम तीन मुद्दों को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। इनमें पहला मुद्दा देश के बड़े हिस्से में जारी मतदाता सूचियों के गहन विशेष पुनरीक्षण से मचे हाहाकार का ही है। इसमें एक ओर करोड़ों लोगों को एक बार फिर नोटबंदी की तरह अनावश्यक परेशानियों में धकेले जाने का तथ्य है, तो दूसरी ओर अविवेकपूर्ण डेडलाइनों के चलते इस काम के बोझ के तले तीन दर्जन से ज्यादा बूथ लेवल आफिसरों की आत्महत्या से लेकर अकाल मौतों तक की सचाई है। दूसरा, करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाला ऐसा ही महत्वपूर्ण मुद्दा, राजधानी समेत देश के बड़े हिस्से में और विशेष रूप से उत्तरी भारत में प्रदूषण के घातक रूप लेने से पैदा हुई स्वास्थ्य इमर्जेंसी का है। तीसरा, इंडिगो द्वारा खड़े किए गए संकट के फूट पड़ने से पैदा हुए, देश भर में विमान यात्रियों के अभूतपूर्व संकट का है। लेकिन इन तीनों संकटों पर चर्चा की मांगों को पीछे कर सबसे पहले और सबसे आगे, “वंदे मातरम्” पर समारोही बहस करायी जा रही है।” बात सिर्फ बहस की नहीं है विपक्ष के खिलाफ ईडी-सीबीआई के दुरुपयोग और सरकार की मनमानी पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हो पाने की भी है।

आज मेरे बाकी सभी अखबारों की लीड का शीर्षक प्रधानमंत्री का आरोप है। मैं उसकी चर्चा नहीं करूंगा। मैं यह बताउंगा कि विपक्ष की कौन सी बातें हाइलाइट की गई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड के साथ एक खबर का शीर्षक है, विपक्ष ने कहा, (वंदे मातरम् पर) चर्चा एक भटकाव, समय बंगाल चुनाव के लिहाज से। टीओआई ने प्रियंका गांधी के कहे को हाईलाइट किया है जो वाकई महत्वपूर्ण और जरूरी है। लेकिन इससे मोदी की राजनीति (असल में कुर्सी पर बने रहने) का आधार ही खिसक जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे दो कॉलम में छापा है और ज्यादातर बातें शीर्षक में हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है लेकिन विपक्ष को समान महत्व देती लगती है। चार कॉलम की लीड के साथ विपक्ष का आरोप तीन कॉलम में छपा है और शीर्षक है, इस चर्चा का मकसद पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले ध्यान बांटना है। द हिन्दू ने नरेन्द्र मोदी के कहे का वह अंश हाईलाइट किया है जिसमें वे चर्चा की जरूरत या कारण या समय को उचित बता रहे हैं। साथ में प्रियंका गांधी के कथन का वह हिस्सा है जिसमें उन्होंने इस चर्चा को विचित्र कहा है और पूछा है, इस चर्चा की जरूरत क्या है? दोनों अंश इस प्रकार हैं। नरेन्द्र मोदी ने कहा है, “जब इस गीतके 50 साल हुए, तब भी हम ब्रिटिश राज में थे, और इसकी सौवीं सालगिरह पर, हम इमरजेंसी में थे जब कुछ ताकतें भारत में संवैधानिक राज को खत्म करने की कोशिश कर रही थीं। इसकी 150वीं सालगिरह पर, हमारी आज़ादी में वंदे मातरम के रोल को मानने का समय आ गया है।” प्रियंका गांधी ने कहा है, “जब हम वंदे मातरम का ज़िक्र करते हैं, तो यह हमें हमारे आज़ादी की लड़ाई के इतिहास की याद दिलाता है। यह बहस अजीब है; इस गाने ने लोगों के दिलों में जगह बना ली है; तो बहस की क्या ज़रूरत है?” मुद्दा यह है और होना चाहिए कि अघोषित इमरजेंसी के कारण तमाम मुद्दों पर चर्चा नहीं हो रही है और इसमें चुनाव आयोग पर सरकारी नियंत्रण शामिल है। सुप्रीम कोर्ट के बारे में ऐसा ही कहने पर सत्तारूढ़ पक्ष ने गौरव गोगोई की आलोचना की। तथ्य यह है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री दीवाली पर दिल्ली में आतिशबाजी के मामले में ऐसा दावा कर चुकी हैं और दुनिया ने देखा है कि भाजपा के नेताओं ने प्रतिबंध का पालन नहीं किया और जब हरित पटाखों की अनुमत थी तो क्या हुआ। इस आशय की खबर भी छप चुकी है।
ऐसी हालत में दि एशियन एज की खबर का शीर्षक ऐसा है जैसे मोदी ने हाल में सत्ता संभाली हो और जैसा उन्होंने कहा है, 150वीं सालगिरह पर चर्चा जरूरी थी, वह कल हुई और उसमें मोदी ने अपने पूर्ववर्ती नेहरू और कांग्रेस पर निशाना साधा हो। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले में प्रियंका गांधी ने बहुत मार्के की बात कही है और भले ही उन्होंने 11 साल से ज्यादा से हर बात के लिए और हर मौके पर नेहरू को कोसने के कारण कहा हो लेकिन अब जो स्थिति है उसमें ऐसा होना ही चाहिए। सत्य हिन्दी ने लिखा है, पीएम मोदी द्वारा नेहरू की लगातार आलोचना करते रहने पर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने पीएम मोदी को दो टूक कहा है कि एक-एक कर उनकी ‘ग़लतियाँ’ गिनाने की बजाए एक बार में ही सब पर बहस कर हमेशा के लिए इसको ख़त्म करें। प्रियंका ने पीएम मोदी को संबोधित करते हुए कहा, ‘नेहरू जी से जितनी भी शिकायतें हैं, जितनी भी गलतियां हैं, उन्हें जितना भी बुरा-भला कहना है, उसकी भी एक सूची बना लीजिए। 999 अपमान, 9999 अपमान- इसकी सूची बना दीजिए। फिर एक समय निर्धारित करिए- 10 घंटे, 20 घंटे, 40 घंटे- हम बहस कर लेंगे।’ उन्होंने अंग्रेज़ी के एक कथन का ज़िक्र करते हुए कहा कि ‘चलिए, इस मुद्दे को हमेशा के लिए ख़त्म करते हैं और फिर बेरोजगारी, महंगाई, महिलाओं की समस्याएँ… पीएमओ के अंदर बेटिंग ऐप, एप्स्टीन फाइल्स में मंत्रियों के नाम, इस पर भी चर्चा होनी चाहिए।’ कहने की जरूरत नहीं है कि आज यह मेरे कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। इस चर्चा और इसकी खबर के बहाने नरेन्द्र मोदी ने जो कहा और आज अखबारों में जो छपा है उसका उदाहरण नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, वंदे मातरम् के बंटवारे पर झुकी कांग्रेस। कांग्रेस और नेहरू की आलोचना को प्रचार देने में अमर उजाला और आगे है, “वंदे मातरम के टुकड़े करने के लिए दबाव में झुकी कांग्रेस, देश के बंटवारे पर भी झुकना पड़ा : मोदी”। कहने की जरूरत नहीं है कि इस खबर का संतुलित शीर्षक हो सकता था और आज कुछ अखबारों में है। संभव है, विचारधारा से तपे झुलसे लोगों को समझ न आए इसलिए बता देता हूं, संसद में वंदे मातरम् पर सरकार-विपक्ष आमने-सामने (देशबन्धु)।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


