संजय कुमार सिंह
देश में 2025 का क्रिसमस वर्षों याद रखा जाएगा। क्रिसमस आयोजन के दौरान तोड़फोड़, मनमानी और बदसलूकी को देखने तथा झेलने वाले बच्चे सरकारी असुरक्षा के कारण डरते हुए बड़े होंगे। जाहिर है उनमें सिर्फ क्रिश्चन नहीं होंगे और ये सब देश के भावी नागरिक होंगे। जो सांप्रदायिक भेदभाव के खिलाफ किसी कार्रवाई की उम्मीद में बड़े होंगे। यह सब देश की मौजूदा राजनीति के कारण होगा और सामान्य नहीं है। इसके अलावा कल क्रिसमस था और आज ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। अमर उजाला में क्रिसमस पर कुछ नहीं है, नवोदय टाइम्स में प्रधानमंत्री के चर्च जाने की फोटो है जबकि देशबन्धु में राजधानी के एक चर्च और उसकी सजावट की तस्वीर है। जनसत्ता में प्रधानमंत्री की चर्च वाली फोटो है। कैप्शन है, … नई दिल्ली के कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्पशन में क्रिसमस की सुबह प्रार्थना सभा में। दैनिक हिन्दुस्तान में क्रिसमस पर कोई खबर नहीं है। दोनों अखबारों की लीड और सेकेंड लीड मेरे बाकी अखबारों से अलग है। जनसत्ता की लीड का शीर्षक है, बांग्लादेश में सप्ताह भर के भीतर एक और हिन्दू युवक की पीट-पीट कर हत्या। हिन्दुस्तान में लगभग यही शीर्षक सेकेंड लीड है। पहले लाल स्याही से क्रूरता भी लिख दिया गया है। लेकिन सवाल है कि भारत में क्रिसमस पर हुड़दंग होगा, ईसाइयों से दुर्व्यवहार किया जाए और यह खबर नहीं है तो बांग्लादेश में हिन्दू को मारा जाना लीड और सेकेंड लीड क्यों है। मुझे तो लगता है कि कल क्रिसमस पर देश भर में जो हुआ वह नरेन्द्र मोदी, भाजपा और संघ परिवार की राजनीति का विस्तार या विकास है और खबर तो है ही। तोड़फोड़ और मनमानी को मुख्य धारा का मीडिया नहीं छापेगा तो बात दब नहीं जाएगी और वीडियो तो कल ही घूम रहा था। सरकार का प्रचार और छवि बनाना एक काम है लेकिन खबरों के मामले में निष्पक्ष होना बिल्कुल अलग है। मुसलमानों से संघ और सरकार का बैर पुराना है। अब अगर वह बढ़ रहा है और इसाइयों की तरफ जा रहा है तो निश्चित रूप से खबर है और यह याद करने की बात है कि उड़ीशा के क्योंझर में 22 जनवरी 1999 की रात ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्रहम स्टेंस और उनके दो छोटे बेटों फिलिप (10 वर्ष) और टिमोथी (6 वर्ष) को जिंदा जला दिया गया था।
यह भारत में धार्मिक हिंसा के खिलाफ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मामला माना जाता है। दुनिया भर में इसकी चर्चा और आलोचना हुई थी। भारत में ऐसी घटनाओं का जवाब या इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे देशों में भी ऐसा ही होने लगे तो विश्व व्यवस्था या वसुधैव कुटुम्बकम का क्या होगा। तथ्य यह है कि भारत ने बांग्लादेश की शेख हसीना को शरण दे रखी है और हिन्दुओं की रक्षा के लिए भारत में सरकार बनाने वाली भाजपा के सत्ता में रहते बांग्लादेश में हिन्दुओं को मार दिया जा रहा है। सरकार बयान से ज्यादा कुछ कर नहीं रही है। देश की राजधानी में तीन महिलाओं को अदालत के आदेश का विरोध करने से रोक दिया जाता है बांग्लादेश उच्चायोग पर अच्छा-खासा प्रदर्शन आयोजित होता है, उसकी खबर भी छपती है। सवाल है कि जो राजनीति के कारण हो रहा है उसे तो समझा जा सकता है लेकिन अगर उसकी खबर नहीं छपेगी तो यह माना जा सकेगा कि समाज ऐसा कर रहा है और इसका खामियाजा पूरे समाज को भोगना पड़ सकता है। इसमें वे भी शामिल हैं जो भारतीय हैं लेकिन विदेशों में रहते हैं। मीडिया राजनीति की ठीक रिपोर्टिंग करके दुनिया को बता सकता है कि आम समाज यह राजनीति नहीं कर रहा है। यह मीडिया का काम भी है। गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी पहली बार क्रिसमस पर चर्च गए थे और लगभग पहली बार क्रिसमस आयोजन का ऐसा विरोध हुआ है। बचाव में यह भी कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में कल बंद था और विरोध बंद समर्थकों ने किया है। जो भी हो, क्रिसमस के दिन बंद की अपील और क्रिसमस आयोजन का विरोध अगर हुआ है तो खबर है। इसके लिए सरकार का विरोध किया जा रहा है तो विरोधियों को नियंत्रित करना, आयोजकों को सुरक्षा देना (या आयोजन से रोकना) सरकार का काम था और चूंकि डबल इंजन की सरकार है इसलिए दोष सरकार को ही दिया जाएगा।
तथ्य यह है कि हिन्दू-मुसलमान की राजनीति करने वाले नरेन्द्र मोदी क्रिसमस पर पहली बार किसी चर्च में गए थे। 2024 में उन्होंने चर्च-सम्बंधित कार्यक्रमों में भाग लिया था। 2023 में प्रधानमंत्री ने अपने आवास पर क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि उनके और ईसाई समुदाय के बीच पुराने, गर्मजोशी भरे सम्बंध हैं, जो उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दिनों से चले आ रहे हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री इसाइयों से संबंध बढ़ा रहे हैं दूसरी तरफ उनके समर्थक क्रिसमस का विरोध कर रहे हैं। अगर ये उनके और सरकार के समर्थक नहीं हैं तो भी तथ्य है कि इन्हें रोका नहीं जा रहा है और इनके खिलाफ कार्रवाई की खबर नहीं है। एआई के अनुसार 2007 में उड़ीसा के कंधमाल जिले में क्रिसमस के आसपास हिंसा हुई थी। इसमें चर्चों और ईसाई समुदाय पर हमला, तोड़-फोड़ और आगजनी जैसी स्थितियाँ सामने आई थीं। यह धार्मिक तनाव का एक बड़ा उदाहरण है और सांप्रदायिक हिंसा थी। तथ्य है कि 2007 दिसंबर में भाजपा उड़ीसा में सत्ता में नहीं थी और चुनाव 2009 के अप्रैल में हुए थे। माना जा सकता है कि भाजपा की चुनावी तैयारी शुरू हो चुकी थी। 2024 में भी इसी तरह का एक मामला रिपोर्ट हुआ था। हरियाणा के रोहतक में विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने एक क्रिसमस कार्यक्रम में अड़चन डाली थी और मंच पर हनुमान चालीसा पढ़ी गई थी। तब भी इसाइयों पर “धर्मांतरण” का आरोप लगाया गया था। 2024 दिसंबर में हरियाणा में भाजपा की सरकार थी। और लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव भी हो चुके थे। ऐसे में मीडिया का काम था कि वह प्रधानमंत्री के चर्च जाने की राजनीति को समझने समझाने की कोशिश करता। आज मेरे नौ अखबारों में सिर्फ द टेलीग्राफ ने यह काम किया है या करता दिख रहा है।
द टेलीग्राफ की आज की खबर का फ्लैग शीर्षक है, केरल चुनावों से पहले पीएम की पहली सर्विस। मुख्य शीर्षक है, क्रिसमस पर चर्च चले गए, हमलों पर चुप्पी साधे रहे। नई दिल्ली डेटलाइन से जेपी यादव ने लिखा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को अपनी पहली क्रिसमस सर्विस में हिस्सा लिया। अगले साल होने वाले केरल चुनावों से पहले ईसाइयों से संपर्क साधा। यह ऐसे समय हुआ जब देश के कई हिस्सों में क्रिसमस समारोहों पर हिंदू-हिंदुत्व समूहों के लगातार हमले हो रहे थे। मोदी ने एक्स पर पोस्ट किया, “दिल्ली के कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेम्पशन में क्रिसमस की सुबह की सर्विस में शामिल हुआ। सर्विस में प्यार, शांति और करुणा के शाश्वत संदेश को दर्शाया गया। क्रिसमस की भावना समाज में शांति और सद्भावना लाए। सर्विस में प्रार्थनाएं, विशेष कैरोल, भजन और प्रधानमंत्री के लिए एक विशेष प्रार्थना शामिल थी। इसे रेवरेंड पॉल स्वरूप ने किया।” इसके साथ दिल्ली के एक औपनिवेशिक चर्च में हुए कार्यक्रम की तस्वीरें भी थीं। मोदी ने एक वीडियो भी पोस्ट किया जिसमें वह कैरोल की धुन पर अपनी उंगलियां थपथपाते हुए दिख रहे थे। प्रधानमंत्री जब हाथ जोड़कर खड़े थे तब यह प्रार्थना की गई, “आज सुबह हम विशेष रूप से हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के लिए प्रार्थना करते हैं कि आप अपनी पवित्र भावना से उनका फिर से अभिषेक करें।” प्रार्थना की शुरुआती पंक्तियाँ थीं, “हे प्रभु, उन्हें शक्ति दें। हे परमपिता, हम जानते हैं कि जिसे आप अपना कहते हैं, उसे आप सक्षम भी बनाते हैं और हम जानते हैं कि आपने उन्हें हमारे महान राष्ट्र का नेतृत्व करने के इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बुलाया है,” प्रार्थना जारी रही। “इसलिए, मैं आपकी बुद्धि, समझ और विवेक के दोगुने हिस्से के लिए प्रार्थना करता हूं, ताकि वह इस राष्ट्र को सच्चाई, न्याय और धार्मिकता के मार्ग पर ले जा सकें, और आप उन्हें आशीर्वाद दें। आमीन।” मोदी का यह कदम हिंदुत्व समूहों द्वारा क्रिसमस समारोहों पर हमलों की पृष्ठभूमि में आया, एक ऐसा चलन जिस पर प्रधानमंत्री ने अब तक चुप्पी साध रखी है। यह उनकी आदत भी है। बीजेपी शासित मध्य प्रदेश के जबलपुर में, 20 और 22 दिसंबर को ईसाई प्रार्थना सभाओं पर दो हमले हुए। पहली घटना में, बीजेपी की जिला उपाध्यक्ष अंजू भार्गव ने कथित तौर पर अलग-अलग हिंदुत्ववादी समूहों के सदस्यों और कुछ नेत्रहीन लोगों के साथ मिलकर कार्यक्रम पर हमला किया। मुझे लगता है कि खबर ऐसी ही होनी चाहिए और उसमें तमाम पहलू शामिल होने चाहिए।
ईसाइयों के सबसे महत्वपूर्ण पर्व पर हमले और मनमानी की खबरों के बीच प्रधानमंत्री की चुप्पी ही मुद्दा नहीं है। प्रचारकों ने उनके कहे को भी आज भरपूर प्रचार दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा और आज लीड का शीर्षक है, भाजपा शासन में ही विकास और दलितों का हुआ सम्मान। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, लखनऊ में मोदी ने राष्ट्र प्रेरणा स्थल का उद्घाटन किया, बोले – आज हर विभूति को मिल रहा सम्मान। यह दिलचस्प है कि आम आदमी जब नौकरी, शिक्षा और इलाज के साथ सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए परेशान है तब सरकार विभूतियों को सम्मान दे रही है और उसका प्रचार, दावा व दिखावा कर रही है। अमर उजाला में छपा दावा या शीर्षक और भी विचित्र है। “हमारी सरकार ने गिराई 370 की दीवार प्रणब-मुलायम को दिया सम्मान।” आपके शासन में जब आम आदमी, मुसलमान और ईसाई जब त्रस्त हैं तब आप पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुलायम सिंह (दोनों अब दिवंगत) को सम्मान देने की बात कर रहे हैं। तथ्य यह है कि 370 हटाने से कोई लाभ नहीं हुआ। भाजपा को भी नहीं हुआ है और उस समय राज्य को दो हिस्से में बांटने और राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बना देने का विरोध अभी भी चल रहा है। सरकार इसपर अपेक्षित कार्रवाई नहीं कर रही है। जहां तक हर विभूति के सम्मान की बात है, कर्पूरी ठाकुर को उनके निधन के 36 साल बाद भारत रत्न मिला जबकि लाल कृष्ण आडवाणी को 2014 में मार्ग दर्शक मंडल में भेजे जाने के बाद उनके जीवित रहते हुए 2024 में यानी दस साल बाद सम्मान मिला। इस तरह के सम्मान का कोई मानक समय नहीं है। आप अपनी पीठ खुद थपथपा ही सकते हैं। यह खबर नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने चर्च में नरेन्द्र मोदी की फोटो तीन कॉलम में लगाई है जबकि टेलीग्राफ ने इसे सिंगल कॉलम में निपटा दिया है। इसके साथ तीन कॉलम में मोदी के कहे का प्रचार भी है। क्रिसमस पर बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद वालों ने असम में जो किया वह भी अखबार में पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। चार लाइन का शीर्षक है और दो लाइन के उपशीर्षक से बताया गया है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत राज्यों में हुई बाधाओं की श्रृंखला में यह नवीनतम है। इसके साथ यह भी बताया गया है कि अंदर संपादकीय का शीर्षक है, गुंड़े क्रिसमस की खुशी और उल्लास को हाईजैक नहीं कर सकते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री के चर्च जाने, प्रार्थना और संदेश की खबर लीड है। इसके साथ सिंगल कॉलम में क्रिसमस पर देशभर में तोड़फोड़ की खबर भी है। हाथ जोड़े प्रधानमंत्री की तस्वीर यहां दो कॉलम में है। इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) नेता तारिक रहमान के वापस पहुंचने की खबर को लीड बनाया है। नरेन्द्र मोदी ने जो कहा उसका सबसे अच्छा प्रचार दि एशियन एज ने किया है और एक फ्लैग शीर्षक है, वंशवादी राजनीति की आलोचना। मुख्य शीर्षक में 370 हटाने का दावा तो है ही कांग्रेस पर यह आरोप भी है कि उसने भारत के तमाम हीरो की विरासतों को मटियामेट कर दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा कहने की हिमाकत वे तब कर रहे हैं जब अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए सरकारी खर्च पर विदेश भेजने का मामला सब जानते हैं और सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर गुजरात के सरदार पटेल स्टेडियम का नाम नरेन्द्र मोदी स्टेडियम 2021 में किया गया है। कांग्रेस पर पटेल की उपेक्षा का आरोप मोदी लगाते थे और बाद में यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस के समय तेरा मेरा जैसा नहीं था और अब मोदी जी उसी की राजनीति करते हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


