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सियासत

US सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रंप टैरिफ ध्वस्त, असर अमेरिका पर ज्यादा या भारत पर?

सुभाष सिंह सुमन-

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से किसका ‘सी फॉर कार्बन’ कटा? ट्रंप चचा का या मोदीजी का? ट्रंप चचा का तो कटा है, यह दिख रहा है। मोदीजी का और मोदीजी के चक्कर में जो भारत का कटा है, वह दिख नहीं रहा है। लेकिन थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो दिखेगा कि हमारा कार्बन तो ट्रंप चचा से भी ज्यादा कट गया है।

पहले इस फैसले का मतलब समझते हैं। यूएस सुप्रीम कोर्ट का कहना है- ट्रंप ने राष्ट्रीय आपातकाल वाले जिस दशकों पुराने कानून ‘IEEPA’ का इस्तेमाल कर टैरिफ लगाये, वे वैध नहीं हैं। अब ट्रंप ने ज्यादातर टैरिफ लगाये ही इसी कानून का इस्तेमाल कर। जो रेसिप्रोकल टैरिफ है, वो भी इसी काननू से लगा है। वही रेसिप्रोकल टैरिफ, जिसे भारत के साथ डील में 25% से घटाकर 18% करने का वादा किया गया है। अब पूरा टैरिफ ही गैरकानूनी हो गया है। इस फैसले के दायरे से बाहर जो टैरिफ हैं, वो मामूली हैं। जैसे- स्टील, एल्यूमिनियम वगैरह पर लगे टैरिफ।

पिछले साल जब ट्रंप ने भारत पर पहले 25% रेसिप्रोकल टैरिफ और बाद में रूसी तेल के लिए एक्सट्रा 25% टैरिफ लगाया, उससे पहले भारतीय सामानों पर अमेरिका में औसत टैरिफ था 3% के आसपास। मतलब अभी से 6 महीने पहले तक भारत पर इतना ही औसत टैरिफ लग रहा था। अब हमने जिसका दिवाली जैसा जश्न मनाया, उसमें टैरिफ कम होकर आया 18% पर। यह किसी कोण से जश्न मनाने जैसा नहीं था।

अब मजेदार चीज, जो मैं बार-बार लिखते आ रहा हूँ। और मैं ही नहीं, कई नामधारी लोग ऐसा लिख-बोल रहे थे, कि ट्रंप स्थाई नहीं है, कि ट्रंप मतलब अमेरिका नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आता, तब भी ट्रंप को जाना था और साथ में ट्रंप टैरिफ को भी। हो सकता है यह इस साल मिडटर्म इलेक्शन के बाद जाता, नहीं तो 2029 शुरू होते ही 100%। वहाँ तक धैर्य धरने की जरूरत थी। विकल्प हम खोल ही रहे थे। अभी पिछले महीने यूरोप से इतनी अच्छी डील किये। उससे पहले न्यूजीलैंड के साथ किये। ब्रिटेन के साथ किये। जीसीसी के साथ करने वाले थे। लेकिन नहीं। हमें तो दिवाली मनाना था।

मोदीजी पिछले साल फरवरी में जब अमेरिका गये थे, उस समय से बार-बार लिख रहा हूँ कि हमारी सरकार का निहुरते जाना मेरी समझ में नहीं आ रहा है। अभी भी नहीं आ रहा। ट्रंप का उतावलापन समझ सकते हैं। एक तो सनक, ऊपर से अंदेशा कि टैरिफ टिकने वाला नहीं है। हमारे वाले क्यों उतावले हुए, समझ से परे है।

बहरहाल, जबरदस्त तरीके से कार्बन कटने की बधाई मोदीजी को। मोदीजी की भक्त-मंडली को आज कुछ नहीं कहूँगा। जो निहुरने पर लहालोट होते रहे, उन्हें कोई क्या खाकर अमरीक्की कोर्ट का फैसला समझा पायेगा! 

जिस डील की दिवाली मनी, वो डील अभी हुई नहीं है। अभी अंतरिम डील की बात बनी है। अंतरिम डील भी अभी नहीं हुई है। सोमवार को हमारे कॉमर्स सेक्रेटरी बोल रहे थे कि इस सप्ताह से अंतरिम डील लागू हो जायेगी। फिर आज मंत्रीजी दिन में बोले- अंतरिम डील अप्रैल से लागू हो सकती है। शाम होते-होते अमरीक्का से संदेश आया- हैप्पी वन अप्रैल।

(डिस्क्लेमर देना भूल गया था। सी फॉर कार्बन सिर्फ कैमिस्ट्री में होता है। हिन्दी में वही पढ़ना है, जो वास्तव में होता है।)


एक होता है Rule Based Order, जिसके बाद आता है Order Based Approach. यह पश्चिम की दी गयी अवधारणा है। पिछली सदी में बैक-टू-बैक दो वर्ल्डवॉर में मरने-कटने के बाद पश्चिम में इस अवधारणा ने जोर पकड़ा। इसके प्रवर्तन में यूरोप से ज्यादा अमेरिका की ही भूमिका रही। यही अवधारणा संयुक्त राष्ट्र से लेकर वर्ल्डबैंक, आईएमएफ, डब्ल्यूएचओ वगैरह का आधार बनी। लेकिन ट्रंप चचा इस अवधारणा की बत्ती बनाकर रख दिये हैं। पिछले कार्यकाल में तो चचा कुछ हद में थे, इस बार बेहद और बेलगाम हुए पड़े हैं। ट्रंप चचा अराजकता के उदाहरण से आगे बढ़कर परिभाषा बन गये हैं। समय आ गया है कि शब्दकोश वाली संस्थाएँ कैओस के समानार्थी शब्दों में एक शब्द ‘ट्रंप’ भी जोड़ दें।

पर ये सब अपना काम नहीं है। अपना काम है चचा के फैलाये रायते को समझना। अच्छा। आगे बढ़ने से पहले एक जरूरी बात। आज हम बहुत सारी उलझाऊ चीजें सरल तरीके से समझेंगे। ट्रंप टैरिफ, ट्रेड डील, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला, चचा का नया टैरिफ सब समझेंगे। लेकिन मुझे एक चीज समझने में मदद आपलोग करिये। अपनी उलझन सबसे अंत में लिख देंगे हम डिस्क्लेमर से पहले। तो हमारी घड़ी के हिसाब से भर रात जो तमाशा चला, उस से शुरू करते हैं।

1:- अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है?
ट्रंप ने पिछले साल कई तरह के टैरिफ लगाये। सबसे पहले रेसिप्रोकल टैरिफ। फिर स्टील-एल्यूमिनियम टैरिफ। फिर टॉप-अप टैरिफ। इनमें जो रेसिप्रोकल टैरिफ लगे, उनके लिए ट्रंप ने एक विशेष कानून का सहारा लिया। अमेरिकी कानून में राष्ट्रपति को एक अधिकार दिया गया, जिसे संक्षेप में कहते हैं- आईईईपीए। यह व्यवस्था दुश्मन देशों को दंडित करने के लिए है। कोई देश अमेरिका के हिसाब से नहीं चले। उसको किसी बात पर ब्लैकमेल करना है। अब इसके लिए संसद (अमेरिका में कांग्रेस) से मंजूरी लेने जायेंगे, तो समय लगेगा। लॉबिंग से दूसरा देश सांसदों के वोट को प्रभावित भी कर सकता है। तो राष्ट्रपति को मिला विशेषाधिकार। लेकिन इस विशेषाधिकार में व्यापार पर शुल्क लगाने की सुविधा नहीं है। सैंक्शन (प्रतिबंध) लगा सकते हैं, टैरिफ (शुल्क) नहीं। चचा ने इसी काननू से टैरिफ लगाये। रेसिप्रोकल भी और टॉप-अप भी। टॉप-अप, जैसे भारत पर रूसी तेल के कारण 25% टॉप-अप लगा था। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि भैया जब इस कानून में टैरिफ की व्यवस्था ही नहीं है, तो टैरिफ कैसे लगा दिये, ये तो अवैध हो गया। मतलब ट्रंप के ये वाले टैरिफ अवैध घोषित हो गये।

2:- तो क्या सारे पुराने टैरिफ हट गये हैं?
नहीं। टैरिफ ट्रंप से पुरानी चीज है। पहले इसके लिए अलग व्यवस्था थी। कुछ देशों को तरजीही दर्जा दिया जाता था। अंग्रेजी में बोले तो मोस्ट फेवर्ड नेशन या एमएफएन। इसमें उन देशों को रखा जाता था, जिन्हें रियायत देना होता था। जैसे भारत को भी एमएफएन में रखा गया था और औसत टैरिफ था 3%। तो इस वाले टैरिफ पर कोई असर नहीं पड़ना। फिर ट्रंप ने जो टैरिफ लगाये, उसमें कुछ आईईईपीए से बाहर के थे। जैसे- स्टील-एल्यूमिनियम। ये टैरिफ लगाये गये सेक्शन 232 वाले कानून का इस्तेमाल करके। ये भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बाहर हैं। मतलब ये वाले टैरिफ भी रहेंगे।

3:- ट्रंप ने रात में जो नया टैरिफ लगाया, वो क्या है?
ट्रंप चचा का कहना है- मेरे मन को भाया, मैंने कुत्ता काटकर खाया। उनके शब्दों में- आय कैन डू एनीथिंग आय वान्ट। फिर चचा ने कोर्ट को गरियाया। टैरिफ अवैध बताने वाले फैसले पर 6 बनाम 3 का वोट हुआ। चचा ने टैरिफ के खिलाफ वोट देने वाले 6 जजों को मूर्ख बताया, बाकी 3 की तारीफ की। फिर बोले- लगान तो तुम्हारा भाई वसूल कर रहेगा। कुछ ही देर में चचा ने नया आदेश हस्ताक्षर कर जारी कर दिया। इसमें सभी देशों पर 10% टैरिफ लगाया गया है।

4:- नया टैरिफ कब से लगेगा, कब तक लगेगा?
यह टैरिफ लगा है सेक्शन 122 वाले कानून का इस्तेमाल करते हुए। यह कानून चालू खाता घाटा संतुलित करने के लिए राष्ट्रपति को कुछ समय तक, कुछ टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। राष्ट्रपति इसमें अधिकतम 150 दिनों के लिए 15% टैरिफ लगा सकता है। चचा ने 150 दिनों के लिए फिलहाल 10% टैरिफ लगाया है। यह लागू होगा मंगलवार रात से। 150 दिन से आगे के लिए इसे अमेरिकी संसद की मंजूरी चाहिए होगी, जो अभी की स्थिति में मुश्किल लग रहा है।

5:- तो ये वाला टैरिफ चार दिनों की चाँदनी है?
नहीं। संभवत: नहीं। हर देश के कानून में टैरिफ के प्रावधान होते हैं। जैसे भारत लगाते रहता है अक्सर सेफगार्ड ड्यूटी। लेकिन इसकी प्रक्रिया होती है, जिसमें समय लगता है। इसके लिए पहले शिकायत आये, फिर उसकी जाँच हो और तब टैरिफ लगता है। चचा यही आजमाने वाले हैं आगे। अभी जो टैरिफ लगाये हैं, उससे चचा की सरकार को इस तैयारी के लिए 150 दिनों का समय मिल गया है, जो पर्याप्त है। संक्षेप में- जबतक चचा हैं, टैरिफ भी येन-केन-प्रकारेण रहने वाला है।

6:- भारत पर अब कितना टैरिफ है? 10%, 20% या 18%?
फिलहाल 10%। ट्रंप चचा नया टैरिफ लगाने के बाद सोशल मीडिया पर क्लेम किये कि यह पुराने नॉर्मल टैरिफ के ऊपर टॉप-अप है। इससे लगा कि पुराना बेसलाइन 10% टैरिफ रहेगा और उसके ऊपर से नया 10% लगेगा। लेकिन पुराना बेसलाइन टैरिफ रेसिप्रोकल था, वही आईईईपीए वाला, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अवैध कह दिया। तो वह हट गया। अब यह 10% है और सेक्टोरल टैरिफ हैं। मतलब भारत पर फिलहाल 10% रहेगा। व्हाइट हाउस ने फैक्टशीट में इसे साफ किया है।

7:- लेकिन चचा ये भी क्लेम कर रहे हैं कि भारत पर 18% लगेगा?
चचा कुछ सोच-समझकर ही क्लेम कर रहे हैं। व्हाइट हाउस का कहना है कि जो देश डील कर चुके हैं या डील करने पर सहमत हो चुके हैं, उनके ऊपर अभी तो 10% टैरिफ लगेगा, लेकिन जितने टैरिफ पर वो सहमत हुए हैं, उतना लगाने के उपाय सोचे जा रहे हैं। मतलब फिलहाल तो भारत पर टैरिफ 10% हो गया है, लेकिन इसे ट्रंप चचा बहुत देर 10% पर नहीं रहने देंगे। जल्दी ही 18% करेंगे, क्योंकि भारत 18% पर सहमति दे चुका है।

8:- सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ट्रेड डील पर कुछ असर होगा?
डायरेक्टली नहीं। इनडायरेक्टली हाँ। ट्रेड डील अलग से रैक्टिफाई होते हैं, तो अलग कानून का रूप ले लेते हैं। मतलब आईईईपीए के दायरे से बाहर। तो ट्रेड डील में तय टैरिफ भी इस कानून से बाहर हो जाते हैं। मतलब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दायरे से बाहर। लेकिन ट्रेड डील कर चुके देश नये सिरे से बातचीत की बात उठा सकते हैं। ट्रंप का सबसे बड़ा हथियार बेकार हो गया है। दूसरे हथियार हैं, लेकिन उनका असर इतना व्यापक और त्वरित नहीं है। तो ट्रंप की बारगेनिंग कैपेसिटी कम हुई है। चचा के शब्दों में कार्ड कम हो गये हैं। लेकिन सामने वाले कौन देश रीढ़ दिखा पायेंगे? चीन को छोड़ अबतक कोई दिखा पाया, जो आगे दिखा देगा?

9:- भारत-अमेरिका ट्रेड डील का क्या होगा?
वही होगा, जो मंजूर-ए-खुदा होगा, बस खुदा की जगह पर ट्रंप चचा होंगे। चचा ने 3% टैरिफ को पहले 10% किया, फिर 25% किया, फिर 50% कर दिया। हम कुछ कर पाये? ट्रंप चचा ने बहत्तर बार बोला कि टैरिफ से धमकाकर युद्धविराम कराया मैंने। हमने इसके उत्तर में कुछ ठोस किया? फिर ट्रंप चचा ने कहा रूस से तेल लेना बंद करो और अमेरिका-वेनेजुएला से लो। हमने आदेश की तरह इसका पालन किया। चचा ने एकबार बोल दिया- मोदी का करियर खराब कर दूँ, लेकिन आदमी अच्छे हैं तो छोड़ देता हूँ। हम कुछ बोल पाये? चचा ने कहा एग्री-डेयरी ओपन करो। हमने कर दिया। पूरा नहीं, थोड़ा सही, लेकिन खुला तो। दरवाजे नहीं खुले, दीवार में खिड़की खोल दी गयी। जब पिछले एक साल से वही हो रहा है, जो ट्रंप चचा चाह रहे हैं, तो अब ऐसा क्या हो जाने वाला है कि ट्रंप चचा के आदेश का शिरोधार्य पालन नहीं होगा!

10:- टैरिफ अवैध होने के बाद भारत को रिफंड मिलेगा?
नहीं भाई। सबसे पहले ये समझिये कि टैरिफ काम कैसे करता है। मैंने पहले भी समझाया है। ये टैरिफ लगते हैं उन सामानों पर, जो दूसरे देशों से अमेरिका जाते हैं। अमेरिका में जो कंपनियाँ सामान मंगा रही हैं, वो अमेरिका में पंजीकृत हैं, अत: अमेरिकी हैं। टैरिफ भरेगा वही, जो सामना लायेगा बाहर से। मतलब अमेरिकी कंपनियाँ। तो अगर रिफंड मिलना है किसी तरह का तो वो मिलेगा अमेरिकी कंपनियों को। और ये इतना आसान नहीं है। इसके लिए अलग कोर्ट है। सभी कंपनियों को अलग-अलग केस वहाँ फाइल करना होगा। सुनवाई होगी। फैसला आयेगा। फिर रिफंड मिलेगा। यह कई सालों की प्रक्रिया है। छोटी कंपनियाँ इतना हिम्मत ही नहीं कर पायेंगी। सिर्फ अमेजन, वॉलमार्ट, कॉस्टको जैसी कुछ बड़ी कंपनियाँ ही वसूल सकती हैं।

11:- यह बोनस उत्तर है। कुछ फैक्ट्स और लेमैन लैंग्वेज का अंतर साफ कर देने के लिए। भारत पर टैरिफ लिखने-बोलने-कहने के लिए है। इसका फैक्चुअल अर्थ भारत के उन सामानों पर टैरिफ है, जो अमेरिकी बाजार में जा रहे हैं। अब जैसे भारत पर 18% टैरिफ है, तो ये भारत सरकार या भारत की कंपनियाँ नहीं भर रहीं। ये 18% टैरिफ उन्हें भरना है, जो भारत से सामान वहाँ मंगा रहे हैं। भारत या भारत की कंपनियों को नुकसान इस तरह होता है कि पहले जो सामान अमेरिका 100 रुपये में पहुँच रहा था, अब पहुँचते ही 118 रुपये का होगा। यानी महँगा होगा और महँगा होते ही ग्राहक कम हो जायेंगे। ट्रंप चचा कह रहे हैं कि भारत टैरिफ देगा, ये भी लेमैन लैंग्वेज वाली बात है। तकनीकी मतलब है कि भारत के उन सामानों पर टैरिफ लगेगा, जो अमेरिकी बाजार में बिकेंगे। इसे अच्छे से समझ जायें तो बहुत सारी चीजें स्वत: समझ आ जाती हैं।

अब मैंने इतने सारे सवालों के जवाब दे दिये। मुझे लगता है कि पर्याप्त सरल तरीके से लिख पाया हूँ। फिर भी कुछ न समझ आये तो कमेंट बॉक्स लोकतंत्र की तरह खुला हुआ है। ट्रंप टैरिफ, ट्रेड डील वगैरह पर एक 7-8 किलोमीटर लंबा विश्लेषण भी लिखा हूँ। यहाँ जो बच गया है, वो उसमें आप समझ सकते हैं। निवेश मंथन पत्रिका का वो वाला संस्करण जल्द प्रकाशित होने वाला है। प्रकाशित हो जाये, फिर उसे साझा कर दूँगा। अब मेरे सवाल की बारी। मेरा यह सवाल भी साल भर पुराना है। ट्रंप की सरकार बनने के 2 सप्ताह बाद मोदीजी अमेरिका गये थे। 12 फरवरी 2025 को ट्रंप-मोदी साथ में प्रेस कॉन्फ्रेंस किये थे। तस्वीर तभी की है और तबसे है सवाल। ट्रंप चचा के पास मोदीजी की वो कौन-सी कमजोर नस है, जिसके दबने से मोदीजी निहुरते चले जा रहे हैं? अडानी वाले केस में मुझ इतना वजन नहीं लगता। एप्सटीन फाइल्स से जोड़ते हैं कुछ लोग। ट्रेड डील पर गतिरोध टूटने और विद्युतीय गति से डील पर सहमति के ऐलान की टाइमिंग इससे मैच जरूर करती है, लेकिन ये मानने का मेरे पास कोई आधार नहीं है। मेरे लिए यह एक रहस्य है। मैं ट्रंप टैरिफ, ट्रेड डील, सब समझ लेता हूँ, चाय की टपरी पर बैठने वालों को भी ये सब समझा पाने में खुद को सक्षम पाता हूँ, लेकिन निहुरने का राज मेरे लिए रहस्यमयी है। मेरे 11 जवाबों के बदले में मुझे जनता-जनार्दन से 1 जवाब चाहिए, लेकिन सभ्य भाषा में। कुछ भी हो, मोदीजी सिर्फ भाजपा के नहीं, पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं।


मुकेश कुमार-

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भले ही ट्रम्प के टैरिफ को खारिज़ कर दिया है मगर ट्रम्प के तेवर कम नहीं हुए हैं और वे पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। तुरंत दस फ़ीसदी टैरिफ लगाकर उन्होंने अपने इरादे ज़ाहिर भी कर दिए हैं।

भारत के मामले में तो उनका रवैया और भी कड़ा है। उन्होंने पुराने टैरिफ के लागू रहने की बात दोहरा दी है। उनके इस क़दम से प्रधानमंत्री मोदी चकित भी होंगे और आतंकित भी। ट्रम्प पहले ही उन्हें दबाते आ रहे हैं और एक बार फिर उन्होंने यही किया है।

शायद यही वज़ह है कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के चौबीस घंटे बाद भी उनकी सरकार कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रही है? क्या वह ट्रम्प से डरी हुई है इसलिए कुछ बोलने को तैयार नहीं है? उसने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि वे मामले का अध्ययन कर रही है, जबकि उसे इसके लिए पहले से ही तैयार रहना चाहिए था।

सचाई ये है कि मोदी सरकार से बहुत बड़ी चूक हो गई है। उसे ट्रेड डील करना ही नहीं चाहिए था। सबको पता था कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने वाला है और वह कैसा आ सकता है। ऐसे में समझदारी तो ये होती की डील को टाला जाता, मगर लगता है कि ट्रम्प के दबाव में आकर उन्होंने जो वे चाहते थे उसके लिए हामी भर दी।

ज़ाहिर है कि मोदी सरकार अब और बड़े दबाव में आ गई है। एक बार फिर देश देख रहा है कि मोदी सरेंडर करते हैं या फिर इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर डील में अपेक्षित बदलाव करवाते हैं….

मोदी ये जानते ही होंगे कि अगर इस बार भी वे चूके तो उन्हें भारी सियासी नुक़सान उठाना पड़ सकता है….राहुल गाँधी तो पहले ही मोर्चा खोले हुए हैं, अब और आक्रामक हो जाएंगे….विपक्ष भी उन्हें नहीं छोड़ेगा और समर्थक भी उनसे निराश हो जाएंगे…..

तो अब सवाल ये है कि मोदी करेंगे क्या….क्या विकल्प उनके सामने हैं और वे किस विकल्प के साथ आगे बढ़ सकते हैं…..

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