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आज के अखबार : खेड़ा को जमानत के बहाने देश की राजनीति और न्यायपालिका के हाल की बात नहीं है

सोफिया कुरैशी के मामले में स्वतः संज्ञान लेने वाले जज और उनका हाल’ गूगल करने पर एआई ने जो जवाब दिया उसका स्क्रीन शॉट ऊपर है। घर के बाहरी हिस्से में नोटों के जखीरे वाले जज और हेट स्पीच देने वाले नेताओं तथा संघ समर्थकों का मामला भी सबको पता ही है।  

संजय कुमार सिंह

आज मेरे नौ अखबारों में द टेलीग्राफ, द हिन्दू, दि एशियन एज, टाइम्स ऑफ इंडिया, नवोदय टाइम्स और देशबन्धु में पवन खेड़ा को जमानत मिलने की खबर पहले पन्ने पर है। सबसे बड़ी (या विस्तृत) खबर द हिन्दू में है और सबसे छोटी देशबन्धु में। अमर उजाला, दि इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं दिखी। इससे इस खबर का महत्व कम नहीं होता है और तीनों अखबारों में इसे पहले पन्ने पर नहीं रखने के उनके अपने कारण हो सकते हैं। अभी वह मुद्दा नहीं है। वैसे भी, नवोदय टाइम्स के अनुसार, हेट स्पीच मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। नरेन्द्र मोदी (या गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री या आरएसएस वाले संघ परिवार के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार) की डिग्री का मामला 2014 में उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से फंसा हुआ है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अगस्त 2025 में फैसला सुनाया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री का विवरण सार्वजनिक करने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 1978 में बीए पास करने वाले छात्रों के रिकॉर्ड की जांच करने को कहा गया था। अब अप्रैल 2026 में दिल्ली यूनिवर्सिटी को इस मामले में दायर अपीलों पर आपत्ति जताने के लिए अतिरिक्त समय दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त 2026 को होनी है। डिग्री से जुड़े और भी मामले हैं लेकिन प्रधानमंत्री का ही नहीं निपट रहा है तो औरों की बात कौन करे। वैसे भी, अनपढ़ों के राजनीति में आने पर रोक नहीं है। लेकिन अनपढ़ों के शपथपत्रों की पुष्टि नहीं होने से अनपढ़ों की पौ बारह जरूर रही है। इससे पढ़े लिखे लोग डरते हैं कि नहीं – इसपर किसी खोजी रिपोर्ट की जानकारी नहीं है।

मेरा मानना है कि पवन खेड़ा को जमानत देने के मामले में भारतीय न्याय व्यवस्था और सरकारी जबरदस्ती की जांच हो गई और पवन खेड़ा का मामला मीडिया को खबर देने से संबंधित था इसलिए यह बताना जरूरी है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा जारी 2026 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर खिसक गया है। पिछले वर्ष (2025) में भारत 151वें स्थान पर था, यानी इस वर्ष 6 पायदानों की गिरावट दर्ज की गई है। भारत की स्थिति को “बहुत गंभीर” श्रेणी में रखा गया है। पाकिस्तान 153वें स्थान पर है, जो भारत से बेहतर स्थिति में है। नॉर्वे लगातार शीर्ष पर बना हुआ है। दैनिक भास्कर की 2018 की एक खबर के अनुसार, मीडिया को मिलने वाली आजादी के मामले में भारत की स्थिति 4 साल के सबसे खराब हुई है। दुनिया के 180 देशों के लिए जब प्रेस फ्रीडम इंडेक्स जारी किया गया तब भारत 138वें स्थान पर था। इससे पहले भारत की इतनी बुरी रैंकिंग 2013 और 2014 में थी। तब भारत 140 नंबर पर था। 2017 में भारत 136वें पायदान पर पहुंच गया था। ये रैंकिंग फ्रांस के एक एनजीओ ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ (आरडब्ल्यूबी) ने जारी की है। आरडब्ल्यूबी पिछले 16 साल से यानी 2002 से ये प्रेस फ्रीडम इंडेक्स जारी कर रहा है। गौरतलब है कि 2013-2014 में जब देश का मीडिया भाजपा और अन्ना हजारे को सिर पर लिए घूम रहा था तब यह स्थिति सबसे खराब थी। क्यों थी, अभी मुद्दा नहीं है।

आप जानते हैं कि पवन खेड़ा ने ऐन चुनाव से पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की पत्नी के तीन विदेशी पासपोर्ट और विदेश में संपत्ति होने की जानकारी सार्वजनिक की थी। दुबई की संपत्ति के साथ तीन पासपोर्ट का भी विवरण दिया था। सरमा ने पासपोर्ट को फर्जी बताया। हालांकि, आरोप यह था कि मुसलमानों को गाली देने वाले भाजपाई मुख्यमंत्री की पत्नी के पास मुस्लिम देशों के पासपोर्ट हैं। बेशक यह आरोप राजनीतिक हो सकता है और कांग्रेस नेता के पासपोर्ट पर यकीन किया जा सकता था या नहीं किया जाता। आम लोग यकीन कर रहे हैं या नहीं, इस आधार पर सरकार की (भाजपा की नहीं) जिम्मेदारी थी कि वह इन आरोपों का खंडन करती या इनकी पुष्टि करती। मीडिया का भी काम था कि वह अपने स्तर पर जांच करने के अलावा सरकार के साथ हिमंत बिस्व सरमा से इस बारे में पूछती और आम जनता को बताती। पवन खेड़ा का आरोप भले संपत्ति और पासपोर्ट से संबंधित था लेकिन उन्होंने कहा था कि हेमंत बिस्व सरमा ने अपने चुनावी हलफनामे में इसकी घोषणा नहीं की है। दुनिया जानती है कि हिमंत बिस्व सरमा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, वे कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए हैं। अमित शाह इस बारे में पूछे गए सवालों को टाल जाते रहे हैं और साफ कहा है कि ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते हैं और उनके गृहमंत्री रहते भारत में प्रेस की स्वतंत्रता का हाल मीडिया को ऐसे कारण देता है कि वे इसके बारे में पूछते और रिपोर्ट करते। पर वह सब नहीं हुआ। कई दिनों तक नहीं हुआ और मीडिया यह प्रचारित करता रहा कि पवन खेड़ा मुश्किल में हैं। वास्तविकता यह है कि भारत की चुनाव व्यवस्था, सरकार की पारदर्शिता, सुप्रीम कोर्ट की न्यायव्यवस्था और चुनाव लड़ने वालों के लिए शपथपत्र दाखिल करने की अनिवायर्यता जैसे तमाम मुद्दे संकट में थे और इनपर बात नहीं हुई। मीडिया की हालत तो अब बात करने लायक भी नहीं रही।

मुद्दा था कि मुख्यमंत्री हिमंत बिसव सरमा ने पत्नी की विदेशी संपत्ति का विवरण अपने चुनावी घोषणा पत्र में नहीं दिया है। जहां तक मेरी जानकारी है, इसका खंडन नहीं किया गया और ना इससे इनकार किया गया है। ना ही इस संबंध में किसी कार्रवाई या ऐसी किसी शुरुआत की सूचना या भरोसा भी है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि शपथपत्र में जानकारी नहीं देने या गलत जानकारी देने का मामला जितना गंभीर है, अब उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता है। इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री के शपथपत्र, उनकी डिग्री, शिक्षा के साथ जीवनसाथी से संबंधित जानकारी नहीं होना मुद्दा है। इसलिए हिमंत बिस्व सरमा के मामले में पवन खेड़ा का आरोप भले उनके शपथपत्र से संबंधित था उसे तीन देशों के कथित विदेशी पासपोर्ट से जोड़ दिया गया। यह नहीं कहा गया कि शपथपत्र की जानकारी सही है या उसकी जांच कराई जाएगी। हिमंत बिस्व सरमा ने असम की पुलिस को निजी सेना की तरह चुनाव के समय दिल्ली भेज दिया और भरपूर मनमानी की, जो बोलते रहे सो अलग। इस तरह भारतीय इको सिस्टम ने हिमंत बिस्व सरमा को बचा लिया, पवन खेड़ा को मुश्किल में बताता रहा जबकि चुनावी शपथपत्र को लेकर प्रधानमंत्री ही नहीं देश की पूरी व्यवस्था पहले से सरेंडर मोड में है। कल सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत दिया जाना और इतने दिनों तक उन्हें परेशान होने देना और यह आरोप लगाने का मौका दिया जाना कि वे कानून से बच रहे हैं, डर रहे आदि पर अखबारों में टिप्पणी हो भी नहीं सकती है। सोशल मीडिया पर चर्चा नहीं है। खबर में अंदर हो तो भी ऐसा कुछ शीर्षक में या प्रमुखता से नहीं है। हाईलाइट भी नहीं किया गया है। यह देश की राजनीति और नेताओं द्वारा जनता को परेशान किए जाने की स्थिति में उपलब्ध कानूनी अधिकार के हालात हैं और आज खबर इसपर होनी चाहिए थी। वैसे भी, मामला सिर्फ पवन खेड़ा का नहीं है।

नवोदय टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, हेट स्पीच मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। नहीं बनता होगा, मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि इनके भाषण और उसकी बातें सब को मालूम हैं तब भी इनका अपराध संज्ञेय नहीं है। इन्हें कभी गिरफ्तार नहीं किया गया लेकिन शरजील इमाम और उमर खालिद दोनों 2020 के दिल्ली दंगों की “बड़ी साजिश” के मामले में यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत जेल में हैं और उनकी जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी हैं। अदालत ने कहा है कि दोनों एक साल बाद या गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। बयान जमानत दर्ज करना दिल्ली पुलिस का काम है, उसके लिए कोई समय सीमा नहीं है। वैसे ही ढेरों काम होते हैं। अमित शाह के नियंत्रण में उल्टा लटकाकर सीधा करना भी होता हो तो कोई कैसे जानेगा। नतीजा यह होगा कि अभियुक्त जेल में पड़े रहेंगे। इन पर भड़काऊ भाषण देने, हिंसक विरोध प्रदर्शनों की योजना बनाने और डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान जानबूझकर चक्का जाम के जरिए दंगे भड़काने का आरोप है। कहने की जरूरत नहीं है कि पहले वाले दोनों के नाम ठाकुर और वर्मा हैं, दोनों बड़े बाप के बच्चे हैं और भाजपा सरकार में मंत्री भी। दूसरी ओर, शरजील इमाम और उमर खालिद हैं। ये लोग छह साल से जेल में हैं। ऊपर बिना बात छह महीने जेल में रहने का मामला सोनम वांगचुक का है। इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता है कि सरकार धार्मिक आधार पर भेदभाव कर रही है लेकिन जो कर रही है उसे समझना इतना मुश्किल भी नहीं है। तभी, प्रवेश वर्मा ने हाल में अरविन्द केजरीवाल के तथाकथित शीश महल से संबंधित जो आरोप लगाए थे उनके फर्जी होने की अल्टन्यूज की खबर के बावजूद ना अरविन्द ने कुछ कहा ना कानून ने स्वतः संज्ञान लेकर कुछ किया। करे भी कैसे जब, ‘सोफिया कुरैशी के मामले में स्वतः संज्ञान लेने वाले जज और उनका हाल’ गूगल करने पर एआई ने जो जवाब दिया उसका स्क्रीन शॉट ऊपर है।

विदेशी पासपोर्ट का आरोप राहुल गांधी पर भी है लेकिन आरोप लगाने वाले के खिलाफ किसी कार्रवाई की सूचना नहीं है। मामला खत्म नहीं हो रहा है सो अलग। इसलिए 140 करोड़ के देश में किसी को जमानत मिलने या न मिलने की खबर तो दो कौड़ी की भी नहीं है। यह खबर इसलिए बड़ी है कि सिस्टम ने सोनम वांगचुक को महीनों जेल में रखा और जब थक गया या हारने वाला था तो मामला ही वापस ले लिया। सॉलीसीटर जनरल जज को बच्चों के जरिए पैसे देकर सरकार का काम करवाते दिख रहे हैं फिर भी कोई सवाल नहीं है, कोई गुस्सा नहीं है। लोगों को सारी अपेक्षा राहुल गांधी या कांग्रेस से है। लोगों को लग रहा है कि राहुल गांधी को पवन खेड़ा का साथ देना चाहिए था (जैसे नहीं दिया, उन्हीं को मालूम है) और गिरफ्तारी देनी चाहिए थी। मुझे लगता है कि सब करके भी पवन खेड़ा भाजपा नहीं ज्वायन करेंगे इसे सुनिश्चित करने का तरीका इन दोनों के पास तो नहीं ही है। भाजपा के पास भले हो। ऐसी हालत में जो रहा है,  से ज्यादा जरूरी है जो नहीं हो रहा है उसे समझना और संभव हो तो बताना या उसकी रिपोर्ट करना। ऐसे में पत्रकारिता की हालत जानना समझना चाहें तो आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, महंगाई का वार : वाणिज्यिक सिलिंडर के 993 और पांच किलो वाले छोटू के दाम 261 रुपए बढ़े। कहने की जरूरत नहीं है यह खाड़ी युद्ध के कारण है और इसमें भारत कैसे और कितना भागीदार है, बताना जरूरी नहीं है। लोगों को पता था कि मतदान होते ही पेट्रोलियम पदार्थ के दाम पढ़ेंगे। और हुआ भी यही। यह इतना पक्का था कि सबने यकीन कर लिया और संबंधित सूचना साझा करने लगे। सरकार की चिन्चा छवि की होती है इसलिए पीआईबी ने फैक्ट चेक करके बताया दिया कि वह खबर गलत थी लेकिन गलत खबर देने वाला कौन था, किसलिये ऐसी खबर की, इसे जानने की जरूरत ना उसे है, ना किसी और को। सरकार को कीमत बढ़ाकर भी बताना है कि आम उपभोक्ताओं पर असर नहीं है और अमर उजाला ने इस काम को बखूबी किया है। हरदीप पुरी ने ऐसा कहा है अमर उजाला ने इसे प्रमुखता से छापा है। इसके साथ ही खबर है, पेट्रोल डीजल पर भी गिर सकती है गाज। यानी कीमत बढ़ने की जिस खबर को फैक्ट चेक से गलत बताया वह कुछ समय में सही हो सकती है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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