
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
यूपीसीडा के जिस भ्रष्ट परियोजना अधिकारी बृजेश कश्यप का नाम लेकर अपने बेहद छोटे से लेकिन पत्रकारों के फेसबुक दायरे में 31 मई को सुबह एक पोस्ट लिखी, उसे देखा और पढ़ा तो देश के तक़रीबन हर बड़े मीडिया संस्थान के टॉप मोस्ट पदों पर बैठे मेरे सहपाठी, सहकर्मी, सीनियर / जूनियर या पत्रकारों के नेतागण आदि ने होगा। लेकिन उस पर प्रतिक्रिया केवल जंगजू पत्रकार और Bhadas4media के संस्थापक Yashwant Singh ने उसी दुस्साहसी अंदाज़ में दी, जैसे कि वह पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से “विख्यात” और मीडिया और सिस्टम से लड़ने वालों का हथियार माने जाने वाले अपने पोर्टल bhadas4media के ज़रिए देते रहे हैं। उन्होंने उस पोस्ट को उसी दिन छाप दिया।
अगले ही दिन खबर आई कि कश्यप का ट्रांसफर हो गया है। UPSIDA से उसे नोएडा भेज दिया गया है। जाहिर सी बात है कि प्रदेश के इतने बड़े विभाग में अफसरों के ट्रांसफर की यह लिस्ट काफी पहले से बन रही होगी। कश्यप का नाम भी उसमें रहा ही होगा और यह महज संयोग ही दिख रहा है कि मेरे इस लेख के अगले एक दो दिन बाद उसका ट्रांसफर हो गया। कश्यप का ट्रांसफर हो गया, मेरे लिए तो यही “तात्कालिक राहत” की बात है। “तात्कालिक राहत” इसलिए क्योंकि एक भ्रष्ट अफसर एक कुर्सी से दूसरी लेकिन और बड़ी मलाईदार कुर्सी पर चला जाए, तो यह सिस्टम से लड़ने वालों की जीत नहीं होती। जीत तो तब होगी जब सिस्टम में ऐसे अफ़सर शासन के कोप भाजन बनते। शासन तो ऐसे अफसरों को वर्षों तक बचाता रहा है, उसी के ख़िलाफ़ दर्ज शिकायतें उसी भ्रष्ट अफ़सर से निस्तारित करवाता रहा है, और अंत में पीड़ित आदमी को अदालत, आरटीआई, जनसुनवाई, मीडिया और सोशल मीडिया के चक्रव्यूह में फँसा देता है।
कश्यप को अगर किसी छोटी या कमजोर जगह भेजा गया होता तो मैं कह भी सकता था कि कम से कम इतना तो हुआ कि उसकी ताकत घटी। लेकिन उसे नोएडा अथॉरिटी जैसी बड़ी, प्रभावशाली और ज्यादा कमाई वाली अथॉरिटी में भेजा गया है। इसलिए मैं यह कैसे कह दूं कि शासन ने उसे लखनऊ से नोएडा भेजकर दंडित किया? यह तो वैसा ही है जैसे किसी भ्रष्ट अफसर को एक मलाईदार कुर्सी से हटाकर दूसरी और भी मलाईदार कुर्सी पर बैठा दिया जाए। सवाल तबादले का नहीं है, सवाल जवाबदेही का है। सवाल यह है कि जिन शिकायतों, आरटीआई उल्लंघनों, मनमानी रिपोर्टों और अवैध प्लॉटिंग को संरक्षण देने के आरोपों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, क्या उन पर कोई कार्रवाई हुई?
एक और दिलचस्प बात यह भी हुई कि ट्रांसफर की इस लंबी लिस्ट में 17 अफसरों के तबादले उसी के अगले ही दिन निरस्त हो गए। औद्योगिक विकास विभाग में जिस तरह तबादलों पर घमासान मचा, 24 घंटे में आदेश पलटे, 17 अफसरों के ट्रांसफर निरस्त हुए, NCR पोस्टिंग को लेकर खींचतान की खबरें आईं, उससे साफ दिखता है कि यह विभाग केवल प्रशासनिक जरूरतों से नहीं चल रहा। यहां कुर्सियों की अपनी राजनीति है। पोस्टिंग की अपनी कीमत है। कौन कहां रहेगा, कौन किस अथॉरिटी में जाएगा, कौन हटेगा और कौन बच जाएगा—इन सबके पीछे अगर केवल “जनहित” होता तो 24 घंटे में इतने आदेश यू-टर्न नहीं लेते।
बहरहाल, फेसबुक की अपनी उस पोस्ट में मैंने बृजेश कश्यप, यूपीसीडा और रेरा के भ्रष्टाचार व मनमानी पर अपनी पूरी दास्तान लिखी थी। पिछले दो-तीन साल से जिस व्यक्ति ने मेरे अप्रूव्ड प्रोजेक्ट्स को रोकने, नियमों की मनमानी व्याख्या करने, अवैध प्लॉटिंग वालों को खुली छूट देने और मेरी वैध फाइलों में नई-नई अड़चनें लगाने का काम किया, उसका नाम इस ट्रांसफर लिस्ट में आने से मुझे कोई बड़ा फ़ायदा नहीं होगा क्योंकि कश्यप जैसे भ्रष्ट अफ़सर मेरे जिन शत्रुओं के इशारों और घूस पर नाचते हैं, वे नए अफ़सर को भी अपने इशारों पर नचाने के लिए घूस या राजनीतिक प्रभाव का चारा तो डालेंगे ही।
इसलिए मेरी लड़ाई किसी कश्यप जैसे किसी एक अफसर से निजी दुश्मनी की लड़ाई नहीं है। मेरी लड़ाई उस भ्रष्ट सिस्टम से है, जिसमें कश्यप जैसे भ्रष्ट अफसरों की निगहबानी में अवैध प्लॉटिंग करने वाले लोग खुलेआम सड़क, खंभे, बाउंड्री और प्लॉट काटते हैं, निर्माण तक करवा लेते हैं, लेकिन अफ़सर वहाँ धृतराष्ट्र बन जाते हैं। वहीं अगर मेरे जैसा कोई व्यक्ति नियम से, नक्शे से, मंजूरी से, कानून के रास्ते से प्रोजेक्ट करना चाहता है तो उसी पर नियमों की मनमानी व्याख्या करके हर कदम पर एक नई दीवार खड़ी कर दी जाती है। यानी यूपी में जो कानून की डगर का मुसाफ़िर है, वही सबसे ज्यादा प्रताड़ित है।
मेरा संघर्ष इसीलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी एक प्लॉट, एक फाइल या एक अधिकारी की कहानी नहीं है। यह एक उद्यमी की कहानी है, जिसने यूपी जैसे भ्रष्ट राज्य में नियम कानून से व्यापार करने की गलती की। जिसने सोचा कि यदि वह approved project करेगा तो सरकार साथ देगी। जिसने सोचा कि निवेश मित्र, जनसुनवाई, आरटीआई, यूपीसीडा और रेरा जैसी संस्थाएं उद्यमी की मदद के लिए बनी हैं। लेकिन हकीकत यह निकली कि शिकायतें वहीं घूमकर उसी अफसर की टेबल पर लौट आती हैं जिसके खिलाफ शिकायत की गई थी। जवाब कॉपी-पेस्ट होते हैं। सूचना नहीं दी जाती। आयोग में दंड की बात उठती है, फिर मामला निस्तारित हो जाता है। और पीड़ित उद्यमी वहीं खड़ा रह जाता है।
इसलिए कश्यप का ट्रांसफर मेरे लिए केवल एक पड़ाव है। असली सवाल अभी भी वहीं है। क्या उसके कार्यकाल की जांच होगी? क्या जैतीखेड़ा और सरोजिनी नगर के आसपास अवैध प्लॉटिंग पर वास्तविक कार्रवाई होगी? क्या मेरे जैसे अप्रूव्ड प्रोजेक्ट्स को नियमों के नाम पर प्रताड़ित करने वाले अफसरों की जवाबदेही तय होगी? क्या रेरा और यूपीसीडा में बैठे वे लोग, जिन्होंने वैध कारोबारियों को अटकाकर अवैध कारोबारियों को रास्ता दिया, कभी कटघरे में आएंगे?
अगर नहीं, तो फिर यह ट्रांसफर सिर्फ कुर्सी बदलने का खेल है। अफसर बदला है, व्यवस्था नहीं। और अगर व्यवस्था नहीं बदली तो कल कोई दूसरा कश्यप उसी कुर्सी पर बैठ जाएगा, वही कॉपी-पेस्ट रिपोर्ट लगाएगा, वही नियमों की मनमानी व्याख्या करेगा, वही वैध काम रोककर अवैध काम को खुली छूट देगा।
खैर, मेरी लड़ाई भी जारी रहेगी। सोशल मीडिया पर भी, शिकायतों में भी, आरटीआई में भी और जरूरत पड़ी तो कोर्ट में भी। क्योंकि जब सिस्टम किसी आदमी को न्याय देने की जगह उसे थकाने की मशीन बन जाए, तब चुप रहना भी अपराध जैसा लगता है। आज कश्यप का ट्रांसफर हुआ है। कल देखना यह है कि क्या सचमुच कानून की तरफ कोई कदम बढ़ता है या फिर यह भी औद्योगिक विकास विभाग की उसी पुरानी कहानी का नया अध्याय है—जहां फाइलें बदलती हैं, कुर्सियां बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन खेल वही रहता है।
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