
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
राजधानी लखनऊ के सरोजिनी नगर में एक गांव है जैतीखेड़ा, जहां अथॉरिटी लगती है (UPSIDA) एक्स लीडा. इसका वरिष्ठ परियोजना अधिकारी बृजेश कश्यप खुलेआम न सिर्फ इस गांव में अवैध प्लॉटिंग को प्रश्रय दे रहा है बल्कि उसकी अथॉरिटी के दायरे में आने वाले हर गांव में यही हाल है.
एलडीए तो राजधानी में अवैध प्लॉटिंग के खिलाफ ताबड़तोड़ बुलडोजर एक्शन कर रहा है लेकिन कश्यप ने शिकायतें होने पर कोरम पूर्ति के लिए कागज पर काफी पहले नोटिस जारी किए और फिर आंखें मूंद ली.
अब हालत यह है कि एक्स लीडा के हर गांव में अवैध प्लॉटिंग के साम्राज्य खड़े हो गए हैं. समझ ही नहीं आता कि इस अधिकारी को आखिर योगी सरकार में कौन प्रश्रय दे रहा है कि तमाम शिकायतों और नियम कानून की मनमानी व्याख्या करके अप्रूव्ड प्रोजेक्ट्स को परेशान करने वाले इस अधिकारी का बाल भी बांका नहीं हो रहा?
बहरहाल मैंने यह तय किया है कि इस अधिकारी के मनमानी पूर्ण आचरण पर मैं यथा संभव जो भी जानकारी मिले, उस पर शिकायत दर्ज करा कर इसे हर मंच पर उठाऊं.
यूपीसीडा (एक्स लीडा) के जिस वरिष्ठ परियोजना अधिकारी बृजेश कश्यप के बारे में मैंने हाल ही में लिखा था कि वह सरोजिनी नगर के जैतीखेड़ा जैसे तमाम ग्रामीण/ शहरी क्षेत्रों में अवैध प्लॉटिंग को खुला प्रश्रय दे रहा है, वह व्यक्तिगत रूप से मेरे अप्रूव्ड प्रोजेक्ट की जमीन वहां अवैध प्लॉटिंग कर रहे लोगों को दिलवाने के लिए तमाम नियम कानून ताक पर रखकर डेढ़ साल तक मेरे बिजनेस में अड़ंगे लगा रहा था.
उसने मेरे approved project को लगभग डेढ़ साल तक केवल जिद पकड़ कर रिवाइज नहीं होने दिया कि पहले मैं प्रोजेक्ट सरेंडर करूं. मैंने डेढ़ साल तक रिवीजन के लिए जब जब फाइल जमा की कश्यप ने पहले सरेंडर की शर्त के आगे कुछ सुनने से इंकार करते हुए आवेदन में उस शर्त के अलावा भी लगातार हर बार नई नई कमियां निकाली. फिर चाहे वे नियम विरूद्ध हों या बेसिरपैर की. पहले सरेंडर की शर्त भी उसकी खुद की ही गढ़ी हुई थी, सरकारी नियमावली में यह कहीं है ही नहीं.
सरेंडर करवाने के पीछे उसका मकसद डेवलपमेंट एग्रीमेंट पर ली गई मेरे प्रोजेक्ट की जमीन को उन्हीं अवैध प्लॉटिंग वालों को दिलवाने का था, जिन्होंने कश्यप की सरपरस्ती में पूरे क्षेत्र में कई जगह अवैध प्लॉटिंग कर रखी है.
मेरा आवेदन दो बार रिजेक्ट हुआ और तीसरी बार मंजूर हुआ लेकिन डेढ़ साल से ज्यादा समय मुझे लगा. योगी आदित्यनाथ उधर मीडिया में बड़े बड़े दावे करते रहे कि फाइल या आवेदन तीन दिन से ज्यादा कोई रोक नहीं आएगा या एक ही बार में आपत्ति लगाएगा, इधर कश्यप ने योगी आदित्यनाथ के हर दावे की बेख़ौफ़ होकर हवा निकाली.
वहां से निकला तो उस जमीन पर निगाह गड़ाए अवैध प्लॉटिंग वालों ने एक और महाभ्रष्ट डिपार्टमेंट यूपी rera को पकड़ लिया. अब वहां के भ्रष्ट अफसर कर्मचारी उनके फेंके हुए टुकड़ों का कर्ज चुकाने के लिए मेरे सामने तरह तरह के अड़ंगे लगा रहे हैं. इसलिए वहां भी ट्राई करते करते मुझे लगभग सवा साल हो चुके हैं.
मुझे पता है कि जमीन बेचने या खरीदने वाले बहुत धैर्य से इन भ्रष्ट विभागों और कर्मियों का इस्तेमाल कर रहे हैं और आगे भी तमाम अन्य साजिशें करेंगे. मुझे उनसे लड़ने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन हैरत होती है मुझे यूपी के इन भ्रष्ट विभाग / अफसर / कर्मचारियों को देखकर कि इनका कोई जमीर है या नहीं?
सरकार से इतनी मोटी सेलरी मिलने और तमाम सुख सुविधाएं और धन संपत्ति होने के बावजूद अगर दिन रात काला धन ही बटोरने में जीवन बीत रहा है तो पता नहीं इतना धन लेकर इन्हें आखिर करना क्या है ?
साल 2023-24 से कश्यप जिन आकाओं की सेवा करने में तमाम नियम कानून की मनमानी व्याख्या करके उन्हें मेरे प्रोजेक्ट की जमीन दिलवाने में लगा था या अब उनका एक और हित, मेरे एक अन्य अप्रूव्ड प्रोजेक्ट में भी इसी तरह अड़ंगे लगाकर, साधने में लगा है, वे अवैध प्लॉटिंग करें या कुछ भी खुलेआम करें, कश्यप को वह नहीं दिखता.
जबकि मेरे आवेदन, फाइल या किसी भी अप्रूव्ड काम में वह कोई भी बेसिरपैर के नियम लगाकर तमाम कमियां निकाल लाता है.
सरोजिनी नगर में हर जगह ये अवैध प्लॉटिंग वाले लोग खुलेआम रोड, खंभे, प्लॉट काटना, बाउंड्री आदि काम करते हुए बिक चुके प्लॉट पर निर्माण तक करवा रहे हैं, मगर कश्यप ने उनसे धन उगाही का सिलसिला बना कर उन्हें मामूली नोटिस आदि भेजकर ( वह भी बहुत दबाव पड़ने पर) अपनी आंख पूरी तरह से मूंद रखी है.
बहरहाल, मैं जिन हालात में घिरा हूं वहां से कोर्ट ही एकमात्र रास्ता बचता है क्योंकि योगी नियम या सिस्टम तो बना लेंगे लेकिन जब किसी भ्रष्ट अफसर या विभाग पर कार्यवाही नहीं करेंगे या मलाईदार पोस्ट पर ऐसे भ्रष्ट अफसर को मजबूती से टिकाए रखेंगे तो फिर कोर्ट के अलावा मेरे पास चारा ही क्या बचता है यूपी में ?
हालांकि कोर्ट के बारे में भी तरह तरह की चर्चाएं और शिकायतें हैं लोगों को लेकिन वहां फिर भी कुछ उम्मीद तो है.
ऐसा नहीं है कि सिर्फ जमीन, प्रोजेक्ट और बिजनेस को लेकर ही कोर्ट में जाऊंगा. मैं कश्यप या रेरा जैसे विभाग के भ्रष्ट अफसर कर्मचारी को भी वहां कानूनी रूप से घसीट कर कटघरे तक ले जाऊंगा. यह लड़ाई जहां तक लड़ पाऊंगा, लड़ूंगा फिर चाहे ये भ्रष्ट अफसर रिटायर ही क्यों न हो चुके होंगे. इसी भविष्य को भांपकर ही मैंने काफी पहले ही लॉ की पढ़ाई शुरू कर दी थी. जीत मिले या हार, जब सामने वाला लड़ना ही एकमात्र विकल्प उपलब्ध कराए तो फिर किया भी क्या जा सकता है?


