दैनिक भास्कर में प्रधानमंत्री के सवाल – पहले पन्ने पर। यह दिलचस्प है कि भास्कर नॉलेज के तहत बताया गया है कि मॉक पार्लियामेंट सीईसी को हटाने की प्रक्रिया नहीं है। लेकिन प्रधानमंत्री सवाल पूछ रहे हैं और उसका जवाब नहीं है। किसी ने दिया नहीं है, उन्हें पता नहीं है, कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। इधर नॉलेज (ज्ञान) पाठकों के लिए है। मुझे प्रधानमंत्री के इस सवाल और इससे किसी को समस्या न होना समझना है – कौन बता सकता है? क्या यह मीडिया का काम नहीं है?
संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 के 10 अखबारों में मॉक पार्लियामेंट की खबर पहले पन्ने पर है। हिन्दी अखबारों में भाजपाई पलटवार भी है तो अंग्रेजी के हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया का अंदाज पुराना ही है। द टेलीग्राफ और द हिन्दू में ‘पलटवार’ नहीं है लेकिन दि एशियन एज ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘पलटवार’ को पूरी प्रमुखता दी है। चार कॉलम की लीड के मुकाबले लगभग बराबर में तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है – मोदी ने विपक्ष की आलोचना की, कहा यह अवरोध पक्ष में बदल गया है। हालांकि, राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के गार्डन में आयोजित मॉक पार्लियामेंट एक हथियार है और सबको घायल करेगा। इसका कारण उन्होंने यही बताया कि सरकार ने विपक्ष के लिए विरोध की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है।
इसलिए यह आयोजन खरगे जी के घर पर करना पड़ा। इसके साथ उन्होंने जो कहा उसका मतलब यही है किसी संवैधानिक संस्था ने विपक्ष की, विरोध की या पीड़ित जनता की बात नहीं सुनी तो कोई विकल्प नहीं था। आम आदमी, सरकार के समर्थकों और प्रचारकों की इन बातों और स्थितियों की गंभीरता नहीं समझ में आई हो यह संभव है लेकिन अखबारों को बात समझ में आ गई और जैसा राहुल गांधी ने कहा, मीडिया भी विपक्ष की बात नहीं सुन (समझ) रहा था। इस खबर की प्रस्तुति से लग रहा है उसे बात समझ में आई है। यह हेडलाइन मैनेजमेंट के आने वाले निर्देशों के बावजूद हो तो बड़ी बात है और निर्देश नहीं आए तो आप समझ सकते हैं कि असर पूरा हुआ है।
आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रस्तुति बताना जरूरी है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है – Delhi hunkers down for Opposition’s anti-CEC protest (दिल्ली में विपक्ष के सीईसी-विरोधी प्रदर्शन की तैयारी)। यहां hunkers down (हंकर्स डाउन) मतलब तैयारी तो है लेकिन यह तैयारी विशेष होती है। इसका मतलब है, किसी खतरे या कठिन परिस्थिति के टलने तक लंबे समय के लिए सुरक्षित रहने की तैयारी करना या किसी काम में पूरी गंभीरता से जुट जाना। अखबार में इस लीड के साथ छपी खबर कल के मॉक पार्लियामेंट की है।
आप जानते हैं कि सरकार विरोधी या विपक्ष का समर्थन या उसकी प्रशंसा करने वाली खबरों को लंबे समय से बमुश्किल पहले पन्ने पर जगह दी जा रही है। आज यह खबर जब कई अखबारों में लीड है तो हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड राम लीला मैदान की रैली के लिए की गई तैयारी की खबर है। मॉक पार्लियामेंट की खबर यहां आज भी लीड नहीं है। इसका शीर्षक है, Opposition holds ‘public impeachment’ of poll panel chief; ‘drama’ says BJP (विपक्ष ने चुनाव आयोग के प्रमुख के खिलाफ ‘सार्वजनिक महाभियोग’ की कार्रवाई की; भाजपा ने इसे ‘ड्रामा’ बताया)। मॉक पार्लियामेंट के जवाब या प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री ने जो कहा है वह यहां सिंगल कॉलम में है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड चुनाव आयोग की मनमानी पर कार्रवाई की खबर है। शीर्षक है – पीलीभीत विवाद के बाद उत्तर प्रदेश में ईसीआई नेट लॉगिन बंद। खबर में बताया गया है, अनियमितताओं के लिए 2 एसडीएम के खिलाफ मामला दर्ज, वेट लिस्ट में डाले गए। यह कार्रवाई 12 नवंबर को ‘विशेष सरसरी पुनरीक्षण’ के लिए मतदाता सूची का ड्राफ्ट प्रकाशित होने से पहले की गई है। विवाद तब सामने आया जब मतदाताओं ने शिकायत की कि उनके ईपीआईसी नंबरों पर अन्य मतदाताओं की जानकारी दिख रही है। सीईओ ने कंप्यूटर सहायकों द्वारा दर्ज किए गए फॉर्म 6, 7 और 8 के ऑडिट का आदेश दिया है और इन्हें आवेदनों को डिजिटाइज़ करने से रोक दिया गया है। आप जानते हैं चुनाव आयोग, एसआईआर से संबंधित शिकायतें सुनी ही नहीं जाती थीं। राहुल गांधी ने कर्नाटक में वोट चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त पर वोट चोरों की मदद करने का आरोप लगाया था तो चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयु्क्त और भाजपा की क्या प्रतिक्रिया थी।
अब उत्तर प्रदेश के मामले में कार्रवाई और सुनवाई हो रही है तो इसका कारण चुनाव आयोग के कारनामों का खुलासा और विपक्ष के एकजुट विरोध के कारण दबाव बढ़ना तो हो ही सकता है। यह भी संभव है कि भाजपा की आंतरिक राजनीति में उत्तर प्रदेश में मिली गड़बड़ियों को ठीक करके यह कह दिया जाए कि जो गड़बड़ी मिली सब ठीक हो गई और सघन पुनरीक्षण की खामियां सरसरी पुनरीक्षण में ठीक कर दी गईं। इस पर नजर रखना, समझना और समझाना मीडिया का काम है लेकिन मीडिया का बड़ा हिस्सा राजा का बाजा बजाने में लगा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में मॉक पार्लियामेंट की खबर तीन कॉलम की लीड के ठीक नीचे तीन कॉलम में ही छपी है। शीर्षक है – विपक्ष के ‘मॉक पार्लियामेंट’ ने रैली से एक दिन पहले सीईसी पर ‘महाभियोग’ चलाया; प्रधानमंत्री ने उन्हें ‘काम में बाधा डालने वाला’ बताया।
मुझे लगता है कि प्रेस कांफ्रेंस नहीं करना, आरोपों का जवाब नहीं देना, चुनाव आयोग का बचाव करना ऐसे मामले हैं जिनके बाद प्रधानमंत्री के पास बोलने के लिए कुछ होना नहीं चाहिए और वे जो बोल रहे हैं उसका मतलब नहीं है। प्रधानमंत्री के स्तर का तो नहीं ही है। प्रधानमंत्री सिर्फ भाजपा का नहीं होता है। फिर भी जो है वह सबके सामने हैं और उसे समझने की जरूरत है। मीडिया के साथ भाजपाई प्रचार तंत्र भांति-भांति के भ्रम फैलाने में लगा हुआ है। दि इंडियन एक्सप्रेस में मॉक पार्लियामेंट की खबर पांच कॉलम की लीड है। शीर्षक में ही कहा गया है कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष को काम में बाधा डालने वाला कहा। लोकतंत्र में विपक्ष की निश्चित भूमिका है। भाजपा विपक्ष में थी तो यही करती थी लेकिन सत्ता में है तो विपक्ष को काम में बाधा डालने वाला कह रहे हैं। यह खबर नहीं है और इसीलिए हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम में छपी है क्योंकि प्रधानमंत्री ने कहा है तो इस लायक होनी ही चाहिए।
आप जानते हैं कि दि इंडियन एक्सप्रेस की बात अलग है और यहां लीड के साथ छपी तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, “शक्तियां भारत को बांटने की साजिश कर रही हैं, सोशल मीडिया का उपयोग हथियार के रूप में किया जा रहा है : मोदी”। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, इंडिया गठबंधन ने छह आरोपों के आधार पर सीईसी के खिलाफ ‘महाभियोग’ का प्रस्ताव स्वीकार किया। उपशीर्षक है, विपक्ष ने संसद का प्रतीकात्मक सत्र आयोजित किया; उन्होंने ज्ञानेश कुमार पर भाजपा के साथ मिलकर चुनाव चुराने और 13.2 करोड़ मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने की साजिश रचने का आरोप लगाया। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड द हिन्दू में सेकेंड लीड है और लीड के बराबर में छपी है। शीर्षक है, पीलीभीत में मतदाता सूची के दुरुपयोग के बाद, यूपी ने एआरओ कंप्यूटर असिस्टेंट के लिए ईसीआई नेट लॉगिन को निष्क्रिय कर दिया है।
यह बेहद असामान्य है कि यह सब एसआईआर के तहत हुआ था। एसआईआर क्यों हुआ, किसने कहा, पता नहीं है लेकिन सरकार ने इसके लिए खर्च दिए और इसका बचाव कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में हुआ या उसने होने दिया। जमाने से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। ना एसआईआर रुक रहा है ना सुनवाई पूरी हो रही है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और नियुक्ति करने वाले लोगों को बदलने, सीजेआई को बाहर कर दिए जाने आदि से संबंधित मामले की सुनवाई नहीं हुई। मोटे तौर पर कल मॉक पार्लियामेंट में एक ऐसे व्यक्ति को पद से हटाने का निर्णय हुआ जिसकी नियुक्ति पर ही फैसला होना है। यह सब करने में देश का समय तो लगा ही। व्यापारियों के जरिए रैली स्थगित करने की मांग के जवाब में राहुल गांधी पहले कह चुके थे कि ज्ञानेश कुमार को हटा दिया तो रैली 30 सेकेंड में रद्द हो जाएगी। पर यह सब नहीं हुआ। तीन घंटे हजारों लोगों ने सीधा प्रसारण देखा। बाकी सब अलग।
हिन्दी अखबारों में देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, लोकतंत्र नष्ट कर रहे ज्ञानेश को जाना ही होगा : राहुल। इसका उपशीर्षक है संविधान व लोकतंत्र बचाने की लड़ाई जारी रखेगा विपक्ष। इसके साथ एक खबर, राहुल गांधी का आरोप है, 2024 का आम चुनाव अवैध था। इसके साथ भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा का कहा शीर्षक है – वोट चोरी की शुरुआत नेहरू ने की थी। की भी हो तो अब इस पर बात करने का समय नहीं है। मामला क्या है, सबको मालूम है फिर भी हर मौके पर पुरानी बातें उठा लाने से अभी की चोरी सही नहीं हो सकती है। लेकिन यही भाजपा का स्तर है और कथित पलटवार। जो असल में समय की बर्बादी है।
अमर उजाला की लीड का शीर्षक है – कांग्रेस अध्यक्ष खरगे के आवास पर जन महाभियोग, एसआईआर रोकने की मांग। मुख्य शीर्षक है – विपक्ष की छद्म संसद में सीईसी पर 6 आरोप, आज रामलीला मैदान में रैली। इस खबर के साथ भाजपा का पलटवार केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू का सवाल है। क्या ईवीएम से जीते कांग्रेसी सीएम इस्तीफा देंगे? और बात इतनी ही नहीं है। उन्होंने पांच सवाल पूछे हैं और अमर उजाला ने इन्हें पहले पन्ने पर छापा है। 1) 2014 में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटी जबकि चुनाव आयुक्त उसकी सरकार ने नियुक्त किए थे। 2) 2024 में तीसरी हार के लिए कांग्रेस क्या जवाब देगी 3) मृतकों, दोहरी प्रविष्टियों व स्थान बदल चुके वोटरों के नाम हटाने का विरोध क्यों? क्या पुराने एसआईआर अवैध थे? कहने की जरूरत नहीं है कि ये सारे सवाल हंसने लायक हैं। इनमें किसी का भी जवाब देने की कोई जरूरत नहीं है। सबको पता है।
दैनिक भास्कर ने संतुलित पत्रकारिता करने और दिखाने की कोशिश की है। आप कह सकते हैं कि यही संतुलित पत्रकारिता है। मुझे पत्रकारिता पर कुछ नहीं कहना है लेकिन दिख रहा है कि, भास्कर नॉलेज के तहत मॉक पार्लियामेंट को विरोध का मंच कहा गया है और इसके बारे में बताया गया है कि यह सीईसी को हटाने की प्रक्रिया नहीं है। मुझे नहीं लगता है कि इसे बताने की जरूरत थी। जरूरत पीएम के सवाल का जवाब देने की थी। या उनसे पूछना था कि जवाब वे देंगे या देश की जनता को देना है।
नवोदय टाइम्स में प्रधानमंत्री का यह रोना कि विपक्ष विरोध पक्ष के बजाय अवरोध पक्ष बन गया है – प्रमुखता से छपा है। टॉप पर बॉक्स में। बड़े फौन्ट वाली खबर को लीड कहें तो शीर्षक ऐसा है फौन्ट को पतला करना पड़ा है। ज्ञानेश को लेकर मॉक पार्लियामेंट। अगर यह शीर्षक – खरगे के घर मॉक पार्लियामेंट होता तो तंज कुछ ज्यादा तेज हो जाता। अक्षर कम हो जाते और चिपके हुए नहीं दिखते। लेकिन ज्ञानेश नाम का अपना महत्व और उससे लगाव हो सकता है। अलग मुद्दा है। इसके बराबर में भाजपा का तंज और संतुलित पत्रकारिता का दिखावा या कोशिश है। भाजपा के पास मुद्दों का जवाब नहीं है यह बड़ी बात नहीं है। जवाब तो चुनाव आयोग को देना है, ज्ञानेश कुमार को देना है लेकिन भाजपा उनका बचाव करके खुद बता रही है कि प्रधानमंत्री मजाक बन गए हैं। ऐसे में सवाल यह है कि राहुल गांधी जीवन भर मॉक प्रधानमंत्री बने रहेंगे तो क्या नरेन्द्र मोदी के दामन पर लगा ‘वोट चोर’ का दाग साफ हो जाएगा? या दाग अच्छे हो जाएंगे?

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



