संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों के पहले पेज की खबरों में क्रिकेट टीम का मुंबई में स्वागत, हेमंत सोरेन फिर मुख्यमंत्री बने, चंद्रबाबू नायडू ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की, हाथरस हादसे में छह गिरफ्तार जैसी खबरें हैं। बिहार में पुल ध्वस्त होना और 15 दिन में 12 का बह जाना भी बड़ी खबर है। एक पुल पर प्रधानमंत्री ऐक्ट ऑफ गॉड और ऐक्ट ऑफ फ्रॉड का मामला बना चुके हैं। यह खबर सिंगल कॉलम से आगे बढ़ ही नहीं रही है। जो खबर नहीं है वह यह कि मुकेश अंबानी ने कल सोनिया गांधी से मुलाकात की और अग्निवीर के मामले में राहुल गांधी का कथित झूठ पकड़ लिया गया है।
दैनिक भास्कर की एक पुरानी खबर के अनुसार, चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने तेलंगाना के करीमनगर में पहली बार अडाणी-अंबानी का जिक्र करते हुए राहुल गांधी पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था, “पिछले पांच साल से कांग्रेस के शहजादे दिन-रात एक ही माला जपते थे। …. जब से चुनाव घोषित हुआ है, इन्होंने अंबानी-अडाणी को गाली देना बंद कर दिया है…क्यों? प्रधानमंत्री ने कहा था, मैं कांग्रेस के शहजादे से पूछना चाहता हूं कि उन्होंने अडाणी और अंबानी से कितना माल उठाया है? काला धन के बोरे भर के रुपए मारे हैं? कांग्रेस पार्टी को चुनाव के लिए उन उद्योगपतियों से कितना माल मिला? क्या टेंपो भरकर माल पहुंचा है?
यही नहीं, हाल में उन्होंने संसद में कहा था, हां, मैने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की खुली छूट दे रखी है, सरकार इसमें टांग नहीं अड़ाएगी। मैं चुनाव हार-जीत के लिए नहीं लड़ रहा हूं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई मेरा मिशन है। प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस के एक तिहाई सरकार के तंज पर पलवार करते हुए कहा कि यह सही बात है। लेकिन मुद्दा यह है कि इन एजेंसियों को सरकार से मुक्त होना चाहिये और सरकार के खिलाफ जांच करने में भी सक्षम होना चाहिये। हालत यह है कि ये एजेंसियां भाजपा तो छोड़िये भाजपा में शामिल होने वाले लोगों के खिलाफ जांच को ठंडे बस्ते में डाल देती रही हैं। इसलिए न सिर्फ भाजपा को वाशिंग मशीन पार्टी कहा जाता है बल्कि यह आरोप भी लगा है कि सरकार इन एजेंसियों का उपयोग न सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए करती है बल्कि इनके जरिये विपक्षी नेताओं को डराने-धमकाने और परेशान करने के भी आरोप है। इस लिहाज से अपने बयान से प्रधानमंत्री ने आरोपों को स्वीकार कर लिया है और जब उन्होंने आरोप लगाया था तो अब बताना चाहिये कि मुकेश अंबानी सोनिया गांधी से मिलने गये तो सरकार ने आवश्यक जांच कर ली थी ना? या सही समय पर राजनीति आरोप लगाये जायेंगे?
आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री के आरोप के बाद राहुल गांधी ने एक वीडियो साझा किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि नरेंद्र मोदी जी, अडानी-अंबानी आपको ‘टेंपो’ में भरकर पैसे देते हैं क्या? ये आपका पर्सनल एक्सपीरियंस है? राहुल गांधी ने कहा था – मोदी जी, एक काम कीजिए – सीबीआई, ईडी को इनके पास भेजिए। पूरी जांच कराइए, इन्क्वायरी कराइए। घबराइए मत। पर कुछ हुआ नहीं। चुनाव आयोग भी चुप्पी साधे रहा। प्रधानमंत्री ने आपत्तिजनक भाषण दिये। मांस-मछली, मुसलमान से मंगलसूत्र होते हुए मुजरे तक पहुंच गये। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्य सभा में इन भाषणों की चर्चा की तो उनसे कहा गया कि वे जो आरोप लगा रहे हैं उसे ऑथेंटिकेट करके दें। इसके लिए अखबार की खबरों की कतरन से काम नहीं चलेगा। पर वह अलग मुद्दा है। मीडिया के लिए खबरों की परिभाषा बदल गई है। वह इन मामलों में प्रधानमंत्री से सवाल करने की बजाय अग्निवीर के मामले में राहुल गांधी के आरोप को गलत साबित करने में लगा है। इस मामले में प्रधानमंत्री जवाब नहीं देते तो जानकारों से इसपर चर्चा हो सकती है पर वैसा भी कुछ नहीं दिखता है।
नायडू-नीतिश डिपेंडेंट अलायंस
अभी तो तथ्य यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम ऐसे आये कि भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और एनडीए यानी राजग की सरकार बनी है जो नीतिश कुमार तथा चंद्रबाबू नायडू के समर्थन पर आश्रित है। इसलिए अब एनडीए को नायडू-नीतिश डिपेंडेंट सरकार भी कहा जाता है। आज ही खबर है नायडू ने मांगों की लंबी सूची के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात की। नीतिश कुमार के बारे में भी यही कहा जाता है कि वे बिहार के लिए पैकेज की आस में नरेन्द्र मोदी सरकार का समर्थन कर रहे हैं। दोनों ने मिलकर उन्हें लोकसभा का अध्यक्ष भी अपने मन का बनवाने में साथ दिया और उसके बाद लोकसभा में जो सब हुआ वह हम देख चुके हैं। ऐसे में मुकेश अंबानी का सोनिया गांधी से मिलना बड़ी खबर है लेकिन पहले पन्ने पर नहीं है तो आप समझ सकते हैं कि यह अकारण नहीं होगा। यह हेडलाइन मैनजमेंट का मामला है और लगता है कि सवाल सिलेबस से बाहर का था या निर्देश देने वालों ने ऐसा सोचा ही नहीं होगा और पक्का निर्देश नहीं होने कारण जोखिम नहीं लिया होगा। आपको लग सकता है कि निर्देश तो फोन पर लिये जाने थे और लिया जा सकता था। लेकिन विकास की कहानी यह है कि देश में अब संभवतः सरकार के पास जासूसी के लिए पेगासस है और फोन पर ऐसी सूचना लेना देना खतरे से खाली नहीं है।
कंप्यूटर में स्पाईवेयर डालकर उसके जरिये सबूत प्लांट करने और फिर गिरफ्तार कर लिये जाने का भी मामला है। इसलिए, संभव है, महत्वपूर्ण लोग इस तरह के ई-मेल वगैरह नहीं कर रहे होंगे या इन्हें इससे रोका गया होगा। हालांकि, यह भी मेरा मुद्दा नहीं है। मेरे लिये तो अग्निवीर मुद्दा है। आप जानते हैं कि राहुल गांधी ने इस संबंध में संसद में मामला उठाया था तो रक्षा मंत्री और गृहमंत्री ने उनपर सदन में भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। राहुल गांधी अपने आरोप पर डटे रहे। अगले दिन अखबारों में यह खबर छपी तो राहुल गांधी ने संबंधित अग्निवीर के पिता से बातचीत का वीडियो जारी कर दिया। इसके अनुसार केंद्र सरकार ने कोई मुआवजा नहीं दिया था। इसके बाद कल ट्वीटर पर इंडिया टीवी ट्रेन्ड कर रहा था। पता चला कि इंडिया टीवी ने कोई खबर दिखाई थी जिसमें शहीद के पिता ने कहा था कि उन्हें इतने पैसे मिले हैं। ये वो पैसे हैं जो बीमा राशि के रूप में मिले थे और जिसे सेना ने ट्वीट कर बताया था। इस तरह, इंडिया टीवी ने सेना के ट्वीट की पुष्टि की और राहुल गांधी के वीडियो को गलत साबित करने की कोशिश की। शहीद अग्निवीर के परिवार का कहना था कि इंडिया टीवी ने पूरी बात नहीं बताई और भ्रम फैला रहा था। इससे संबंधित वीडियो ट्वीटर पर ट्रेन्ड कर रहा था। ऐसे में यह मामला भी कम नहीं है। सरकार समर्थकों ने अपने स्तर पर यह साबित कर दिया है कि राहुल गांधी ने गलत बयानी की जबकि राहुल गांधी के समर्थकों का मानना है कि रक्षा मंत्री ने गलत बयानी की। मुद्दा यह है कि नौकरी के दौरान मौत पर मुआवजा मिलता ही है। निजी क्षेत्र भी मजबूरी में ही सही, आगे की सरकारी कार्रवाई और जहां वह काम करता है वहां के लोगों की नाराजगी से बचने के लिए किसी की मौत की स्थिति में मुआवजा देता ही है। सैकड़ों उदाहरण मिल जायेंगे। ऐसे में अग्निवीर को जो मिला है वह मुद्दा नहीं है। मुद्दा पेंशन, मुआवजा और शहीद का दर्जा है। बीमा राशि मुआवजा नहीं है और मामला केंद्र सरकार द्वारा मुआवजा दिये जाने का है। वरना अजय सिंह के पिता ने यह कहा है कि उन्हें पंजाब सरकार ने मुआवजा दिया है। जाहिर है, आधी-अधूरी खबरों से भ्रम फैलाया जा रहा है और राहुल गांधी के मुद्दे को बदलने की कोशिश चल रही है। इसलिए आज यह खबर भी महत्वपूर्ण है लेकिन पहले पन्ने पर नहीं है। शायद इसलिए कि अखबार एक ही पक्ष नहीं बता सकते और दोनों पक्ष बतायेंगे तो एजंडा सेट नहीं होगा। इसलिए छोड़ दिया गया हो।
परीक्षा की प्रतिष्ठा और नीट
ऐसे में इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड, “परीक्षा की प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए केंद्र ने राज्यों से सुरक्षा में मदद करने के लिए कहा” है। इस खबर के फ्लैग शीर्षक के अनुसार गये हफ्ते पायलट रन किया जा चुका है। उपशीर्षक है, राज्यों से कहा गया है कि प्रत्येक परीक्षा केंद्र में एक असैनिक और एक पुलिस पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाये। आज ही खबर है कि नीट के 50 से अधिक सफल परीक्षार्थी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गये हैं और याचिका दायर कर मांग की है कि परीक्षा रद्द नहीं की जाये। मेरा मानना है कि ये छात्र प्रश्नपत्र लीक होने के लाभार्थी नहीं है इसे जानने और सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है। किसी ने भी अगर प्रश्नपत्र लीक होने या खरीद कर परीक्षा में सफलता पाई होगी तो चाहेगा कि परीक्षा रद्द नहीं हो। लीक की व्यवस्था चली और इससे फायदा उठाने वालों के लिए यह अच्छी बात होगी। वे फिर वे इसी तरह लीक करेंगे, लाभ उठायेंगे, कोशिश करेंगे कि मामला लीक न हो और हो जाये तो इन्हीं तर्कों और शर्तों से मांग करेंगे की परीक्षा रद्द नहीं की जाये और अभाविप के पूर्व सदस्य के नेतृत्व में एनटीए की भ्रष्ट व्यवस्था चलती रहेगी और कमाई का हिस्सा इलेक्टोरल बांड के रूप में या चंदे के रूप में संरक्षण देने वाले राजनीतिक दल को मिलता रहेगा। छात्र परेशान होते रहेंगे, चयन में गड़बड़ी चलती रहेगी।
इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे 56 छात्रों की खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर दो कॉलम से ज्यादा में है। दूसरी ओर, शायद, सरकार भी ऐसा ही चाहती है। आप जानते हैं कि शिक्षा मंत्री ने पहले ही कह दिया था कि प्रश्नपत्र लीक नहीं हुआ है, फिर कहा कि वह एक स्थान पर केंद्रित है। फिर उसका देशव्यापी विस्तार दिखा, बिहार पुलिस ने आरोप लगाया कि एनटीए ने जांच सहयोग नहीं किया तो एनटीए के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय जांच सीबीआई को दे दी गई। यानी जो मामला पहले बिहार में सीमित था, बिहार पुलिस जांच कर रही थी उसे सीबीआई को दिया गया तो क्या जांच सिर्फ बिहार में होनी थी? जांच देशव्यापी है तो मामला बिहार में सीमित कैसे है और नहीं है तो परीक्षा रद्द क्यों नहीं होनी चाहिये। मीडिया इसपर चर्चा क्यों नहीं कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट से परीक्षा रद्द न हो की मांग करने वाले लीक के लाभार्थी नहीं हैं, कैसे तय होगा और बिना तय किये परीक्षा रद्द करने पर रोक की मांग क्यों। और जब इतना सब हो रहा है तो मीडिया में चर्चा क्यों नहीं? हाल में एएनआई की स्मिता प्रकाश का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वे इस बात से परेशान दिखी थीं कि सरकार का समर्थन करने वाले यू ट्यूबर लोकप्रिय क्यों नहीं हैं। मेरा मानना है कि वे अगर इन विषयों पर चर्चा करें तो लोकप्रिय हो सकते हैं।
संदेश में प्रधानमंत्री की नसीहत
चीन के विदेश मंत्री से भारत के विदेश मंत्री की मुलाकात के बाद सरकारी प्रचार में अच्छे शीर्षक वाली एक खबर भी आज पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस में यह तीन कॉलम में है। शीर्षक है, “एलएसी की स्थिति एक दूसरे के हित में नहीं है : भारत और चीन सहमत”। इस खबर का इंट्रो है, मुद्दों को निपटाने के लिए दोनों (देश) प्रयासों को फिर से दूना करेंगे। द हिन्दू का शीर्षक है, “जयशंकर ने वांग यी से मुलाकात की, कहा – एलएसी का सम्मान होना चाहिये।” हिन्दु्स्तान टाइम्स, भारत ने चीन को याद दिलाया, एलएसी के लिये सम्मान महत्वपूर्ण है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन यहां राहुल गांधी के हाथरस दौरे और वहां चल रही जांच में बाबा को बख्श दिये जाने की खबर लीड है। नवोदय टाइम्स में जयशंकर ने चीन के विदेश मंत्री से कहा, एलएसी का हो सम्मान। सबसे अच्छा प्रचार अमर उजाला में है। फ्लैग शीर्षक है, “एससीओ शिखर सम्मेलन में पीएम की चीन को दो टूक। संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान जरूरी : मोदी। अखबार ने लिखा है, प्रधानमंत्री ने पड़ोसी देशों को कड़ा संदेश दिया है। यह संदेश एससीओ के नाम है और इसके जरिये दो टूक नसीहत दी गई। कई राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति में विदेश मंत्री ने यह संदेश पढ़ा।
हाथरस हादसा
सरकार ने जांच से बाबा को मुक्त कर दिया है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार हादसास्थल का नियंत्रण बाबा और उनके सुरक्षा कर्मियों के पास था लेकिन एफआईआर में इनका नाम नहीं है। पुलिस फरार सेवादार को तलाश रही है। फिर भी अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, हाथरस हादसे में छह गिरफ्तार, फरार मुख्य सेवादार पर एक लाख का ईनाम। उपशीर्षक है, गिरफ्तार सेवादारों का कबूलनामा, बाबा की चरणरज लेने के लिए भीड़ को बेकाबू छोड़ा, जिससे हुआ हादसा। मैं नहीं जानता कि मामला क्या है लेकिन अखबारों में जो छप रहा है उससे सेवेदारों को गिरफ्तार करने और उनके कबूलनाम पर उन्हें सजा हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा। पर खबरों से ही लग रहा है कि मुख्य आरोपी बाबा हैं और वे अपना दोष जानते हैं। इसीलिए फरार है पर ईनाम सेवादार पर है। अगर यह सही है कि बाबा के चरण रज लेने के लिए भीड़ बेकाबू हो गई तो सीधी सी बात है कि बाबा को इसका पूर्वानुमान होना चाहिये था और सुरक्षा की आवश्यक व्यवस्था करनी चाहिये थी या इतनी भीड़ नहीं जुटानी चाहये थी। अनुमान ही नहीं था तो बगैर अनुमान लोगों को जुटाने और मनमाने कार्यक्रम के दोषी वही हैं। जो भी हो खबरों के अनुसार, मौके पर नियंत्रण उनका था एफआईआर में नाम ही नहीं है। द टेलीग्राफ में अग्निवीर पर भी आज एक खबर है। राहुल गांधी आज हाथरस जायेंगे यह खबर भी आज पहले पन्ने पर नहीं है।



