पंकज शुक्ला-
एक रिपोर्ट के मुताबिक इन दिनों युवा, माता-पिता बनने की जल्दी में नहीं हैं। उनके अभिभावकों ने अपने संघर्षों से जो कुछ सीखा है, उसके चलते वे अपने इन युवा बच्चों पर ऐसा कुछ करने का ज़ोर भी नहीं डाल रहे। ओशो ने बहुत पहले कहा कि हमें प्रेम में संबंध तलाशना चाहिए, संबंधों में प्रेम नहीं। ऐसे ही दो युवाओं (लड़की 32 की, लड़का 42 का) की प्रेम कहानी है, फ़िल्म ‘आप जैसा कोई’। राजनेता कितने साल की उम्र तक युवा कहलाते हैं, याद है न?
फ़िल्म ‘आप जैसा कोई’ की ये समीक्षा नहीं है, बल्कि फ़िल्म देखते समय एक साधारण दर्शक की तरह मेरे मन में जो अनुभूतियां (feelings) हुईं, बस उन्हें आपके साथ साझा करने का मन हुआ। 40 पार का एक ब्राह्मण लड़का, जिसकी परवरिश ऐसे परिवार में हुई जहां बड़े भाई (पिता भी हो सकता है) का कहा पत्थर की लकीर है। वह अब तक ‘वर्जिन’ है। सेक्स चैट में सुख तलाशने का रास्ता उसे उसका दोस्त दिखलाता है, वहीं कभी ‘टकराई’ युवती उसकी होने वाली मंगेतर निकलती है। अब क्या होगा?
समाज में स्त्री और पुरुष के अधिकारों की सीमाएं टूट रही हैं, लेकिन कैसे? स्त्री को प्रेम चाहिए, बराबर वाला। जितना मैं, उतना तुम। पुरुष को अधिकार भी चाहिए, सम्मान भी चाहिए और वह उसे अपनी सपनों की रानी जैसा बनाना चाहता है। असल संघर्ष यहीं है। एक-दूसरे को बदलने की कोशिशों में लगे लोगों के लिए प्रेम का असली ज्ञान यही है, तत् सुखे त्वमं। मुक्ति ही वैसे तो जीवन का मतलब है और उम्मीदों व अपेक्षाओं से परे जाकर इसे पाया भी जा सकता है, लेकिन ये जितना आसान लिखना है, उतना ही दुष्कर है इसे अमल में लाना।
अमल में लाना ही किसी शिक्षक की सबसे बड़ी चुनौती है। जब मैं अपने कार्यक्रम में बार-बार दोहराता हूं, ‘आवत ही हरषत नहीं नयनन नहीं सनेह। तुलसी तहां न जाइए चाहे कंचन बरसे मेह।।’ तो मुझे इसे अपने घर, अपने परिजनों, अपने रिश्तेदारों और अपने कार्यस्थल पर भी लागू करना होता है। जी हां, न ऐसे घरों में जाना चाहिए जहां आपके पहुंचने से लोगों के चेहरों पर उत्साह न झलके और न ही ऐसे किसी केबिन के बाहर इंतज़ार करना चाहिए जहां आपके आने की सूचना उत्साह में न बदले।
‘आप जैसा कोई’ वैसे तो एक ऐप है इसी नाम की इस फ़िल्म की कहानी में, लेकिन परफेक्शन की तलाश में रहने वाले समाज पर भी ये एक व्यंग्य है। एक कटाक्ष है कि जो कुछ दूसरों को सिखलाते, उसे स्वयं कितना अपनाते। ख़ैर, लंबी छलांग से पहले थोड़ा पीछे जाता हूं। ये उन दिनों की बात है जब, विजय सेतुपति और तृषा कृष्णन की अद्भुत रूमानी फिल्म ‘96’ रिलीज़ ही हुई थी। ऐसी कोई फ़िल्म हिंदी में करने के लिए अभिनेता आर माधवन काफ़ी उत्सुक थे। तमिल में उन्होंने ‘मारा’ की भी लेकिन, एक हिंदी रोमांटिक फिल्म करने की उनकी चाह बनी रही। ‘रहना है तेरे दिल में 2’ की ख़ूब स्क्रिप्टें लिखी गईं। लेकिन, बाजी हाथ लगी निर्देशक विवेक सोनी के।
कम ही फ़िल्में होती हैं, जो अपने समय का दस्तावेज बन पाती हैं। समाज को सुधारने का काम सिनेमा डंके की चोट पर कभी नहीं कर सकता। वह सिर्फ़ एक निर्देशक कर सकता है, अपने सिनेमा में कुछ ऐसे तत्व डालकर जो चाय में बस अदरख, इलायची या सौंफ बनकर निकल जाएं। इनकी महक ही बदलाव सुझाती है। तीन वक्त के खाने और तीन बार की चाय में अटका रिश्ता कब हाथ से छूट जाए? ‘आप जैसा कोई’ इसकी बानगी बनती है। फ़िल्म के निर्देशक विवेक सोनी के साथ-साथ इसके लिए बधाई इसकी लेखक राधिका आनंद को भी बनती है। राधिका को लेखिका जानबूझकर नहीं लिख रहा हूं। हिंदी भाषी समाज में पदों को पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में बदलने की रूढ़ियां तोड़ना भी ज़रूरी है, अगर हम वाक़ई समानता के पैरोकार हैं, तो।
स्त्री से अक्षत कौमार्य की उम्मीद करने वाले पुरुष को जब ये सुनने को मिले, ‘आजकल 16-17 साल के बाद कौन कुंआरा रह जाता है?’ तो ये न्यू मिलिनियल्स या बीती सदी के आखिरी दशक में पैदा हुई पीढ़ी की अपने शरीर को लेकर बनी नई अवधारणा भी बताती है। ज़माना बदल रहा है। मौजूदा वक्त चुनौती का है। 40 के दशक में जन्मे अभिभावकों संग बड़ी हुई 60-70 के दशकों में जन्मी पीढ़ी को अपने इन न्यू मिलेनियल्स या बीती सदी के आख़िरी दशक में जन्मे बच्चों संग आगे बढ़ना भी चुनौती-सा रहा है। ये वो पीढ़ी है, जिसके लिए ‘सो व्हाट’ या ‘आई नीड माय प्रायवेसी’ जैसे जुमले उसके अधिकारों का टूल हैं।
ज़माना बदल रहा है। बस, हिंदी सिनेमा में ही सब उसे महसूस नहीं कर पा रहे। बधाई, आर माधवन, फ़ातिमा सना शेख और विवेक सोनी को, एक अच्छी और अपने समय की कहानी कहती फ़िल्म बनाने के लिए। तमाम लोगों को ये फ़िल्म बोरिंग, धीमी और बिहार व बंगाल के सामाजिक विकास पर टिप्पणी करती भी लग सकती है। लेकिन, दरअसल ये यही है। कमाल की सिनेमैटोग्राफ़ी, अद्भुत प्रोडक्शन डिज़ाइन और ‘मधुर’ (मेलोडियस) गीत-संगीत-पार्श्वसंगीत इस फ़िल्म की अतिरिक्त ख़ूबियां हैं।
प्रेम करना आज की तारीख़ में सबसे बोरिंग काम है। इंतज़ार धीमा होता जा रहा है। फ़िल्म बिहार और पश्चिम बंगाल के बदलते सामाजिक परिवेश की एक झलक भी है। बिहार में जो चुनाव आयोग कर रहा है, वह आप देख ही रहे हैं, पश्चिमी और पूर्वी बंगाल में भी ज़्यादा अंतर अब बचा नहीं है…! अगर सिनेमा से आपको प्यार है, और अच्छे सिनेमा की आपको समझ भी है, तो आपके अपने प्यार के लिए फ़िल्म ‘आप जैसा कोई’ किसी आइने से कम नहीं है, देखना ज़रूर।



