राजशेखर पन्त-
असहमति की अभिव्यक्ति के लिए क्या आचरण की शालीनता को ताक पर रख, अभद्रता पर उतर आना, गाली गलौज करना, मर्यादाओं को तिलांजलि दे देना और अंततः हिंसक हो जाना आवश्यक हो चुका है? बगैर ऐसा कुछ करे क्या अपनी असहमति को दर्ज कराना अब संभव नहीं रह गया है। संसद से लेकर सड़क तक और हल्ला बोल दंगल, कुरुक्षेत्र, या आर-पार जैसे बौखलाए नामों वाले टीवी शोज़ में, सभ्य, शालीन और कथित रूप से पढ़े-लिखे समाज की स्थापित और अपेक्षित वर्जनाओं को आये दिन तार-तार होते देखना अब आम हो गया है। हम में से अधिकांश लोग तो यह सब देख के अब संभवतः विचलित भी नहीं होते। एक सहज स्वीकार्यता सी मिल चुकी है इस आचरण को अब, और निश्चय ही यह एक दुर्भाग्यपूर्ण और खतरनाक स्थिति है।
असहमत होना एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है। पढ़े-लिखे और जागरूक समाज की पहचान है यह। व्यापक स्तर पर यदि देखें तो सरकार की नीतियों से, किसी राजनैतिक दल, व्यक्ति या विचार से निश्चित रूप से असहमत हुआ जा सकता है; अधिकार है यह आपका। एक स्वतंत्र राष्ट्र के जिम्मेदार और जागरूक नागरिक के नाते मुझे अधिकार है कि मैं गाँधी, नेहरू, भगत सिंह, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, गोलवरकर, सुभाष चंद्र बोस या फिर किसी अन्य राष्ट्रीय नेता की नीतियों, विचारों से इत्तेफ़ाक न रखता होऊँ; मुझे उनके भाषण, उनका लिखा हुआ व्यक्तिगत रूप से नापसंद हो। उनसे असहमत होने का, उनकी आलोचना करने का पूरा अधिकार है मुझे। पर अपनी असहमति दर्ज कराने के लिए यदि मुझे अशिष्ट भाषा का प्रयोग करना पड़े; अश्लील संबोधन गढ़ने पड़ें; उनका चरित्र हनन करना पड़े -तो निश्चित ही मेरी असहमति आधारहीन है।
किसी भी धर्म से संबंधित ग्रंथों, पौराणिक आख्यानों, यहां तक कि इतिहास को भी चीर-फाड़ कर उसे वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए निहायत ही फूहड़ तर्क गढ़ना आजकल कथित बहस-मुबाहिसों का खास शगल बन गया है। इन ग्रंथों को हम समय के उस हिस्से के परिपेक्ष्य से देखना-समझना नहीं चाहते जब एक बेहतर और व्यवस्थित जीवन की उम्मीद में इन्हें तत्कालीन मान्यताओं और परिवेश के आधार पर रचा गया होगा। लगभग दो हज़ार साल पूर्व लिखी गयी मनुस्मृति की आज शल्यक्रिया कर वाहवाही लूटने का प्रयास करना, या गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी ‘ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी….जैसी पंक्तियों को संदर्भित कर उन्हें बुराभला कहने का भला क्या अर्थ है आज। ये सब कुछ जब लिखा गया था तब सामाजिक-आर्थिक स्थितियां कुछ और थीं। बीते हुए सैकड़ों सालों में वह सब अब
इतिहास बन चुका है, खो चुका है अपने अर्थ। अगर बार बार राख के इस ढेर को कुछ हितों को साधने की नीयत से कुरेदा न गया होता तो शायद नई पीढ़ी को तो नाम भी पता नहीं होता मनुस्मृति का। कैथोलिक समाज में हैरेसी के आरोपियों को कभी सूली पर चढ़ा कर जिंदा जला दिया जाता था। पर यह सब अब अतीत बन चुका है। समय के चिरंतन प्रवाह ने बाध्य किया है हमें, वह सब तट पर छोड़ देने के लिए जो त्याज्य था। परिस्थितियों ने, बदलते हुए समय ने हमें निखारा है, सभ्य बनाया है।
धर्म अपने मूल रूप में उस समाज का प्रतिबिंब होता है और उन परिस्थितियों से निर्धारित होता है जो उसे उस वक्त कंडीशन करती हैं जब यह गढ़ा गया था। मध्य एशिया के कबीलाई समाज में कई कारणों से जीवन अत्यंत संघर्षमय, अधिक दुरूह रहा था। तत्कालीन जरूरतों को पूरा करने के लिये वहां विकसित हुई धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं का गंगा-यमुना के उपजाऊ और संपन्न मैदानों में विकसित हुई धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं से भिन्न होना नितांत स्वाभाविक और सहज सी बात है। धार्मिक रीतियों, कुरीतियों के मूल को समझे बग़ैर उन्हें तीखे और चुटीले तर्कों का आधार बनाना भला कहां की समझदारी है। बेहतर होता कि खुद की कमीज़ को दूसरे की कमीज़ से ज्यादा पाक-साफ साबित करने की ज़हालत को छोड़ कर कोशिश यह की जाती कि दोनों कमीजों के दाग़ वक्त रहते छूट जाएं। दुर्भाग्य ही है यह कि इस संदर्भ में असहमति से जन्मी बहस अक्सर स्वयं को श्रेष्ठतम साबित करने की होड़ में बदल जाती है।
इतिहास की स्थापित मान्यताओं से असहमत हो कर किसी पूर्वाग्रह के चलते उसकी पुनर्व्याख्या करना मुझे प्रायः एक अंग्रेजी अवधारणा- जेडबर्ग जस्टिस की याद दिलाता है। इस अवधारणा की व्युत्पत्ति का आधार सत्रहवीं शताब्दि की एक पुरानी सोच है- हैंग इन हेस्ट, एंड ट्राइ इन लेजर यानी कि पहले सजा निर्धारित कर उसे देने की प्रक्रिया पूरी कर लें, तहकीकात तो फिर होती ही रहेगी।
पुष्यमित्र शुंग को बौद्ध द्रोही, समुद्रगुप्त को साम्राज्य वादी, अशोक को क्रूर और बाबर को लुटेरा मान लेना ऐसा ही है। इतिहास से असहमत होना अपराध नहीं है, पर इस असहमति का आधार तार्किक होना चाहिए। उदाहरण के लिए दिए गए इन नामों को यदि आप उस कालखंड जिसमें ये थे, की मान्यताओं, सामाजिक मूल्यों और तत्कालीन आर्थिक-राजनैतिक परिदृश्य से पूरी तरह काट कर देखेंगे तो ये निश्चित ही बौद्ध द्रोही, साम्राज्यवादी, क्रूर और लुटेरे ही लगेंगे, ठीक उसी तरह जैसे श्री कृष्ण को यदि उनकी समग्रता से काट कर मात्र चीर हरण वाले प्रसंग में देखा जाए, गांधी को सिर्फ उनके ब्रह्मचर्य के कथित प्रयोगों तक सीमित कर दिया जाए या फिर चर्चिल को महज उसकी शराबखोरी की आदत के लिए याद किया जाए -तो इनका बिम्ब एक चरित्रहीन या शराबखोर लंपट के रूप में ही उभरेगा।
मुझे अक्सर यह लगता है कि वर्तमान में असहमतियों के अचानक हुए विस्फोट का प्रमुख कारण हमारे इसी तरह के पूर्वाग्रह हैं। किसी समूह या वर्ग के एक सदस्य के रूप में हम असहमत पहले हो जाते हैं और फिर बाद में अपनी असहमति का कोई कारण ढूंढ या गढ़ लेते हैं। किसी घटनाक्रम, विचारधारा या व्यक्तित्व को उसकी समग्रता में न देख कर टुकड़े-टुकड़ों में उसका विश्लेषण करना, असहमत होने का कोई ऐसा कारण सहज ही गढ़ लेता है जिस पर फौरी तौर पर यकीन किया जा सके। कला, साहित्य, संस्कृति, संगीत, स्थापत्य, भाषा इत्यादि के क्षेत्र में मुगल युग के योगदान को अनदेखा कर उन शासकों को लुटेरा कह कर खारिज कर देना उल्लेखित असहमति का एक अच्छा उदाहरण हो सकता है।
पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, सही-ग़लत, कानूनी-गैरकानूनी, त्याज्य-स्वीकार्य इत्यादि -ये सब सापेक्ष धारणाएं हैं। बहुत कुछ जो आज से पांच-सात दशक पूर्व तक ग़लत समझा जाता था, अस्वाभाविक हुआ करता था, आज सहज स्वीकार्य हो चुका है; फिर इतिहास तो सैकड़ों वर्ष पूर्व का लेखाजोखा है। उसका मनन करना, विश्लेषण करना, उससे सबक सीखना जायज है। ऐसा किया भी जाना चाहिए। पर वर्तमान मान्यताओं के आधार पर उस वक्त के किसी घटनाक्रम, किसी व्यक्ति को सही या गलत ठहराना मेरे विचार से किसी पूर्वाग्रह से कंडीशन हो कर निर्णय सुनाने जैसा है।
कार्लमार्क्स का यह कहना कि -इंसान इतिहास बनाता जरूर है पर उसका निर्माण वह अपनी इच्छा अनुसार नहीं कर सकता; तत्कालीन परिस्थितियां, और वह सब जो उस समय को विरासत में मिला है, इसका निर्धारण करते हैं -वास्तव में दीवार पर लिखी गयी एक इबारत है जिससे हम नज़रें चुराते आये हैं।
जर्मन दार्शनिक नीत्शे इसी विचार की एक और परत खोल कर इतिहास के दागदार पन्नों के लिए व्यक्ति को कमोबेश दोषमुक्त कर देता है- व्यक्तियों में पागलपन एक दुर्लभ लक्षण है, पर समूह, दल, राष्ट्रों और कालखंडों के संदर्भ में यह एक स्थापित नियम है।
यह कहते हुए कि-
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
भगवत गीता इस संदर्भ को थोड़ा और गूढ़ बना देती है। व्यक्ति की अवधारणा, जहां तक मैं समझता हूं, भारतीय दर्शन में शरीर और आत्मा के द्वैत पर आधारित है। शरीर अज्ञानवश उन कर्मों को भी
स्वयं द्वारा किया हुआ मान लेता है जो वास्तव में प्रकृति के गुणों द्वारा संपादित और क्रियान्वित होते हैं, और प्रकृति का निर्धारण काल करता है- काल यानि कि समय। वैसे मैं इसे एक सहज और अनुभूत सत्य मानता हूं, जिसे ढूंढने-समझने के लिए कार्लमार्क्स, नीत्शे या भगवत गीता का पढ़ा जाना कम से कम अपरिहार्य तो नहीं है। स्वयं सोच कर देखिएगा, शायद तब मुझसे सहमत होना इतना कठिन नहीं लगेगा।



