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वाह मोदीजी वाह : नागरिकों के जीवन से ज्‍यादा जरूरी अडानी का लाभ!

अनिल कुमार-

ये आरोप नहीं है बल्कि सच्‍चाई है कि अडानी को फायदा पहुंचाने के लिये केंद्र की मोदी सरकार आम नागरिकों के जान से भी समझौता कर सकती है. मोदी और भाजपा को झऊआ भर वोट देने वाले आम नागरिकों के जीवन की सुरक्षा अडानी के लाभ के आगे केंद्र सरकार के लिये कोई मायने नहीं रखती है. आम नागरिक, पशु पक्षी की जान जाये, जैव विविधता नष्‍ट हो तो हो, लेकिन अडानी के आमदनी को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिये.

मिर्जापुर के ददरी खुर्द गांव में अडानी समूह द्वारा 1600 मेगावाट के थर्मल पॉवर प्‍लांट का निर्माण किया जा रहा है. ऊर्जा मंत्री एके शर्मा के अधीन आने वाले यूपीपीसीएल एवं अडानी समूह के बीच 5.38 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली खरीदने का समझौता हुआ था. यूपीपीसीएल ने इसमें एक शर्त यह भी रखी थी कि कंपनी फ्लू गैस डिसल्‍फराइजेशन (एफजीडी) संयंत्र भी स्‍थापित करेगी, जिससे वातावरण में सल्‍फर डाई आक्‍साइड का उत्‍सर्जन ना हो, और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव ना पड़े.

एफजीडी मशीन थर्मल पॉवर प्‍लांटों में लगवाना इसलिये अनिवार्य होता है ताकि जीवाश्‍म ईंधन यानी कोयला के जलने के बाद उससे उत्‍स‍र्जित होने वाली नुकसानदेय सल्‍फर डाई आक्‍साइड गैस को वातावरण में जाने से रोका जा सके. एफजीडी मशीन में सल्‍फर डाई आक्‍साइड को चूना के घोल से गुजाकर डिसल्‍फराइज किया जाता है. इस प्रक्रिया के चलते वातावरण में बहुत ही कम मात्रा में सल्‍फर उत्‍सर्जित होता है तथा बाई प्रोडक्‍ट के रूप में जिप्‍सम का उत्‍पादन होता है.

सल्‍फर डाई आक्‍साइड एक नुकसानदेय गैस है. इसे सीधे वातावरण में नहीं छोड़ा जा सकता, क्‍योंकि इससे यह अम्‍लीय वर्षा का कारण बनता है. सांस और हृदय संबंधी बीमारी पैदा होती है. सल्‍फर डाई आक्‍साइड के संपर्क में आने वाले लोगों के श्‍वसन नली को नुकसान पहुंचता है,अस्‍थमा एवं ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियां बढ़ती हैं. पशु-पक्षी, पेड़-पौधों एवं प्रकृति को भी इससे नुकसान पहुंचता है, इसलिये सभी विकसित देशों में थर्मल प्‍लांटों में एफजीडी मशीन लगाना अनिवार्य है.

भारत में भी पॉवर प्‍लांटों में एफजीडी लगाना अनिवार्य था. इस मशीन की कीमत 2000 करोड़ के आसपास होती है, लिहाजा बिजली उत्‍पादन लागत भी बढ़ जाती है. अडानी पॉवर ने इस मशीन के साथ यूपीपीसीएल से 5.38 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से समझौता किया था, लेकिन इस दर पर समझौता हो जाने के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने पॉवर प्‍लांटों में एफजीडी ईकाई लगाने की अनिवार्यता ही खत्‍म कर दी. मतलब अडानी पॉवर को अब एफजीडी मशीन लगाने की कोई मजबूरी नहीं बची.

अडानी पॉवर बिना एफजीडी लगाये हुए भी बिजली का उत्‍पादन कर सकता है. इसी को लेकर विद्युत उपभोक्‍ता परिषद के अध्‍यक्ष अवधेश वर्मा ने विद्युत नियामक आयोग में याचिका दाखिल की है. उन्‍होंने कहा है कि एफजीडी की अनिवार्यता खत्‍म होने से प्रोजेक्‍ट की लागत घट गई है, जिससे फिक्‍स्‍ड लागत 5.38 से लगभग 70 पैसे प्रति यूनिट की कमी आ सकती है. उन्‍होंने आरोप लगाया है कि यूपीपीसीएल ने अडानी को लाभ पहुंचाने के लिये जानबूझकर नियामक आयोग को नहीं दी.

अवधेश वर्मा का कहना है कि जब प्रोजेक्‍ट की लागत और शर्ते मूल रूप से बदल गई हैं तो अडानी पॉवर से पुराने रेट पर बिजली खरीदने का कोई औचित्‍य नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार ऐसे मामलों में रेट बदला नहीं जा सकता, इसलिये नया टेंडर जारी होना आवश्‍यक है. जाहिर है कि अगर पुराने टेंडर पर ही इस प्रोजेक्‍ट को आगे बढ़ाया गया तो केवल अडानी पॉवर को मोटा लाभ मिलेगा, विद्युत उपभोक्‍ताओं एवं नागरिकों के हिस्‍से केवल हानि ही शेष रह जायेगी. हालांकि इस पर कोई सुनवाई होगी इसकी संभावना बेहद कम है.

इससे इतर, सबसे बड़ी चिंता की बात है कि केंद्र की मोदी सरकार ने अडानी पॉवर को लाभ पहुंचाने की सनक में ददरी खुर्द और आसपास के इलाकों के पर्यावरण, वातावरण, ना‍गरिकों, पशु-पक्षियों एवं पेड़ पौधों के जीवन को भी दांव पर लगा दिया है. एफजीडी नहीं लगने की दशा में पॉवर प्‍लांट से उत्‍सर्जित होने वाला सल्‍फर डाई आक्‍साइड ना केवल जैव विविधता को प्रभावित करेगा बल्कि आसपास के कई किलोमीटर क्षेत्र में रहने वाली आबादी को भी धीमी मौत की सौगात देगा. वाह मोदी जी वाह!

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