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चुनाव आयोग की निष्पक्षता और साख का हाल यह है कि वह विपक्ष के नेता से शपथपत्र मांगता है और सत्तारूढ़ दल के नेता से नहीं, शिकायतों पर कार्रवाई और संतोषजनक जवाब तो दुर्लभ है!

जब सुप्रीम कोर्ट को जनता की संतुष्टिऔर ईवीएम परअनियंत्रित संदेहके लिए किए गए काम की याद नहीं है, चुनाव आयोग यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है कि कोई योग्य मतदाता छूटे नहीं और कोई अयोग्य व्यक्ति मतदाता बने तब ट्रायल एंड एरर वाले एसआईआर का क्या मतलब? ईवीएम का विरोध फिर प्रेम और बचाव के बाद ईवीएम के पक्ष में विपक्ष को कोसना और ढेर सारी सच्चाई बहुत कुछ कह रही है जो अखबार नहीं बताते। कई दिनों तक इंतजार करने के बाद चैट जीपीटी और दूसरे एआई के सहयोग से मैंने यह रिपोर्ट तीन घंटे में तैयार कर ली लेकिन अखबारों में अब ऐसी रपटें नहीं छपती है।  

संजय कुमार सिंह

सच्चाई यह है कि ईवीएम कांग्रेस के जमाने में आई थी। हो सकता है अपने फायदे के लिए ही लाई गई हो। भाजपा ने पुरजोर विरोध किया था। सत्ता में आई तो विरोध बंद हो गया। 2017 में कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमण्डल (इनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया भी थे) ने चुनाव आयोग से कहा कि ईवीएम को बंद किया जाए और पुराने मतपत्र वापस लाये जाएं। 2017 में ही कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने कहा था कि भारत ईवीएम की बजाय मतपत्रों पर वापस नहीं जा सकता है। उन्होंने ईवीएम व्यवस्था का बचाव किया और कहा कि यदि आवश्यक हो तो मशीनों में तकनीकी सुधार हो सकता है। मार्च 2024 में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि कांग्रेस ईवीएम के खिलाफ नहीं है, लेकिन ईवीएम में मानवीय हेरा‑फेरी (मैनिपुलेशन) हो सकती है, इसलिए वीवीपैट के स्लिप्स की 100% गिनती होनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि वीवीपैट को 14 अगस्त 2013 को 1961 के चुनाव नियमों में संशोधन करके शामिल किया गया था। पहली बार वीवीपैट और ईवीएम का उपयोग  सितंबर 2013 को नॉक्सन विधानसभा उपचुनाव (नागालैंड) में किया गया था। इस तरह, 2013 के बाद धीरे-धीरे वीवीपैट को पूरे देश में चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया। चुनाव आयोग की व्यवस्था थी कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में एक मतदान केंद्र की वीवीपैट पर्चियों की गिनती की जाए। अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि यह संख्या बढ़ाकर पांच ईवीएम प्रति विधानसभा क्षेत्र की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कहा था कि यह न ईवीएम व्यवस्था पर अविश्वास है और न चुनाव आयोग के काम पर प्रश्न — यह “जनता की संतुष्टि” बढ़ाने के उद्देश्य से है। बाद में मांग करने पर स्थितियां बनने पर भी सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग ने ऐसी कोशिश नहीं की। सरकार को भी निष्पक्ष चुनाव कराने के प्रयास करने चाहिये लेकिन उसकी कहानी तो अलग ही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2019 को आदेश दिया था कि वीवीपैट की संख्या बढ़ाकर पांच ईवीएम प्रति विधानसभा क्षेत्र की जाए। इसके बाह हुए चुनाव का नतीजा देखिये और नतीजों से संबंधित अशोका विश्वविद्यालय का चर्चित रिसर्च। उसपर घबरहाट और कुचल देने, खत्म कर देने वाली प्रतिक्रिया से संबंधित कहानी यह भी है कि पुलवामा का राज अब तक नहीं खुला है। पुलवामा पर एक किताब है जिसके लेखक को सेवा में रहते हुए किताब लिखने की अनुमति मिली थी और इस कराण मैंने वो किताब नहीं पढ़ी। खुलासा कुछ हो तो मुझे पता नहीं है। लेकिन खबरों में नहीं है। लोकसभा चुनाव से जुड़ा तथ्य भाजपा का विशेष प्रचार और यह विश्वास दिलाना, प्रचारित करना कि भाजपा अपने परिश्रम से चुनाव जीतती है। दूसरी ओर, पहली बार के वोटर से अपील पर चुनाव आयोग की चुप्पी गौरतलब है। इसमें पुलवामा, बालाकोट, घुसकर मारूंगा, बादलों की ओट लेने की सलाह और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की विद्वता सार्वजनिक होना, उसका बचाव आदि याद करने लायक मामले हैं। आप इसे नरेन्द्र मोदी का आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान कह सकते हैं।

नरेन्द्र मोदी सरकार की जीत तो संदिग्ध थी ही सच्चाई और किसी को पता हो या नहीं ‘सरकार’ को तो होगी ही। पांच साल के कार्यकाल को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए और मैं उसकी चर्चा नहीं कर रहा हूं। लेकिन यह बताना जरूरी है कि इस दौरान सरकार की कार्रवाई में विरोधियों, विरोध कर सकने वालों और विपक्षियों को धमकाना, डराना, बेअसर करना शामिल था। इसके लिये वाशिंग मशीन का उपयोग हुआ, एफसीआरए लाइसेंस रद्द हुए, नवीकरण नहीं हुआ, शेल कंपनियां बंद करना जारी रहा। इसमें राहुल गांधी की सदस्यता गई, संजय सिंह को जेल, महुआ मोइत्रा के खिलाफ कार्रवाई आदि शामिल था। अब राहुल गांधी की हत्या की धमकी और गोड्से समर्थकों की बहुतायत बहुत कुछ कहती है।  

अब यह भी बताता चलूं कि 2024 के चुनाव से पहले एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि: 1) 100% वीवीपैट स्लिप्स की मैनुअल गिनती हो (यानी सभी मशीनों की गिनती हो)। 2)  वोटरों को वीवीपैट पर्ची दिए जाएँ और वे स्वयं निरीक्षण करें या 3) पुरानी “बैलट पेपर” प्रणाली पर वापस जाएँ। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 26 अप्रैल 2024 को फैसला सुनाया। कहने की जरूरत नहीं है फैसले का फायदा भाजपा और चुनाव आयोग को ही है। अब दोनों एक हैं। दूसरी ओर, वोट चोरी में भाजपा के शामिल होने की चर्चा बिहार में एसआईआर के दौरान भी रही। इसकी कोशिशों के मामले रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट में हैं। “100% वीवीपैट” की मांग वर्षों से उठती रही है। लेकिन कोर्ट ने नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट ने लिखा है कि “अनियंत्रित संदेह” से चुनाव प्रणाली में अविश्वास बढ़ सकता है और इसलिए ऐसी मांग को स्वीकार नहीं किया गया। अप्रैल 2025 में एक याचिका दायर हुई, जिसमें 100% मैनुअल गिनती की मांग थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश पर दबाव डालने, उन्हें प्रभावित करने के लिए अपनाए गए कई कानूनी-गैर कानूनी तरीके सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं। तब के मुख्य न्यायाधीश के घर पूजा करने पहुंच जाना और इस समय के मुख्य न्यायाधीश की मां को आरएसएस के समारोह में बुलाया जाना इसमें शामिल है। मुख्य न्यायाधीश के घर पूजा का खुलासा प्रधानमंत्री ने किया था और यह सामान्य तभी होता जब वे पहले भी किसी के घर इस तरह पूजा करने गये होते या बाद में किसी के घर जाते, वह भाजपा का नेता या कार्यालय भी हो सकता था। हाल में मौजूदा मुख्य न्यायाधीश की मां को आरएसएस के एक समारोह में बुलाया जाना भी सिस्टम का हिस्सा लगता है। इससे संबंधित विवाद, उनके नाम का उल्लेख और मां का कहना कि वे नहीं जाएंगी, इससे जुड़ा विवाद अशोभनीय है।   

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अप्रैल 2024 में बिहार में एक जनसभा में कहा था, “जो लोग बूथ कैप्चरिंग करते थे और मतपत्र लूटते थे”, वे लोग अब ईवीएम पर सवाल खड़ा कर रहे हैं क्योंकि ईवीएम आने के बाद बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाएँ कम हुई हैं। यह सही हो या गलत सत्ता में रहते हुए सत्ता की ताकत से चुनाव जीतना अनैतिक और गैर कानूनी है। इंदिरा गांधी को इससे बहुत कम के लिए सजा हुई थी। लालू यादव दबंग मुख्यमंत्री थे। लाठी रैली नहीं, रैला कर चुके हैं। जरूरत पड़ी तो पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया था। कोई ढंग से विरोध भी नहीं कर पाया लेकिन उनके खिलाफ भी सीबीआई जांच हुई, सजा हुई। अब नरेन्द्र मोदी के शपथपत्र की जांच तो नहीं ही हुई पहले से सार्वजनिक डिग्री को सार्वजनिक नहीं करने का आदेश आ गया। दूसरी ओर, पर्ची मतदाता को देने, उसे बैलट बॉक्स में डालने और उसी की गिनती करने में बहुत मुश्किल नहीं है और हो भी तो जरूरी है। कुल मिलाकर, चुनावी गड़बड़ी में मौजूदा व्यवस्था का कोई मुकबला नहीं है।  प्रधानमंत्री के स्तर पर ईवीएम का लिजलिजा बचाव किया गया जबकि भाजपा ही उसका विरोध करती रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 26 नवंबर 2024 को संविधान दिवस पर कहा था कि हमें बैलट पेपर चाहिये। जो भी हो, चुनाव की निष्पक्षता जरूरी है और बिहार में एसआईआर तथा उस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट में फेट एकम्पली होना साबित करता है कि ईवीएम और चुनाव आयोग से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में शायद नहीं निपट पाए। मतदाता सूची जो बनी है उसके शुद्ध होने की कोई गारंटी नहीं है। ऐसा ही पिछली बार हुआ था। मेरा सवाल है कि एसआईआर का फायदा क्या हुआ?   

अगर पहले की मतदाता सूची ठीक नहीं थी तो उससे हुए चुनाव नतीजों को नहीं बदला जा सकता है। दूसरी ओर, जाहिर है कि भाजपा अपने हिसाब से काम करवा ले रही है। वोट चोरी के आरोप हैं ही, वोट चोरों को पकड़ने की कोशिशों पर चुनाव आयोग की चुप्पी बहुत कुछ बोल रही है। स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा (या नरेन्द्र मोदी) के सत्ता में रहते सरकार और संस्थाएं ढंग से काम नहीं कर पा रही हैं और यह पूरी व्यवस्था को प्रभावित करने या प्रभाव में लेने का उदाहरण है। देश को इससे निकालने के लिए, पहले के चुनावों की गलती को ठीक नहीं कर पाने की मजबूरी में यह जरूरी है कि भाजपा को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाये तभी वह और उसके समर्थक उसे सत्ता में रखने के प्रयास नहीं करेंगे और चुनाव निष्पक्ष हो पाएगा।

जो हुआ और हो रहा है उसमें लोग कहते हैं कि सबूत है तो कोर्ट जाना चाहिये। लेकिन उसका नतीजा सर्वविदित है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और साख का हाल यह है कि वह विपक्ष के नेता से शपथपत्र मांगता है और सत्तारूढ़ दल के नेता से नहीं। शिकायतों पर कार्रवाई और संतोषजनक जवाब तो दुर्लभ है। शपथपत्र के साथ दी गई शिकायत के संबंध में झूठ बोला जा चुका है और साबित होने के बावजूद माफी मांगने का शिष्टाचार तक नहीं है। कार्रवाई नहीं करके साबित किया जा चुका है कि वे या पूरा आयोग, देश के लिए नहीं, भारतीय जनता पार्टी के लिए काम कर रहा है। इसलिए भाजपा को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने के अलावा कोई चारा नहीं है। इसके बाद ही चुनाव निष्पक्ष होने की संभावना बनेगी या गुंजाइश होगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भाजपा को अपनी योजना के अनुसार चलने से रोका नहीं जा सकता है। इसकी शुरुआत 2014 से पहले अन्ना हजारे, सीएजी विनोद राय आदि के सहयोग से हुई थी। वोट चोरी के खुलासे उसपर कार्रवाई नहीं होना, समर्थकों द्वारा उसे फुस्स बम कहना सहयोग में शामिल है। संभव है पैसे लेकर या लाभ के लालच में ऐसा किया गया हो। उज्जवल निकम को मिला ईनाम लोगों को इसके लिए प्रेरित करेगा जो लभी लाभ की स्थिति में और सुरक्षा कवच में हैं वो तो हैं ही। सरकारी पद ही नहीं, भारत रत्न लुटाने के उदाहरण हैं। इसलिये स्थिति बहुत गंभीर है। इससे कौन इनकार कर सकता है। कानून बदलकर सरकार ने इसे सही साबित कर दिया है। बदलने का तरीका और समय तो है ही।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है।

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