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मैं मूलत: रचनाकार हूं लेकिन आलोचकों की हरामजदगी के खिलाफ आलोचना के क्षेत्र में आया : प्रो. गणेश तिवारी

Ganesh Pandey : मौन साधना के पीछे का हाहाकार… जमाना कितना खराब है? आज की तारीख में कर्ण सिंह चौहान जैसे स्वाभिमानी और साहसी आलोचक कितने हैं? आज कौन आलोचक साहित्य के मठों में मत्था नहीं टेकता है, मठाधीशों के चरणरज अपने ललाट पर नहीं पोतता है? मैं तो डरे हुए आलोचकों की जमात देखता हूं. मैं इन डरे हुए आलोचकों को अपनी कविताओं पर लिखने के लिए कैसे कह सकता हूं? रिव्यू के लिए इन्हें या किसी को भी किताबें कैसे भेज सकता हूं? अच्छा लिखूं और बेईमान आलोचकों को खुश करूं, ऐसा कैसे हो सकता है?

Ganesh Pandey : मौन साधना के पीछे का हाहाकार… जमाना कितना खराब है? आज की तारीख में कर्ण सिंह चौहान जैसे स्वाभिमानी और साहसी आलोचक कितने हैं? आज कौन आलोचक साहित्य के मठों में मत्था नहीं टेकता है, मठाधीशों के चरणरज अपने ललाट पर नहीं पोतता है? मैं तो डरे हुए आलोचकों की जमात देखता हूं. मैं इन डरे हुए आलोचकों को अपनी कविताओं पर लिखने के लिए कैसे कह सकता हूं? रिव्यू के लिए इन्हें या किसी को भी किताबें कैसे भेज सकता हूं? अच्छा लिखूं और बेईमान आलोचकों को खुश करूं, ऐसा कैसे हो सकता है?

नागार्जुन ने करारा व्यंग्य हिन्दी के आलोचकों पर किया ही है- अगर कीर्ति का फल चखना है, आलोचक को खुश रखना है. आप तो जानते ही हैं कि आलोचकों की हरामजदगी के खिलाफ, आलोचना में आया. मैं मूलत: रचनाकार हूं. आलोचना के मौजूदा गढ और किलों को तोडने के लिए रोशनाई में लट्ठ डुबोकर आलोचना लिखने का जोखिम उठाया है. मैं जानता था कि आलोचकों को नंगा करूंगा तो वे मेरी तारीफ नहीं करेंगे, मेरा नाम नहीं लेंगे, मुझे इसकी जरूरत नहीं है. मुझे अपने लिखे पर पूरा भरोसा है, बिना आंख की मां भी जान जाती है कि उसने बच्चे को जन्म दिया है या बच्ची को.

जिन लेखकों को अपने लिखे पर रत्तीभर भरोसा नहीं है या कीर्ति का फल चखने के लिए मरे जा रहे हैं, वे जाएं इन पिलपिले आलोचकों को खुश करें. बहुत से कवियों को नचनिया बनकर इन आलोचकों के सामने नाचते देखता हूं. करें वे जो कर रहे हैं, मैं अपने लट्ठ के साथ खुश हूं. यह सब इसलिए कहा है कि आपने मुझे कविता का मौन साधक कहा है, उचित ही कहा है, आपने. मुझे लगा कि आपको बताना जरूरी है कि इस मौन साधना के पीछे कितना हाहाकार है!

मेरी उम्र के आसपास के कुछ ही सही ऐसे आलोचक भी हैं, जिन्होंने भले ही कम लिखा है, लेकिन अच्छा यह किया कि रिव्यू करने, कवियों की सूची इत्यादि बनाने, लेखकों की जयंती और पुण्यतिथि इत्यादि पर टिप्पणी लिखने और लेखकों की फरमाइश पर उन पर किताब या उनकी प्रतिनिधि रचनाएं संपादित करने का काम नहीं के बराबर किया, नहीं तो रिव्यू लिखने और सूची बनाने वाले आलोचकों की पंक्ति में होते. आशय यह कि युवा आलोचक मित्र इस तरह के काम शुरू में करेंगे तो बुरा नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे इससे मुक्त होकर साहित्य के अँधेरे के पहाड को तोडने के काम में लगें.

कुछ आलोचक बहुत जटिल होते हैं, सीधे-सीधे कहें तो उलझाऊ भाषा में अपनी बात कहते हैं, लगता है किसी अन्य ग्रह या उपग्रह की भाषा में लिख रहे हैं, पता नहीं ऐसा क्यों करते हैं? जरूर कोई दिक्कत होगी? कोई बीमारी होगी? कुछ छिपाना होगा? कोई आलोचक अपने पाठक के साथ आखिर यह खेल क्यों करता है? अरे भाई, साफ-साफ कहो! पहले के आलोचकों की पारदर्शी भाषा से सीखो! रेत का कण हो या चीनी का मोटा दाना, उससे बनी दीवार ढह जाती है. आज की हिन्दी आलोचना की बात कर रहा हूं. मजबूत आलोचना, आलोचक के आत्मसंघर्ष से पैदा होती है. जाहिर है, आत्मसंघर्ष मठाधीशों की छाया में बैठकर नहीं किया जा सकता है.

पुरस्कार बस मशहूर लेखक होने की खुशफहमी है और इसी के लिए साढे निन्यानबे फीसदी लेखक मरे जा रहे हैं!! हो सकता है कि आज की तारीख में मेरी बात समझदारी की न लगे, फिर भी कहूंगा वही, जो कह रहा हूं. किसी कवि के कविकर्म को उसके जीवन से काटकर देखने का मतलब आलोचक की सदाशयता नहीं, शुद्ध बेईमानी है। राजनीति, धर्म इत्यादि में सिर्फ विचार ही नहीं, नेता या साधु का जीवन भी उसके मूल्यांकन की कसौटी है तो साहित्य में लेखक को जीवन में हजार गुनाह करने की छूट क्यों? विश्व के बारे में नहीं, हिन्दी के बडे लेखकों के कविकर्म और जीवन में फांक नहीं देखता, इसीलिए कहा है. साहित्य में छूट तो राजनीति में, धर्म में क्यों नहीं, सवाल यह भी है. फिर तो राजनेता को भी अच्छी बात करते हुए बुरा जीवन जीने की छूट होगी, धर्माचार्यों को भी जेल में नहीं डालना चाहिए. अपवाद कहीं भी हो सकते हैं, आमतौर सचमुच के बडे लेखकों के जीवन में कुछ तो मूल्य होंगे ही, कहीं के भी लेखक हों.

एक कवि जी रोज अपनी पसंद के लेखकों की सूची लंबी सीटी की तरह बजा रहे हैं. क्या पता यही उनका साहित्य का सर्वोत्तम हो! इन्हें नहीं, दूसरी तरह के लोगों को देखो… कौन-कौन चर्चा में है और किन कीमतों पर जरा सी चर्चा दो दिन के लिए पा जा रहा है, दिल्ली में आशीर्वाद और तिलक बेचने वाले हिन्दी के सौदागर नाम-इनाम की दुकान चला रहे हैं और कुछ कथित महान जिसे देखो अपने समय के प्रतिनिधि कवि की जाली सर्टिफिकेट थमा रहे हैं, अरे भाई साहित्य के चौपट राजाओं की अंधेर नगरी को कुछ वक्त के लिए मत देखो. मुझे भी बहुत गुस्सा आता था. ये साहित्य के आदमी नहीं, बुलबुले हैं, बस एक पल का जीवन है. आंख मूंदते ही कोई जीव-जन्तु इन्हें नहीं पूछेगा. आओ, देखो कैसे कुछ लोग अपनी किताबों का लोकार्पण, इन बदमाशों से नहीं कराते हैं. इनके सहायकों से अपनी किताब की रिव्यू के लिए नहीं कहते हैं, किसी सूची-फूची में नाम डालने के लिए नहीं कहते हैं, साहित्य के अंधेरे के पहाड को काट कर नया रास्ता बनाने की बात करते हैं. ऐसे लोगों को देखो, उन्हें जाने दो!

जाने माने आलोचक, साहित्यकार और दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा. गणेश तिवारी के फेसबुक वॉल के पोस्ट्स के संकलन-संयोजन पर आधारित.

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