
संजय कुमार सिंह
“हरियाणा के उम्मीदवारों की सूची पर भाजपा में अशांति, 12 नेताओं ने पार्टी छोड़ी”, “युद्ध के लिए तैयार रहें तीनों सेनाएं : राजनाथ” और “शिमला में ‘अवैध मस्जिद’ के खिलाफ आक्रोश” जैसी खबरों के बीच अमर उजाला में आज टॉप पर पांच कॉलम का एक शीर्षक है, “केजरीवाल को जमानत देने से हाईकोर्ट का मनोबल गिरेगा : सीबीआई”। वैसे तो उपशीर्षक में ही बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने एजेंसी की दलील पर आपत्ति जताई और खबर के इंट्रो में है, ‘कहा, ऐसा मत कहिये’। इस दलील से जाहिर है कि केजरीवाल को जमानत न मिले इसके लिए सीबीआई (या सरकार) को किन कुतर्कों का सहारा लेना पड़ रहा है। आप जानते हैं कि केजरीवाल के मामले में प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि उनके खिलाफ सबूत नहीं है क्योंकि वे ‘अनुभवी चोर’ हैं। जाहिर है, उन्हें सबूत के आधार पर नहीं, प्रधानमंत्री को ‘अनुभवी’ लगने के कारण अभियुक्त माना जा रहा है। आप जानते हैं कि केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे हैं और नियमों को अच्छी तरह जानते हैं। उनका समर्थक कहेगा कि इसलिए वे नियमों का उल्लंघन नहीं करेंगे उनके प्रतिद्वंद्वी कह रहे हैं कि इसलिए वे अनुभवी चोर हैं।
प्रचारकों ने देश की राजनीति को ऐसा बना दिया है कि राहुल गांधी ने पूछा कि सभी चोर मोदी क्यों होते हैं तो उनके खिलाफ अवमानना का मामला बन गया और उन्हें सजा भी हो गई। लेकिन अरविन्द केजरीवाल को ‘अनुभवी चोर’ कहने पर किसी को दिक्कत नहीं है (मुझे लगता है कि इतने बड़े देश और इतनी बड़ी व्यवस्था में प्रतिद्वंद्वी को इस तरह बदनाम और परेशान नहीं किया जा सके उसकी भी व्यवस्था होनी चाहिये। होगी भी, पर उसका उपयोग नहीं किया गया है। हालांकि, वह अलग मुद्दा है)। राहुल गांधी को बदनाम करने के पूरे अभियान पर कांग्रेस पार्टी ने कुछ नहीं किया या कर पाई। लोकसभा चुनाव प्रचार में तो झूठ बोले ही गये हाल में रेल दुर्घटनाओं को रोक पाने में लाचारी या नालायकी को उचित ठहराने के लिए भी झूठ बोला गया। इन सबके बाद केजरीवाल को जेल में रखने का उद्देश्य समझ में आता है।
आप जानते हैं कि हरियाणा में चुनाव है और इसमें अरविन्द केजरीवाल तथा उनकी आम आदमी पार्टी की अच्छी भूमिका हो सकती है। जमानत नहीं मिलने के आधर पर उन्हें ‘अनुभवी चोर’ कहने का लाभ चाहे जो हुआ हो जमानत मिलते ही उसका नुकसान हो सकता है। इसलिए भाजपा (और सरकार) की शाखा बन चुकी सीबीआई की यह दलील महत्वपूर्ण है और इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए। यह प्रस्तुति अलग नहीं हो सकती है। केजरीवाल को लोकसभा चुनाव के समय जमानत मिल गई थी तो स्पेशल ट्रीटमेंट का प्रचार (या दबाव) आपको याद ही होगा अब यह स्पष्ट है और केजरीवाल ने आरोप भी लगाया है कि उन्हें जेल में रखने के लिए ईडी और उसके पीएमएलए के बाद सीबीआई को लगाया गया है। अब उसे ऐसे तर्क देने पड़ रहे हैं जो न तो सीबीआई के लिए पेशेवर हैं और ना ही उसका काम है कि वह हाईकोर्ट के मनोबल की रक्षा करे। इससे आप समझ सकते हैं कि एक राजनीतिक दल के रूप में सत्तारूढ़ पार्टी कैसी है।
वैसे भी, सुप्रीम कोर्ट का काम न्याय करना है या निचली अदालतों के मनोबल का ख्याल रखना? बेशक, सुप्रीम कोर्ट को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिये जिससे नीचे की किसी भी अदालत के फैसले या साख पर बट्टा लगे। अमूमन सुप्रीम कोर्ट नीचे की अदालतों के फैसलों को पलट देता है, गलतियां बताता है पर आलोचना नहीं करता है। उसे बुरी स्थिति में नहीं रखता है। ऐसा बहुत कम होता है कि नीचे की अदालत के किसी गलत (अनुपयुक्त या अनुचित भी कह सकते हैं) फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट आलोचना करे। अगर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसा होता भी है तो सुप्रीम कोर्ट फैसला पलटने या अपने फैसले के पक्ष में कारण बताता है और यह राहुल गांधी के मामले में भी हुआ था। लेकिन उस फैसले के लिए नीचे की अदालतों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। ना ऐसी कोई व्यवस्था है। होती तो राहुल गांधी ऐसी मांग कर सकते थे।
जाहिर है, यह सब अदालतों का (अदालती व्यवस्था का) मनोबल बनाये रखने के लिए ही है। इसका नतीजा यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट से न्याय पाना बहुत महंगा और सबके वश का नहीं है फिर भी बहुत लोगों की मजबूरी होती है कि निचली अदालतों के फैसलों पर संतोष करें और वे उसे चुनौती नहीं देते हैं या दे पाते हैं। देरी तो सबके मामले में होती ही है। अर्नब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से हफ्ते भर में जमानत मिल जाना अपवाद ही कहा जायेगा। हाल में मुख्य न्यायाधीश ने कहा था, ‘जिला न्यायपालिका कानून के शासन का महत्वपूर्ण घटक और न्यायतंत्र की रीढ़’ है।’ यह तो कहा ही है कि निचली अदालतें जमानत देने में उदार नहीं हैं और इसका भार सुप्रीम कोर्ट पर पड़ता है। राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलती उससे पहले उनकी संसद सदस्यता चली गई थी (अदालत को पता था कि चली जायेगी या जा चुकी है)। महुआ मोइत्रा का मामला और दिलचस्प है। उनकी संसद की सदस्यता चली गई या लेने वालों ने ले ली। सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। फिर भी वे दोबारा चुनकर आ गईं और सदस्यता लेने वालों में कुछ नहीं आ पाये। राहुल गांधी दो सीटों से जीत गये। इसमें किसका मनोबल गिरा और किसका नहीं गिरा और किसके मनोबल का ख्याल रखा जा सका और जिसका नहीं रखा गया उसका क्या हुआ?
आम आदमी तो छोड़िये, जन प्रतिनिधियों के मनोबल का ख्याल रखा जाना जरूरी है या उनका जो बहुमत के नाम पर मनमानी करते हैं? सीबीआई के अधिकारी को सीबीआई से ही बचाने के लिए आधी रात की कार्रवाई में अध्यक्ष बदल चुके हैं। ऐसे आका वाली सीबीआई जनप्रतिनिधि के मामले में यह तर्क दे रही है। और यह तब हो रहा है जब एक मामले की जांच सेबी ने नहीं की और जब उसका कारण बताया गया तो सेबी प्रमुख के घोटालों की जांच नहीं हो रही है या सीबीआई को नहीं सौंपी गई है। कोलकाता के बलात्कार और हत्या के मामले में जो जांच सौंपी गई है उसमें सीबीआई कुछ नया नहीं ढूंढ़ पाई है। द टेलीग्राफ की खबर के कारण अस्पताल के चिकित्सक जांच में प्रगति की जानकारी का इंतजार कर रहे हैं और यह सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद की स्थिति है। खबर के अनुसार, इस मामले में सोमवार को सुनवाई होनी है। खबर यही थी कि सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार और हत्या के मामले की जांच के आदेश दिये हैं पर बाद में पता चला कि सबंधित मेडिकल कालेज अस्पताल के पूर्व प्राचार्य को भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किया गया है।
वैसे भी सीबीआई का काम करने का रिकार्ड अच्छा नहीं है और इतना अच्छा तो नहीं ही है कि उसकी ऐसी दलीलों पर जन प्रतिनिधियों को जेल में रखा जाये। नोएडा के आरुषि हत्याकांड में हम उसकी कार्रवाई देख चुके हैं। ऐसा आज से नहीं है। इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया गया था तो उन्हें फरीदाबाद ले जाया जा रहा था जो नियमानुसार गलत है। अदालत में पेश किये बिना शहर से बाहर नहीं ले जाया जा सकता था। इंदिरा गांधी ने इसका विरोध किया। फरीदाबाद सीमा के पास रेल फाटक पर धरना दिया तब उन्हें किंग्सवेकैम्प के पुलिस लाइन में ले जाया गया था। इसके बाद से सीबीआई की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का मुद्दा कई बार उठा है। लेकिन आधी रात की कार्रवाई में सीबीआई प्रमुख को हटाना तो अति था। अब की हालत उसके बाद की है।
जहां तक सेबी और सेबी प्रमुख के मामलों की जांच की बात है, इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी खबर के अनुसार, सरकारी खर्चों पर नजर रखने वाली संसदीय निगरानी समिति, पबलिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) ने तय किया है कि इसे इस साल के एजंडा में शामिल किया जाये और सेबी के प्रदर्शन की समीक्षा की जाये क्योंकि इसकी प्रमुख माधवी पुरी बुच अमेरिकी आधार वाले हिन्डनबर्ग रिसर्च के आरोपों के बाद राजनीतिक विवादों के घेरे में हैं। यह खबर आज मेरे किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं है। आप समझ सकते हैं कि सरकार को जो काम करना चाहिये वह तो नहीं हो रहा है और अब पीएसी उसकी समीक्षा करेगी लेकिन सरकार के प्रमुख विरोधियों को जेल में रखने के लिए सीबीआई को लगा दिया गया है और वह अदालतों का मनोबल बढ़ाने के गैरजरूरी और अन्यायपूर्ण काम में लगी हुई है। ऐसे लोगों की सेवा ले रही है जो जनविरोधी सोच के हैं। उधर सेबी के कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन जारी है और खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में है।
जहां तक सुप्रीम कोर्ट में कल हुई चर्चा को खबर रूप में प्रकाशित करने की बात है, नवोदय टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, केजरीवाल ने कहा, “सीबीआई ने जमानत के बाद मेरी बीमा गिरफ्तारी की”। उल्लेखनीय है कि अदालत ने इस मामले में सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। खबर के अनुसार अरविन्द केजरीवाल के मामले में कहा गया है, आबकारी नीति मामले में सीबीआई ने करीब दो साल तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया और ईडी द्वारा दर्ज अधिक कठोर धन शोधन मामले में जमानत मिलने के बाद 26 जून को उनकी ‘बीमा गिरफ्तारी’ की गई। उनकी तरफ से यह भी कहा गया है कि उनके भागने का खतरा नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यही दलील शीर्षक है और इसपर सीबीआई का जवाब भी, कि वे गवाहों को प्रभावित करेंगे। यहां पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र उर्फ टेनी का मामला उल्लेखनीय है। उनके बेटे पर आरोप था कि उसने किसानों को अपनी गाड़ी से रौंद दिया। ऐसे मामलों में इस्तीफा देने या पद से हटा देने का रिवाज है ताकि जांच करने वाले प्रभावित नहीं किये जा सके। कई बार वे पद पर होने भर से ही प्रभावित होते हैं। फिर भी उन्होंने ना इस्तीफा दिया ना उन्हें हटाया गया। इसी तरह साध्वी प्रज्ञा को चुनाव लड़वाकर सांसद बना दिये जाने से उनके खिलाफ मामले की सुनवाई नहीं हुई औऱ यह वैसे ही है जैसे 1984 के दंगा मामले में हाल में जगदीश टाइटलर के खिलाफ आदेश आया है। कांग्रेस ने अपने पक्ष में फैसले करवाये हों या नहीं, भाजपा के पक्ष में फैसले दिखाई देते हैं।
केजरीवाल के ही मामले में आज द हिन्दू की लीड खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की खिंचाई की, केजरीवाल की जमानत अर्जी पर फैसला सुरक्षित रख लिया। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री की जमानत अपील पर फैसला सुरक्षित रखा और कहा, अन्य अदालतों का मनोबल नहीं गिरेगा।
सरकार के प्रचार वाली अखबारों की खबरों (लीड और सेकेंड लीड) की बात करूं तो आज टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार पुतिन ने कहा है कि भारत यूक्रेन पर मध्यस्थता कर सकता है। नवोदय टाइम्स ने लिखा है – भारत, चीन, ब्राजील हो सकते हैं मध्यस्थ। द हिन्दू की लीड की चर्चा पहले कर चुका हूं। सेकेंड लीड है, तेलंगाना में पुलिस से मुठभेड़ में छह माओवादी मारे गये। जब गो रक्षक अपने अधिकार नहीं समझ रहे हैं, सरकारें बुलडोजर न्याय कर रही हैं तो पुलिस के ऐसे मुठभेड़ पर जिसे यकीन हो करे। मुझे तो नहीं है। मैं ऐसी खबर भी नहीं पढ़ता। अपना कोई मारा जायेगा तो पहले पता होगा। बाकी से सहानुभूति ही रख सकता हूं। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, भारत सिंगापुर ने संबंध को बेहतर कर रणनीतिक साझेदारी की। अमर उजाला ने बताया है, रिश्तों को नया आयाम … भारत में पांच लाख करोड़ का निवेश करेंगी सिंगापुर की कंपनियां। जी हां, सिंगापुर की कंपनियां भारत में निवेश करेंगी। प्रधानमंत्री ने कहा है और अमर उजाला में उपशीर्षक है, भारत में बनाना चाहते हैं कई सिंगापुर। नवोदय टाइम्स की लीड है, चिप का चैम्पियन बनेगा भारत।
हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर नीचे एक खबर का शीर्षक है, “हरियाणा के उम्मीदवारों की सूची पर भाजपा में अशांति, 12 नेताओं ने पार्टी छोड़ी”। कांग्रेस के एक-एक नेता के पार्टी छोड़ने की खबर को लीड बनाने वाले अखबारों में यह खबर ढूंढ़नी पड़ रही है कि छपी है या नहीं। ऐसे में एक खबर सेना को तैयार रहने के लिए कहा जाना भी है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, “युद्ध के लिए तैयार रहें तीनों सेनाएं : राजनाथ”। इसके साथ तीन कॉलम का बॉटम है, “शिमला में ‘अवैध मस्जिद’ के खिलाफ आक्रोश”। कोलकाता मामले में पीड़िता के पिता ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उन्हें जल्दबाजी में अंतिम संस्कार करने के लिए मनाया। पैसों की पेशकश की। यह खबर द टेलीग्राफ में कल ही थी आज दिल्ली के कुछ और अखबारों में है। टेलीग्राफ की खबर के अनुसार पुलिस ने दबाव डाला। कल टेलीग्राफ में सेबी कर्मचारियों के आंदोलन की खबर भी थी आज उसका फॉलोअप कम है। इंडियन एक्सप्रेस ने एक अध्ययन के हवाले से खबर दी है कि स्वच्छ भारत अभियान से हर साल 60,000 नवजात शिशुओं की जांच बताने में मदद मिली। भारी आबादी में हर साल के ये 60,000 बच्चे बोझ बनेंगे या कुपोषित रहेंगे यह भविष्य की बात है। गरीबी के कारण पहले ही कुपोषित बच्चों की संख्या अच्छी खासी रही है अब हर साल 60,000 बच्चे ज्यादा हैं तो उसका ख्याल रखने के लिए भी काम होना चाहिये। जो गैर सरकारी संस्थाएं इस दिशा में काम करती थीं उनमें से बहुतों का विदेशी चंदा या दान प्राप्त करने का लाइसेंस रद्द हो गया है। ऐसे में यह बच्चों की भारी संख्या है जो देश के भविष्य के नागरिक हैं।



