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आज के अखबार : अमेरिकी व्यापार करार और प्रचार मंत्री के लिए प्रचार-पर्दा दोनों काम बखूबी कर रहे हैं  

संजय कुमार सिंह

आज अंग्रेजी के मेरे दो अखबारों – द हिन्दू और दि एशियन एज की लीड एक लाख करोड़ रुपए की शहरी संरचना परियोजना की घोषणा है। द हिन्दू का शीर्षक है, नया अर्बन चैलेंज फंड (यूसीएफ या शहरी चुनौता कोष) बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने के लिए बाजार से धन जुटाएगा। केंद्र सरकार एक लाख करोड़ देगी; सरकारी सहायता परियोजना लागत का 25% कवर करेगी बशर्ते बाकी राशि का कम से कम 50% बाजार से जुटाया जाए; इस फंड में 10 लाख या उससे अधिक आबादी वाले शहर तथा राज्यों की राजधानियां शामिल हैं। द हिन्दू में खबर का संबंधित हिस्सा इस प्रकार है, केंद्रीय सहायता परियोजना की 25% लागत को कवर करेगी, बशर्ते परियोजना की न्यूनतम 50% लागत बाजार से जुटाई जाए, जिसमें नगरपालिका बांड, बैंक ऋण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी शामिल हैं। इससे लगता है कि यहां बाजार का अर्थ नगरपालिका बांड, बैंक ऋण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी है। जो भी हो, यह शहरी संरचना के लिए धन जुटाने का मामला है और सरकार के पास पैसे न हों तो दूसरे विकल्पों का सहारा लेने की बात है। लेकिन मामला स्पष्ट नहीं है और केंद्र सरकार के निर्णय या अधिकारों का मामला तो है ही। उदाहरण के लिए पीएम केयर्स सरकारी होते हुए भी आरटीआई से मुक्त है, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने शराब नीति बनाई तो उसमें भ्रष्टाचार देखा गया और इसमें है या नहीं, किसे नहीं दिखा जैसी बातें हैं ही नहीं। फिर भी खबर है, इसके परिणामस्वरूप अगले पांच वर्षों में शहरी क्षेत्र में 4 लाख करोड़ रुपये का निवेश होने की उम्मीद है। यह केंद्र की भाजपा सरकार की प्रचार वाली नीति और काम का भाग है। यह घोषणा तब हुई है जब प्रधानमंत्री असम में चुनाव प्रचार की शुरुआत कर चुके हैं और कल वहां थे। इसकी खबर आज दूसरे अखबारों में है।

हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, असम को महत्वपूर्ण  परियोजनाएं मिलीं, मोदी ने चुनावी रणनीति को धार दी। जाहिर है, प्रधान प्रचारक वही कर रहे हैं जो चुनाव जीतने के लिए करते रहे हैं और इसमें वे प्रधानमंत्री का अपना काम नहीं कर रहे हैं लेकिन मीडिया का बड़ा हिस्सा उनके (या सरकार अथवा पार्टी) के प्रचार को ही प्रमुखता देता है। इसका पता द टेलीग्राफ की आज की खबर से भी लगता है, जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असम गए, कांग्रेस के प्रचार प्रमुख पवन खेड़ा ने उनके लिए पड़ोसी राज्य मणिपुर की फ़्लाइट टिकट बुक की, जहाँ मेइती और कुकी के बीच जातीय संघर्ष लगभग तीन साल से चल रहा है। खेड़ा ने टिकट का स्क्रीनशॉट एक्स पर पोस्ट किया, साथ ही उखरुल ज़िले में कुकीज़ और नागाओं के बीच हाल ही में हुई झड़पों की फ़ोटो भी पोस्ट कीं। उनका जोर इस बात पर था कि मोदी ने इस अशांत राज्य से काफ़ी हद तक दूरी बनाए रखी है। खेड़ा ने लिखा, “हम समझते हैं कि चुनाव वाले राज्य हमेशा आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होते हैं। लेकिन मणिपुर को छोड़ा नहीं जाना चाहिए। राज्य 2023 से जल रहा है – और यह फिर से जल रहा है।” जाहिर है यह खबर है और दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है जबकि असम चुनाव के लिए सरकारी प्रचार को देश भर में प्रमुखता मिली है। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने कहा और अखबारों में छपा है, कांग्रेस ने अपने शासन में उग्रवाद को बढ़ावा दिया। मणिपुर में तीन साल से जो हो रहा है उसे रोक नहीं पा रहे हैं और खबरें कितनी छपती हैं, या छपी हैं, आप जानते हैं। असम में भाजपा की सरकार है और प्रधानमंत्री सरकार के काम या बाकी बचे काम की नहीं, कांग्रेस के 10 साल से पुराने शासन में क्या हुआ उसकी बात कर रहे हैं और वह भी तब जब कांग्रेस के ही नेता को मुख्यमंत्री बना रखा है। भ्रष्टाचार के आरोपों और उनके हिन्दू-मुसलमान करने तथा मुसलमानों के लिए बार-बार मियां कहने के बावजूद।  

बात इतनी ही नहीं है। मीडिया का बड़ा वर्ग न सिर्फ सरकार का प्रचार करता है बल्कि जरूरत पड़ने पर खबरों को पर्दे में भी रखता है। उदाहरण के लिए, देशबन्धु की आज की लीड का शीर्षक है – किसानों, निर्यातकों पर गहरी चोट है समझौता। अखबार ने लिखा है, अमेरिका से हुए व्यापार समझौते पर सरकार को फिर घेरा। राहुल गांधी ने कहा है और अखबार ने उपशीर्षक बनाया है, झूठ बोलने में माहिर प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री व्यापार समझौते को लेकर भ्रम फैला रहे हैं। यह खबर मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। कल मैंने लिखा था – सरकारी पक्ष के मुकाबले राहुल गांधी का पक्ष उपलब्ध नहीं है। एक्स पर था, मैंने कॉपी पेस्ट भी किया था लेकिन अखबारों में वह आज सिर्फ देशबन्धु में है। पाठकों की जानकारी के लिए मैं यहां बता देता हूं कि मोटा-मोटी मामला क्या है। खासकर इसलिए कि झूठ बोलने वाले राहुल गांधी पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हैं। अमेरिकी व्यापार करार पर सरकारी प्रचार और राहुल गांधी की जानकारी बताती है कि दोनों किस तरह की राजनीति करते हैं और समर्थकों को क्या समझते हैं। उदाहरण के लिए, अचानक घोषित व्यापार करार की शर्तें तय नहीं हुईं लेकिन उसे अच्छा बताया जाने लगा। राहुल गांधी ने कहा सरेंडर है तो बुरा लगना स्वाभाविक था। कॉटन (कपास) और उससे बनने वाले कपड़ों (टेक्सटाइल) की बात हुई तो राहुल गांधी ने कहा कि बांग्लादेश पर ड्यूटी कम है, भारत पर ज्यादा। अमेरिकी बाजार में भारत का टेक्सटाइल उत्पाद महंगा हो जाएगा, प्रतिस्पर्धा में नहीं टिकेगा। तुरंत जवाब आया, हम भी अमेरिका से कपास खरीदेंगे तो शुल्क बांग्लादेश के बराबर लगेगा। कितनी अच्छी बात है। कितनी समानता है। भारत को बांग्लादेश के बराबर रखा गया है। आदि आदि। पर सच्चाई यह है या राहुल गांधी ने बताया है कि भारत कपास खरीदता नहीं बांग्लादेश को बेचता है। इस शर्त के बाद बांग्लादेश भारत से नहीं अमेरिका से कपास खरीदेगा और भारत के कपास किसानों पर असर पड़ेगा। और भारत अपने कपास का उपयोग नहीं करके अमेरिका से कपास आयात करे तो किसान मर ही जाएंगे। अगर कपास आयात किए बगैर उसका उपयोग करने वाला टेक्सटाइल उद्योग अपना माल अमेरिका में बेचने जाए तो प्रतिस्पर्धा में नहीं टिकेगा। जवाब यह मिलेगा कि भारत अमेरिका से कपास नहीं खरीदता है।

इंडियन एक्सप्रेस की सेकेंड लीड पन्नू की हत्या की साजिश में निखिल गुप्ता के अपराध स्वीकारने के बाद का फॉलो अप है जो अब मीडिया में ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलता है। इस खबर के अनुसार, अमेरिकी न्याय विभाग ने इस बात की पुष्टि की है कि निखिल गुप्ता भारतीय नागरिक है और वह एक सरकारी कर्मचारी के साथ काम करता था। अखबार ने बताया है, विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस मामले में गुप्ता को 40 साल की जेल हो सकती है। उसपर पैसे लेकर हत्या करने समेत तीन आरोप हैं। अखबार का शीर्षक है कि पन्नू मामले में अमेरिकी न्याय विभाग ने रॉ का नाम लिया है। गुप्ता के परिवार ने यह भी कहा बताते हैं कि वह चाहता था कि मामले को खत्म किया जाए और इसलिए अपने ऊपर आरोप ले लिया। जो भी हो, मामला पर्याप्त गंभीर है और भारत के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। सरकार का प्रचार जो है सो है। आज के अखबारों के लिए बांग्लादेश का मामला भी फॉलोअप का होना चाहिए था। खासकर तब जब प्रधानमंत्री बनने के लिए चुने गए तारिक रहमान को बधाई देने वालों में प्रधानमंत्री पहले थे। दि इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है – रहमान ने कहा, विदेश नीति के मामले में हम अपने हितों का ख्याल रखेंगे। द टेलीग्राफ की लीड बांग्लादेश है। आप कह सकते हैं कि कलकाता का अखबार है इसलिए होना ही था। लेकिन फ्लैग शीर्ष है, भारत का उल्लेख करने से बचे तारिक। संतुलित रुख का संकेत दिया। अब चाय वाले की राजनीति से तुलना कीजिए, प्रधानमंत्री पाकिस्तान के बारे में अब जो बोलें, शपथग्रहण में नवाज शरीफ को बुलाया गया था और प्रधानमंत्री बिना बुलाए पाकिस्तान चले गए थे। दि एशियन एज के अनुसार तारिक अनवर ने कहा है, कानून व्यवस्था की स्थिति किसी भी कीमत पर कायम रहनी चाहिए। तारिक रहमान के विदेशी मामलों के सलाहकार तारिक रहमान ने कहा है, भारत को पहले से अलग होना चाहिए और यह भी कि सांप्रदायिक मामले चिन्ता का विषय हैं। यह खबर द हिन्दू में सिंगल कॉलम में है और मुझे लगता है कि आज की खबरों से इस मामले की गंभीरता समझ में आती है लेकिन खबरों की प्रस्तुति में ऐसी गंभीरता नहीं है।   

हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड बता चुका हूं। सेकेंड लीड भारत पाकिस्तान मैच की है। यह लीड के बराबर में है और इसके नीचे छपी खबर का शीर्षक है, रहमान के शपथग्रहण के लिए ढाका ने प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया। आज एक खबर बंगाल में एसआईआर खत्म होने की है। इसके अनुसार, 6 लाख 61 हजार और मतदाताओं को हटाया जा सकता है। आप जानते हैं कि एसआईआर या मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण के नाम पर मतदाताओं को परेशान करने (और मतदाता सूची से) बाहर करने के लिए शुरुआती दलील यह थी कि विदेशी मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जा सकते हैं। इस कारण बिहार में तमाम लोगों के नाम दर्ज नहीं हुए, तेजस्वी यादव का नाम दो जगह था क्या हुआ पता नहीं चला। इसके बावजूद इसका 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विस्तार हुआ और अमर्त्य सेन जैसों की नागरिकता जांची जाने लगी। हंगामा हुआ तो बताया गया कि मामला नागरिकता का नहीं, लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी या तर्कसंगत विसंगतियों का है और ऐसे मामले  ज्यादा है क्योंकि सॉफ्टवेयर गड़बड़ है, लिप्यांतरण में गलती हुई है और नोटिस कंप्यूटर से तैयार हुए हैं। अंततः लाखों लोग मतदाता सूची में शामिल होने से वंचित रह जाएंगे। वे समझेंगे उनकी मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट तक उनकी लड़ाई लड़ ली अब उनकी कौन सुनेगा। चुनाव आयोग कहेगा कोई शिकायत नहीं आई इसलिए सब ठीक है। लाखों लोग जो जमाने से वोट दे रहे थे अब नहीं दे सकेंगे, वे घुसपैठियां हैं कि नहीं और हैं तो खदेड़ा क्यों नहीं जाए, कैसे शामिल हुए थे और नहीं हैं तो अब क्यों रह गए – मुद्दा नहीं है। हमारा भारत महान है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड दूसरे सभी अखबारों से अलग है। इसके अनुसार, शहर में होने वाले एआई सम्मेलन के लिए जी-20 जैसी सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, स्टार्टअप को पूंजी सहायता लिए 10,000 करोड़ का कोष। खबर इस प्रकार है, 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही केंद्र सरकार ने स्टार्टअप, शहरी विकास और रेलवे से जुड़ी 1.60 लाख करोड़ रुपये की कई बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी दी है। केंद्रीय कैबिनेट ने 10,000 करोड़ रुपये के स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स (एफओएफ)-2.0 को मंजूरी दी। इसका फोकस डीप टेक, प्रौद्योगिकी आधारित विनिर्माण और शुरुआती चरण के स्टार्टअप पर रहेगा। इसके साथ, शहरी विकास के लिए एक लाख करोड़ रुपये का अर्बन चैलेंज फंड (यूसीएफ) शुरू करने पर भी मुहर लगाई गई। जाहिर है कि सरकार के 1.6 लाख करोड़ रुपए की परियोजनाओं में से एक 10,000 करोड़ की एक परियोजना को लीड बनाया गया है। जाहिर है, ऐसा स्टार्ट अप के लिए इतनी रकम रखे जाने को महत्व देने या महत्वपूर्ण मानने के लिए किया गया होगा पर 1.6 लाख करोड़ का 10,000 करोड़ में ही सिमट जाना खबरों की प्रस्तुति और चयन का मामला है। नवोदय टाइम्स ने भी आज यही किया है, नोएडा के बॉटनिकल गार्डन से सेक्टर 142 तक मेट्रो की योजना स्थानीय खबर है लेकिन 1.6 लाक करोड़ के अर्बन चैलेंज फंड का ही भाग है। अमर उजाला की तरह नवोदय टाइम्स ने 2,254 करोड़ की परियोजना को ही महत्व दिया है। इतनी बड़ी यह घोषणा हिन्दी के दो अखबारों में छोटी होती गई तो देशबन्धु में पहले पन्ने पर है ही नहीं। नवोदय टाइम्स में जो खबर है वह सरकार का प्रचार करने वाले अखबारों में हो नहीं सकती। शीर्षक है, ऑल वेदर रोड में मानकों की हो रही अनदेखी। खबर का हाईलाइट किया हुआ अंश है, चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई ऑल वेदर रोड परियोजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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