त्रिभुवन-
पत्रकारिता में हम आए दिन टीवी चैनलों पर बहस सुनते हैं। इस बहस में ऐसे चेहरे भी सामने आते हैं, जिन्होंने अतीत में अच्छी पत्रकारिता की थी और उनकी आत्मा जीवंत रहती थी। लेकिन दु:ख होता है, जब हम देखते हैं कि अब वे पूरी तरह न केवल बदल गए हैं, अपितु अपने दोस्तों और समकालीन पत्रकार साथियों पर ऐसे तंज करते हैं, मानो वे अनंत काल से किसी देवपीठ के संचालक हों।


अनंत विजय का 31 दिसंबर 2012 का यह ट्वीट सिर्फ़ एक पुराना ट्वीट नहीं है; यह हिन्दी पत्रकारिता की उस बदलती हुई आत्मा का स्क्रीनशॉट है, जो सत्ता बदलते ही अपने पुराने साहस से कतराने लगती है। तब केंद्र में यूपीए सरकार थी, भाजपा विपक्ष में थी और सुषमा स्वराज जैसी अत्यंत सुविज्ञ, गरिमामयी और अनुभवी नेता भी उनके सवाल से बाहर नहीं थीं। निर्भया जैसे अत्यंत संवेदनशील प्रसंग में वे सुषमा जी से यह सवाल पूछ रहे थे कि पीड़िता के घर जाने से कहीं पहचान उजागर तो नहीं हो रही?
सवाल कठोर था, असहज था; लेकिन पत्रकारिता का स्वभाव भी तो यही है। सत्ता और विपक्ष, दोनों से बराबर असुविधाजनक प्रश्न करना। लेकिन असली प्रश्न अब शुरू होता है। यदि यही ट्वीट बाद में, केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद, डिलीट कर दिया गया तो यह केवल डिज़िटल सफ़ाई नहीं है; यह स्मृति-लोप का संपादकीय अभ्यास है।
यह अपने ही अच्छे और गर्वीले अतीत से आंख चुराने जैसा है। किसी ट्वीट को मिटा देना सिर्फ़ शब्द मिटाना नहीं होता, वह उस समय की अपनी स्वतंत्रता, अपनी बेचैनी और अपने प्रश्नाकुल विवेक को भी मिटाने का प्रयास होता है। इसे अपराध-बोध और आत्मग्लानि का संकेत मानने में अतिशयोक्ति नहीं होगी; क्योंकि मनुष्य वही चीज छिपाता है, जिससे उसे बाद में असुविधा होने लगती है।
पत्रकार के जीवन में विचार बदलना अपराध नहीं है। परंतु सत्ता बदलते ही सवालों की दिशा बदल जाना, यह चिंताजनक है। जो कल विपक्ष की नेता से भी कड़े प्रश्न पूछ सकता था, वह आज यदि सत्ता से प्रश्न पूछने वालों पर ही व्यंग्य-बाण चलाने लगे तो यह वैचारिक विकास नहीं, नैतिक विस्थापन है। यह वही क्षण है जब पत्रकारिता की रीढ़ धीरे-धीरे कुर्सी की टेक में बदलने लगती है।
हिन्दी पत्रकारिता में कुछ अच्छे संपादकों और लेखकों की गिरावट का सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि वे कभी सत्ता के समक्ष खड़े होने वाली भाषा के प्रतिनिधि थे और अब सत्ता के आलोचकों पर चढ़ दौड़ने वाली भाषा के पहरेदार बन गए हैं। पहले वे प्रश्न पूछते थे; अब प्रश्न पूछने वालों की नीयत पूछते हैं। पहले वे सरकार से जवाब मांगते थे; अब सरकार से जवाब मांगने वालों को कठघरे में रखते हैं। यही गिरावट है प्रतिभा की नहीं, चरित्र की; भाषा की नहीं, आत्मा की।
अनंत विजय जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति से अपेक्षा यह थी कि वे सत्ता चाहे किसी की हो, अपनी दृष्टि को स्वतंत्र रखते। लेकिन जब पुराने ट्वीट मिटाए जाते हैं और नई भाषा में सत्ता-संगति चमकने लगती है तो पाठक समझ जाता है कि यहां स्मृति नहीं, सुविधा संपादित की जा रही है। यह किसी एक व्यक्ति की आलोचना नहीं, उस पूरी पत्रकारिता की आलोचना है, जिसने अपने पुराने सवालों को डिलीट कर दिया और नए समय में वफ़ादारी को विवेक का नाम दे दिया।
सच यह है कि ट्वीट डिलीट हो सकता है, स्क्रीनशॉट नहीं; शब्द मिट सकते हैं, चरित्र की दिशा नहीं। यही स्क्रीनशॉट बताता है कि कभी प्रश्न पूछने की क्षमता थी। आम आदमी पार्टी के मामले में वे कुछ अच्छे पत्रकारों पर तंज कस रहे थे; लेकिन उनके वे ट्वीट भी सामने हैं, जिनमें वे केजरीवाल की तुलना माओ के बरअक्स कर रहे थे कि जो माओ बंदूक की नली से सत्ता छीन रहा था, केजरीवाल बिना बंदूक ही वह क्रांति कर दी। कितनी अच्छी क्षमता थी वह लेकिन दु:ख यह है कि अब वही क्षमता सत्ता की ओर नहीं, सत्ता से सवाल करने वालों की ओर मुड़ गई है। यही पत्रकारिता की सबसे मार्मिक और सबसे शर्मनाक गिरावट है।


