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ब्राह्मण समाज ने दिखा दी ताक़त, डरे अनुराग कश्यप ने बहुत तगड़ी वाली माफ़ी माँगी!

सोशल मीडिया एक्स प्लेटफार्म पर फ़िल्म निर्माता निर्देशक अनुराग कश्यप ने ब्राह्मणों को गाली देने के बाद देश भर में विरोध के स्वर को देखते हुए तगड़ी माफ़ी माँगी है। देखें अनुराग की पोस्ट-

मैं गुस्से में किसी को एक जवाब देने में अपनी मर्यादा भूल गया। और पूरे ब्राह्मण समाज को बुरा बोल डाला। वो समाज जिसके तमाम लोग मेरी जिंदगी में रहे हैं, आज भी हैं और बहुत कॉन्ट्रीब्यूट करते हैं। आज वो सब मुझसे आहत हैं। मेरा परिवार मुझसे आहत है। बहुत सारे बुद्धिजीवी, जिनकी मैं इज्जत करता हूं मेरे उस गुस्से में, मेरे बोलने के तरीके से आहत हैं।

मैंने खुद ही ऐसी बात करके, अपनी ही बात को मुद्दे से भटका दिया। मैं तहे दिल से माफी मांगता हूं, इस समाज से जिनको मैं ये नहीं कहना चाह रहा था, लेकिन आवेश में किसी की घटिया टिप्पणी का जवाब देते हुए लिख दिया।

मैं माफी मांगता हूं अपने उन तमाम सहयोगी दोस्तों से, अपने परिवार से और उस समाज से, अपने बोलने के तरीके के लिए, अभद्र भाषा के लिए।

अब आगे से ऐसा न हो, मैं उस पर काम करूंगा। अपने गुस्से पर काम करूंगा। और मुद्दे की बात अगर करनी हो तो सही शब्दों का इस्तेमाल करूंगा।

आशा है आप मुझे माफ कर देंगे।


अनुराग कश्यप की पुरानी पोस्ट-


कुछ प्रतिक्रियाएं-

अविनाश दास- मैंने बहुत सोचा कि इस विषय पर नहीं बोलूंगा, लेकिन लगा कि नहीं – बोलना चाहिए। अनुराग कश्यप कौन है? एक फ़िल्ममेकर जो हिंदी सिनेमा में नया तेवर लेकर आया। जब-तब फ़िल्म इंडस्ट्री, समाज और राजनीति के बारे में अपनी तमाम तरह की समझ को उसने ज़ाहिर किया। काफ़ी लोगों को अनुराग से तक़लीफ़ हुई होगी और उन सबने अपनी नाराज़गी वक़्त वक़्त पर ज़ाहिर भी की होगी – लेकिन अनुराग ने कभी किसी की परवाह नहीं की। कुछ साल पहले उसका मुंह बंद करने के लिए उसके घर ईडी पहुंच गयी। अनुराग ने बोलना बंद कर दिया। और तमाम लोगों ने भी बोलना बंद कर दिया, जिन्हें लगता था कि उनके व्यावसायिक हित को नुक़सान पहुंच सकता है। इस सबसे हुआ ये कि सत्ता और निरंकुश हो गयी। सत्ता यानी सेंसर बोर्ड। उसने बेवजह सिनेमा की शक्लें बिगाड़नी शुरू कर दी। “फुले” और “धड़क टू” पर सेंसर की कैंची से वैचारिक तानाशाही जब अपने वीभत्स रूप में सामने आयी, तब अनुराग कश्यप का धीरज टूटा और उसने बोला। उसने जो भी कहा, वो सच कहा। कोई हो न हो, मैं अनुराग कश्यप के साथ हूं।


उर्मिलेश- अनुराग कश्यप अच्छे फ़िल्म प्रोफेशनल माने जाते हैं. पर निजी तौर पर मैं उनके ‘उस अभद्र शब्द’ से पूरी तरह असहमत हूं, जिसका प्रयोग उन्होंने पिछले दिनों किसी समुदाय विशेष के लिए किया था. उन्हें आवेश या ग़ुस्से में भी अपनी भाषा का संयम बनाये रखना चाहिए था़. अच्छी बात कि उन्होंने अफ़सोस जताया!
पहली बात तो ये कि मैं नहीं मानता कि हर ब्राह्रमण या सवर्ण दक़ियानूसी या जातिवादी ही होगा और हर वंचित या पिछड़ा बदलाववादी और क्रांतिकारी ही होगा!

हमने राहुल सांकृत्यायन को पढ़ा, EMS नंबूदिरिपाद ने जो केरल में किया, उसे भी देखा. देवराज अर्स, सी अच्युत मेनन और शेख अब्दुला के काम का भी अध्ययन किया. इनमें कोई वंचित समाज से नहीं था. वंचित और सबाल्टर्न समूह में पैदा हुए महान् बदलाववादी विचारकों और नेताओं जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार, डाॅक्टर अम्बेडकर, नारायणगुरु, अन्नादुरै, करुणानिधि और वी एस अच्युतानंदन के जीवन और काम का भी अध्ययन किया. इन्होंने समाज को बदलने का नजरिया ही नहीं दिया; उस पर अमल भी किया.

अपने छात्र-जीवन में मैने ऐसे युवकों को भी देखा, जो सवर्ण समुदाय में पैदा हुए थे. पर उन्होंने वंचितों के लिए अपनी जान तक दे दी! कैसे मानूँ कि सारे सवर्ण-यथास्थितिवादी ही होंगे!
बेहतर बदलाव के लिए प्रतिरोध जरूरी है.आज के दौर में वह क्रोनी कैपिटलिज्म-काॅरपोरेटवाद, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और मनुवाद आदि का होना चाहिए. हर इंडिविजुअल ब्राह्मण के विरोध का कोई मतलब नहीं!

हां, ये बात सही है कि हमारे समाज की उच्चवर्णीय आबादी का बड़ा हिस्सा यथास्थितिवादी और सत्तावादी नजर आता है. पर अनेक अपवाद भी तो हैं!

वंचितों में बदलाव की आकांक्षा नैसर्गिक है. पर बदलाव की वैचारिकी नैसर्गिक नहीं! वर्ना वंचित और उत्पीड़ित समाज का हर व्यक्ति अम्बेडकरवादी, जेनुइन बदलाववादी या वाम-क्रांतिकारी होता! पर वंचित और उत्पीड़ित समुदाय से आये अनेक लोग आज यथास्थितिवाद और सर्व-सत्तावाद की राजनीति में सक्रिय नजर आते हैं! दरअसल, बदलाव की वैचारिकी ज्ञान, बोध और कर्म से हासिल होती है.–और यह किसी भी समुदाय का व्यक्ति हासिल कर सकता है..


पीयूष पांडेय-

अमां अनुराग, काहे बवाल काट दिया…

आजकल लिखना छूट गया है, लेकिन अनुराग कश्यप विवाद के बीच कुछ लिखने का मन हो गया। निजी तौर पर मेरा मानना है कि फिल्मकार को अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए। और ज्योतिबा फुले और सावित्री फुले की कहानी में जाति का, ब्राह्मणवाद का जिक्र नहीं होगा तो कहां होगा ? लेकिन, सवाल ये है कि क्या आज की तारीख में हर फिल्मकार तथ्यों के साथ पूरी संवेदनशीलता बरत रहा है। उदाहरण के लिए राष्ट्रवाद से ओतप्रोत ‘केसरी टू चैप्टर’ अच्छी होते हुए भी इतिहास की सच्चाई से कोसो दूर है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी फिल्मकार नहीं लेगा। चूंकि, फिल्म में विलेन अंग्रेज है तो ज्यादा लफड़ा नहीं हुआ। अगर कोई जाति या धर्म होता तो हंगामा हो जाता। वैसे भी, ये कोई पहली बार नहीं है कि जब किसी जाति समूह की तरफ से किसी फिल्म का विरोध हुआ हो और फिल्म सेंसर के झंझट में उलझ गई हो। कई बार ऐसा हुआ और कई बार फिल्मकारों ने अपनी तरह से रास्ता निकाला है। हाल की बात करें तो 2007 में ‘आजा नचले’ के एक गाने में मोची शब्द का इस्तेमाल था, लेकिन विरोध हुआ तो गाने से शब्द हटा दिया गया। ‘बिल्लू बार्बर’ रिलीज होने के बाद सैलून एसोसिएशन ने एतराज जताया, और बार्बर को जातिसूचक कहा तो फिल्म का नाम ही बिल्लू हो गया। हाल में ‘छावा’ के ट्रेलर में शंभाजी के किरदार के नाचने पर विरोध हुआ तो उसे हटाया गया। दरअसल, बीते कई साल से जाति और धार्मिक समूहों की भावनाएं बहुत जल्दी आहत होने लगी हैं, और भावनाएं आहत होने पर कई बार वो हिंसा पर उतारु हो जाते हैं, जिसे संभालना पुलिस-प्रशासनक को पड़ता है। लेकिन, समझदार फिल्मकार संतुलन बनाता है। मसलन अनुभव सिन्हा ने ‘आर्टिकल-15’ जैसी शानदार फिल्म बनाई। श्याम बेनेगल ने एक जमाने में ‘अंकुर’ बनाई थी। दरअसल, सेंसरबोर्ड अब अपनी समझ से कम देश की सामाजिक-राजनीतिक हालत से ज्यादा प्रभावित होता दिख रहा है। वैसे, सेंसर बोर्ड से फिल्म बैन होने की कहानी आज की नहीं है। और ये भी सच है कि समझदार फिल्मकार अपने सच को साबित कर लड़ाई जीतते हैं। जैसे, 70 के दशक में एमएस सथ्यू की फिल्म ‘गर्म हवा’ को सेंसर बोर्ड ने बैन कर दिया था, लेकिन सथ्यू ने पत्रकारों को, अधिकारियों को, राजनेताओं को अलग अलग फिल्म दिखाई और आखिरकार फिल्म को रिलीज कराने में सफलता पाई। बाद में फिल्म ने राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता। दूसरी तरफ, अनुराग कश्यप बौखलाते जल्दी और ज्यादा है। जानकारी के लिए कुछ यूट्यूबर ‘फुले’ फिल्म को अनुराग कश्यप की फिल्म बता रहे हैं, जबकि इस फिल्म के निर्देशक अनंत महादेवन हैं और संयोग से अनंत खुद ब्राह्मण हैं। दूसरी दिलचस्प बात ये कि अनुराग एक-दो साल पहले डीएनए को दिए इंटरव्यू में कह चुके हैं कि उन्हें अब सेंसर बोर्ड से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ओटीटी प्लेटफार्म आ चुके हैं और उनका ये भी कहना था कि अगर आप सही हैं और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ सकते हैं तो फिल्म की रिलीज होकर रहेगी। तो भइया, अनुराग जी, एक तरफ आप बॉलीवुड छोड़ दक्षिण में जाने का ऐलान कर चुके हैं, लेकिन आपका मन अटका यही है। दुर्भाग्य ये कि अनुराग के फिजूल के बयान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरबोर्ड के अधिकार को लेकर उस बहस को कुंद कर दिया, जो फुले, पंजाब-95 या संतोष जैसी फिल्मों के बहाने होनी चाहिए थी।


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