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बनारस के ASG Eye Hospital का सच : आंख के ऑपरेशन के लिए गई मेरी बच्ची लाश बन गई!

बनारस में सफेद कोट अब इलाज नहीं, धंधे का प्रतीक बन चुका है। इलाज की आड़ में चल रहे निजी अस्पतालों के इस ‘मौत महोत्सव’ में इंसानियत आख़िरी सांसें गिन रही है। जहां मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, वहीं लौटती हैं लाशें और पीछे छूट जाते हैं रोते-बिलखते परिजन। सात साल की मासूम अनाया की मौत ने एक बार फिर इस सिस्टम का क्रूर चेहरा उजागर कर दिया है—जहां डॉक्टर नहीं, अब ‘डीलर’ बैठते हैं… और अस्पताल नहीं, मौत के ठिकाने चल रहे हैं। पढ़िए बनारस के वरिष्ठ पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट-


हमसे बार-बार झूठ बोला गया कि सब ठीक है, जबकि सब खत्म हो चुका था!

भास्कर गुहा नियोगी-

बनारस। बनारस में निजी अस्पतालों का सच बेहद भयावह है। यहां इलाज करवाने में जान और माल दोनों का खतरा है। आंख की रेटिना के ऑपरेशन के लिए गई सात वर्षीया अनाया रिज़वान लाश बन गई।

अनाया की मां आफरीन का कहना है कि हमसे बार-बार झूठ बोला गया कि सब ठीक है, जबकि सब खत्म हो चुका था। हमें कहा गया था कि यह छोटा-सा ऑपरेशन है, एक घंटे में हो जाएगा। लेकिन कई घंटे बीत जाने के बाद जब मैं ऑपरेशन थियेटर में गई तो देखा कि मेरी बेटी उल्टी पड़ी हुई है, डॉक्टर या कोई भी शख्स उसके पास नहीं था। बाद में हमें बताया गया कि उसे दूसरे अस्पताल ले जाना होगा।

जब मैं एम्बुलेंस में बैठने लगी तो मुझे रोक दिया गया और कहा गया कि आप “आशीर्वाद अस्पताल” पहुंचिए। हम लोग वहां पहुंचे तो अनाया को वहां लाया ही नहीं गया था। फोन करने पर कहा गया कि “पॉपुलर अस्पताल” आइए। वहां पहुंचे तो वही कहानी दोहराई गई और फिर कहा गया कि “महमूरगंज स्थित मैट केयर अस्पताल” पहुंचिए। वहां पहुंचने पर हमसे बीस हजार रुपये जमा करवाए गए। अनाया को वेंटिलेटर पर डाल दिया गया और थोड़ी ही देर में सब खत्म हो गया।

बीते 16 अक्टूबर को कक्षा दो में पढ़ने वाली अनाया को उसके घरवाले महमूरगंज स्थित ASG Eye Hospital लेकर गए थे, जहां उसकी आंख का ऑपरेशन होना था। अनाया का इलाज वहां पहले से चल रहा था। घंटों इंतज़ार के बाद उसे ऑपरेशन के लिए ले जाया गया। डॉ. कार्तिकेय ने ऑपरेशन किया। घरवाले बाहर इंतजार करते रहे। उनका कहना है कि उन्होंने डॉ. कार्तिकेय को ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकलते देखा। काफ़ी समय बीतने के बाद जब आफरीन अंदर गईं तो देखा कि अनाया अकेली स्ट्रेचर पर पड़ी थी।

थोड़ी देर बाद डॉक्टरों ने उसे दूसरे अस्पताल ले जाने की बात कही। घरवालों से उसकी बिगड़ती हालत को लगातार छिपाया गया। बाद में अनाया को महमूरगंज स्थित मैट केयर मैटरनिटी एंड चाइल्ड केयर अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई।

इस मामले में अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने बनारस के सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वाराणसी के जिलाधिकारी तथा प्रदेश के प्रमुख स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिखकर तत्काल उच्च स्तरीय जांच का आदेश देने की मांग की है।

उधर परिजनों ने भेलूपुर थाने में तहरीर देकर ASG Eye Hospital और मैट केयर अस्पताल से ऑपरेशन थियेटर के CCTV फुटेज, वेंटिलेशन व एनेस्थीसिया से संबंधित रिकॉर्ड, तथा मरीज की भर्ती से मृत्यु तक के सभी चिकित्सकीय दस्तावेज़ बरामद करने की मांग की है, ताकि साक्ष्य नष्ट न किए जा सकें।

बनारस के निजी अस्पतालों में चल रही संगठित जान-माल की लूट पर शायद ही कोई कार्रवाई होती है। ये अस्पताल मरीजों के परिजनों से उगाही करने के साथ-साथ कई बार लापरवाही से जान भी ले लेते हैं। हतप्रभ और आहत परिजन आंसू पीकर लौट जाते हैं। इन अस्पतालों को “मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट” का संरक्षण प्राप्त है — यह बोर्ड हर अस्पताल में टंगा दिख जाएगा, लेकिन मरीजों की सुरक्षा के लिए कोई “पेशेंट प्रोटेक्शन एक्ट” नहीं है।

बनारस में निजी अस्पतालों की लूट जारी है। शायद ही किसी के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई हुई हो। कोरोना काल में भी ऐसे ढेरों मामले सामने आए, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

बीते दिनों सुंदरपुर स्थित एपेक्स अस्पताल में भी एक मरीज की मौत के बाद परिजनों ने हंगामा किया था। ऐसी मौतों की एक पूरी श्रृंखला बन चुकी है। अगला शिकार कौन होगा, कोई नहीं जानता। आम आदमी आखिर बचेगा कैसे और उसके साथ खड़ा कौन है?

अनाया की मौत ने एक बार फिर इन अस्पतालों के अमानवीय और लालची चरित्र को उजागर कर दिया है। चिकित्सा अब करोड़ों का बाजार बन चुकी है — और उस बाजार में मरीज सिर्फ एक एटीएम है, जिसे निचोड़ कर छोड़ दिया जाता है।

डॉ. कार्तिकेय ने आफरीन को किया फोन

घटना के बाद जब मामला थाने तक पहुंचा, तो ASG Eye Hospital में अनाया का ऑपरेशन करने वाले डॉ. कार्तिकेय ने आफरीन को फोन कर अस्पताल आकर बात करने को कहा। बातचीत में आफरीन को यह कहते सुना जा सकता है —

“उस दिन जब अनाया की हालत बिगड़ी थी, मैं आपसे बात करवाने के लिए सबसे मिन्नतें करती रही, लेकिन किसी ने बात नहीं करवाई। आप कैसे जा सकते थे? मेरी नन्ही-सी बेटी ऑपरेशन थियेटर में अकेली पड़ी रही, उसके पास कोई नहीं था।”


पहले इन्हें भगवान कहा जाता था “आज भी भगवान के रूप में कई हैं” लेकिन अब ये व्यापारी और यमराज बन गए हैं.

– अजीत कुमार पाण्डेय

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