पीड़ित पर ही एफआईआर! ये यूपी में क्या हो रहा है सरकार…

आधी रात कैन्टीन का ताला तोड़ समान लूट ले गये प्रबन्ध समिति के लोग… वाराणसी। कहीं लूट कहीं हत्या तो कहीं चोरी। नामजद चोरी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी गिरफ्तारी तो दूर, उल्टे रसूख और पैसे की ताकत से पीड़ित पर ही हो जा रही है एफआईआर दर्ज। यही है प्रधानमंत्री मोदी जी के सांसदीय क्षेत्र में कानून-व्यवस्था का हाल। सूबे में कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए योगी सरकार द्वारा दिये गये कड़े निर्देशों का कोई असर बनारस में नहीं देखने को मिल रहा है। खाकी यहां कुछ ज्यादा ही सुस्त है और कानून को ताक पर धरकर घटना को अंजाम देने वाले हाल-फिलहाल कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं।

घटना के बाद भले ही एफआईआर दर्ज कर ली जा रही हो लेकिन जांच के नाम पर सुस्ती और गिरफ्तारी के नाम पर सन्नाटा आरोपी को बचने व सबूतों के साथ छेड़छाड़ का ढेरों मौका उपल्बध करा दे रहे हैं। चौक थाना क्षेत्र के घुघंरानी गली स्थित हिन्दू सेवा सदन अस्पताल में कैन्टीन संचालक माता प्रसाद की आपबीती शहर के कानून व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा कर रही है। कैन्टीन का ताला तोड़ 29 मई की आधी रात अस्पातल प्रबन्ध समिति के सम्मानित पदाधिकारी लोग समान उठा ले गये। इस मामले में पीड़ित कैन्टीन संचालक माता प्रसाद की तहरीर पर चौक पुलिस ने प्रबन्ध समिति के सचिव अमिताभ केडिया, उपाध्यक्ष जय प्रकाश मुद्रा, प्रबन्धक जी.वी.रमण सहित चार अज्ञात लोगों पर चौक थाने में धारा 380 का मुकद्मा 30 मई को दर्ज करने के साथ ही पीड़ित पर भी धारा 504, 506 का मुकद्मा ठोक दिया ताकि आने वाले दिनों में पीड़ित पर दबाव बनाकर सुलह-समझौते का रास्ता बनाया जा सके।

घटना के बारे में पीड़ित माता प्रसाद बताते हैं कि कैन्टीन को खाली करने के लिए अमिताभ केडिया पिछले कई महीने से उन पर दबाव बना रहे थे। इस सन्दर्भ में उन्होंने चौक थाने में आधा दर्जन से ज्यादा शिकायतें भी की लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। बीते अप्रैल को उनके प्रार्थना प्रत्र पर हुई जांच में पुलिस ने इस बात को माना है कि माता प्रसाद वहां कैन्टीन चलाते हैं और वहां का प्रशासक उन्हें वहां से निकालना चाहते हैं। साथ ही मामले में न्यायालय में मुकदमा भी दाखिल है।

माता प्रसाद बताते हैं कि जब बीते 29 मई की रात उन्हें घटना के बारे में जानकारी हुई तो उन्होनें 100 नम्बर पर डायल कर इसकी सूचना पुलिस को दी। मौके पर पहुंचे तो उन्हें वहां सचिव अमिताभ केडिया, जयप्रकाश मुद्रा, जीवीरमण मिले। कैन्टीन का ताला टूटा हुआ मिला। साथ ही कुछ समान भी अस्पताल परिसर में रखा दिखा। बावजूद मौके पर पर पहुंची पुलिस ने न तो सीसीटीवी कैमरे में कैद फुटेज को देखने या उसे कब्जे में लेने की जहमत उठाई न ही अस्पताल में रखे चोरी के माल को बरामद किया। उल्टे अगले दिन एफआईआर दर्ज करने की बात कहकर लौट गयी। अगले दिन एफआईदर्ज तो कर लिया गया लेकिन फौरी कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं किया गया।

बाद में घटना स्थल के निरीक्षण के नाम पर पहुंची पुलिस को प्रबन्धक की तरफ से लिख कर दे दिया गया कि अस्पताल में लगे सीसीटीवी कैमरे 15 मई से ही खराब चल रहे हैं। प्रबन्धक की ये दलील पूरे मामले में प्रबन्ध समिति की नीयत पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है। हाल-फिलहाल अपने रोजगार से बेदखल कर दिए गए माता प्रसाद रोजगार पर दखल पाने के लिए रोज एक नये प्रार्थना पत्र के साथ पुलिस के उच्च अधिकारियों के दफ्तरों की परिक्रमा कर रहे हैं। न्याय के नाम पर जांच और आश्वासन की घुट्टी से उन्हें इंसाफ मिलेगा कि नहीं, ये तो पता नहीं लेकिन एक बात तो तय है, कि अभी भी उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था प्रभावशाली और ताकतवरों को छूना नहीं चाहती भले ही कमजोर अपनी रोजी-रोटी से जाए या फिर जान-माल से।

….कई और हैं निशाने पर  
हिन्दू सेवा सदन अस्पताल में पिछले कई सालों से न्यूनतम वेतन को लेकर कार्यरत कर्मचारी अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। इस मामले में न्यायालय में मुकदमा भी चल रहा है। ऐसे में माता प्रसाद के प्रकरण से शायद प्रबन्ध समीति कर्मचारियों में संदेश देना चाहती है कि खामोश रहकर घुटते हुए खुश रहें, या फिर दूसरी तस्वीर सामने है।

बनारस से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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…जब अफसर-बाबू ऐसे होंगे तब न्याय कैसे होगा?

गाजीपुर। अफसर-बाबुओं की मुट्ठी गर्म कर मनमर्जी तरीके से दूसरों की संपत्ति पर अपना नाम चढ़वा लेने का खेल तहसील स्तर पर जारी है। फर्जीवाड़े के इस खेल का शिकार अगर कोई बनता है, तो वो है पीड़ित व्यक्ति क्योंकि अपनी ही संपत्ति को वापस पाने के लिए तहसील से लेकर न्यायालय तक दौड़ने में न जाने कितने साल गुजर जाते हैं, और कितनी जोड़िया चप्पलें घिस जाती हैं, लेकिन बावजूद इसके इंसाफ नहीं मिलता। तहसील स्तर पर इस तरह के मामले कदम-कदम पर नजर आयेंगे। सूबे में सरकार भले ही बदल गयी हो, लेकिन कार्य-संस्कृति की बयार आज भी वही है। न्याय पाने के लिए कल भी अर्जियां दौड़ रही थीं, आज भी दौड़ रही हैं।

मामला पूर्वी यूपी के गाजीपुर जिले के जखनिया तहसील से जुड़े गांव कस्बा कोईरी का है। यह गाव थाना शादियाबाद में पड़ता है। मूल रूप से कस्बाकोईरी के रहने वाले कृष्ण कुमार श्रीवास्तव बनारस में रहकर छोटी सी नौकरी के सहारे अपने और अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं। कृष्ण कुमार ने जरूरत के वास्ते आराजी नम्बर 160-161 में स्थित एक बिस्सा जमीन अपने बड़े भाई अजय कुमार की पत्नी मधु श्रीवास्तव को बेचा। बड़े भाई की नीयत पलट गयी तो खरीदे गये जमीन का भुगतान करना तो दूर उल्टे आबादी नम्बर 169 में स्थित मकान पर भी तहसील कर्मियों की मिली-भगत से अपना नाम चढ़वा लिया।

अपने घर से बेघर हुए कृष्ण कुमार घर वापसी के लिए तहसील दिवस से लेकर थाना दिवस तक दर्जनों से ज्यादा प्रार्थना पत्र दे चुके है। लेकिन उनकी कही कोई सुनवाई नहीं हुई। इस तरह के संवेदनशील मामलों में तहसील पर बैठे अधिकारी-बाबू किस हद तक अंसेवदनशील हो सकते हैं, इसका उदाहरण पीड़ित कृष्ण कुमार के मामले में तब देखने को मिला जब विगत 21 अक्टूबर  2016 को तहसील दिवस पर उनकी शिकायत पर तहसील से जो जवाब मिला उसमें मकान का आराजी नम्बर 160-161 में होना बताया गया जबकि उनका मकान आबादी नम्बर 169 में स्थित है। इसी तहसील में नायाब तहसीलदार की 15 अ्रपैल 2015 की रिपोर्ट पीड़ित कृष्ण कुमार के पक्ष में यह कहती दिखती है, कि प्रार्थी कृष्ण कुमार के बड़े भाई ने उनके हिस्से में जबरदस्ती कब्जा कर रखा है।

इंसाफ पाने के लिए कृष्ण कुमार हर हफ्ते कभी गाजीपुर के जिलाधिकारी कभी जखनिया तहसील के एसडीएम तो कभी शादियाबाद के थानेदार के दरबार में अपनी अर्जियों के साथ हाजिरी ठोके जा रहे हैं, लेकिन लेकिन लेन-देन की कार्यशैली के चलते उनके साथ इंसाफ होता नहीं दिखता।

आखिर क्यों नहीं रुकते इस तरह के मामले?
पुलिस व प्रशासन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्य के प्रति अरूचि तथा काम करने के बदले गलत तरीके से धन अर्जित करने की प्रवृत्ति के चलते इस तरह के मामले अक्सर देखने में आते हैं। ऐसे प्रकरणों में कानून स्पष्ट रूप से पीड़ित को न्याय सुलभ करवाने के हक में अनअधिकृत रूप से काबिज व्यक्ति को हटाये जाने की बात कहता है। इस तरह के मामलों की उपेक्षा के चलते ही शांति भंग से लेकर हत्या तक की घटनाए सामने आती हैं। उप जिलाधिकारी से लेकर क्षेत्रीय थानाध्यक्ष, सी.ओ. का ये प्राथमिक कर्तव्य होता है, कि वो इस तरह के मामले संज्ञान में आने के बाद प्रभावी रूप से कार्यवाही कर पीड़ित पक्षकार के हित में न्याय सुनिश्चित करे जबकि ठीक इसके उलट पीड़ित को जांच का झुनझना थमा सब अपने कत्वर्य की इतिश्री कर लेते है और पीड़ित साल दर साल भटकते रहते है।

बनारस से युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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मदर्स डे और मौत मांगती एक मां

एक मां की कहानी, उन्हीं की जुबानी… मैं माया देवी. मेरी उम्र 92 साल है. मैं काशी बनारस की रहने वाली हूं. कहते हैं, काशी में मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. भगवान से पूछती हूं, राधा-माधव, कितने बार मुझे मरना होगा कि मोक्ष मिल जाए! जानते हैं, क्यों? क्यों कि मैं रोज हर-पल मर रही हूं। खुद का घर रहते हुए इन दिनों मेरा ठिकाना किराये का एक कमरा है। मैं चल नहीं सकती क्योंकि मेरा पैर मेरा साथ नहीं दे रहे। जानना चाहेंगे क्यों? क्योंकि तीन महीने पहले मेरी बहू कंचन ने मुझे जानवरों की तरहत पीटा, सीढ़ियों से ढकेल दिया। मर जाती तो अच्छा था। पर मौत ने दगा दिया। शायद जिदंगी मुझे और दुःख देना चाहती है।

माया देवी 92 साल की उम्र में अपनी बहू से पीड़ित है। बार-बार कानून और न्याय की चौखट पर पहुंची उनकी गुहार अनसुनी कर दी जाती रही। शायद इसलिए कि सत्ता बदली है, व्यवस्था नहीं।

दो महीने तक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी रही। वो दिन 26 फरवरी का था। मैं कबीरचौरा के शिव प्रसाद गुप्त अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पड़ी चार घंटे तक दर्द से कराहती रही। उधर सिगरा थाने में माता कुण्ड चौकी इंर्चाज लक्ष्मण यादव ने शिकायत करने गये मेरे बेटे घनश्याम को ही थाने पर बिठा लिया। बाद में अस्पताल में आपरेशन के बाद जब डाक्टर ने घर जाने को कहा तो मेरे सामने सवाल था कि मैं किस घर जाऊं। मेरे घर के कमरों में तो मेरी बहू कंचन ने ताला बंद कर रखा है।

बाद में एम्बुलेंस से ही खुद के लिए न्याय की गुहार लगाने शहर के एस.एस.पी नितिन तिवारी के पास गई। इस उम्मीद से कि सूबे में बनी नई सरकार हम बुर्जुगों के साथ अन्याय नहीं होने देगी। लेकिन यहां भी उम्मीद की दीवार ढह गई। निराशा ही हाथ लगी। मेरी बहू के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज है। पर कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ। वो खुलेआम घूम रही है।

आज से नहीं पिछले दो साल से मेरी कई दर्जन अर्जिया पुलिस-प्रशासन के आला अधिकारियों के पास दौड़ कर दम तोड़ बैठी। मैं कहती रही कि मेरी जान को मेरी बहू से खतरा है। पर कोई सुनवाई कभी नहीं हुई। उल्टे पुलिस वाले मुझे समझाते रहे, अपनी संपत्ति का बटवारा क्यों नहीं कर देती? मैं खुद के सम्मान की बात करती रही, वो संपत्ति की।

आज मांओ का दिन है यानि मदर्स डे, अखबार में मांओ के बारे में खूब छपा है। पर मेरी कहानी…. मेरे दर्द और अपमान की कहानी शायद मेरे साथ ही कुछ दिनों बाद खतम हो जायेगी। मुझे शायद इंसाफ नहीं मिलेगा और अपने घर की वो छत भी जहां मेरी जिदंगी गुजर रही थी। हर पल मरने की दुआ मांगती हूं, और सोचती हूं…

जिदंगी से बड़ी सजा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।

लेखक भाष्कर गुहा नियोगी वाराणसी के जनसरोकारी पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415354828 के जरिए किया जा सकता है.

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भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की योगी सरकार की नीति को मुंह चिढ़ाता एक सरकारी अस्पताल

प्रदेश भर में चल रहे राजकीय आर्युवेदिक और यूनानी चिकित्सालय न सिर्फ बदहाल हैं बल्कि लूट के अड्डे बने हुए हैं। इन अस्पतालों में दसकों से तैनात चिकित्सक और कर्मचारी दलाली की मलाई काट रहे हैं। इन अस्पतालों को दवा आपूर्ति से लेकर अन्य सुविधाओं के नाम पर मिलने वाले करोड़ो का बजट किसके पेट में जा रहा है, ये इन अस्पतालों में जाकर वहां के हालात और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को देखकर समझा जा सकता है। जौनपुर के शाहगंज स्थित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय इन दिनों बाबू, डाक्टर और कर्मचारियों की मिलीभगत से खुली लूट का केन्द्र बना हुआ है। दवाओं की आपूर्ति से लेकर अन्य मामलों में यहां बड़ी खामियां है। यहां मरीजों का कल्याण सिर्फ कागजों पर हो रहा है।

बसपा से भाजपा में गये और फिलहाल आयुष मंत्री बने धर्म सिंह सैनी के साथ कई किस्म के आरोपों से घिरा बाबू इशरत हुसैन (चश्मे में, तीर से निशान बना हुआ है)।

जौनपुर के शाहगंज स्थित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय में पिछले 25 वर्षों से तमाम स्थानांतरण नीति को ताक पर रखकर इशरत हुसैन नामक एक बाबू लगातार अपनी मनमानी चला रहा है। इसने तो पूरे कार्यालय को ही कचहरी के पास हुसैनाबाद से हटाकर एक वर्ग विशेष की आबादी वाले इलाके रासमण्डल में लेकर चला गया है, ताकि इसकी मनमाना पूरी तरह खुल कर चल सके। चर्चा तो इस बात को लेकर भी है कि इसकी पहुंच सरकार के मंत्रियों तक है।

जौनपुर के शाहगंज स्थित इसी राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय में तैनात डा. विजय प्रताप का प्रदेश सरकार के आयुष विभाग द्वारा खमरिया भदोही में रिक्त चिकित्साधिकारी के पद पर स्थानान्तरण किया गया लेकिन वो यहां से टस से मस होने का नाम नहीं ले रहे हैं। ये चिकित्सक महोदय को खुद को कानून से परे समझते हैं। हाईकोर्ट ने इन्हें विगत 17 मार्च को ही कार्यमुक्त हो जाने का आदेश दिया है। पूरा मामला तब सामने आया जब यहां चिकित्साधिकारी के पद पर तैनात डा. श्रीप्रकाश सिंह ने यहां चल रहे लूट-खसोट में हिस्सेदार बनने से मना कर दिया। बकौल श्रीप्रकाश सिंह, यहां बड़े पैमाने पर सरकारी धन के लूट का खेल चल रहा है। 21 शैया वाले जिले के सबसे बड़े इस अस्पताल में मरीजों को सुविधा के नाम पर कुछ नहीं दिया जा रहा है। सरकारी पैसे के लूट की खुली छूट यहां मिली हुई है।

डाक्टर श्रीप्रकाश सिंह ने प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा से लेकर आयुष विभाग के आला अधिकारियों तक को दर्जनों पत्र लिख कर यहां चल रहे भ्रष्टाचार की जांच कराने की मांग की लेकिन कहीं कुछ नहीं हो रहा। करप्शन से लड़ रहे इस डाक्टर की आवाज नक्कारखाने में तूती साबित होती दिख रही है। डा. सिंह की माने तो बलिया से यहां आने के बाद से ही उन्हें खामोश रहने की धमकिया दी जा रही हैं। कार्यवाहक क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी के पद पर डाक्टर श्रीप्रकाश की नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय द्वारा आदेश दिये जाने के बाद भी उन्हें तैनाती नहीं दी जा रही है।

यहां चल रहे भ्रष्टाचार के खेल का छोटा सा नमूना इस बात से समझा जा सकता है कि 15 मई के दिन अस्पताल के रिकार्ड में 20 थर्मामीटर की आपूर्ति दर्शायी गयी है। दूसरी तरफ उसी दिन इन थर्मामीटरों को कार्य करते समय खराब होने की बात भी कही जा रही है।

डा. श्रीप्रकाश सिंह ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई सारे पत्र लिखे हैं। योगी सरकार भी भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टालरेंस की नीति अपनाने की घोषणा कर चुकी है। ऐसे में डा. श्रीप्रकाश के आरोपों की जांच कराकर दोषी और भ्रष्ट कर्मियों को दंडित किया जाना जरूरी है ताकि आम जन को उनका हक मिल सके।

बनारस से भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क : bhaskarniyogi.786@gmail.com

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काम बोलता है : चार घंटे तक इमरजेंसी में कराहती रही बूढ़ी मां, बेटे को जबरन थाने में बिठाये रखा

वाराणसी। यूपी में चल रहे चुनावी दंगल में भले ही ‘काम बोलता है’ का धुन आम मानुष के लिए सुशासन होने का दावा भर रहा हो पर जमीन पर थानों में वर्दी की दबंगई के आगे आम आदमी का गूंगापन और लाचारी बोल रहा है। बीते रविवार यही नजारा देखने को मिला जब अपनी 92 वर्षीय बूढ़ी मां माया देवी को उन्हीं की बहू कंचन और उसके मामा मंगला प्रसाद ने मार-पीट कर घायल कर दिया। बेटा घनश्याम जायसवाल ने तत्काल इसकी सूचना 100 नम्बर पर डायल कर दी और पुलिस से मदद मांगी तो मौके पर पहुंची पुलिस ने समझौते की बेशकीमती सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। 

घबराया बेटा जब एम्बुलेंस में चोटिल मां को लेकर कबीरचौरा स्थित मण्डलीय चिकित्सालय पहुंचा तो वहां मौजूद डाक्टर ने मामले को पुलिस केस बताकर पहले एफआईआर करने की सलाह दी। परेशान घनश्याम मां को वहां इमरजेंसी वार्ड में तन्हां छोड़कर सिगरा थाने पहुंचा तो उल्टे माताकुण्ड चौकी इंचार्ज लक्ष्मण यादव ने घनश्याम को थाने में रात 9 बजे तक बिठाये रखा। इस दौरान लगातार उस पर समझौता करने के लिए दबाव बनाया जाता रहा। उधर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पड़ी बूढ़ी घायल मां घंटो दर्द से कराहती रही।

घटना की जानकारी मिलने पर वहां पहुंचे चंद पत्रकारों ने जब डाक्टर से इस बारे में बात की तब कही जाकर उनका इलाज शुरू हुआ। असंवेदनशील तंत्र यहां किस तरह आम जन की जिदंगी से खेल रहा है, ये उसकी एक बानगी है।

घटना की जानकारी लेने थाने पहुंचे पत्रकारों के सामने एसओ सिगरा ने जब चौकी इंचार्ज से घटना के बारे में पूछा तो वहां भी चौकी इंजार्च मामले की लीपा-पोती करने में लगे रहे। चार घंटे तक फरियादी को थाने में क्यों रोके रखा, इस सवाल पर चौकी इंचार्ज महोदय के पास कोई जवाब नहीं था। फरियादी घनश्याम जायसवाल के तहरीर को भी चौकी इंचार्ज ने अपने पास दबा कर रख लिया। बाद में एसओ महोदय की फटकार के बाद चौकी इंचार्ज ने तहरीर उन्हें दिया।

घटना की गंभीरता को देखते हुए एसओ ने फौरन बहू कंचन और उसके मामा के खिलाफ मुकदमा कायम करने के साथ चौकी इंचार्ज को अस्पताल जाकर चोटिल माया देवी का बयान लेने का आदेश दिया। फिलहाल 92 साल की बूढ़ी माया देवी मण्डलीय अस्पताल के आर्थोपेडिक वार्ड के वार्ड न. 6 के बेड न. 10 पर जिस्मानी दर्द से ज्यादा समय के साथ अर्थहीन होते जा रहे रिश्तों और असंवेदनशील प्रशासन के दर्द से ज्यादा दुःखी है, जहां काम नारों और विज्ञापनों में बोल रहा है।

सोमवार को जब इस मामले में एसओ सिगरा से मोाबाइल पर बात की गई तो उनका जवाब था कि एफ.आई.आर दर्ज कर ली गई है, धाराओं के बारे में थाने से जानकारी लें। सिगरा थाने पर फोन करने पर दूसरी तरफ से आवाज आयी यह नम्बर इस समय काम नहीं कर रहा है। खबर लिखे जाने तक पीड़िता का मेडिकल मुआयना तक नहीं हुआ था।

वाराणसी के पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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कानपुर से संचालित होने वाले के. न्यूज चैनल का सच : ”खुद कमाओ और हमे भी लाकर दो, तब हम जानेंगे तुम रिपोर्टर हो!”

: काम करवा कर वेतन नहीं देते है ‘के. न्यूज’ वाले : के. न्यूज की कहानी यहां नौ महीने तक काम करने वाले बनारस के मीडियाकर्मी प्रहलाद गुप्ता की जुबानी :

वाराणसी। चिल्ला-चिल्ला कर झूठ को बेनकाब करने का दावा करने वाले चैनलों का भीतरी सच क्या है? क्या है इनकी हकीकत? कैसे ये अपने यहां काम करने वालो का शोषण करते हैं? मेरा दावा है, चैनलों पर ऐसी कोई बेक्रिंग न्यूज कभी नहीं दिखेगी। कानपुर से संचालित होने वाले रीजनल चैनल ‘के.न्यूज’ के साथ काम कर के मुझे यही सबक मिला कि सच का दम भरने वाले इन चैनलों का भीतरी चेहरा कितना बदसूरत है।

इनकी हकीकत ये है दिन-रात पसीना बहाकर इनके लिए काम करने वालों के दुःख-दर्द से इनका कोई लेना-देना नहीं है। आप इनकी टी.आर.पी बढ़ाने के लिए भले ही कितने खतरे उठा लें, पर इन्हें इस बात की छटाक भर चिंता नहीं होती कि इनके लिए काम करने वालों के घर में चूल्हा कैसे जलता होगा? कैसे ये अपनी रोजर्मरा की जरूरतों को पूरा करते होंगे?

आज मुझे 9 महीने हो गए ‘के.न्यूज’ के साथ काम करते हुए। इस दौरान सैकड़ों खबरें मैंने इनके लिए भेजा। पर मुझे दिया गया 5 हजार के हिसाब से सिर्फ दो महीने का वेतन जबकि के.न्यूज ने मुझे 7 हजार रुपया हर महीने देने का वादा किया था। इस दौरान मैंने क्या-क्या दिन नहीं देखा। कभी किसी साथी से उधार लेकर तो कभी किसी से मांग कर मैं खबरों के पीछे दौड़ता रहा, खबरें भेजता रहा। पर जब भी कभी अपनी जेब में हाथ डाला तो वो खाली ही मिला।

वेतन के लिए जब कभी मैंने चैनल में बैठे जिम्मेदार लोगों से बातचीत कर अपनी मजबूरियों के बारे में बताया तो उधर से जवाब मिला- ”अरे यार कोई व्यवस्था क्यों नहीं खुद ही बना लेते, अपने भी कमाओं और हमे भी लाकर दो, तब न हम जानेंगे तुम रिपोर्टर हो।”

मैं इस चैनल के सम्पादक और मालिकों से पूछता हूं, आप ही बताईए कि खाली जेब से घर चलता है क्या? रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं क्या? मुझे पता है, इसका जवाब कभी नहीं मिलेगा। खबरों में दुनिया भर के लोगों की हक के लिए आवाज उठाने का दावा करने वाले इस चैनल के संपादक से लेकर मालिक तक अपने यहां काम करने वाले रिपोर्टरों का हक मार कर बैठे हुए हैं। 

प्रहलाद गुप्ता

रिपोर्टर

‘के.न्यूज’ रीजनल चैनल

वाराणसी

मोबाइल न. 09454654698

भड़ास के लिए उपरोक्त स्टोरी बनारस के युवा और जनपक्षधर पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी ने भेजी है. भास्कर से संपर्क bhaskarniyogi.786@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.

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बनारस : खताएं कौन करता है, सजा किसको मिलती है

बनारस। भीड़ की कदमों की आहटों से हमेशा गुलजार रहने वाला शहर का गोदौलिया चौराहा सोमवार की शाम अचानक जल उठा। न जाने कैसी आग लगाई की आने-जाने वाले राहगीर, पुलिसकर्मी, मीडियाकर्मी सहित दर्जनों घायल होकर इलाज के लिए अस्पताल पहुंच गए। बीच चौराहे से उठती आग की लपटें तुलसी के मानस चरित और कबीर के पोगापंथ पर किए गए प्रहार से कही ज्यादा उंची होती दिखी। लगा कि गुस्से और नफरत के कारोबार ने कुछ ज्यादा ही पांव पसार लिया है। नहीं तो डरी, सहमी, रोती- बिलखती सुरक्षित ठिकाना तलाशने के लिए भागती महिलाओं के चेहरे पर इतना खौफ और डर नहीं होता। बनारस कोई जंगल तो नहीं कि बीच बाजार कोई खौफनाक जानवर निकल कर इंसानों पर हमला बोल दिया हो। इंसानों की बस्ती में ये कौन सा मंजर है, कि आदमी बस बदहवास भागता रहता है।

शायद धर्म गुरुओं का ये नया धार्मिक पाठ हो जिसमें आत्मसंतुष्टि नहीं अहम संतुष्टि जरूरी है, चाहे इसके लिए कीमत आम जन मानस को क्यों न चुकानी पड़े। संतों के नेतृत्व में टाउनहाल से चली अन्याय प्रतिकार यात्रा के अग्रिम पंक्ति में कोई संत तो नहीं नजर आया, हां उन्मादी लोगों का एक जत्था जरूर था, जो उन्मादी नारे लगाकर माहौल को भयावह बना रहा था। ठीक उसी जगह जहां बीते 22 सितम्बर को गंगा में गणपति के मूर्ति विर्सजन को लेकर पुलिस से विवाद हुआ था, अचानक से पत्थर चलने लगे, फिर आग की लपटें दिखीं और उसके बाद गोदौलिया से लेकर आस-पास की सड़कें मिनटों में रणक्षेत्र बन गये।

जबरदस्त पथराव-आगजनी के बीच घंटों डर और दहशत का माहौल बना रहा। इन सबके बीच यात्रा में शामिल प्रमुख संतों ने घटना स्थल से दूर चौक स्थित एक मंदिर में शरण ली। जिन्होंने अपने आहत सम्मान के लिए ये प्रतिकार यात्रा निकाली थी वो मौके पर दूर-दूर नहीं दिखे, न तो शांति स्थापना के लिए उनकी वाणी गूंजी। मौके पर हालात न जाने क्यों बार-बार ये कहने को विवश कर रहे थे कि कहीं ये आत्मसंतुष्टि यात्रा तो नहीं थी? जिसमें कुछ लोगों को भले ही राहत दी लेकिन ढेरों की फजीहत हुई।

ये शहर कभी सोता नहीं। आज भी नहीं सोया है। घटना के बाद आज भी गोदौलिया पर वैसे ही लोगों का आना-जाना लगा है। इनमें तीर्थयात्रियों की संख्या ज्यादा है, जो काशी में धर्म के मर्म को समझने आते हैं। लेकिन काशी में धर्म का मर्म अब ज्ञान की आंधी में कम और सड़क पर ताकत आजमाईश में ज्यादा भरोसा करने लगा है। घटना के बाद की बदहवासी और लोगों को हुई बेवजह परेशानी यही कहती रही कि खताएं कौन करता है, सजा किसको मिलती है?

ज्ञात हो कि अन्याय प्रतिकार यात्रा के दौरान सड़कें रणक्षेत्र में तब्दील हो गईं थी। एक बार फिर धार्मिक मुद्दे पर हुए विवाद को लेकर शहर का हृदय स्थल माने जाने वाले गोदौलिया सहित आस-पास के सड़क रणक्षेत्र बन गए थे। हालत की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने शहर के गोदौलिया, मैदागिन, चौक, मदनपुरा, नई सड़क इलाकों में कर्फ्यू लगाने की घोषणा की हालाकि बाद में सभी क्षेत्रों से कर्फ्यू उठा लिया गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में संतों व धार्मिक संगठनों द्वारा निकाले गए अन्याय प्रतिकार यात्रा के दौरान शहर के सबसे भीड़-भाड़ वाला इलाका देखते ही देखते जल उठा।

यात्रा में शामिल भीड़ ने गोदौलिया चौराहे पर मौजूद पुलिस बूथ को फूंक डाला। पुलिस की गाड़ी को आग के हवाले कर दिया। बाद में घंटों तक गोदौलिया, गिरजाघर की सड़कें रणक्षेत्र बनी रहीं। पुलिस और यात्रा में शामिल भीड़ की ओर से पत्थरबाजी होती रही। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को आंसू गैस, रबर की गोली तक चलानी पड़ी। देर शाम तक रुक-रुक कर पथराव का क्रम जारी रहा। पथराव में आम लोगों सहित पुलिस वाले व पत्रकार भी जख्मी हुए।

कल दोपहर तीन बजे तक गोदौलिया चौराहे पर सब सामन्य था। पिछले दिनों गणेश प्रतिमा के गंगा में विर्सजन की मांग को लेकर गोदौलिया चौराहे पर तकरीबन 30 घंटे तक धरना दिया गया था। धरने को खत्म करने के लिए पुलिस ने अर्धरात्रि बाद लाठी चार्ज कर धरने को खत्म करवाया था। लाठी चार्ज में विद्यामठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को भी चोटें आयीं थीं। इसके बाद से लगातार माहौल गर्म होता रहा। दोनों प़क्ष घटना के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे। लाठीचार्ज के बाद संत समाज ने 5 अक्टूबर को पुलिसिया कार्यवाही के विरोध में अन्याय प्रतिकार यात्रा निकाले जाने का ऐलान किया था।

कल दोपहर मैदागिन से चली यात्रा जैसे ही गोदौलिया पहुंची, यात्रा में शामिल लोग पुलिस-प्रशासन विरोधी नारेबाजी करने लगे। देखते ही देखते एक के बाद एक कई जत्थे गोदौलिया पहुंच गए। इसके बाद यात्रा में शामिल लोगों ने गोदौलिया चौराहे पर स्थापित पुलिस बूथ पर पथराव शुरू कर दिया। इस दौरान किसी ने आगजनी की घटना को अंजाम दे दिया। फिर देखते ही देखते गोदौलिया, गिरजाघर का इलाका रणक्षेत्र बन गया। कल देर शाम प्रषासने ने शहर के पांच इलाके गोदौलिया, चौक, मैदागिन, नई सड़क, मदनपुरा में कर्फ्यू लगाये जाने का ऐलान कर दिया। घटना का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि कल ज्युतिका का पर्व होने के चलते भारी संख्या में महिलाए दर्शन-पूजन के लिए सड़कों पर थीं। इस घटना के चलते उन्हें सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा।

बनारस से पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: bhaskarniyogi.786@gmail.com

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‘आज’ के मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त ने अपने कर्मचारी को कफन के पैसे देने से मना किया

वाराणसी : मेडिकल की भाषा में कहें तो मुर्दा वो है, जिसकी दिल की धड़कनें और सांसें थम जाती हैं, पर मुझे समझ में नहीं आता ऐसे  लोगों को किस श्रेणी में रखा जाए, जो सब कुछ जानते-देखते और समझते हुए भी खामोशी का आवरण ओढ़े दूसरों की मजबूरी को तमाशा बना कर रख देते हैं। जो दिखावे के लिए मंदिर में सैकड़ों रुपये पुजारी के हाथों में दान स्वरूप रख देते हैं, पर अपने ही किसी कर्मचारी के गिड़गिड़ाने पर घर पर रखी उसके बेटी की लाश के कफन तक के पैसे देने से इन्कार कर देते हैं, भले ही वो कर्मचारी अपनी मेहनत और हक के पैसे मांग रहा हो। ये कहानी है वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन की। आर. राजीवन की जुबानी सुनिए उनके शोषण और दुख की कहानी…

‘आज’ अखबार वाराणसी में काम करते हुए मुझे कई झकझोर देने वाले दृश्यों से रूबरू होना पड़ा है। बार-बार ये सोचना और समझना पड़ा है कि लोगों तक देश-दुनिया की घटनाओं, संवेदना-वेदना की खबर पहुंचाने वाले अखबारों के पन्नों के पीछे की जिंदगी का कड़वा सच क्यों इतना बेगाना और अंजाना रह जाता है? ‘आज’ अखबार के मालिक और संपादक शार्दूल विक्रम गुप्त और उनकी हां में हां मिलाने वाले लोग भी पत्रकार और कवि रघुवीर सहाय के शब्दों में कहूं तो चलते-फिरते शवों की श्रेणी में ही आते हैं क्योंकि इन्हें किसी की जरूरतों से कोई लेना-लादना नहीं। 

अपनी स्मृतियों को खंगालता हूं, तो बीते कल की कितनी ही बातें ताजा होकर सामने खड़ी दिखती हैं। मैंने ‘आज’ अखबार के वाराणसी स्थित कबीरचौरा कार्यालय में वो दृश्य भी देखा है कि प्रेस के एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी की बेटी की मौत होती है, घर पर बेटी का शव छोड़कर अपने बकाये पैसे के लिए कर्मचारी आज कार्यालय आता है। अपने ही हक के पैसे यानि बकाया वेतन के लिए रोता-गिड़गिड़ाता है। यहां तक कहता है कि कफन भर के लिए पैसे तो दे दीजिए, पर जवाब मिलता है, नहीं। बिटिया के शोक में डूबा बाप इससे पहले कुछ कहे, सुनने को मिलता है कि कार्यालय की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। अंत में मैं और अन्य कुछ सहयोगी कार्यालय में चन्दा इकट्ठा कर उस कर्मचारी को सौंपते हैं ताकि वो अपने बेटी का अंतिम संस्कार कर सके। 

इसी क्रम में नरेश भी याद आता है। चपरासी के पद पर कार्य करने वाला नरेश एक दिन मालिक शार्दूल विक्रम के केबिन के बाहर स्टूल पर बैठे-बैठे लुढ़क जाता है, सांसें साथ छोड़ जाती हैं, काम करने वाले लोग जुट जाते हैं, नरेश….. नरेश पर कोई जवाब नहीं मिलता। इतने में सुनने को मिलता है कि क्या हुआ, भीड़ क्यों लगा रखी है, भैया जी यानी (शार्दूल विक्रम गुप्त) के आने से पहले हटाओ इसे! दुनिया भर के लोगो की वेदनाओं और संवेदनओं की यात्राओं का साक्षी होने का दंभ भरने वाला अखबार का मालिक-प्रबंधन कितना निष्ठुर और भावहीन हो सकता है, इन घटनाओं से पता चलता है।

जिस आज के संस्थापक शिवप्रसाद गुप्त जैसे दानवीर रहे हो, जिस अखबार ने देश की आजादी के आन्दोलन में ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह किया हो, उन्हीं के वंशज शार्दूल विक्रम गुप्त उन्हीं के अखबार में काम कर रहे एक कर्मचारी की बेटी की मौत पर कफन के चंद रूपये भी देने से मना कर देते हैं। घृणा होती है, ऐसे मालिक और संपादक की मानसिकता पर जो देश-दुनिया की घटनाओं को संवेदना और सच्चाई के साथ छापने का दावा करता है, पर अपने ही कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों की वेदना-संवेदना और जरूरतों को कुछ नहीं समझता।

अब मैं क्या निष्कर्ष निकालूं। खुद आप सोच कर देखिए कि लाश उसे कहा जाए, जिसका जिस्म ठंडा हो जाए, जिसमें कोई हरकत न हो या फिर उसे जो दूसरों की मेहनत और हक का पैसा दबाकर अपने आस-पास ऐसे लोगो का चापलूस तंत्र विकसित कर ले कि हक और सच की आवाज को सुना ही न जाए।  सच बोलने वालो को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए, फैसला आपके हाथों में है, मैं आगे भी कहता रहूंगा उस सच को, जिसके एवज में शायद कल मेरी हत्या हो जाए या फिर फर्जी मुकदमा। चाहे जो भी हो, आगे भी कहूंगा ऐसे संपादक की कंलक कथा।

आज तो सच्चाई से कागज का घर भी छिन गया

ऐसे-वैसे लोग अखबारों के मालिक हो गए।

((वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन से उनका दुख-दुर्द खुद जानना-सुनना चाहते हैं या उनकी कोई मदद करना चाहते हैं तो उनसे संपर्क उनके मोबाइल नंबर 07800644067 के माध्यम से कर सकते हैं.))

इस रिपोर्ट के लेखक वाराणसी के युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी हैं जिनसे संपर्क bhaskarniyogi.786@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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‘आज’ अखबार का मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त बोला- ”मैं चाहूं तो किसी रिक्शे वाले को भी संपादक बना सकता हूं”

वाराणसी। ‘आज’ अखबार से आर. राजीवन निकाल दिए गए। वरिष्ठ पत्रकार। सुनिए इनकी दास्तान। ये कहते हैं- फर्जी मुकदमा या हत्या शायद यही मेरे पत्रकारिता कर्म की संचित पूंजी हो, जो शायद आने वाले दिनों में मुझे उपहार स्वरूप मिले तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. यकीन मानिए पूरे होशो-हवास में सच कह रहा हूं। हिन्दी का सबसे पुराना अखबार जो 5 साल बाद अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है, उसी ‘आज’ अखबार में मैने 25 साल तक सेवा की, लिखता-पढ़ता रहा। निष्ठा-ईमानदारी के साथ अपने काम को अंजाम देता रहा। लेकिन एक दिन अचानक मुझे बिना किसी कारण-बिना किसी नोटिस के बाहर का रास्ता दिखा दिया।

‘आज’ अखबार से निकाले गए वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन ने जब अपनी दास्तान सुनाई तो मीडिया के अंदर की हालत पर रोना आया…        फोटो : भाष्कर गुहा नियोगी

बकाया वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, ग्रेच्युटी तो दूर, देने के नाम पर मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त ने कुछ दिया तो देख लेने की धमकी। ये जो ‘आज’ अखबार के मालिक और सम्पादक शार्दूल जी हैं, इनका कहना है तुम चीज क्या हो? मैं ही सब हूं। मैं चाहूं तो किसी रिक्शेवाले को भी संपादक बना सकता हूं। हां एक दिन कुछ इसी तरह से उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुला कर समझाया और ठीक इसके दूसरे दिन मैं सड़क पर था, अपने पत्रकारीता जीवन के यादों के साथ।

सोच रहा था विद्या भास्कर, लक्ष्मी शंकर व्यास, चन्द्र कुमार जैसे सम्पादक जिनके सान्ध्यि में मैने पत्रकारिता का कहकरा सीखा, उसी संस्थान के वर्तमान बढ़बोले और हठी संपादक की नजर में एक रिक्शेवाला भी संपादक हो सकता है, यानि योग्यता और नजरिया कोई मायने नहीं रखता। …झूठा अहम भी क्या कुछ नहीं कहता और करता, शार्दूल विक्रम गुप्त इसके उदाहरण हैं। कुछ दिन लगे इस सदमें से उबरने में। जब उबरा तो स्मृति में हिन्दी के सबसे पुराने अखबार के साथ गुजरे 25 सालों की न जाने कितनी यादें दस्तक देने लगी। और यादों के झरोखे से साथ में काम करने वालों के बुझे और उदास चेहरे याद आने लगे। जो काम तो पूरे ईमानदारी से करते रहे, पर इसके ऐवज में जो मिला, शौक तो छोड़िए उससे जरूरतें कभी पूरी न हो सकी।

इनमें से एक चेहरा था राजेन्द्रनाथ का। उन्होंने भी इस संस्थान में अपने जीवन का लम्बा समय दिया। पर जब राजेन्द्र लकवा के शिकार हुए तो संस्थान ने उनसे मुंह फेर लिया। मदद के नाम पर हम कुछ पत्रकार साथियों ने व्यक्तिगत तौर पर मदद किया। हां, काम के ऐवज में राजेन्द्र को संस्थान सें उनका हक तो मिला पर कई टुकड़ों में। राजेन्द्र जी ही क्यों, कई चेहरे है, जो हिन्दी के सबसे पुराने अखबार के शोषण के शिकार हुए हैं, और कई हो रहे हैं। एलबीके दास, गोपेश पाण्डेय, प्रमिला तिवारी… और भी लम्बी फेहरिस्त है… इन्हें अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अखबारी दुनिया का ये सबसे दुखद पहलू है, कि खबर लिखने, उसे सजाने-सवांरने वालो की जिदंगी की खबर बेखबर बन कर रह जाती है। मीडिया इंडस्ट्री में इस तरह की हजारों सिसकियां मौजूद हैं, जो मालिक-प्रबंधन के निर्ममता की उपज है। कुछ मिल जायेगा, शायद यही वजह है, कि होंठ सबके सिले हैं, वरना अन्दर ही अन्दर आक्रोश का एक तूफान तो सबको मथ रहा है।

अपने प्रंसग पर लौटता हूं, इन दिनों अपने हक को पाने की लड़ाई लड़ रहा हूं। अपने मेहनताने को पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने की पहल कर  चुका हूं। भविष्य निधि कार्यालय से एक नोटिस भी अखबार को जारी हो चुका है, साथ ही साथ बहुत-कुछ समझ-बूझ कर इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि लड़ने के सिवाय कोई और चारा नहीं है। सो तय किया हूं कि मैं लड़ूगा अपने हक के लिए, कहूंगा अपनी बात, मैं किसी रिक्शेवाले को भी संपादक बना सकता हूं। संपादक होने के भ्रम में जो खुद के खुदा होने का गुमान पाले बैठे हैं, उनके भ्रम को तोड़ना जरूरी है। इतना तो जानता हूं कि कुछ न कुछ तो होकर रहेगा… मालिक, प्रबंधन की तरफ से फर्जी मुकदमा, जानलेवा हमला या फिर कुछ….. और, चाहे जो कुछ भी हो, खामोश रहने से बेहतर है, अपनी बात कहते हुए दुनियां से जाना… कम से कम वो चेहरे तो बेनकाब होंगे जो आदर्श का खाल ओढ़कर और शब्दों का जाल बुनकर अपनी काली करतूतों को छुपाए फिर रहे है। वो सब कहूंगा तफसील और सिलसिले से…. जो छुपाया जा रहा है, सामने लाकर रहूंगा। फिलहाल इतना ही कहूंगा……

ऐ सनम तेरे बारे में
कुछ सोचकर
अपने बारे में कुछ सोचना जुर्म है….

हिन्दी के सबसे पुराने अखबार ‘आज’ में 25 साल तक काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन के अंतर की आवाज का ताना-बाना, जो शायद किसी अखबार का हिस्सा न बन पाए… आर.राजीवन से संपर्क 07800644067 के जरिए किया जा सकता है. आर. राजीवन ने जो कुछ कहा-बताया, उसे शब्दों में उकेरा बनारस के युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी ने. भास्कर गुहा नियोगी से संपर्क 09415354828 के जरिए कर सकते हैं.

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10 रुपये में बिकता है चौराहा, बनारस पुलिस से संपर्क करें!

वाराणसी। इस शहर से सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषणा ‘न लेंगे न लेने देंगे’ से परे बनारस की पुलिस का मानना है कि हर हाल में बेच के रहेंगे, भले ही चौराहा क्यों न हो. मात्र 10 रुपये के ऐवज में शहर की पुलिस चौराहों को आटो चालकों के हाथों बेच रही है. सातों दिन और चौबीसों घंटे बेचने का ये खेल जारी है. शहर के गिरजाघर, गौदोलिया, बेनियाबाग जैसे अति व्यस्तम और भीड़-भाड़ वाले चौराहों को तो आटो चालकों ने पुलिस को पैसे देकर अपने नाम दाखिल-खारिज करवा रखा है। बोले तो यहां अवैध आटो स्टैण्ड कायम हो गया है।

अब भले ही 15 फुट चौड़ी सड़क सिमट कर 5 फुट की रह गयी हो, आने-जाने वाले घंटो जाम झेलते रहे, लोग गीरते-पड़ते धक्के खाकर गुजरने के लिए विवष होते हो, लेकिन बेचने-खरीदने का ये गैरकानूनी खेल, काननू की वर्दी में बेरोक-टोक जारी है। अगर आप को भी चौराहों पर अवैध तरीके से जमना है तो फिर 10 रूपये में चौराहा बिकता है, वाराणसी पुलिस इस काम में आपकी मदद कर सकती है।

इनमें से सबसे महत्वपूर्ण चौराहा गोदौलिया है। इसी चौराहे से होकर रोजाना हजारों की संख्या में देसी-विदेशी पयर्टक गंगा घाट का रुख करते हैं। लेकिन अवैध तरीके से चल रहे आटो-स्टैण्ड के चलते लगे जाम में फंसकर वो भी अपना सर पीटने के साथ ही शहर के कानून-व्यवस्था की नकारात्मक छवि साथ लेकर अपने साथ लौटते हैं।
भले ही सुबह 8 बजे से इन रास्तों पर नो इन्ट्री का फरमान जारी है, पर दस रुपये रजिस्ट्ररी शुल्क अदा करते ही चौराहा आटो वालों का हो जाता है। फिर सीधे, उल्टे, दाये-बायें, आड़े-तीरछे जैसे मन करे आटो सड़क पर खड़ी कर दे, इधर बीच शहर की आबोहवा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए इलेक्ट्रानिक रिक्शा नाम के सैकड़ो वाहन सड़को पर दौड़ पड़े हैं। शहर प्रदूषण से कितना मुक्त हुआ ये तो पता नहीं पर खाकी के लिए मलाई काटने का एक और जरिया निकल आया है। अवैध तरीके से चौराहों पर जमे ये इलेक्ट्रानिक रिक्शे भी यातायात को बाधित करने में अपना योगदान दे रहे हैं।
 
याद रखने की बात ये भी है कि चंद महीने पहले ही यहां से ताबदला कर दिये गये एसएसपी अजय मिश्रा के कार्यकाल में सारे अवैध स्टैण्ड हवा-हवाई होकर रह गये थे। सड़के भी चौड़ी हो गयी थी और यातायात भी सुगम। पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता ये उनके जाते ही समझ में आ गया।  अब 10 रुपये जैसी छोटी रकम सुनने में भले ही मामूली लगे। पर गौर करें तो हजारों आटो और अन्य वाहनों से वसूली का ये खेल शहर में एक दिन में लाखों का सेंसेक्स पार कर जाता है। अंदर की खबर तो ये भी है कि नीचे से उपर तक सबका हिस्सा पहुंचता रहता है। इसलिए सब ठंडे पड़े रहते हैं। इसके उलट अवैध कब्जे के चलते जाम की चक्की में पीसते लोग बड़बड़ाते एक दूसरे को धकियाते अपना आगे का सफर तय करने को विवश है। ऐसे में तयशुदा वक्त में जाम मुक्त बनारस के सपने को खाकी की अवैध कमाई पलीता लगा रही है।

बनारस के युवा, तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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जानी-मानी कथक नृत्यांगना सितारा देवी का मुंबई में निधन

वाराणसी। आज घुंघरू उदास है। अपनी विषिश्ट शैली में उन्हें खनक देती कथक नृत्य का सितारा अस्त हो गया। मुबंई के अस्पताल में पिछले कई दिनों से कोमा में चल रही सितारा देवी की सांस 94 साल की उम्र में थम गयी। भले ही गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने 16 साल की उम्र में उनका नृत्य देख उन्हें नृत्य साम्राज्ञिनी की उपाधि दी हो पर जिस शहर में वो लम्बे समय तक रहीं हों उसी शहर ने उन्हें भुला दिया था।

अब भले ही उनके निधन के बाद शहर के कला-संस्कृति के प्रेमी उनके नाम पर लम्बा-चौड़ा व्याख्यान दें, श्रद्धांजलि के नाम पर उनकी तस्वीर रख पुष्प अर्पित करें पर कबीरचौरा स्थित उनके आवास के बाहर लगा शिलापट्ट तो न जाने कब से धूल फांक रहा था। तब किसी को सितारा देवी की याद नहीं आयी। सास्ंकृतिक नगरी कहे जाने वाले काशी के कला-जगत की अन्दरूनी तस्वीर बड़ी भयावह है। आपसी गुटबाजी के तानेबाने के चलते यहां जिन्दा लोग उनके नाम से जुड़ी चीजों तक का सम्मान नहीं कर पाते। हां, कला के नाम पर गाल बजाने वालों की यहां कमी नहीं है।

सितारा जी तो अब नहीं रहीं। भले ही उनका जन्म कोलकाता में हुआ लेकिन बनारस से उनका अटूट नाता था। कभी लंदन के एल्बर्ट हाल में नृत्य प्रस्तुत कर कथक नृत्य को उचाईयों तक ले जाने वाली सितारा देवी के नाम पर कबीरचौरा स्थित उनके घर के बाहर शिलापट् तो जरूर लगा दिया गया लेकिन वो शिलापट्ट न जाने कब से जमीन पर धूल-धूसरित होता रहा। किसी ने उसकी सुध तक नहीं ली। बेहतर होता कि हम कलाकार के जीते जी भी उससे जुड़े यादों को समेटते-सहेजते और उसका सम्मान करते। लेकिन यहां तो लोग तब याद आते हैं, जब सम्मान मिलता है, या फिर हम दुनिया से रुखसत हो जाते हैं। ऐसे में कहना पड़़ता है, बाद मरने के सलाम आया तो क्या।

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

 

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25 नवम्बर नजीर बनारसी की जंयती पर : …हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?

हदों-सरहदों की घेराबन्दी से परे कविता होती है, या यूं कहे आपस की दूरियों को पाटने, दिवारों को गिराने का काम कविता ही करती है। शायर नजीर बनारसी अपनी गजलों, कविताओं के जरिए इसी काम को अंजाम देते रहे है। एक मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने का काम करने वाली नजीर को इस बात से बेहद रंज था कि…

‘‘न जाने इस जमाने के दरिन्दे
कहा से उठा लाए चेहरा आदमी का’’

एक मुकम्मल इंसान को रचने-गढ़ने के लिए की नजीर की कविताएं सफर पर निकलती है, हमे हमारा फर्ज बताती है, ताकीद करते हुए कहती है-

‘‘वहां भी काम आती है मोहब्बत
जहा नहीं होता कोई किसी का’’

मोहब्बत, भाईचारा, देशप्रेम ही नजीर बनारसी की कविताओं की धड़कन हैं। अपनी कहानी अपनी जुबानी में खुद नजीर कहते है, ‘‘मैं जिन्दगी भर शान्ति, अहिंसा, प्रेम, मुहब्बत आपसी मेल मिलाप, इन्सानी दोस्ती आपसी भाईचारा…. राष्ट्रीय एकता का गुन आज ही नहीं 1935 से गाता चला आ रहा हूं। मेरी नज्में हो गजलें, गीत हो या रूबाईया….. बरखा रूत हो या बस्त ऋतु, होली हो या दीवाली, शबेबारात हो या ईद, दशमी हो या मुहर्रम इन सबमें आपको प्रेम, प्यार, मुहब्बत, सेवा भावना, देशभक्ति कारफरमा मिलेगी। मेरी सारी कविताओं की बजती बासुरी पर एक ही राग सुनाई देगा वह है देशराग…..मैंने अपने सारे कलाम में प्रेम प्यार मुहब्बत को प्राथमिकता दी है।

हालात चाहे जैसे भी रहे हो, नजीर ने उसका सामना किया, न खुद बदले और न अपनी शायरी को बदलने दिया कही आग लगी तो नजीर की शायरी बोल उठी-

‘‘अंधेरा आया था, हमसे रोशनी की भीख मांगने
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?’’

25 नवम्बर 1925 में बनारस के पांडे हवेली मदपुरा में जन्में पेशे से हकीम नजीर बनारसी ने अंत तक समाज के नब्ज को ही थामे रखा। ताकीद करते रहे, समझाते रहे, बताते रहे कि ये जो दीवारे हैं लोगों के दरमियां, बांटने-बंटने के जो फसलफे हैं, इस मर्ज का एक ही इलाज है, कि हम इंसान बनें और इंसानियत का पाठ पढ़ें, मुहब्बत का हक अदा करें। कुछ इस अंदाज में उन्होंने इस पाठ को पढ़ाया-

‘‘रहिये अगर वतन में तो इन्सां की शान से
वरना कफन उठाइये, उठिये जहान से’’

नजीर का ये इंसान किसी दायरे में नहीं बंधता। जैसे नजीर ने कभी खुद को किसी दायरे में कैद नहीं किया। गर्व से कहते रहे मैं वो काशी का मुसलमां हूं नजीर, जिसको घेरे में लिये रहते है, बुतखाने कई। काशी यानि बनारस को टूट कर चाहने वाले नजीर के लिए बनारस किसी पारस से कम नहीं था। घाट किनारे मन्दिरों के साये में बैठ कर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नजीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसे ढला-

‘‘बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी,
मन्दिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी,
जब चांदनी रातों मं हम-तुम गंगा किनारे होते थे।‘‘

नजीर की शायरी उनकी कविताएं धरोहर है, हम सबके लिए। संर्कीण विचारों की घेराबन्दी में लगातार फंसते जा रहे हम सभी के लिए नजीर की शायरी अंधरे में टार्च की रोशनी की तरह है, अगर हम हिन्दुस्तान को जानना चाहते है, तो हमे नजीर को जानना होगा, समझना होगा कि उम्र की झुर्रियों के बीच इस साधु, सूफी, दरवेष सरीखे शायर ने कैसे हिन्दुस्तान की साझाी रवायतों को जिन्दा रखा। उसे पाला-पोसा, सहेजा। अब बारी हमारी है, कि हम उस साझी विरासत को कैसे और कितना आगे ले जा सकते है। उनके लफजों में…

‘‘जिन्दगी एक कर्ज है, भरना हमारा काम है,
हमको क्या मालूम कैसी सुबह है, शाम है,
सर तुम्हारे दर पे रखना फर्ज था, सर रख दिया,
आबरू रखना न रखना यह तुम्हारा काम है।‘‘

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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प्रधानमंत्री जी! हथकरघा विभाग और कोठीवाल से हमारी जमीन बचाईये!

: जिस जमीन पर लगना था करघा, उसपर कोठीवाल का कब्जा :

पूरे दिन क्रब में जिस्म आधा रहे
घर में इस पर भी इक वक्त फांका रहे
भूख से गर्म तन सर्द चूल्हा रहे
इस तरह खून कब तक जलायेंगे हम
इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम। 

”हमें प्रधानमंत्री जी से मिलना है, उनको बताना है कि बनारस में हथकरघा विभाग के अफसरों से सांठगांठ कर कोठीवाल हमारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठा है।” ये आवाज बुनकर कालोनी से आए बुनकरों की थी, बुनकर अपनी इस आवाज को अपने सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुंचाना चाहते थे। पर अफसोस ये आवाज बैरीकेड पर ही दम तोड़ गयी क्योंकि बैरीकेट के इस पार बुनकर थे और उस पार अपने कार्यालय में प्रधान मंत्री चुनी हुई जनता से मिलकर उनकी समस्याओं को सुन रहे थे।

शुक्रवार दोपहर जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रविन्द्रपुरी स्थित कार्यालय में जनसाधरण से रूबरू होने पहुंचे ठीक उसी वक्त सैकड़ो की संख्या में आमजनता अपने हाथों में में शिकायती पत्र लेकर कार्यालय से दूर पुलिसिया बैरीकेट पर ही खड़े रह गए। बुनकरों के लिए प्रधानमंत्री की तमाम लोकलुभावन योजनाओं और घोषणाओं के परे नाटी ईमली स्थित बुनकर कालोनी के बुनकर अपनी ही जमीन से बेदखल कर दिए गए है, वो जमीन जो उन्हें हथकरघा विभाग की ओर से 100 हथकरघा लगाने के लिए कभी दिया गया था, आज उस पर किसी हाजी साहब ने कब्जा कर रखा है।

बुनकर कमाल अख्तर का कहना था कि 1963 में बुनकर कालोनी की बुनियाद रखी गयी। 8 एकड़ में फैले इस कालोनी में बुनकरों के रिहाईश के अलावा 100 करघे लगाने के लिए जमीन भी दिया गया था। बुनकरों के बाबा-दादाओं के पास बकायदे इस संबधित कागजात भी मौजूद है। बावजूद इसके हथकरघा विभाग के अफसरों ने मोटी कमाई के चक्कर में कोठीवाल को इस जमीन पर कब्जा करा दिया। बुनकर फरियाद करते और दौड़ते ही रह गए, कभी इस अफसर के दरवाजे तो कभी उस अफसर के लेकिन सिवाय आष्वासन कुछ नहीं मिला। शुक्रवार को भी दर्जनों की संख्या में बुनकर अपने सांसद अपने शिकायत नामा के साथ अपने सांसद से मिलने पहुंचे लेकिन मिल नहीं पाये। निराश बुनकर बैरिकेड पर घंटो जमे रहे और अंतत निराश-हताश वापस लौट गये। मौके पर मौजूद बुनकरों ने बताया कि मउ की बुनकर कालोनी भी हथकरघा विभाग और पैसेवालों की मिलीभगत के चलते उजाड़ दी गयी है। बनारस में बुनकर कालोनी भी उस राह पर है।
 
प्रधानमंत्री के आने-जाने के बीच सैकड़ो फरियादी बस मूकदर्शक बन कर रह गए। चुनी हुई जनता और आम जनता के बीच का फर्क भी समझ में आ गया। साथ ही दशकों से शोषण और हालात के शिकार बदहाल बुनकरों के हालात पर अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास की झीनी-झीनी बीनी चदरियां का सच किताब के पन्ने से निकलकर सामने नजर आया कि शोषण के पाट के एक छोर पर गिरस्ता, कोठीवाल और सरकारी अफसर है, तो दूसरी छोर पर भ्रष्ट राजनीतिक हथकण्डे बीच में कोई है तो वो है बुनकर…… ऐसे में किस जमीन पर फलेंगे-फूलेंगे प्रधानमंत्री की सुरमयी स्वप्वनील योजनाए।

बनारस से भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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पत्रकार गोपाल ठाकुर के मामले में काशी पत्रकार संघ की भयावह चुप्पी के मायने

: …दर्द से तेरे कोई न तड़पा आंख किसी की न रोयी :

पत्थर के सनम
पत्थर के खुदा
पत्थर के ही इंसा पाये है,
तुम शह-रे मोहब्बत कहते हो
हम जान बचा के आये हैं…

जज्बात ही जब पत्थर के हो जायें तो खुले आसमान के नीचे भले ही कोई अपना यूं ही तन्हा मर जाए, किसी को कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर को लेकर कुछ ऐसा ही हो रहा है। भड़ास पर खबर चलने के बाद भले ही शहर के बाहर के लोगों ने फोन कर उनके बारे में जानकारी चाही पर खुद उनका अपना बनारस शहर अब तक खामोश है। उनके चाहने वाले, मित्र, यार परिवार किसी को भी न तो उनके दर्द से मतलब है, फिर आखों में आंसू का तो सवाल ही नहीं उठता।

वैसे भी काशी पत्रकार संघ की खामोशी पर कोई मलाल नहीं होता क्योंकि पत्रकारों के हित से ज्यादा अपनों के बीच अपनों को ही छोटा-बड़ा साबित करने में ही इनका ज्यादतर समय गुजर जाता है। हां एक टीस सी जरूर होती है कि जिस काशी पत्रकार संघ की स्थापना में वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर के पिता स्व. राम सुंदर सिंह की भी भूमिका रही है, और जो काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके है, उन्हीं के पुत्र और खुद काशी पत्रकार संघ के उपाध्यक्ष रहे गोपाल ठाकुर के मसले पर भी संघ के अन्दर कोई हलचल नहीं है। पत्रकारों के हितों के लिए सजग रहकर संघर्ष करने का इससे बेहतर नजर और नजरिया क्या हो सकता है।

बीते कल उनके हालात की जानकारी होने पर उंगली में गिनती के दो-तीन लोग वहां पहुंच उनकी हालात को देखने के बाद अपने साथ ले गये। इन्हीं लोगों ने इनके कपड़े भी बदलवाये, प्राथमिक चिकित्सा देने के साथ गोदौलिया स्थित पुरषोत्तम धर्मशाला में ले जाकर आश्रय भी दिलवाया। लेकिन आश्रय की ये मियाद शनिवार शाम तक ही रही क्योंकि धर्मशाला में देखरेख करने वालों ने उनके वहां अकेले रहने में असमर्थता जताते हुए उन्हें वहां से शनिवार की शाम को ले जाने को कहा है।

अब आगे गोपाल ठाकुर कहा जायेंगे, उनका अगला ठिकाना क्या होगा, इस बारे में अभी भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। लाचार और बीमार गोपाल ठाकुर को चिकित्सा और संवेदना दोनों की ही बेहद जरूरत है। …  जब कि चिकित्सा पैसों के बिना मिलेगी नहीं और संवेदना अपनों के बिना। पर यहां तो उनके मामले को लेकर एक रिक्तता नजर आ रही है। इन सबके बीच धूमिल की कविता बार-बार कह रही है….

नहीं यहां अपना कोई मददगार नहीं
मैंने हर एक दरवाजे को खटखटाया
पर जिसकी पूंछ उठाया
उसको ही मादा पाया।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828


मूल खबर….

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

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बनारसी कुल थूकिहन सगरो घुला के मुंह में पान, का ई सुनत बानी अब काशी बन जाई जापान?

आजकल बनारस सुर्खियों में है… बनारस को लेकर रोज कोई न कोई घोषणा सुनने को मिल रही है…. ऐसा होगा बनारस… वैसा होगा बनारस… पर न जाने कैसा होगा बनारस…. सब कुछ भविष्य के गर्भ में है…. पर दीपंकर की कविता में आज के बनारस की तस्वीर है…. दीपंकर भट्टाचार्य कविता लिखते हैं… दीपांकर कविता फैंटसी नहीं रचतीं बल्कि बड़े सीधे और सरल शब्दों में समय के सच को हमारे सामने खड़ा कर देतीं हैं…. दीपांकर के शब्दों का बनारस हमारा-आपका आज का बनारस है जिसे हम जी रहे है… आप भी सुनिए उनकी कविता…

 

अब काशी बन जाई जापान?

–दीपंकर भट्टचार्य–

बनारसी कुल थूकिहन सगरो
घुला के मुंह में पान,
का ई सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?
जब देखा तब बिजली रानी,
कहीं घूम के आवत बानी,
मुंह चिढ़ा के चल जाई पानी,
बनल हौ भुतहा घर-दुआर,
उपर से रेगिस्तान,
का इ सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?
शहर क आधा रोड खनल हौ,
सगरो कूड़ा भरल-पड़ल हौ,
नरिया के उपर हलुवाई,
छानत हौ पकवान।
का ई सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापन?
गजब हौ भागम-भाग सड़क पर,
कब न दुपहिया मार दे टक्कर,
जरको चुकबा, जइबा उप्पर
जइसे रोड इ नाही, कउनो
रेस क हौ मैदान
का इ सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?
लगल हौ सगरो खुमचा-ठेला,
खूब बिकत हौ अंडा-केला,
जम में ला फिन घन्टन झेला,
बिचवें में फॅंस गयल हौ मुर्दा,
पहुंची कब श्मशान?
का इ सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?

प्रस्तुति : भाष्कर गुहा नियोगी, बनारस.

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बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

क्या पता कब मारेगी
कहां से मारेगी
कि जिदंगी से डरता हूं
मौत का क्या, वो तो
बस एक रोज मारेगी

कभी धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे बुर्जुग पत्रकार गोपाल ठाकुर को जिदंगी रोज मार रही है, फिर भी जिंदा हैं… सिर पर छत फिलहाल नहीं है…. जो अपने थे, वक्त के बदलते रौ में वो अपने नहीं रहे… बेबसी, बेकारी हालात के शिकार गोपाल जी का नया ठिकाना फिलहाल रविन्द्रपुरी स्थित बाबा कीनाराम आश्रम का चबूतरा है, जहां लेट कर आसमान को निहारते हाथों को ऐसे ही हिलाकर शायद अपने गुजरे वक्त का हिसाब-किताब करते मिले… लेकिन इतने बुरे वक्त में भी उनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखी…

मिले तो उसी अंदाज में हंस दिये जैसे कुछ हुआ ही नहीं है… कुछ पूछने से पहले ही खुद ही बोल उठे… सब ठीक है यार… पर छलछलाती आखें और चेहरे के अन्दर का चेहरा जैसे सारे राज खोल कर चुगली कर गया- ‘सब एक नजर फेर कर बढ़ गये हैं आगे, मैं वक्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूं।’

गोपाल ठाकुर को मैं तब से जानता हूं जब वो बनारस में ही पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से जुड़ कर हिन्दी पुस्तकों का सम्पादन किया करते थे… दिल के साफ पर स्वभाव के अक्खड़ गोपाल जी का पत्रकारिता से पुराना रिश्ता रहा है… तब बम्बई और अब की मुंबई में वो 1976 से लेकर 1984 तक धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे… बाद में बनारस लौटे तो दैनिक जागरण, आज, सन्मार्ग जैसे कई अखबारों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता ही की… बाद में पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से लम्बे समय तक जुड़े रहे…

सुनने में आया था कि वहां भी उनकी भारत सरकार के किसी सेवानृवित अधिकारी के लिखे किताब की प्रूफ रीडिंग को लेकर विवाद हो गया था, जैसा की होता रहा है… प्रभावशाली सेवानिवृत अधिकारी ने मालिक पर दबाव बना उनको माफी मांगने के लिए मजबूर किया तो अधिकारी की ऐसी-तैसी कर नौकरी को लात मारकर सड़क पर खड़े हो गये… बाद में जब भी मिले तो इस बात का जिक्र उन्होंने कभी मुझ जैसे उनसे उम्र में काफी छोटे लोगो से नहीं किया… जब भी मिले तो पत्रकारिता के वैचारिक पहलुओं पर ही बातें की…

अस्सी से लेकर सोनारपुरा के कई चाय की अड़िया उनके अड्डेबाजी के केन्द्र हुआ करती थी, जहां वो अपने हम उम्र दोस्तों, जानने-पहचानने वालों के साथ घंटों गुजारते थे… लेकिन न तो आज वो दोस्त कहीं नजर आ रहे हैं, न उन्हें जानने-पहचानने वाले… आज गोपाल जी खुले आकाश के नीचे तन्हा जिंदगी के अंत का इन्तजार कर रहे हैं… रोज एक धीमी मौत मर रहे हैं…. कह रहे हैं- ये देश हुआ बेगाना… वैसे भी नजरों से ओझल होते ही भुला देने की शानदार परम्परा हमारी रवायत रही है… हम डूबने वालों के साथ कभी खड़े नहीं होते ये जानते हुए कि हम में हर कोई एक रोज डूबती किश्ती में सवार होगा…

शराब की लत और उनकी बर्बादी के कई किस्से सुनने के बाद भी न जाने क्यों लगता है कि, ऐसे किसी को मरने के लिए छोड़ देना दरअसल कहीं न कहीं हमारे मृत होते जा रहे वजूद की तरफ ही उंगली उठाता है… मौजूदा हालात में साथ वालों की थोड़ी सी मदद, थोड़ा सा साथ और हौसला उन्हें इस हालात से बाहर लाकर जिदंगी से जोड़ सकता है… नहीं तो किसी रोज जिदंगी भर खबर लिखने वाला ये शख्स खबरों की इस दुनिया को छोड़ चलेगा और ये खबर कहीं नहीं लिखी जायेगी कि एक था गोपाल ठाकुर ….और कहना पड़ेगा ….. कोई किसी का नहीं है, झूठे नाते हैं, नातों का क्या।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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संपादक है या जल्लाद : एक मिनट देर होने पर पैसे काट लेता है, देर तक काम करने के पैसे नहीं देता

वाराणसी। दिवाली थी। पूरा शहर रोशनी में डूबा हुआ था। पर मेरा मन किसी गहरे अंधेरे में दिशाहीन सा भटक रहा था। जेब में पैसे नहीं थे, और घर पर ढेरों उम्मीदें मेरा इन्तजार कर रही थी। ऐसे में घर कैसे जाता। बार-बार अपने होने पर रंज हो रहा था। खैर, किसी तरह से पैसों का इंतजाम किया और गोदौलिया से ठेले पर बिक रही मिठाई खरीद कर घर पहुंचा। बूढ़ी मां के हाथों पर मिठाई रखकर डबडबाई आखों से कहा- मां इस बार इतना ही कर पाया हूं। … और फिर उस संपादक का चेहरा जेहन में आया। जो एक मिनट आफिस देर से पहुंचने पर पैसा काट लेता था और तय समय के बाद भी घंटों काम करवाकर उसके पैसे नहीं देता था।

सच कहूं तो पत्रकारिता का ये पतन का युग है जिसमें हर ऐरा-गैरा संपादक बन बैठा है। ऐसे लोग जिनके लिए पत्रकारिता मिशन नहीं कमीशन है, पत्रकारिता अपना हित साधने का माध्यम भर है, वे लोग संपादक की कुर्सी पर विराजमान होकर संपादक होने का दंभ भर रहे है। अरूण यादव भी उन्हीं लोगो में से है। फिलहाल बनारस से निकलने वाले सांध्य कालीन अखबार भारत दूत के संपादक के पद पर विराजमान हैं। पत्रकारिता का कितना ज्ञान इन्हें हैं, ये तो मुझे पता नहीं लेकिन अपने यहां काम कर रहे कर्मचारियों को टार्चर करने का पूरा अनुभव इनके पास है। इसके लिए इनके पास ढेरों तरीके हैं।

जिन लोगों को ये सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते उन्हें अपने ससुर राम मूर्ति यादव से परेशान करवाते है। इस अखबार में इन्होंने नियम भी अजीबो-गरीब बना रखे हैं। मसलन अगर आप एक मिनट देर से दफ्तर पहुंचते हैं, तो रजिस्टर में आपके नाम के आगे लाल स्याही लगा दी जाती है, आपसे कुछ कहा नहीं जाता, और अगर 4 दिन तक आपसे दफ्तर पहुंचने में देर हो जाती है तो वेतन आपके हाथों में देते समय एक पूरे दिन का पैसा काट लिया जाता है। लेकिन तयशुदा वक्त के बाद भी घंटों काम करने के ऐवज में आपको यहां कुछ नहीं दिया जाता।

मुझे याद आता है कि एक बार मैंने इनसे एडंवास में कुछ रूपये लिये थे, वक्त पर तनख्वाह मिलने पर उससे कटवाकर चुका भी दिया। एक दिन जब मैंने उनसे पूछा कि मैं तो अक्सर तयशुदा वक्त से ज्यादा काम करता हूं, उसके ऐवज में मुझे क्या मिलेगा, तो उनका जवाब था- वो तो रुपये एडंवास लेने के ऐवज में सूद था जो तुम्हें चुकाना था।

खैर मेरी तनख्वाह से ज्यादा मेरी परिवार की जरूरत और मेरे बेटियों के सपने थे जिनके लिए मैं कुछ हजारों की नौकरी सब सहने के बाद भी करता चला जा रहा था। उस दिन जब मैं दफ्तर पहुंचा तो अरूण यादव ने मुझे बुलाकर कहा कि तुम्हारी तनख्वाह अब आधी की जाती है। मैंने सुना तो जैसे मेरे पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गयी। जेहन में परिवार आ गया जिनके सारे सपने और उम्मीद मेरे छोटे से तनख्वाह से जुडे़ थे। उनका क्या होगा। दिपावली भी सामने है। निर्णय लेने का वक्त था, पर मन ने कहा कि बर्दाश्त की भी हद होती है। मैंने कहा कि अब मैं काम नहीं कर सकता। मेरा हिसाब कर दीजिए।  जवाब मिला- ठीक है, अगले महीने आकर ले जाना। अब मेरी बारी थी। सब्र का पैमाना छलका। मेरा जवाब था- पैसे लेकर ही मैं यहा से जांउगा, ऐसे नहीं जनाब।

मैंने तेवर कड़ा किया तब जाकर मेरा पैसा मुझे मिला। नहीं तो यहां काम करने वालों को यहां से विदा करते समय उनके पैसे काटने का इस अखबार की परम्परा रही है। वहां से निकल कर सड़क पर आ गया हूं। आगे की जिदंगी, बच्चों की जरूरत, घर का खर्चा… यही दिमाग में घूम रहा हूं। क्या करूं, नौकरी की तलाश में हूं इन दिनों। घूम रहा हूं….. चक्कर काट रहा हूं…..सड़कों को नाप रहा हूं…… बार-बार सोच रहा हूं कब तक ऐसी जिंदगी जीता रहूंगा जिसमें मेहनत है, संघर्ष है, पर उसका कोई फल नहीं है.

ये दास्तान है पत्रकार मनोज सिन्हा का जो मुझसे गोदौलिया पर मिले तो बताते चले गए. उनकी कहानी को सुनकर मुझे धूमिल की कविता याद आ गयी…

सचमुच मजबूरी है

पर जिंदा रहने के लिए पालतू होना जरूरी है।

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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कबीराना ताने-बाने को बुनता बेनियाबाग का मुशायरा

: शनिवार की रात भर होगी दिलों को जोड़ने की बातें :  बनारस के बेनियाबाग में हर साल आयोजित होने वाले मुशायरा यकीनन कई मायनों में खास है। इस साल ये मुशायरा 18 अक्टूबर यानि शनिवार को होने जा रहा है। सालों से आयोजित होते चले आ रहे मुशायरे का जादू यहां लोगो के सिर चढ़कर बोलता है। बेनियाबाग मुशायरे के डायस पर हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि सरहद पार के शायर भी अपना कलाम सुनाकर लोगो के दिलों में जगह बनाने की कोशिश करते है।

यहां कैफी आजमी से लेकर अली सरदार जाफरी तक अपना कलाम सुना चुके है, तो बशीर बद्र, निदां फाजली, मुनव्वर राना, मंजर भोपाली, सागर ख्ययामी जैसे नामचीन शायरों के कलाम लोगो के दिलों की जस्बात बन दाद पा चुके है, शायरों को सुनने का सुरूर इस कदर लोगों पर छाया रहता है, कि जाने-माने शायर राहत इंदौरी को सुनने के लिए हजारों की भीड़ रात भर इस इंतजार में रहती है, कि कब राहत आए और अपने खास अंदाज में कुछ अलग सुनाते हुए दिलो पर राहत बनकर छा जाए।

रात भर चलने वाले इस मुशायरे में लोग षिरकत कर शायरों को सुनते है, साथ ही वाह-वाह से लेकर हूटिंग का दौर भी रात भर चलता है। गंगा-घाट और विष्वनाथ मंदिर से चंद कदम दूर बेनियाबाग कें मैदान में जब शेर गूंजता है,

गूंजे कही शंख कही, कही आजान हो
जब ज्रिक एकता हो तो हिन्दुस्तान हो।

तो ऐसा लगता है, कि हालात कैसे भी हो, कबीर का ये शहर कबीराना ताने-बाने की डोर को थामे चल रहा है। स्व. राजीव गांधी की याद में आयोजित होने वाले इण्डो-पाक मुशायरे के कनवीनर अशफाक मेमन का कहना है कि काशी की सरजमीन पर ये मुशायरा साझी संस्कृति और साझी एकता का मिसाल है, जहां शायरी मोहब्बत, भाईचारे का पैगाम देती है।

1986 से शुरू हुए बेनियाबाग के मुशायरे ने 28 सालों से अपनी लय को बना रखा है। इस लम्बें सफर में कितने शायर यहां आये और चले गये लेकिन मकसदे मुशायरा यानि दिलो और तहजीबों को जोड़ने का जो सफर आज भी जारी है। जारी है, शायरी का सफर…. कुछ इस अंदाज में।                 

न रोको इसका रास्ता
इसे हर सिम्त आने दो,
मोहब्बत रंग है, खुष्बू है,
इसे फैल जाने दो……….

बनारस से भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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