पीड़ित पर ही एफआईआर! ये यूपी में क्या हो रहा है सरकार…

आधी रात कैन्टीन का ताला तोड़ समान लूट ले गये प्रबन्ध समिति के लोग… वाराणसी। कहीं लूट कहीं हत्या तो कहीं चोरी। नामजद चोरी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी गिरफ्तारी तो दूर, उल्टे रसूख और पैसे की ताकत से पीड़ित पर ही हो जा रही है एफआईआर दर्ज। यही है प्रधानमंत्री मोदी जी के सांसदीय क्षेत्र में कानून-व्यवस्था का हाल। सूबे में कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए योगी सरकार द्वारा दिये गये कड़े निर्देशों का कोई असर बनारस में नहीं देखने को मिल रहा है। खाकी यहां कुछ ज्यादा ही सुस्त है और कानून को ताक पर धरकर घटना को अंजाम देने वाले हाल-फिलहाल कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं।

…जब अफसर-बाबू ऐसे होंगे तब न्याय कैसे होगा?

गाजीपुर। अफसर-बाबुओं की मुट्ठी गर्म कर मनमर्जी तरीके से दूसरों की संपत्ति पर अपना नाम चढ़वा लेने का खेल तहसील स्तर पर जारी है। फर्जीवाड़े के इस खेल का शिकार अगर कोई बनता है, तो वो है पीड़ित व्यक्ति क्योंकि अपनी ही संपत्ति को वापस पाने के लिए तहसील से लेकर न्यायालय तक दौड़ने में न जाने कितने साल गुजर जाते हैं, और कितनी जोड़िया चप्पलें घिस जाती हैं, लेकिन बावजूद इसके इंसाफ नहीं मिलता। तहसील स्तर पर इस तरह के मामले कदम-कदम पर नजर आयेंगे। सूबे में सरकार भले ही बदल गयी हो, लेकिन कार्य-संस्कृति की बयार आज भी वही है। न्याय पाने के लिए कल भी अर्जियां दौड़ रही थीं, आज भी दौड़ रही हैं।

मदर्स डे और मौत मांगती एक मां

एक मां की कहानी, उन्हीं की जुबानी… मैं माया देवी. मेरी उम्र 92 साल है. मैं काशी बनारस की रहने वाली हूं. कहते हैं, काशी में मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. भगवान से पूछती हूं, राधा-माधव, कितने बार मुझे मरना होगा कि मोक्ष मिल जाए! जानते हैं, क्यों? क्यों कि मैं रोज हर-पल मर रही हूं। खुद का घर रहते हुए इन दिनों मेरा ठिकाना किराये का एक कमरा है। मैं चल नहीं सकती क्योंकि मेरा पैर मेरा साथ नहीं दे रहे। जानना चाहेंगे क्यों? क्योंकि तीन महीने पहले मेरी बहू कंचन ने मुझे जानवरों की तरहत पीटा, सीढ़ियों से ढकेल दिया। मर जाती तो अच्छा था। पर मौत ने दगा दिया। शायद जिदंगी मुझे और दुःख देना चाहती है।

माया देवी 92 साल की उम्र में अपनी बहू से पीड़ित है। बार-बार कानून और न्याय की चौखट पर पहुंची उनकी गुहार अनसुनी कर दी जाती रही। शायद इसलिए कि सत्ता बदली है, व्यवस्था नहीं।

भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की योगी सरकार की नीति को मुंह चिढ़ाता एक सरकारी अस्पताल

प्रदेश भर में चल रहे राजकीय आर्युवेदिक और यूनानी चिकित्सालय न सिर्फ बदहाल हैं बल्कि लूट के अड्डे बने हुए हैं। इन अस्पतालों में दसकों से तैनात चिकित्सक और कर्मचारी दलाली की मलाई काट रहे हैं। इन अस्पतालों को दवा आपूर्ति से लेकर अन्य सुविधाओं के नाम पर मिलने वाले करोड़ो का बजट किसके पेट में जा रहा है, ये इन अस्पतालों में जाकर वहां के हालात और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को देखकर समझा जा सकता है। जौनपुर के शाहगंज स्थित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय इन दिनों बाबू, डाक्टर और कर्मचारियों की मिलीभगत से खुली लूट का केन्द्र बना हुआ है। दवाओं की आपूर्ति से लेकर अन्य मामलों में यहां बड़ी खामियां है। यहां मरीजों का कल्याण सिर्फ कागजों पर हो रहा है।

बसपा से भाजपा में गये और फिलहाल आयुष मंत्री बने धर्म सिंह सैनी के साथ कई किस्म के आरोपों से घिरा बाबू इशरत हुसैन (चश्मे में, तीर से निशान बना हुआ है)।

काम बोलता है : चार घंटे तक इमरजेंसी में कराहती रही बूढ़ी मां, बेटे को जबरन थाने में बिठाये रखा

वाराणसी। यूपी में चल रहे चुनावी दंगल में भले ही ‘काम बोलता है’ का धुन आम मानुष के लिए सुशासन होने का दावा भर रहा हो पर जमीन पर थानों में वर्दी की दबंगई के आगे आम आदमी का गूंगापन और लाचारी बोल रहा है। बीते रविवार यही नजारा देखने को मिला जब अपनी 92 वर्षीय बूढ़ी मां माया देवी को उन्हीं की बहू कंचन और उसके मामा मंगला प्रसाद ने मार-पीट कर घायल कर दिया। बेटा घनश्याम जायसवाल ने तत्काल इसकी सूचना 100 नम्बर पर डायल कर दी और पुलिस से मदद मांगी तो मौके पर पहुंची पुलिस ने समझौते की बेशकीमती सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। 

कानपुर से संचालित होने वाले के. न्यूज चैनल का सच : ”खुद कमाओ और हमे भी लाकर दो, तब हम जानेंगे तुम रिपोर्टर हो!”

: काम करवा कर वेतन नहीं देते है ‘के. न्यूज’ वाले : के. न्यूज की कहानी यहां नौ महीने तक काम करने वाले बनारस के मीडियाकर्मी प्रहलाद गुप्ता की जुबानी :

वाराणसी। चिल्ला-चिल्ला कर झूठ को बेनकाब करने का दावा करने वाले चैनलों का भीतरी सच क्या है? क्या है इनकी हकीकत? कैसे ये अपने यहां काम करने वालो का शोषण करते हैं? मेरा दावा है, चैनलों पर ऐसी कोई बेक्रिंग न्यूज कभी नहीं दिखेगी। कानपुर से संचालित होने वाले रीजनल चैनल ‘के.न्यूज’ के साथ काम कर के मुझे यही सबक मिला कि सच का दम भरने वाले इन चैनलों का भीतरी चेहरा कितना बदसूरत है।

बनारस : खताएं कौन करता है, सजा किसको मिलती है

बनारस। भीड़ की कदमों की आहटों से हमेशा गुलजार रहने वाला शहर का गोदौलिया चौराहा सोमवार की शाम अचानक जल उठा। न जाने कैसी आग लगाई की आने-जाने वाले राहगीर, पुलिसकर्मी, मीडियाकर्मी सहित दर्जनों घायल होकर इलाज के लिए अस्पताल पहुंच गए। बीच चौराहे से उठती आग की लपटें तुलसी के मानस चरित और कबीर के पोगापंथ पर किए गए प्रहार से कही ज्यादा उंची होती दिखी। लगा कि गुस्से और नफरत के कारोबार ने कुछ ज्यादा ही पांव पसार लिया है। नहीं तो डरी, सहमी, रोती- बिलखती सुरक्षित ठिकाना तलाशने के लिए भागती महिलाओं के चेहरे पर इतना खौफ और डर नहीं होता। बनारस कोई जंगल तो नहीं कि बीच बाजार कोई खौफनाक जानवर निकल कर इंसानों पर हमला बोल दिया हो। इंसानों की बस्ती में ये कौन सा मंजर है, कि आदमी बस बदहवास भागता रहता है।

‘आज’ के मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त ने अपने कर्मचारी को कफन के पैसे देने से मना किया

वाराणसी : मेडिकल की भाषा में कहें तो मुर्दा वो है, जिसकी दिल की धड़कनें और सांसें थम जाती हैं, पर मुझे समझ में नहीं आता ऐसे  लोगों को किस श्रेणी में रखा जाए, जो सब कुछ जानते-देखते और समझते हुए भी खामोशी का आवरण ओढ़े दूसरों की मजबूरी को तमाशा बना कर रख देते हैं। जो दिखावे के लिए मंदिर में सैकड़ों रुपये पुजारी के हाथों में दान स्वरूप रख देते हैं, पर अपने ही किसी कर्मचारी के गिड़गिड़ाने पर घर पर रखी उसके बेटी की लाश के कफन तक के पैसे देने से इन्कार कर देते हैं, भले ही वो कर्मचारी अपनी मेहनत और हक के पैसे मांग रहा हो। ये कहानी है वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन की। आर. राजीवन की जुबानी सुनिए उनके शोषण और दुख की कहानी…

‘आज’ अखबार का मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त बोला- ”मैं चाहूं तो किसी रिक्शे वाले को भी संपादक बना सकता हूं”

वाराणसी। ‘आज’ अखबार से आर. राजीवन निकाल दिए गए। वरिष्ठ पत्रकार। सुनिए इनकी दास्तान। ये कहते हैं- फर्जी मुकदमा या हत्या शायद यही मेरे पत्रकारिता कर्म की संचित पूंजी हो, जो शायद आने वाले दिनों में मुझे उपहार स्वरूप मिले तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. यकीन मानिए पूरे होशो-हवास में सच कह रहा हूं। हिन्दी का सबसे पुराना अखबार जो 5 साल बाद अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है, उसी ‘आज’ अखबार में मैने 25 साल तक सेवा की, लिखता-पढ़ता रहा। निष्ठा-ईमानदारी के साथ अपने काम को अंजाम देता रहा। लेकिन एक दिन अचानक मुझे बिना किसी कारण-बिना किसी नोटिस के बाहर का रास्ता दिखा दिया।

‘आज’ अखबार से निकाले गए वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन ने जब अपनी दास्तान सुनाई तो मीडिया के अंदर की हालत पर रोना आया…        फोटो : भाष्कर गुहा नियोगी

10 रुपये में बिकता है चौराहा, बनारस पुलिस से संपर्क करें!

वाराणसी। इस शहर से सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषणा ‘न लेंगे न लेने देंगे’ से परे बनारस की पुलिस का मानना है कि हर हाल में बेच के रहेंगे, भले ही चौराहा क्यों न हो. मात्र 10 रुपये के ऐवज में शहर की पुलिस चौराहों को आटो चालकों के हाथों बेच रही है. सातों दिन और चौबीसों घंटे बेचने का ये खेल जारी है. शहर के गिरजाघर, गौदोलिया, बेनियाबाग जैसे अति व्यस्तम और भीड़-भाड़ वाले चौराहों को तो आटो चालकों ने पुलिस को पैसे देकर अपने नाम दाखिल-खारिज करवा रखा है। बोले तो यहां अवैध आटो स्टैण्ड कायम हो गया है।

जानी-मानी कथक नृत्यांगना सितारा देवी का मुंबई में निधन

वाराणसी। आज घुंघरू उदास है। अपनी विषिश्ट शैली में उन्हें खनक देती कथक नृत्य का सितारा अस्त हो गया। मुबंई के अस्पताल में पिछले कई दिनों से कोमा में चल रही सितारा देवी की सांस 94 साल की उम्र में थम गयी। भले ही गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने 16 साल की उम्र में उनका नृत्य देख उन्हें नृत्य साम्राज्ञिनी की उपाधि दी हो पर जिस शहर में वो लम्बे समय तक रहीं हों उसी शहर ने उन्हें भुला दिया था।

25 नवम्बर नजीर बनारसी की जंयती पर : …हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?

हदों-सरहदों की घेराबन्दी से परे कविता होती है, या यूं कहे आपस की दूरियों को पाटने, दिवारों को गिराने का काम कविता ही करती है। शायर नजीर बनारसी अपनी गजलों, कविताओं के जरिए इसी काम को अंजाम देते रहे है। एक मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने का काम करने वाली नजीर को इस बात से बेहद रंज था कि…

प्रधानमंत्री जी! हथकरघा विभाग और कोठीवाल से हमारी जमीन बचाईये!

: जिस जमीन पर लगना था करघा, उसपर कोठीवाल का कब्जा :

पूरे दिन क्रब में जिस्म आधा रहे
घर में इस पर भी इक वक्त फांका रहे
भूख से गर्म तन सर्द चूल्हा रहे
इस तरह खून कब तक जलायेंगे हम
इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम। 

”हमें प्रधानमंत्री जी से मिलना है, उनको बताना है कि बनारस में हथकरघा विभाग के अफसरों से सांठगांठ कर कोठीवाल हमारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठा है।” ये आवाज बुनकर कालोनी से आए बुनकरों की थी, बुनकर अपनी इस आवाज को अपने सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुंचाना चाहते थे। पर अफसोस ये आवाज बैरीकेड पर ही दम तोड़ गयी क्योंकि बैरीकेट के इस पार बुनकर थे और उस पार अपने कार्यालय में प्रधान मंत्री चुनी हुई जनता से मिलकर उनकी समस्याओं को सुन रहे थे।

पत्रकार गोपाल ठाकुर के मामले में काशी पत्रकार संघ की भयावह चुप्पी के मायने

: …दर्द से तेरे कोई न तड़पा आंख किसी की न रोयी :

पत्थर के सनम
पत्थर के खुदा
पत्थर के ही इंसा पाये है,
तुम शह-रे मोहब्बत कहते हो
हम जान बचा के आये हैं…

बनारसी कुल थूकिहन सगरो घुला के मुंह में पान, का ई सुनत बानी अब काशी बन जाई जापान?

आजकल बनारस सुर्खियों में है… बनारस को लेकर रोज कोई न कोई घोषणा सुनने को मिल रही है…. ऐसा होगा बनारस… वैसा होगा बनारस… पर न जाने कैसा होगा बनारस…. सब कुछ भविष्य के गर्भ में है…. पर दीपंकर की कविता में आज के बनारस की तस्वीर है…. दीपंकर भट्टाचार्य कविता लिखते हैं… दीपांकर कविता फैंटसी नहीं रचतीं बल्कि बड़े सीधे और सरल शब्दों में समय के सच को हमारे सामने खड़ा कर देतीं हैं…. दीपांकर के शब्दों का बनारस हमारा-आपका आज का बनारस है जिसे हम जी रहे है… आप भी सुनिए उनकी कविता…

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

क्या पता कब मारेगी
कहां से मारेगी
कि जिदंगी से डरता हूं
मौत का क्या, वो तो
बस एक रोज मारेगी

कभी धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे बुर्जुग पत्रकार गोपाल ठाकुर को जिदंगी रोज मार रही है, फिर भी जिंदा हैं… सिर पर छत फिलहाल नहीं है…. जो अपने थे, वक्त के बदलते रौ में वो अपने नहीं रहे… बेबसी, बेकारी हालात के शिकार गोपाल जी का नया ठिकाना फिलहाल रविन्द्रपुरी स्थित बाबा कीनाराम आश्रम का चबूतरा है, जहां लेट कर आसमान को निहारते हाथों को ऐसे ही हिलाकर शायद अपने गुजरे वक्त का हिसाब-किताब करते मिले… लेकिन इतने बुरे वक्त में भी उनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखी…

संपादक है या जल्लाद : एक मिनट देर होने पर पैसे काट लेता है, देर तक काम करने के पैसे नहीं देता

वाराणसी। दिवाली थी। पूरा शहर रोशनी में डूबा हुआ था। पर मेरा मन किसी गहरे अंधेरे में दिशाहीन सा भटक रहा था। जेब में पैसे नहीं थे, और घर पर ढेरों उम्मीदें मेरा इन्तजार कर रही थी। ऐसे में घर कैसे जाता। बार-बार अपने होने पर रंज हो रहा था। खैर, किसी तरह से पैसों का इंतजाम किया और गोदौलिया से ठेले पर बिक रही मिठाई खरीद कर घर पहुंचा। बूढ़ी मां के हाथों पर मिठाई रखकर डबडबाई आखों से कहा- मां इस बार इतना ही कर पाया हूं। … और फिर उस संपादक का चेहरा जेहन में आया। जो एक मिनट आफिस देर से पहुंचने पर पैसा काट लेता था और तय समय के बाद भी घंटों काम करवाकर उसके पैसे नहीं देता था।

कबीराना ताने-बाने को बुनता बेनियाबाग का मुशायरा

: शनिवार की रात भर होगी दिलों को जोड़ने की बातें :  बनारस के बेनियाबाग में हर साल आयोजित होने वाले मुशायरा यकीनन कई मायनों में खास है। इस साल ये मुशायरा 18 अक्टूबर यानि शनिवार को होने जा रहा है। सालों से आयोजित होते चले आ रहे मुशायरे का जादू यहां लोगो के सिर चढ़कर बोलता है। बेनियाबाग मुशायरे के डायस पर हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि सरहद पार के शायर भी अपना कलाम सुनाकर लोगो के दिलों में जगह बनाने की कोशिश करते है।