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आज के अखबार : बांग्लादेश के फर्जी मुद्दे को छोड़ इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू SIR पर साथ-साथ हैं!

इस तरह बंगाल के मामले में यह स्पष्ट हुआ कि बड़े पैमाने पर हटाए गए नाम सिस्टम के कारण हो सकते हैं। भविष्य में यह तय होगा कि सिस्टम वही है जो चुनाव आयोग कह रहा है या उसी का इस्तेमाल सिस्टम के रूप में किया गया (असल में किया जा रहा है)। मामला सॉफ्टवेयर के उपयोग और उसका उपयोग नहीं करने का भी है। इसकी शुरुआत डिजिटल इंडिया में चुनाव लड़ने वालों को डिजिटल वोटर लिस्ट नहीं देने और उसके लिए चल रही थेथरई और लड़ाई का भी है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने कल ही रिपोर्ट दी थी कि ईसीआई ने यू-टर्न लिया प्रोटोकॉल, मैनुअल और लिखित निर्देशों के बिना एसआईआर के बीच में ही एल्गोरिदम जारी कर दिए। सुप्रीम कोर्ट को यह बताने के बाद कि उसका डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करने के लिए बहुत ज़्यादा खराब है। इस तरह, इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया ने 12 राज्यों में वोटर रोल के रिवीजन के बीच में इसे फिर से चालू कर दिया है। हालांकि, उसने ऐसा डी-डुप्लीकेशन के लिए अपने मैनुअल में बताए गए सख्त ग्राउंड वेरिफिकेशन प्रोसेस को खत्म करने के बाद किया है। इस क्वासी-ज्यूडिशियल प्रोसेस का मकसद शक वाले फ्रॉड वोटर्स को असली वोटर्स से भरोसेमंद तरीके से अलग करना था। मुझे याद आता है कि नोटबंदी के समय भी ऐसा ही हो रहा था और तब कहा जाता था कि रोज गोलपोस्ट बदल दिया जाता है। अब चुनाव आयोग भी ऐसा कर रहा है तो समझना मुश्किल नहीं है कि इसका कारण क्या होगा या इसके लिए प्रेरणा कहां से आ रही होगी। भाजपाई प्रचार के अंदाज तो निराले हैं ही। जाहिर है, मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करने के नाम पर एनआरसी किया जाता लग रहा है। एसआईआर घटिया स्वीकार किए गए सॉफ्टवेयर से और उसके बिना अयोग्य लोगों, संदिग्ध इरादों से किया जा रहा काम है।

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में हेडलाइन मैनेजमेंट वाला शीर्षक बांग्लादेश का है। लेकिन कई अखबारों ने इसे महत्व नहीं दिया। असली खबर एसआईआर की है और बंगाल का मामला द हिन्दूइंडियन एक्सप्रेस में लीड है। कोलकाता के द टेलीग्राफ ने कल पहले पन्ने पर फोटो और उसके विवरण से इस खबर का आधार तैयार कर दिया था। आखिरकार, चुनाव आयोग को मतदाताओं की सुनवाई सशर्त टालनी पड़ी। दि इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, “बंगाल में ‘अनमैप्ड’ वोटर्स की एसआईआर सुनवाई रोकी गई”। खबर का इंट्रो है,  सीईओ का यह आदेश उन लोगों के लिए है जो  2002 की मतदाता सूची (की हार्ड कॉपी) में हैं लेकिन चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने कहा था, नहीं मिले। यानी गलती चुनाव आयोग की थी लेकिन परेशान हुए नागरिक या वोटर। टेलीग्राफ ने ऐसे वोटर और चुनाव आयोग की परेशानी के बारे में कल बताया था जिसे मैंने यहां लिखा था। इंडियन एक्सप्रेस ने आज अपनी इस खबर के साथ एक प्रमुख सवाल को भी स्पष्ट किया है, “पश्चिम बंगाल में अनमैप्ड वोटर्स पर जारी नोटिस चुनावी निष्पक्षता के मूल में प्रक्रिया से जुड़े एक मुद्दे को रेखांकित करते हैं। वह यह कि, कानून जब किसी स्थानीय वैधानिक अथॉरिटी को ज़िम्मेदारी सौंपता है तो केंद्र का दखल जवाबदेही की श्रृंखला को बिगाड़ सकता है”।

इस मामले में इंडियन एक्सप्रेस की खबर स्पष्ट है। …. राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय ने निर्देश दिया है कि  चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर में “अनमैप्ड” या 2002 की वोटर लिस्ट में नहीं पाए गए वोटर्स के लिए सभी पर्सनल सुनवाई को अगली जांच तक रोक दिया जाए। यह रोक उन वोटर्स पर ही लागू होती है जिन्हें ईसी के सेंट्रल सॉफ्टवेयर ने नहीं पाया था, लेकिन वे 2002 की लिस्ट की हार्ड कॉपी में मौजूद थे। इस रोक का कारण बताते हुए राज्य के अधिकारियों ने कहा कि जब ज़मीनी अधिकारियों ने 2002 की लिस्ट की हार्ड कॉपी चेक की, तो पाया कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर से “अनमैप्ड” दिखाए गए वोटर या उनके बच्चे मौजूद थे। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर को केंद्रीयकृत रूप से तैयार नोटिस के लिए दोषी ठहराया जा सकता है जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं था। उल्लेखनीय है कि इस संबंध में पहले खबर छप चुकी है। चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की और अब राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी ने यह आदेश जारी किया है। तब भी इस खबर को आज महत्व नहीं मिला है। अनमैप्ड वोटर की परेशानी जो कल  टेलीग्राफ में छपी थी मैं यहां लिख चुका हूं। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में एसआईआर करने की दिक्कतें खबर है जो हेडलाइन मैनेजमेंट का शिकार हुई लगती हैं। द हिन्दू की खबर मोटे तौर पर यही है। उपशीर्षक से बताया गया है कि तृणमूल ने चुनाव आयोग पर बुजुर्गों को यंत्रणा देने का आरोप लगाया है।

वोट चोरी से संबंधित कई आरोपों के बावजूद एसआईआर का काम निर्बाध चल रहा है और उसमें इन गड़बड़ियों की खबर को जब प्रमुखता नहीं मिली है तो आज टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स तथा टेलीग्राफ की लीड भारत पर बांग्लादेश का आरोप या भारत का जवाब है। नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार भाजपा का (भारत का नहीं) दावा, बांग्लादेश में एक और हिन्दू को जलाकर मार डालने की है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, हादी के हत्यारों को लेकर अब भारत-बांग्लादेश आमने सामने। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, बांग्लादेश ने हंगामा बढ़ाया, भारतीय एजेंसियों ने जवाब दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत में जब मुसलमानों के साथ तमाम अत्याचार होते रहे हैं, क्रिसमस पर हंगामा हुआ ही तो बांग्लादेश में जो हुआ उस पर भारत का कुछ कहना विवादों को जन्म देना ही था और वही हो रहा है। बांग्ला देश के आंतरिक मामले में दखल देकर और शेख हसीना को शरण देकर भारत ने बांग्लादेश को अपने आंतरिक मामलों में दखल देने के लिए आमंत्रित या मजबूर कर दिया है। अपने यहां सब ठीक होता तो अलग बात होती लेकिन जो चल रहा है उसमें यही होगा कि देसी मामले अखबारों में कम प्राथमिकता पाएंगी। आज यही हुआ है। दिलचस्प यह भी है कि इस विवादास्पद काम में सरकार के साथ सत्तारूढ़ पार्टी भी लगी हुई है और उसके प्रवक्ता का नाम लेकर उल्लेख किया गया है जबकि क्रिसमस पर हुड़दंग करने वालों के खिलाफ पहले पन्ने पर खबर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है, भाजपा ने इस दावे को खारिज किया कि हत्यारे भागकर मेघालय आ गए हैं।

कल कांग्रेस का स्थापना दिवस था। देशबन्धु की लीड है, कांग्रेस के 141वें स्थापना दिवस पर अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि कांग्रेस पार्टी का आधार जोड़ने वाली विचार धारा है। अमर उजाला की लीड इन सबसे अलग है। खबर बताती है कि सीमेंट से लदी मालगाड़ी बेपटरी हो गई। कई डिब्बे नदी में गिर गए तथा इस कारण हावड़ा-दिल्ली मार्ग 10 घंटे ठप रहा। खबर के अनुसार यह हादसा  बिहार के जमुई में हुआ तथा इसकी वजह से बंगाल, झारखंड और यूपी में कई स्टेशनों पर हजारों यात्री फंसे रहे। प्रशासनिक लापरवाही की यह खबर आज किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं है। सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और कॉमेडियन कुणाल कामरा ने कुछ दिनों पहले रेलवे की पोल खोलने वाला एक वीडियो पोस्ट किया था। रेलवे ने इसका फैक्ट चेक किया और फोटो पर मिसलीडिंग का ठप्पा लगाकर पोस्ट कर दिया। इसपर कुणाल कामरा ने रेलवे के फैक्ट चेक का भी मजाक उड़ाया। खबर है कि सरकार ने छह करोड़ से ज्यादा की राशि देकर प्रचार वाले डॉक्यूमेंट्री बनवाए। इसका उद्देश्य सरकार की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का प्रचार करना था। इसके बदले संबंधित इनफ्लूएंसर को कमाने का मौका भी दिया गया।

नवोदय टाइम्स की लीड अरावली विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में बड़ी सुनवाई की खबर है। अरावली का विवाद आप जानते हैं। खबरों के अनुसार पहाड़ और पर्वतश्रृंखला तथा पहाड़ की ऊंचाई आदि की परिभाषा तय करने पर इतना विवाद हो गया है कि आज सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की पीठ स्वतः संज्ञान के इस मुद्दे पर सुनवाई करेगी। देशबन्धु की खबर है, दिल्ली में सांस लेना हुआ मुश्किल। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने कहा है और दि एशियन एज ने लीड बनाया है, 2025 उपलब्धियों का वर्ष रहा, दुनिया भर पर भारत के प्रभाव की प्रशंसा की। देशबन्धु ने प्रधानमंत्री के मन की बात बताई है और कहा है, ऑपरेशन सिन्दूर ने विश्व में छोड़ी अपनी विशेष छाप। इसके साथ आज ही यह भी खबर है, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने कहा है, उनसे कहा गया था कि ऑपरेशन सिन्दूर के समय बंकर में छिप जाएं। कहने की जरूरत नहीं है कि मिल-जुल कर बनाई और छपवाई गई इन कहानियों की टाइमिंग इनके खबर होने पर संदेह पैदा करती है और किसी कारण से देर से आई है तो पहले पन्ने की खबर कैसे हो सकती है। जो भी हो, अखबार जो करते हैं छिपा नहीं सकते। मैं रेखांकित कर देता हूं कि पाठक इनका खेल समझें। फिर भी अगर कोई नहीं समझ रहा है तो उसका कुछ किया नहीं जा सकता है। कुल मिलाकर, साल के अंत में जब हम भारी प्रदूषण, एक बड़ी विमानसेवा की मनमानी और मजबूरी झेल रहे हैं तब प्रधानमंत्री साल को उपलब्धियों वाला बता रहे हैं और आज अखबारों की खबरों तथा सोशल मीडिया पोस्ट से पता चल रहा है कि भाजपाई प्रचार के अंदाज ही निराले हैं। उसमें करोड़ों का भुगतान पाने वाले प्रचारकों और सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर में पैसे कमाने की होड़ दिख रही है तो मीडिया मालिक भी अछूते नहीं हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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