
संजय कुमार सिंह
दशहरा के अगले दिन आज इतवार के अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड बांग्लादेश के हिन्दुओं के संबंध में भारत सरकार का आरोप है तो इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला की लीड राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख, मोहन भागवत की सलाह है। शीर्षक है, “हिन्दुओं को समझना होगा… असंगठित और दुर्बल रहना अत्याचार को निमंत्रण : भागवत”। यह ‘खबर’ दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर छोटी-बड़ी खबर के रूप में है ही। गौरतलब है कि कोलकाता के द टेलीग्राफ ने विजयादशमी की खबर को लीड नहीं बनाया है और तिब्बत से लगने वाले नेपाल सीमा पर चीन के साथ विवाद की खबर लीड है। दुर्गाप्रतिमा के विसर्जन की तस्वीर के साथ शीर्षक है, अगले साल के लिए उल्टी गिनती शुरू हुई। इस एक तस्वीर और शीर्षक से बंगाल में आप इसका महत्व समझ सकते हैं। नवोदय टाइम्स की लीड अंतरिक्ष से निगरानी को मंत्रिमंडल समिति की मंजूरी की खबर है। द हिन्दू में मैसूर के दशहरे की खबर है तो हिन्दुस्तान टाइम्स में टॉप पर तीन कॉलम की फोटो के शीर्षक के अनुसार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दशहरा उत्सवों का नेतृत्व किया। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड हरियाणा और जम्मू के कश्मीर के मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण से संबंधित खबर है जबकि द हिन्दू की लीड दक्षिण भारत में हुई रेल दुर्घटना की जांच की खबर है। शीर्षक में बताया गया है कि इसमें तोड़-फोड़ के कोण से भी जांच की जायेगी।
कहने की जरूरत नहीं है कि रेल दुर्घटनाओं का कारण तोड़फोड़ और साजिश को बताना सरकार की चाल है और सरकार समर्थक इसका जमकर प्रचार कर रहे हैं और दुर्घटना रोकने की कोशिशें तो छोड़िये इसे छोटी-मोटी घटना बता दिया जा रहा है। कल सोशल मीडिया पर किसी ने लिखा, किसी भी विपक्षी दल ने ट्रेन पलटाने के लिए ट्रैक पर पत्थर, सिलेंडर, लोहे के गर्डर रखने की निन्दा की हो तो जरूर बताइयेगा। यही नहीं, भाई ने आगे लिखा था, ऐसा विपक्ष किसी और देश में देखने को मिलता हो तो बताइयेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर रेल दुर्घटनाओं को साजिश मान भी लिया जाये तो उससे निपटना और उसे रोकना तथा नागरिकों के साथ-साथ रेलवे की संपत्ति को नुकसान से बचाना भी सरकार का ही काम है। सरकार और समर्थक प्रचारकों ने साजिश का आरोप लगाकर खुद को जिम्मेदारियों से मुक्त कर लिया है और सोशल मीडिया पर अगर ट्रोल से यह सब नहीं करवाया जा रहा है तो आम आदमी की सोच को जिस तरह प्रदूशित कर दिया गया है वह चिन्ता का विषय होना चाहिये। साजिश ही नहीं, आतंकवाद से निपटना भी सरकार का ही काम है। उदाहरण अमेरिका में ट्विन टावर को गिराया जाना है। इसके बाद से वहां ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि फिर कोई घटना नहीं हुई। भारत में सख्ती और सरकारी आजादी व मनमानी तो है लेकिन कोई वारदात नहीं होगी इसकी गारंटी नहीं है। दुर्घटना के मामले में सरकार को सख्ती करने और इससे निजात दिलाने से कौन रोक रहा है?
दूसरी ओर, सोशल मीडिया से खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों से अपील की है कि विजयादशमी के अवसर पर भागवत जी का उद्बोधन जरूर सुनना चाहिये। एक्स पर उनकी पोस्ट इस प्रकार है, “राष्ट्र सेवा में समर्पित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस आज अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। अविरल यात्रा के इस ऐतिहासिक पड़ाव पर समस्त स्वयंसेवकों को मेरी हार्दिक बधाई और अनंत शुभकामनाएं। मां भारती के लिए यह संकल्प और समर्पण देश की हर पीढ़ी को प्रेरित करने के साथ ही ‘विकसित भारत’ को साकार करने में भी नई ऊर्जा भरने वाला है। आज विजयादशमी के शुभ अवसर पर माननीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी का उद्बोधन जरूर सुनना चाहिए।“ इसके साथ यूट्यूब लिंक भी है। आज जब ज्यादातर अखबार हिन्दुत्व के रंग में रंगे हैं तब कल मैंने पहली बार एक वीडियो देखा जिसमें किसी परिवार ने अपने बंगले में ही रावण दहन का आयोजन किया था। जाहिर है, मौका त्यौहार और उत्साह के साथ खुशी का भी था। पैसा, समय और श्रम खर्च किया जा रहा था। पर जैसे ही रावण जलने लगा, वीडियो में किसी बच्चे के रोने की आवाज आने लगी और वहां मौजूद बड़ों के लिए बच्चों को चुप कराना मुश्किल हो रहा था।
समझना मुश्किल नहीं है कि उस बच्चे को पता ही नहीं था कि रावण का जलना खुश होने का मु्द्दा है। संभव है, धीरे-धीरे उसे यही समझा दिया जाये और बड़ा होकर वह भी ‘रावण’ के जलने पर खुश होने लगे। लेकिन सच यही है कि बच्चा जब कुछ नहीं जानता है, किसी के भी जलने पर रोता है, दुखी होता है। प्रतीकात्मक रावण इसमें शामिल है। मुझे लगता है कि हम जिसे अच्छा या बुरा मानते हैं उसी के अनुसार खुश या दुखी होते हैं जबकि अच्छा औऱ बुरा वही है जो हमें बताया गया है। कई बार जो बताया गया है वह गलत हो सकता है। और कई मामलों में तो है ही। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी (चीज) को भी, जलाना बुरा है। पराली और पटाखे ही नहीं, सड़क पर झाड़ू लगा कर इकट्ठा किये गये कूड़े को भी जलाना कानूनन गलत है। बचपन की हमारी कोलोनी में पेड़-पौधे बहुत थे। उनके पत्ते इकट्ठा कर जला दिये जाते थे। बहुत धुआँ होता था। परेशानी तो होती ही थी। बाद में नियम बन गया पेड़ के झड़े हुए सूखे पत्ते भी नहीं जलाये जायेंगे। पर रावण जलाया जा रहा है। बनाकर, खरीदकर, सजा कर – और उसे पसंद किया जाता है।
मुझे लगता है कि इसलिए अखबारों की प्रस्तुति संयमित होनी चाहिये पर जो है वह आपके सामने है और बांग्लादेश के हिन्दुओं के लिए अगर भारत की चिन्ता जायज है तो भारत के मुसलमानों के लिए बांग्लादेश या पाकिस्तान की चिन्ता जायज होगी? वह भी तब जब सरकार यहां के नागरिकों का ख्याल नहीं रख पा रही है। आज माओवादियों से संपर्क के आरोप में दस साल बाद जेल से छूटे, व्हीलचेयर पर चलने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा के निधन की भी खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में टॉप पर छपी खबर के अनुसार बमुश्किल सात महीने पहले आरोपों से बरी साईबाबा 57 साल के थे। आज ही मुंबई में एनसीपी नेता और पूर्व विधायक बाबा सिद्दीक की हत्या की खबर है। इन खबरों के साथ आज जब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के दशहरा मनाने की खबर है तब इंडियन एक्सप्रेस का आज का पेज1 एंकर नागरिकों के प्रति सरकार और उसके अधिकारियों की लापरवाही की भयानक तस्वीर पेश करता है।
इस खबर के अनुसार मुंबई के एक बेकरी मालिक ने एक डीजे को केक दिया जिसमें नशीला पदार्थ छिपाकर रखा गया था। उसे लेकर वह शारजाह गया और वहां पकड़ा गया क्योंकि बेकरी वालों ने ही पूर्व सूचना दे दी थी। संबंधित डीजे 20 महीने से जेल में है। खबर के अनुसार एक पुलिस अधिकारी ने कहा है कि इस मामले में वे जो कर सकते थे किया जा चुका है और मामला सरकार के हाथों में है। इस मामले में भारत के विदेश मंत्री को भेजी गई ढेरों ई-मेल पर कार्रवाई नहीं हुई तो सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने हाल में विदेश मंत्री, एस जयशंकर को पत्र लिखा है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले में विदेश मंत्रालय से जानने की कोशिश की कि सरकार क्या प्रयास कर रही है तो कुछ पता नहीं चला। इसकी तुलना खबरों, खासकर सरकार विरोधी सही खबरों को ‘फेक न्यूज’ घोषित किये जाने और उसके आगे की कार्रवाई तथा उसके लिए की गई व्यवस्था से कीजिये। दूसरी ओर, यह मामला किसी नागरिक के मुश्किल में फंसने पर सरकार के रुख का उदाहरण है। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार का काम सरकार ही कर सकती है पर सरकार के मुखिया अगर हिन्दुओं को एकजुट होने और संगठन की ताकत बताने वाले आरएसएस के मुखिया के संदेश को देखने-सुनने की सिफारिश करें तो जाहिर है मंत्रियों की प्राथमिकता भी अलग होगी और एस जयशंकर के मामले में यह पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अलग लग रही है। सुषमा स्वराज ने तो ललित मोदी की भी सहायता की थी जिससे उन्हें राजनीतिक परेशानी भी हुई थी।
कहने की जरूरत नहीं है कि अगर किसी भारतीय नागरिक को किसी कारण से विदेश में फंसाया गया है तो सरकार को उसकी सहायता करनी ही चाहिये। दूसरे शब्दों में उसकी सहायता सरकार ही कर सकती है। यह परिवार और करीबियों के वश का काम नहीं है। विदेशों में दूतावास से लेकर राजदूत तक का तामझाम और उसका खर्च विदेश मंत्रालय के जरिये इसी काम के लिए होता है। ऐसे मामले में तो पहले ही मेल पर कार्रवाई होनी चाहिये थी और यह कार्रवाई भले ही विदेशमंत्री के दस्तखत से हो, काम नीचे के लोगों को करना है और इसका सिस्टम होता है। कई मेल का जवाब नहीं आना और उसपर कार्रवाई नहीं होने का मतलब साफ है। सरकार की कार्यकुशलता का सबूत है। एक सांसद की सिफारिश पर भी अगर कार्रवाई नहीं हुई है तो आप समझ सकते हैं कि आम जनता के मामले में यह सरकार कैसे काम कर रही है और हिन्दुओं को एकजुट करके तथा इसी कोशिश के नाम पर सत्ता में बनी हुई है। हालात ऐसे हो गये हैं कि नागरिकों को ईवीएम पर भी भरोसा नहीं है और चुनाव आयोग सरकार की भाषा बोलता है। प्रधानमंत्री अपनी सीटें कम आने पर तो पूछते हैं कि ईवीएम जिन्दा है कि मर गया लेकिन अप्रत्याशित जीत की स्थिति में ठोस शिकायतों पर भी जवाब नहीं है। ना सरकार की ओर से ना चुनाव आयोग की ओर से। ऐसी सरकार के मुखिया को जबरन अंतरराष्ट्रीय नेता बनाया जा रहा है और विपक्ष के नेताओं की छवि खराब करने के लिए ट्रोल सेना ही नहीं, सरकारी एजेंसियां लगा दी गई है।


