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आज के अखबार : बेमतलब का ‘युद्ध’ और उसमें जीत-हार का गैर जरूरी हिसाब-किताब, मुद्दा सिरे से गायब!

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में सरकार का बचाव करने का जबरदस्त ‘युद्ध’ दिख रहा है। इसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि पिछले युद्ध (या चल रहे ऑपरेशन सिन्दूर) में भारत की जीत ही नहीं हुई है पाकिस्तान हारा भी है। वैसे तो इसमें कोई शक नहीं था लेकिन शांगरी-ला डायलॉग में हिस्सा लेने सिंगापुर गये सीडीएस अनिल चौहान ने वहां ब्लूमबर्ग टीवी और रॉयटर्स को दो अलग-अलग इंटरव्यू दिए थे। जब प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं और इंटरव्यू अक्षय कुमार तथा प्रसून जोशी जैसों को देते हैं, आम काटकर खाते हैं या चूसकर जैसे सवालों के जवाब देते हैं तब सीडीएस ने सिंगापुर में ब्लूमबर्ग टीवी और रायटर्स से बात क्यों की यह मुद्दा हो सकता था। लेकिन उन्होंने जो कुछ कहा उनमें से एक, ये ज़रूरी नहीं कि विमान गिराया गया, ज़रूरी ये है कि ऐसा क्यों हुआ” मुद्दा बन गया। उनसे सवाल था, “पाकिस्तान से लड़ाई में क्या भारत के लड़ाकू विमान गिरे थे?” जनरल अनिल चौहान ने कहा था : “महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि विमान क्यों गिरा, बल्कि यह है कि ऐसा क्यों हुआ। इस तरह सीडीएस ने स्वीकार किया कि विमान गिराये गये हैं। इससे पहले एयर मार्शल भारती ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल लड़ाकू विमान के गिराए जाने की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए न तो इन दावों का खंडन किया और न ही पुष्टि की थी। इसकी बजाय उन्होंने कहा था कि “किसी भी युद्ध में दोनों पक्षों का नुकसान होता है।” ऐसे में सीडीएस ने जो कहा वह महत्वपूर्ण है। इसलिये न सिर्फ खबरों में है, चर्चा में भी है। इस कारण यह आशंका थी भारत सरकार की ‘ट्रोल सेना’ अब सीडीएस को निशाना बनायेगी।

सरकार समर्थक एक वरिष्ठ पत्रकार ने फेसबुक पर लिखा भी था, लगता है, आपरेशन सिंदूर में किसी कारण सीडीएस को साइड लाइन किया गया है। सीडीएस के बयानों में वही कुंठा, वही हताशा बारंबार दिख रही है। इसी कारण वह विपक्ष के लिए टूल बन कर उपस्थित हैं। सेना में अनुशासन की जो गरिमा है, उसे निरंतर तार-तार करने के अपराधी हैं, सीडीएस। सीडीएस और विपक्ष की यह जुगलबंदी, यह क़दमताल देश के लिए शुभ नहीं है। दोनों ही दोषी हैं, अपराधी हैं। इसलिए कि हम अभी भी युद्ध समय में हैं। बेहतर होगा कि समय रहते प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री, सीडीएस का ईगो मसाज कर दें। नहीं (तो) अकारण मुश्किल बढ़ती जाएगी। सेना का सम्मान जनता और सरकार दोनों का काम है। सेना को इस तरह विक्षिप्त विपक्ष के पाले में भेजना अच्छी बात नहीं है। इसके बाद आज सीडीएस के जो बयान छपे हैं उसे देखिये। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान चाहता था कि भारत 48 घंटे में घुटने टेक दे, आठ घंटे में ही वार्ता के लिए समेट लिया। लगभग ऐसा ही शीर्षक आज टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का है। नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर है। इसके अलावा दि एशियन एज में सीडीएस के हवाले से तीन कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, ऑपरेशन सिन्दूर ने आतंक, परमाणु खतरे के लिए नई रेखा खींची है। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, नतीजा महत्वपूर्ण, नुकसान नहीं : सीडीएस”नवभारत टाइम्स की लीड का शीर्षक है, नतीजा अहम, पाकिस्तान को ‘पारी से’ हराया : सीडीएस”

अमर उजाला में आज पहले पन्ने पर क्रिकेट है लेकिन खबरों का पहला पन्ना अलग है। उसकी लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान ने कबूला – भारत ने जितना बताया, उससे अधिक गहरे घाव दिये हैं। मेरे आठ अखबारों में आज द हिन्दू अकेला है जिसने सीडीएस को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। द हिन्दू की आज की लीड भी सबसे अलग है, लद्दाख को कोटा, डोमिसाइल स्टेटस पर नई नीतियां मिलीं। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर दो कॉलम में तथा और भी अखबारों में है। शीर्षक के अनुसार सरकार ने इन नियमों को रोजगार और कोटा संबंधित चिन्ताओं को खत्म करने के लिए अधिसूचित किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने, जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने और राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बना दिये जाने के बाद जब राज्य का दर्जा फिर से देने की मांग है और पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में मिलाने का शिगूफा काफी समय से चल रहा है तब इस खबर का खास महत्व है और ऑपरेशन सिन्दूर या पाकिस्तान से युद्ध में भारत का नुकसान पाकिस्तान से कम है, इसे साबित करने से ज्यादा जरूरी खबर है। यह इस सरकार की राजनीति को समझने के साथ-साथ भारत के भूगोल और समकालीन इतिहास को जानने और याद रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है। लेकिन अमर उजाला ने पाकिस्तान ने कबूला – बताना जरूरी समझा है। उपशीर्षक है – इस्लामाबाद ने अपने डोजियर में माना, भारतीय सेना ने सात और ठिकानों को किया था ध्वस्त और दूसरा, भारत ने नौ आतंकी, 11 सैन्य ठिकानों की दी थी जानकारी…. नये खुलासे से हुए 27 ठिकाने। जाहिर है, अखबार की मंशा पाकिस्तान की हार या कमजोरी बताने की है। बेशक, यह खबर है पर मामला खबरों के चयन में प्राथमिकता और लीड बनाने का भी है।

सरकार के प्रचार और उसे काम करता दिखाने के अमर उजाला के प्रयास के तहत आज खबरों के पहले पन्ने पर एक खबर है, आयकर अफसर की सात करोड़ की संपत्ति होगी कुर्क। दूसरी ओर, अदाणी की कंपनियों में 20,000 करोड़ के कथित अज्ञात निवेश से संबंधित सवालों का जवाब नहीं है। आधिकारिक रूप से कहा जा चुका है कि उसका पता नहीं चला, जांच करने वालों पर आरोप है कि मिलीभगत के कारण जांच नहीं हुई आदि आदि और अंत में पूर्व सेबी प्रमुख को भी क्लिन चिट मिल गई। यह सब तब जब प्रधानमंत्री का मुद्दा था कि भारत में अवैध ढंग से कमाये पैसे शेल कंपनियों के जरिये विदेशों से भारतीय कंपनियों में निवेश कर दिये जाते हैं। इसे रोकने के लिए मोदी सरकार ने लाखों शेल कंपनियां बंद करवाईं, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। विदेशी चंदा और दान लेने के नियम सख्त बनाया गये जिससे जनहित के काम करने वाले कई गैर सरकारी संगठन बंद हो गये, काम नहीं कर पा रहे हैं फिर भी अदाणी के 20,000 करोड़ जब्त करने की स्थिति नहीं बनी, उसकी जरूरत नहीं समझी गई और वह सब तो सरकारी मामला है उसपर खबर बन सकती थी वह भी नहीं बनी। लेकिन एक बाबू के सात करोड़ रुपये जब्त या कुर्क किये जा रहे हैं तो पहले पन्ने पर बड़ी सी खबर।

अमर उजाला क्रिकेट वाले पहले पन्ने की लीड का शीर्षक है, जस्टिस वर्मा के खिलाफ मानसून सत्र में आयेगा महाभियोग प्रस्ताव। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस और दूसरे अखबारों में भी है। आप जानते हैं कि मामला जस्टिस वर्मा के आउटहाउस में नकदी रखे होने का है। इसका पता तब चला जब वहां आग लगी और चूंकि मामला हाईकोर्ट के जज का था इसलिए (नियमानुसार) न कोई बरामदगी हुई ना कोई खबर छपी। वारदात के कई दिनों बाद जब खबर छपी तो हंगामा मचा और न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि पैसे उनके नहीं हैं, उन्हें नहीं पता कि कहां से आये। चूंकि जब्ती नहीं हुई, सबूत नहीं रखे गये इसलिए अब जांच भी नहीं हो सकती है और न्यायमूर्ति वर्मा की दलीलों को अनसुना करके सरकार महाभियोग की तैयारी कर रही है। बेशक यह खबर है लेकिन मामला पहले पन्ने की लीड और सिंगल कॉलम ही नहीं पहले पन्ने पर नहीं छपने का भी है। खासकर इसलिये कि पहले तो मामले का पता ही नहीं चला और जब चला तो कॉलेजियम सिस्टम भी मुद्दा बना, तबादले की कार्रवाई और गृहनगर भेजे जाने, वहां के बार एसोसिएशन की शिकायत आदि भी हैं। इन सबमें जो बात मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगती है वह यह कि जज लोया की मौत के मामले में उनके साथी जजों के बयान पर यकीन किया गया और जांच नहीं कराई गई जबकि कुछ दस्तावेज और दावे (जजों के नहीं, हार्ट अटैक के संबंध में) संदिग्ध हैं। दूसरी ओर, इस मामले में नकदी कहां से आई, किसकी थी, की पुष्टि हुए बिना महाभियोग का प्रस्ताव है और जज के अपने मामले में उनका बयान नहीं माना जा रहा है जबकि एक जज की मौत के मामले में साथी जजों के बयान को माना गया है।

यह दिलचस्प है कि केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के शासन में भिन्न मामलों में दोहरा रवैया अपनाया गया है। दो पैमाने साफ दिखते हैं। वह अपने आप में गलत है लेकिन उसका विरोध तो छोड़िये उससे संबंधित खबरों को भी महत्व नहीं दिया जाता है। कई बार कहा जा चुका है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार देश के संघीय ढांचे को कमजोर कर रही है। विपक्षी सरकारों का उसका विरोध, सरकारों को गिरा देना, विधायक खरीद लेना, दलबदलुओं को ईनाम और इनमें पुराने पापियों को वाशिंग मशीन में धोकर पवित्र कर लिया है। दूसरी ओर, दुनिया का कोई ऐसा अपराध शायद ही मिले जिसके आरोप किसी न किसी भाजपा नेता पर न हों। फिर भी भाजपा सरकार पवित्र गाय है क्योंकि हिन्दू-मुस्लिम खुलकर कर रही है और मेरा मानना है कि कई हिन्दी अखबार मौके पर हिन्दू हो जाते हैं। इसके बावजूद यह दिलचस्प है कि 2021 के विधानसभा चुनावों के समय की हिंसा के लिए गिरफ्तार तृणमूल के छह कार्यकर्ताओं की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी है। यहां मुझे याद आता है कि छोड़ने को तो भाजपा समर्थक बलात्कार के आरोपी भी छोड़ दिये गये थे और उन्हें वापस जेल भेजने के लिए कितनी मशक्कत हुई थी। कथित आपत्तिजनक पोस्ट के लिए गिरफ्तार बंगाल की सोशल इनफ्लुएंसर, हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार, शर्मिष्ठा पनोली को हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत नहीं मिली है जबकि ऐसे ही और इससे भी गंभीर आरोपों में भाजपा समर्थकों और भाजपा शासन वाले राज्यों में कार्रवाई तो छोड़िये एफआईआर भी नहीं होती है। और मुद्दा इतना ही नहीं है, पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार पर भाजपा के लोग जो आरोप लगाते हैं और जैसे परेशान किया जाता है वह अलग रिकार्ड है और दिख रहा है पर खबरें वैसे नहीं होती हैं और इनमें कोलकाता के आरजी कार अस्पताल में डॉक्टर की हत्या के बाद के विवाद और फिर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया जाना उल्लेखनीय है। संयोग से ऐसा भाजपा शासित किसी राज्य में नहीं हुआ और यहां सीबीआई से जांच में कुछ नया नहीं मिला। वही मिला जो स्थानीय पुलिस ने घटना के कुछ घंटे बाद पता लगा लिया था। इस तरह जांच के जरिये विरोधियों को परेशान करने के मामले भी खबर नहीं बनते हैं।  

आज क्रिकेट की खबर के बाद नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, विपक्ष के 16 दलों ने किया संसद का विशेष सत्र बुलाने का आग्रह। उपशीर्षक भी स्पष्ट है – पहलगाम आतंकी हमले के बाद के घटनाक्रम पर चर्चा की मांग। यह खबर दूसरे अखबारों में भी है लेकिन इतनी प्रमुखता से नहीं। जाहिर है, ऐसी खबरों और शीर्षक से पाठक को न सिर्फ सूचना मिलती है वह यह भी सोचता है कि आखिर भाजपा की सरकार ऐसा कर क्यों नहीं रही है या विपक्ष को ऐसी मांग भी क्यों करनी पड़ रही है। सीडीएस साब के बयान को आज ज्यादातर अंग्रेजी अखबारों ने महत्व दिया है पाठक जब ऐसे सोचेगा तो वह भाजपा के खिलाफ हो सकता है और शायद इसीलिए ऐसी खबरें और शीर्षक अमूमन नहीं होते हैं। आज की प्रमुख खबरों में एक खबर है, (इंडियन एक्सप्रेस) एसीबी ने मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन को कक्षाओं के निर्माण से संबंधित मामले में समन किया। मुझे लगता है कि यह विपक्षी नेताओं को परेशान करने का मामला है और इसका असर यह होगा कि नये लोग राजनीति में नहीं आयेंगे और आयेंगे तो वही लोग जिन्हें सुरक्षा और सरकार का संरक्षण चाहिये। ऐसे लोग हमेशा ब्लैकमेल किये जा सकेंगे और ईमानदारी से काम नहीं कर सकेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि निर्वाचित सरकार ऐसे फैसले कर सकती है जिससे सरकार को राजस्व का नफा-नुकसान हो। शराबबंदी इनमें सबसे महत्वपूर्ण है। टैक्स राजस्व शून्य हो जाना स्वीकार्य है तो कम होने में दिक्कत क्यों हो सकती है ऐसे में राज्सव नुकसान के किसी निर्णय को अपराध बना दिया जाये तो सरकार के लिए काम करना मुश्किल हो जायेगा। अधिकारी ऐसा नहीं कर पायें और अधिकारियों के खिलाफ ऐसा सरकार नहीं करे इसके लिये नियम भी है कि बिना अनुमति मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है लेकिन आम आदमी पार्टी (और अन्य विरोधियों) के खिलाफ मामले चलाने के लिए अनुमति भी दी जाती रही है। नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी दोष सिद्ध होने से पहले बदनाम हो गई। दिल्ली का चुनाव हार गई, भाजपा को सत्ता मिल गई जबकि आम आदमी पार्टी की सरकार थी तो उपराज्य के जरिये सरकार के कामों में अड़ंगा लगाया जाता था और चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री का नाम तय होने से पहले यमुना की सफाई होने लगी और खबरें छपने लगीं। राज्य सरकारों को राज्यपाल के जरिये परेशान किया जाता रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती की तो राष्ट्रपति ने भी हथियार उठा लिया। पूरी स्थिति अघोषित इमरजेंसी जैसी है और इसपर 2020 में ही एक किताब आई थी। किताब की चर्चा वैसे नहीं हुई जैसे जयराम रमेश के कहने पर अघोषित इमरजेंसी की हुई।

आज के अखबारों में सरकार के प्रचार वाली खबरों की जगह देशबंधु की लीड छप सकती थी। खबर है कि विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन ने बैठक कर नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है और मांग की है कि संसद का विशेष सत्र बुलाया जाये। आप जानते हैं कि विपक्ष चाहता है कि सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर देश को बताये कि पहलगाम हमला, ऑपरेशन सिन्दूर, सैन्य कार्रवाई तथा आतंकवाद को खत्म कर पाकिस्तान को अलग-थलग करने में देश कितना सफल रहा। कहने की जरूरत नहीं है कि सीडीएस ने जो कहा उससे हुए ‘नुकसान’ की भरपाई के लिए जब खबरें छप रही हैं और छपवाई जा रही हैं, खुले आम इतना जोर लगाया जा रहा है तो संसद में सच बताना कितना मुश्किल है और इसके क्या मायने हैं। आम आदमी न समझे अखबारे वाले, संपादक, पत्रकार तो सब समझ ही रहे होंगे। फिर भी अखबार यह नहीं पूछ रहे हैं कि सरकार ने अगर पाकिस्तान को कस ही दिया है तो संसद सत्र बुलाकर इसे अधिकृत तौर पर कह देना चाहिये या कहने में दिक्कत क्यों है? अखबार वाले इस मांग को भी महत्व नहीं दे रहे हैं। ऊपर आप देशबंधु का पहला पन्ना देख सकते हैं। देशबंधु की सेकेंड लीड भी देखिये – ट्रम्प का फोन आया और बस सरेंडर। यह खबर भी अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन जो है वह यह बताने (या संदेश देने) के लिए है कि नरेन्दर सरेंडर का आरोप गलत है और नरेन्द्र मोदी तो रूस से हथियार खरीदने की हिम्मत रखते हैं जिससे अमेरिका नाराज है और नरेन्द्र मोदी इसकी परवाह नहीं करते हैं। वरना कोई कारण नहीं है कि कोई अखबार सत्तारूढ़ दल की सारी खबरें छापे और विपक्ष के गंभीर आरोपों (निराधार हो तो भी) को प्रमुखता न दे। दूसरी ओर प्रधानमंत्री के बनाये चुनाव आयोग ने उनके गलत, अनैतिक और झूठे (मंगलसूत्र से मुजरा तक) प्रचार पर भी कार्रवाई नहीं की, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित मामला अदालत में लंबित है।

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