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आज के अखबार : बंगाल में टीएमसी की हार और भाजपा की जीत के बाद चार मरे, प्रस्तुति देखिए

संजय कुमार सिंह

आज मेरे ज्यादातर अखबारों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की इस्तीफा नहीं देने की घोषणा लीड है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर है, बंगाल का मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में सुवेन्दु अधिकारी सबसे आगे हैं। द हिन्दू में तमिलनाडु का मामला लीड है। खबर है कि कांग्रेस ने टीवीके को सशर्त समर्थन की पेशकश की है। द टेलीग्राफ इन सबसे अलग है। तृणमूल के झंड़ों के जखीरे की फोटो के साथ शीर्षक है, मैडम खारिज किया जाना ऐसा दिखता है। इस मुख्य शीर्षक के साथ दीदी का दावा भी है। नवोदय टाइम्स की लीड सुप्रीम कोर्ट में 38 न्यायाधीश होने की खबर है जबकि इस्तीफा नहीं दूंगी के साथ बराबर में अमित शाह को पर्यवेक्षक बनाए जाने की खबर है। इस तरह, आज अखबारों ने अगर दीदी के इस्तीफा नहीं देने की घोषणा को सबसे ज्यादा महत्व दिया है तो विशेषज्ञों की यह राय भी बताई है कि इसके कोई खास मायने नहीं हैं। द टेलीग्राफ ने ममता बनर्जी की घोषणा के नीचे विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि उनका रुख अप्रासंगिक है।

अमर उजाला की सबसे बड़ी खबर है, नौ को भाजपा सरकार का शपथग्रहण है। उपशीर्षक है, शुभेन्दु का सीएम बनना तय। मतलब मुख्यमंत्री का फैसला नहीं हुआ है, शपथग्रहण की तारीख तय है और खबर लीड है। दूसरा उपशीर्षक है, असम में हिमंत को फिर मिलेगा मौका लेकिन शपथ 10 मई को। इसी तरह तमिलनाडु में टीवीके नेता कल शपथ लेंगें लेकिन यह खबर आखिरी है। दूसरे अखबारों में भी टीवीके की खबर ढूंढ़नी पड़ रही है लेकिन दि एशियन एज में सेकेंड लीड का शीर्षक है, विजय ने सरकार बनाने का दावा किया, फ्लोर टेस्ट के लिए दो हफ्ते का समय मांगा। कहने की जरूरत नहीं है कि आज की इन खबरों में सबसे बड़ी खबर ममता बनर्जी का यह दावा है कि वे हारी नहीं हैं, उन्हें हराया गया है। सोशल मीडिया पर और वैसे भी, यह चर्चा आम है कि एसआईआर तथा डिजिटल डिसक्रिपेंसी के नाम पर जिन लाखों लोगों को मतदान से वंचित रखा गया उन्हीं की वजह से नतीजे अलग आए हैं। इससे संबंधित एक दिलचस्प खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में एंकर है। शीर्षक है, “एसआईआर ने डिलीट किया, लोगों ने चुन लिया : मोताब शेख ‘सबसे भाग्यशाली व्यक्ति’ हैं”। खबर के अनुसार, 58 साल के कांग्रेस उम्मीदवार का नाम मतदाता सूची में नामांकन के लिए निर्धारित अंतिम समय में शामिल  हुआ और ऐसा सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संभव हुआ। खबरों के अनुसार, वे फरक्का से 8,000 से ज्यादा मतों से विजयी रहे हैं।

खबरों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 2026 के चुनाव से पहले ‘विशेष गहन संशोधन’ (एसआईआर) के दौरान तथाकथित तकनीकी विसंगतियों का हवाला देते हुए मोताब शेख का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था। इससे उनका नामांकन ही खतरे में पड़ गया था। स्थानीय स्तर पर उनकी अपील नहीं सुनी गई, तो मोताब शेख ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 6 अप्रैल थी और ठीक एक दिन पहले, 5 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के मामले सुनने के लिए बनाए गए नवनिर्मित अपीलीय न्यायाधिकरण को उनके मामले की तुरंत सुनवाई करने का निर्देश दिया। न्यायाधिकरण ने पाया कि उनके पास पासपोर्ट जैसे वैध दस्तावेज थे और उनके रिकॉर्ड में कोई गलती नहीं थी। इसके बाद उन्हें ‘वैध मतदाता’ घोषित किया गया और ‘पूरक सूची’ में उनका नाम जोड़ने का आदेश दिया गया। अदालती आदेश के तुरंत बाद, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) उम्मीदवार के रूप में फरक्का से अपना पर्चा दाखिल किया। फरक्का में पहले चरण के तहत मतदान हुआ था। 4 मई 2026 को घोषित परिणामों में मोताब शेख ने शानदार जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार सुनील चौधरी को 8,193 मतों के अंतर से हराया। मोताब शेख की यह जीत उनके लिए तो महत्वपूर्ण है ही, कांग्रेस के लिए भी महत्वपूर्ण रही। राज्य में पार्टी की स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी। मोताब शेख बंगाल में जीतने वाले केवल दो कांग्रेस उम्मीदवारों में से एक हैं। इस मामले ने एसआईआर  प्रक्रिया की खामियों को उजागर किया और यह सिद्ध किया कि न्यायिक हस्तक्षेप से लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की जा सकती है। मोताब शेख का मतदाता सूची से बाहर होकर सुप्रीम कोर्ट के जरिए वापसी करना और फिर चुनाव जीतना, 2026 के चुनावों और उससे पहले के एसआईआर तथा लॉजिकल डिसक्रिपेंसी का सच है।

आज की तीसरी महत्वपूर्ण खबर भी बंगाल या कलकत्ता से ही है। अमर उजाला में यह चार कॉलम में छपी है। शीर्षक है, बंगाल में चुनाव के बाद भड़की हिन्सा, दो की मौत। द टेलीग्राफ ने इसे टॉप पर छापा है। शीर्षक है, हिंसा का तांडव – कोलकाता के बीचोंबीच एक बुलडोजर, बंगाल भर में हमलों में चार मौतें – भाजपा की जीत मंगलवार शाम को हिंसा के भंवर में बदल गई। न्यू मार्केट (तस्वीर) में, भाजपा की विजय रैली के दौरान कई फेरीवालों के स्टॉल कथित तौर पर बुलडोजर से ध्वस्त कर दिए गए। फेरीवालों ने पुलिस पर निष्क्रियता का आरोप लगाया। टॉपसिया में, तृणमूल ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर टीएमसी कार्यालय में तोड़फोड़ करने का आरोप लगाया। हावड़ा और न्यू टाउन में, दो भाजपा कार्यकर्ताओं की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, जबकि बीरभूम के ननूर में, एक टीएमसी कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या कर दी गई। बेलेघाटा में, टीएमसी ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर एक समर्थक की हत्या का आरोप लगाया। राज्य भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने राज्य भर के पार्टी नेताओं से कहा कि चुनाव के बाद हिंसा नहीं होनी चाहिए। दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, चुनाव नतीजों के बाद बंगाल में उफान; 3 मरे, टीएमसी कार्यालयों पर हमला।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी मरने वालों की संख्या चार बताई है। चुनाव, राजनीति, हिन्सा की इन खबरों के बीच देशबन्धु ने खबर दी है कि एनसीईआरटी की किताब का नया संस्करण एक सप्ताह के भीतर उपलब्ध होगा। आप जानते हैं कि कक्षा आठ के सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका से संबंधित अध्याय से सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई और अब उसे हटा दिया गया है।  यह दिलचस्प है कि विवादास्पद अध्याय पुस्तक के दूसरे भाग में था जिसका नाम है, समाज को जानना : भारत और उससे आगे।

अखबारों की खबरों और अन्य समाचार माध्यमों से पाठक इस विवाद के साथ दिल्ली हाईकोर्ट कोर्ट में अरविन्द केजरीवाल का मामला भी जान जाएंगे और महसूस करेंगे कि एक मुख्यमंत्री के खिलाफ मामला बनाने वाली केंद्र सरकार और उसकी एजेंसी सीबीआई तथा उसके सरकारी वकील यानी सोलिसीटर जनरल जज साहिबा के बच्चों को काम और उसके पैसे देते हैं तथा जज साहिबा जो फैसले देती हैं वह भले सीबीआई के पक्ष में हो, (पूर्व या हरा दिए गए) मुख्यमंत्री के खिलाफ हो लेकिन वह स्वतंत्र होता है या हो सकता है। इसमें जज खुद रिक्लूज नहीं करे, सीबीआई यह जानकारी सार्वजनिक नहीं करे और अरविन्द केजरीवाल के कहने या मांग करने पर भी जज रिक्लूज न करे तो यह सामान्य है और हमारा आज का समाज है। यह पाठ्यक्रम में भले न रहे। बच्चा जान तो जरूर जाएगा और अगर नहीं जानेगा तो पाठ्यक्रम में रहने से भी क्या होना था। टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड सरकारी खबर है। इसके अनुसार, कंपनियों को युद्ध के प्रभाव से निपटने में मदद के लिए 2.5 लाख करोड़ की लोन गारंटी योजना है।

आज एक और खबर कई अख़बारों में है, पीआईएल के दुरुपयोग पर शीर्ष अदालत सख्त। बेशक दुरुपयोग गलत है और उसपर सख्ती ठीक है। लेकिन इसे रोकना भी अदालतों का ही काम है। लेकिन देशबन्धु के अनुसार अदालत ने कहा है, जनहित याचिकाएं अब पैसा राजनीतिक हित याचिका बनीं। हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक के अनुसार, 2006 में सबरीमाला मामले में पीआईएल के कागज रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाने चाहिए थे। कहने की जरूरत नहीं है सुप्रीम कोर्ट के बारे में ऐसा कोई और नहीं कह सकता है और आप जानते हैं कि इससे संबंधित अध्याय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कितनी सख्ती दिखाई है। 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूलचूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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