भोपाल में सामने आए जमीन घोटाले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर देश में त्याग सिर्फ आम जनता ही क्यों करे? एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों से पेट्रोल कम खर्च करने, एक साल तक सोना न खरीदने और वर्क फ्रॉम होम अपनाने जैसी अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर बड़े अफसरों और रसूखदारों पर करोड़ों के खेल के आरोप सामने आ रहे हैं।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल के गुढ़ी घाट इलाके में करीब 50 अफसरों ने जमीन खरीदी। इसके बाद महज 16 महीनों में उसी इलाके से 3200 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना मंजूर हुई और फिर कुछ ही महीनों में लैंड यूज बदल गया। दावा है कि जमीन की कीमत 11 गुना तक बढ़ गई। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ संयोग है या फिर सिस्टम और सत्ता के गठजोड़ का बड़ा खेल?
देश की जनता महंगाई, बेरोजगारी और टैक्स के बोझ से जूझ रही है। पेट्रोल-डीजल के दामों से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक हर तरफ आम आदमी की जेब कट रही है। सरकार लगातार “त्याग”, “संकट” और “राष्ट्रहित” की बातें कर रही है। लेकिन दूसरी ओर नौकरशाही और प्रभावशाली लोग सरकारी फैसलों से करोड़ों कमाने में जुटे दिखाई दे रहे हैं।
विडंबना देखिए, जनता से कहा जा रहा है कि खर्च कम करो, सोना मत खरीदो, ईंधन बचाओ। लेकिन जिनके हाथों में सिस्टम की ताकत है, वे जमीन के सौदों से अरबों का फायदा उठा रहे हैं। अगर आरोप सही हैं तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या त्याग और राष्ट्रभक्ति का बोझ सिर्फ आम नागरिकों के लिए है? क्या सत्ता, नौकरशाही और बड़े लोगों के लिए कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बची?
जब जनता से लगातार संयम और बलिदान की उम्मीद की जाए, तब सरकार और सिस्टम की जवाबदेही उससे कहीं ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन मौजूदा तस्वीर यह दिखा रही है कि आम आदमी से “कुर्बानी” मांगी जा रही है और प्रभावशाली लोग सिस्टम से “कमाई” कर रहे हैं।

इस स्टोरी को ही गोदी चैनल दस दिन रिपोर्ट कर दें। सारी एजेंसियाँ हरकत में आ जाए। ऐसा होगा नहीं। प्रधानमंत्री आम जनता से पैसा बचाने की अपील कर रहे हैं और पचास अफ़सर 3200 करोड़ ज़मीन के धंधे से बना रहे हैं। बाद में इसी टाइप के अफ़सर लोकतंत्र की हत्या की सुपारी लेकर सरकार के काम आते हैं। अगर देश में राष्ट्रवाद और धर्म की लहर चल रही है तो इन अफ़सरों के आँगन में नैतिकता की बूंदा बांदी भी नहीं हुई क्या? -रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार



