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जयपुर में भी सस्ती दरों पर भूखंड पाने वाले कई पत्रकार सरकारी मकानों का सुख भोग रहे!

जयपुर में कई वरिष्ठ पत्रकार ऐसे हैं, जिन्हें पत्रकार कॉलोनी में सरकार से सस्ती दरों पर भूखंड आवंटित किए जा चुके हैं, लेकिन वह अभी भी सरकारी मकानों का सुख भोग रहे हैं। पत्रकार कॉलोनी में मकान देते समय यह निर्देश दिए गए थे कि एक समय सीमा के बाद वे सरकारी मकान खाली कर देंगे, लेकिन भूखंड मिलने के लगभग 15 साल बाद तक भी ये जयपुर के गांधीनगर स्थित सरकारी आवासों में मजे कर रहे हैं। इनमें राजेंद्र गोधा, जगदीश शर्मा, राजेंद्र बोडा, अनिल दाधीच आदि शामिल हैं। एक अन्य पत्रकार एच के शास्त्री हीरा बाग के फ्लैट पर कब्ज़ा किए हुए हैं, जबकि वे बरसों पहले पीटीआई से सेवानिवृत्त हो कर बाहर जा चुके हैं।

जयपुर में कई वरिष्ठ पत्रकार ऐसे हैं, जिन्हें पत्रकार कॉलोनी में सरकार से सस्ती दरों पर भूखंड आवंटित किए जा चुके हैं, लेकिन वह अभी भी सरकारी मकानों का सुख भोग रहे हैं। पत्रकार कॉलोनी में मकान देते समय यह निर्देश दिए गए थे कि एक समय सीमा के बाद वे सरकारी मकान खाली कर देंगे, लेकिन भूखंड मिलने के लगभग 15 साल बाद तक भी ये जयपुर के गांधीनगर स्थित सरकारी आवासों में मजे कर रहे हैं। इनमें राजेंद्र गोधा, जगदीश शर्मा, राजेंद्र बोडा, अनिल दाधीच आदि शामिल हैं। एक अन्य पत्रकार एच के शास्त्री हीरा बाग के फ्लैट पर कब्ज़ा किए हुए हैं, जबकि वे बरसों पहले पीटीआई से सेवानिवृत्त हो कर बाहर जा चुके हैं।

राजेंद्र गोधा एक अखबार “समाचार जगत” के मालिक हैं और अखबार के दफ्तर के नाम पर सरकार से सस्ती जमीन ले कर भास्कर के बगल में विशाल इमारत खड़ी कर चुके हैं, जिसमें एक बड़ा हिस्सा उन्होंने एक कोचिंग इंस्टीट्यूट को किराए पर दे दिया है, लेकिन पत्रकार के रूप में वे सरकारी मकान पर कब्जा जमाए हुए हैं। इसी तरह जगदीश शर्मा का अब पत्रकारिता से कोई वास्ता नहीं रहा और वे एक प्राइवेट कंपनी की नौकरी करते हैं, लेकिन वह भी सरकारी आवास में जमे हुए हैं। राजेन्द्र बोड़ा भी अब पत्रकारिता को तिलांजलि दे कर एनजीओ से जुड़े हैं। इन पत्रकारों को सरकारी आवास खाली करने के नोटिस भी मिल चुके हैं, लेकिन इन्होंने शायद वे डस्टबिन में डाल दिए हैं।

दिलचस्प बात तो यह कि कुछ पत्रकारों ने तो लाखों रुपए का किराया तक जमा नहीं कराया है। ऐसे ही एक वरिष्ठ पत्रकार बिना किराया चुकाए भागने की तैयारी में हैं। यह उल्लेखनीय है कि चंडीगढ़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट का पहले एक फैसला आ चुका है, जिसके मुताबिक जो पत्रकार 60 साल से ऊपर के हो चुके हैं या अब पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं, वे सरकारी मकानों में रहने के हकदार नहीं हैं। पिछले दिनों वसुंधरा सरकार भी यह फैसला कर चुकी है कि 60 साल से ऊपर वाले पत्रकारों को सरकारी आवास खाली करने होंगे। मजेदार बात यह कि जयपुर में सरकारी मकानों में रह रहे सभी पत्रकार 60 साल की उम्र कभी की पार कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद सरकारी मकानों में ऐश कर रहे हैं।

जयपुर से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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