जयपुर में भी सस्ती दरों पर भूखंड पाने वाले कई पत्रकार सरकारी मकानों का सुख भोग रहे!

जयपुर में कई वरिष्ठ पत्रकार ऐसे हैं, जिन्हें पत्रकार कॉलोनी में सरकार से सस्ती दरों पर भूखंड आवंटित किए जा चुके हैं, लेकिन वह अभी भी सरकारी मकानों का सुख भोग रहे हैं। पत्रकार कॉलोनी में मकान देते समय यह निर्देश दिए गए थे कि एक समय सीमा के बाद वे सरकारी मकान खाली कर देंगे, लेकिन भूखंड मिलने के लगभग 15 साल बाद तक भी ये जयपुर के गांधीनगर स्थित सरकारी आवासों में मजे कर रहे हैं। इनमें राजेंद्र गोधा, जगदीश शर्मा, राजेंद्र बोडा, अनिल दाधीच आदि शामिल हैं। एक अन्य पत्रकार एच के शास्त्री हीरा बाग के फ्लैट पर कब्ज़ा किए हुए हैं, जबकि वे बरसों पहले पीटीआई से सेवानिवृत्त हो कर बाहर जा चुके हैं।

80 प्रतिशत पत्रकारों को सेलरी से मतलब, सरोकार से नहीं

देश को जगाने वाले खुद अंधेरे में, कौन बोले उनके लिए…  जो देश को जगा रहे हैं उनकी भी कोई सुधि लेने वाला है सभी को उनसे बस समाचार चाहिए चोखा। मतलब सही और रोचक। देश की पूरी ईमानदारी पत्रकार से ही चाहिए। जो पत्रकार लिखता पढ़ता है वह सच्चा भी होता है। 80 प्रतिशत ऐसे पत्रकार है देश में। उन्हें बस अपनी सैलरी से ही मतलब है। समाचार वहीं लिखने का प्रयास करते है जिसमें सच्चाई होती है। हर मीडिया कंपनी में ऐसे लोग है तभी आप सच्चाई को समझ और जान पा रहे है।

क्या दिल्ली में पाए जाने वाला सरोकारी संपादक नाम का जीव विलुप्त हो गया है?

सुना है कि देश की राजधानी दिल्ली में सरोकारी संपादक नाम का कोई जीव पाया जाता था. आजकल यह जीव विलुप्त हो गया है क्या? वैसे सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति के जीव मीडिया हाउसों को खोलने का ठेका खूब लेते हैं. मीडिया कर्मियों के हितों का ठेका लेने की डींगें भी इस प्रजाति के जीव हांकते पाये जाते हैं. लगता है सोशल मीडिया पर शेर की तरह दहाड़ने वाले बड़का सरोकारी संपादक लोग बेरोजगार मीडिया कर्मियों की दिहाडी में लगी आग से हाथ गरम कर रहे हैं. एक के बाद एक न्यूज टीवी चैनल बंद हो रहे हैं. जर्नलिस्ट और नॉन जर्नलिस्ट्स के साथ-साथ चैनलों में काम करने वाले सैकड़ो कर्मचारी बेरोजगार हो रहे हैं.

श्वेता प्रसाद बसु का मीडिया के नाम खुला पत्र… क्या किसी संपादक में जवाब देने की हिम्मत है?

मीडिया वालों ने श्वेता प्रसाद बसु को वेश्या बता दिया लेकिन कोर्ट ने वेश्यावृत्ति के आरोपों को खारिज कर दिया. अब कहां गये मीडिया वाले. क्या वे श्वेता प्रसाद बसु की इज्जत से खेलने के आरोपी नहीं बन चुके हैं. श्वेता प्रसाद बसु ने खुद को बरी किए जाने के बाद मीडिया वालों को एक खुला पत्र लिखा और बेहद कड़े टोन में ऐसी तैसी की है. अगर मीडिया वालों में, मीडिया के संपादक लोगों, मीडिया के टीआरपी खोरों में थोड़ी भी शरम बाकी हो तो उन्हें इस खुले पत्र का खुला जवाब जरूर लिखना चाहिए. श्वेता का मीडिया के नाम खुला पत्र इस प्रकार है….

अखबार ऐसे विज्ञापन नहीं प्रकाशित कर सकते जो अश्लील या महिला विरोधी हों

नई दिल्ली : सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कहा है कि प्रेस की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने की नीति के अनुकरण में भारत सरकार प्रेस की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप नहीं करती है, फिर भी स्वनियमन के सिद्धांत को स्थापित करने के लिए भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना की गई है।

मीडिया में सरोकार, जज्बे और जज्बात के जितने शब्द-एक्सप्रेशन हैं, सबके सब सिर्फ प्रोमो-विज्ञापन के काम लाए जाते हैं

Vineet Kumar : जिया न्यूज की मीडियाकर्मी स्नेहल वाघेला के बारे में जानते हैं आप? 27 साल की स्नेहल अपने चैनल जिया न्यूज जिसकी पंचलाइन है- जर्नलिज्म इन एक्शन, के लिए अपने दोनों पैर गंवा चुकी है. पिछले दिनों जिया चैनल के लिए मेहसाना (अहमदाबाद) रेलवे स्टेशन पर रिपोर्टिंग करते हुए स्नेहल फिसलकर पटरियों पर गिर पड़ी और उनके दोनों पैर इस तरह से जख्मी हुए कि आखिर में काटने पड़ गए. अब वो चल-फिर नहीं सकती.