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बिहार चुनाव : लोकतंत्र की लाश पर आखिरी जुलूस!

राकेश कायस्थ-

इस देश की चुनावी राजनीति को करीब से देखते हुए मुझे 25 साल से ज्यादा वक्त हो चुका है। ये पहला मौका है, जब मैंने बिहार जैसे महत्वपूर्ण समझे जाने वाले चुनाव पर एक शब्द भी नहीं लिखा। ना लिखने की वजहें मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ—

1. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र संसदीय राजनीति के बुनियादी उसूलों (कमियां पहले भी थीं) को बहुत पीछे छोड़ चुका है। इस समय देश एक संगठित अपराध तंत्र के हवाले है और तमाम संस्थाएं उसी तंत्र का हिस्सा बन चुकी हैं। सुनने में बुरा लग सकता है लेकिन इस बात के अकाट्य प्रमाण है कि हाइयर ज्यूडिशियरी तक अब हायर्ड ज्यूडिशियरी बन चुकी है, केचुआ की बात कौन करे? ऐसे में किसी भी राजनीतिक प्रक्रिया के निष्पक्ष होने और कहीं से भी न्याय की उम्मीद बेमानी है।

2. मेरी इस धारणा से बुनियादी असहमति है कि बिहार के चुनावी नतीजों से कुछ बदलेगा। अगर एनडीए जीतता है, तो वही स्थिति रहेगी जो पहले थी। अगर महागठबंधन किसी तरह कामयाब हो गया तब भी बुनियादी तौर पर कुछ नहीं बदलेगा, क्योंकि भारत का संकट राजनीतिक से कहीं ज्यादा सामाजिक बन चुका है।

3. इस बात को समझने के लिए बीजेपी समर्थकों के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे, सबसे इलीट तबके के व्यवहार पर गौर कीजिये। खुद को लोकतंत्र समर्थक बताने और भारत के सुनहरे भविष्य का गीत गाने वाला यह तबका सोशल मीडिया पर क्या कर रहा है? यूनिवर्सिटी प्रोफेसर, पुराने पत्रकार, लेखक, समाज-सेवी सबके के सब पुरानी कथाएं बांचने में जुटे हैं, ताकि मोदी सरकार के हर कुकर्म को वैध ठहराया जा सके।

4. बीजेपी के वोटरों की तादाद 30 करोड़ से कुछ ज्यादा मानी जाती है। मोटे तौर पर आप यह समझ लीजिये कि इस देश की 30 करोड़ यानी लगभग एक चौथाई जनता लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट है। उसके लिए चुनाव क्रिकेट मैच की तरह है, जहाँ वो अपनी टीम को हर हाल में जीतते देखना चाहती है। किसी भी तरह कोई नैतिक प्रश्न इस वोटर समूह को विचलित नहीं करता है। जब देश की एक चौथाई आबादी चाहती ही नहीं कि लोकतंत्र बचे तो फिर लोकतंत्र कैसे बचेगा?

5. केंद्रीय मंत्री अजय टेनी का बेटा आधा दर्जन किसानों को जान-बूझकर अपनी गाड़ी से रौंद डालता है। उसके ठीक बाद हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव बीजेपी लखीमपुर की सारी सीटें जीत जाती है। इस तरह के दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं। नैतिक प्रश्न बीजेपी के वोटरों को ज़रा भी परेशान नहीं करते। ऐसे में ये उम्मीद करना कि वोट चोरी का मुद्दा उठाने से जनता जाग जाएगी और बीजेपी को हरा देगी, बला की मासूमियत है।

6. शिक्षा,रोजगार, महंगाई यानी जनता से जुड़े मुद्दे किसी भी चुनाव में गूंज सकते हैं लेकिन नतीजों पर उनका प्रभाव तभी हो सकता है, जब चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत लड़े जायें। अपराध तंत्र चुनावी बिसात बिछाता है, हर जगह अपने मोहरे फिट करता है और असंभव लगने वाले नतीजे लाकर उसे लोकतंत्र की जीत बताता है। मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र और हरियाणा तक यह सबकुछ देखा जा चुका है और आगे भी यही दिखाई देगा।

7. विपक्ष के पास बीजेपी जैसी चुनावी महा-मशीन नहीं है। लेकिन उससे ज्यादा दुखद बात ये है कि इस तरह के संगठित अपराध तंत्र से लड़ने के लिए जो संकल्प और नैतिक बल चाहिए उसका भी अभाव नज़र आता है। आंदोलन के नाम पर रचे गये अन्ना हजारे के षडयंत्र से जनांदोलनों के प्रति भरोसे को इस तरह हिलाया कि निकट भविष्य में उसका दोबारा बहाल हो पाना कठिन लगता है।

इतिहास की निरंतरता में 20 या 50 साल का कोई खास मतलब नहीं होता है। हमारी बदकिस्मती कि हम ऐसे दौर में पैदा हुए हैं। मेरे जैसे लोगों के लिए यह समय बोलने का कम और चीज़ों को ध्यान से देखने और समझने का ज्यादा है।

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