
दिलीप ख़ान-
शुरुआती उठापटक और ‘फ़्रेंडली फ़ाइट’ जैसी बेवकूफ़ियों को छोड़ दें, तो महागठबंधन ने अच्छा चुनाव लड़ा। 37.94 फ़ीसदी वोट बताता है कि उसका वोट बेस अभी भी इंटैक्ट है। तो फिर, इस चुनाव को भांपने में ज़्यादातर लोगों से चूक कहां हुई?
- फ़ील्ड रिपोर्टर के लिए सत्ता-विरोधी लहर को भांपना आसान होता है। इसके उलट, जब सत्ता में मौजूद गठबंधन की अलग-अलग पार्टियों का वोट बेस अलग-अलग हो, तो उसे इकट्ठे देख पाना कई बार मुश्किल होता है। अलग-अलग कमिटमेंट के साथ सरकार ‘बचाने’ वाले लोगों की आवाज़ों को ‘समीकरण’ की तरह देखने से उनकी सामूहिकता आक्रामक नहीं दिखती। फ़ील्ड में मौजूद कई लोग एनडीए को एज बता रहे थे, वे भी बस ‘एज’ तक ही सीमित थे।
- एनडीए ने महागठबंधन से वोट नहीं छीना, बल्कि दो काम किए। पहला अपने वोटरों को ‘कॉन्क्रीट सॉलिड’ बनाया और ‘अन्य’ के वोट को अपने में मिला लिया। 2020 की तुलना में एनडीए को 5.5 फ़ीसदी वोट ज़्यादा मिले, और इस वोट का तक़रीबन पूरा हिस्सा उसे पिछली बार के ‘निर्दलीय और अन्य’ के खाते से मिला। निर्दलीय और निहायत की छोटी पार्टियों को इस बार क़रीब 8 फ़ीसदी वोट कम मिले हैं।
नोट- 2020 के एनडीए में मैंने लोजपा को भी जोड़ रखा है। इसी तरह महागठबंधन में वीआईपी को।
- प्रशांत किशोर की पार्टी के वोट बेस को डिकोड करने में चूक हुई। प्रशांत किशोर को भी अपने वोट का बड़ा हिस्सा इसी अन्य कैटगरी से मिला, लेकिन उसने क़रीब 1 फ़ीसदी वोट महागठबंधन के खाते से भी झटक लिया। इसी बात की व्याख्या इस तरह से हो रही है कि जनसुराज की भूमिका महागठबंधन को शुद्ध रूप से 5 सीटें हराने वाली रही। एनडीए ने 19 और महागठबंधन ने 14 सीटें ऐसी जीतीं, जहां जीत का मार्जिन जनसुराज को मिले वोटों से कम है। जबकि ज़्यादातर लोगों का अनुमान था कि प्रशांत किशोर की अपील जिस तबक़े में है उसका असर एनडीए पर ज़्यादा पड़ेगा। इस ‘तबक़े’ ने वोटिंग के वक़्त अपनी चाल बदल ली और वापस एनडीए में आ गया।
- एनडीए के घटक दलों के बीच आपस में सीमलेस वोट ट्रांसफ़र हुआ। ऐसा अमूमन होता नहीं है, लेकिन हुआ। जदयू, भाजपा, लोजपा, हम, आरएलएम के कार्यकर्ताओं ने एक यूनिट के तौर पर चुनाव लड़ा। इसकी एक सरल व्याख्या यह हो सकती है कि छोटी पार्टियां जब एनडीए में आती हैं, तो उनका सिंक मज़बूत दिखने लगता है, जबकि यही पार्टियां जब विरोधी खेमे में जाती है, तो वोट ट्रांसफ़र इतना सरल नहीं होता। इसकी साफ़ वजह है, जिस पर अलग से बात हो सकती है। हालांकि, मेरे समेत कई लोगों को यह लग रहा था कि एनडीए में इस बार आपसी वोट ट्रांसफ़र आसानी से नहीं होगा।
- राजद नए सोशल बेस को अपने पाले में नहीं जोड़ पा रहा है। उसे अपने पारंपरिक वोट तो मिल रहे हैं, लेकिन ज़मीनी तौर पर जब तक वह नया सोशल बेस अपने हिस्से में नहीं जोड़ेगा, एनडीए के मौजूदा समीकरण से वह पीछे ही रहेगा, भले ही उसे सबसे ज़्यादा वोट मिल जाए। महागठबंधन का ‘हर घर नौकरी’ वाले वादे पर शुरू से ही लोगों ने भरोसा नहीं जताया। वादे यथार्थवादी होने चाहिए, जिसके बारे में सवाल पूछे जाने पर आपके पास ठोस जवाब हो, जबकि इसका गणित कोई नेता नहीं समझा सका।
- महिला वोटरों के वोटिंग पैटर्न की स्टडी जो लोग कर रहे हैं, उनके कुछ डिटेल स्टडी आए तो चीज़ें ज़्यादा स्पष्ट होंगी, लेकिन अब तक जो फ़ौरी स्टडी सामने आई हैं, उनमें यही लग रहा है कि ग़ैर-महागठबंधन मतदाताओं के बीच यह गोलबंदी ज़्यादा मज़बूत दिखी, जबकि महागठबंधन और ख़ासकर राजद के समर्थकों पर उसका असर बहुत कम पड़ा।
- सीमांचल में पप्पू यादव के साथ होने की वजह से महागठबंधन ने ज़्यादा उम्मीदें लगा रखी थीं, लेकिन इस बार एमआईएम को मिली 5 सीटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसने तुक्के में पिछली बार 5 सीटें नहीं जीती थीं, उसने सीमांचल में अपनी जड़ जमा ली है। जो वोटर पिछले 2 बार से एमआईएम को वोट कर रहे हैं, उनके पास आगे अपना पाला बदलने की कोई वजह नहीं दिखती।
एनडीए के मौजूदा घटक दल के पास सोशल बेस के आधार पर एक अजेय समीकरण है, इसे तभी तोड़ा जा सकता है, जब विरोधी पार्टियां अपने समर्थक समुदाय का दायरा बढ़ाए। यह पांच साल लगातार काम करने पर ही मुमकिन है, चुनावी रैलियों में कोई सोशल बेस अचानक नहीं शिफ़्ट होता। आप किसी तबक़े को प्रभावित कर सकते हैं, पूरी तरह तोड़ नहीं सकते।
बाक़ी, सिर्फ़ ‘वोट चोरी’ जैसी बातों को उछालकर रिज़ल्ट को नकारने वाले इस स्पष्ट तस्वीर को नहीं देख पा रहे हैं, तो आगे भी नहीं देख पाएंगे। हां, एसआईआर में जो रीस्ट्रक्चरिंग हुई है, उसकी एक बड़ी भूमिका हो सकती है और इसकी स्टडी विरोधी राजनीतिक दलों को गंभीरता से करनी चाहिए।




Madan Tiwary Advocate
November 21, 2025 at 9:38 am
[email protected]