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दूसरा जरूरी काम है उन दो-चार महिला प्रवक्ताओं को किनारे करना, जो बहुत ज्यादा लाउड हैं!

सुभाष सिंह सुमन-

हर चुनाव एक परीक्षा की तरह है। सभी नेताओं के लिए तो है ही, हमारी पत्रकार बिरादरी के लिए विशेष परीक्षा की तरह है। खासकर चुनाव-राजनीति कवर करने वालों के लिए। नेता लोग तो हर चुनाव जीतते ही हैं, पत्रकार लोग लगभग हर बार हार जाते हैं। कारण है- परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न को सही से नहीं समझ पाना। हर चुनावी परीक्षा के प्रश्नपत्र में पूछा जाता है, ‘‘जनता क्या चाहती है?’’ चुनावी पंडित बने हमारे पत्रकार लोग उत्तर में बता देते हैं कि वे क्या चाहते हैं। बस यहीं पर सारा गुड़ गोबर हो जाता है। अधिकांश घोषित विशेषज्ञों, पोल पंडितों, एग्जिट पोलों के साथ यह समस्या दोहराती है। हर बार वे जनता का मर्म टटोलने की जगह, अपनी इच्छा को जनमत बताने के तर्क गढ़ने में खर्च होते हैं। मैं पत्रकार हूँ, लेकिन मेरी धारा बिलकुल अलग है। मैं पत्रकारों की उस धारा से नहीं हूँ, जो मुख्य तौर पर पत्रकार कहलाते हैं।

आम लोगों की समझ में पत्रकार पार्टी-पौव्वे वाले होते हैं। लेकिन चुनाव-राजनीति कवर करने में न मेरी कभी रुचि रही, न मैंने ज्यादा यह काम किया। बहुत नीरस और निरर्थक काम लगता है मुझे यह। इस बार भी चुनाव को ध्यान में रखकर कहीं नहीं घूमा। फिर भी मुझे स्पष्ट दिख रहा था कि एनडीए को पूर्ण बहुमत मिलने में कोई खतरा नहीं है। लोगों को काँटे की टक्कर दिख रही थी, मैं खाली टक्कर भी देख पाने में असमर्थ था। अब जब चुनाव परिणाम लगभग स्पष्ट हो चुका है, दिख रहा है कि कैसा चुनाव हुआ है! इसे एकतरफा चुनाव कहते हैं। कहीं कोई टक्कर नहीं थी। और विशेषज्ञ लोग तमाम विधानसभा क्षेत्रों का दौरा करने, आम लोगों का साक्षात्कार करने और लाखों लोगों का सर्वेक्षण करने के बाद भी इसे नहीं भांप पाये, कितनी हैरानी की बात है! हमारे उन पत्रकार मित्रों को अपनी धारणा और अपनी भावना को नियंत्रित रखने में विशेष सतर्क रहना चाहिए, जो जनता में सबसे अधिक खपने वाले विषय चुनाव-राजनीति कवर करते हैं। आपके बहक जाने से पत्रकारिता के सारे आयाम बदनाम हो जाते हैं/हो गये हैं।

बिहार के इस चुनाव ने सबको कुछ-न-कुछ सीखने के लिए दिया है। अपनी बिरादरी की बात मैंने सबसे पहले कर ली। अब नेताजी लोग की बात। जो जीत चुके हैं, उन्हें कुछ बताया नहीं जा सकता। जो हारते हैं, समीक्षा उनके लिए होती है। फिर भी सबसे पहले नीतीश चचा की बात। मेरे एक मित्र का कहना है- नीतीश चचा हमारे बिहार की राजनीति के भीष्म पितामह हैं। वरदान लेकर आये हैं। उन्हें परास्त करने का मंत्र सिर्फ उन्हीं के पास है। कल तक नहीं था, लेकिन आज मैं मित्र की बात से पूरा सहमत हूँ। चचा मगध सुप्रीमेसी के सजीव प्रमाण हैं। चचा बिहार की राजनीति के प्राण हैं। चचा को इच्छामृत्यु का वरदान है। भतीजे उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे। चचा ने भतीजों को एक बार मंत्र देना शुरू तो किया था, लेकिन भतीजे ने हड़बड़ में गड़बड़ कर दी थी। परिणाम- अपनी ही सीट फँस गयी।

महिलाओं को चुनावसे ऐन पहले दस हजरिया देने का प्रभाव निश्चित पड़ा, लेकिन सिर्फ यही एक कारण नहीं है। आप सोचकर देखिये कि एक व्यक्ति 20 सालों से सरकार चला रहा है, फिर भी उसके खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी जैसी कोई चीज नहीं है। इस चुनाव में आप आम लोगों से मिलते तो एक बात साफ-साफ दिखती कि सरकार बदलने की भावना कहीं है ही नहीं। सरकार के खिलाफ कोई नाराजगी या निराशा जैसी चीज ही नहीं थी। लोग अपने विधायकों से त्रस्त थे, विधायकों को दौड़ा ले रहे थे, लेकिन नीतीश चचा से कोई समस्या नहीं थी कहीं। अब 20 साल के शासन के बाद भी कोई विरोधी लहर नहीं है, इसका कारण खुद विपक्ष है। अभी का विपक्ष, जब सत्ता पक्ष में था, तो उसके उन 15 सालों की एंटी-इनकंबेंसी समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है। चुनाव से पहले मैंने लिखा था कि एक बार को जनता बदलाव का मन बना लेती है, तभी राजद का समर्थक वर्ग कुछ-न-कुछ ऐसा कर देता है कि बिहार बैक गियर से बेहतर यथास्थिति को मानने लगता है। मेरी राय है कि नीतीश चचा ने अपने पहले कार्यकाल यानी पहले 5 साल के बाद कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिसके लिए उन्हें बार-बार जीत मिले। बिहार 15 सालों से जड़ पड़ा है। अब 5 साल और।

5 साल बाद भी स्थिति बदलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हो सकता है चचा अगले चुनाव तक खुद ही मैदान से हट जाएँ, तब भी तेजस्वी के लिए लड़ाई कठिन ही रहने वाली है। तेजस्वी को अभी से ईमानदार और अनुशासित प्रयास करने होंगे। सबसे पहले अपने अराजक समर्थक वर्ग को कुछ प्रशिक्षित करें। एक बार राजद ने दिलीप मंडल जी को प्रशिक्षक बनाया भी था। बाद में क्या हुआ, मुझे पता नहीं। यह राजद के लिए सबसे जरूरी काम है। इस चुनाव से पहले बिहार बंद किया विपक्ष ने। मुद्दे सारे गायब हो गये। जनता को याद रहा कि राजद का झंडा लिये कुछ लफंगे एक स्कूटी पर जाती महिला से अभद्रता कर रहे थे। जनता को याद रहा कि राजद-कांग्रेस के मंच से प्रधानमंत्री को माँ की गालियाँ दी जा रही थी। आपको मोदीजी लाख नापसंद हों, जनता ने उनको लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री के पद पर बिठाया है। जिसे जनता प्रधानमंत्री चुन रही है, उसे आप गालियाँ देंगे तो यह सिर्फ आत्मघाती असर करेगा। दूसरा जरूरी काम है उन दो-चार महिला प्रवक्ताओं को किनारे करना, जो बहुत ज्यादा लाउड हैं। उनके पास न कहने के लिए बात होती है, न बात कहने का सलीका। जबकि राजद के पास कई अच्छे युवा हैं। जैसे जयंत जिज्ञासु। इन्हें आगे करिये। कुछ अन्य मित्र भी हैं, जो बड़े काबिल हैं। वे अपना नाम सार्वजनिक करना पसंद नहीं करेंगे, इस कारण नहीं लिखते हैं।

लाउड वाली बात ही प्रशांत किशोर पर भी लागू है। बिहार को बहुत ज्यादा अहंकार पसंद नहीं रहा कभी। बिहार ने अहंकार करने वाले सम्राटों के वंशबेल मिटाये हैं। आप कुछ भी हैं, नंद सम्राट तो नहीं हैं। विनम्र बनकर आइये, तब विकल्प बन पाइयेगा। पुष्पम प्रिया जी तो कुछ न करें, मुझे अपनी पार्टी में शामिल कर लें बस। उनका तो सारा काम कर देंगे हम।

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