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आज के अखबार : बोफर्स खुलासे में इंडियन एक्सप्रेस का साथ देने वाला ‘द हिन्दू’ अलग राग अलाप रहा है

संजय कुमार सिंह

इंडियन एक्सप्रेस ने आज लगातार तीसरे दिन सरकार की पोल खोलने वाली खबर छापी है। यह सही है कि बोफर्स के समय इंडियन एक्सप्रेस के ज्यादातर खुलासे तब के संपादक अरुण शौरी के नेतृत्व में हुए थे। बाद में अरुण शौरी भाजपा सरकार में मंत्री रहे। तब उनका साथ द हिन्दू समेत दूसरे अखबार भी देते थे। अब इंडियन एक्सप्रेस तो अपना काम कर रहा है लेकिन द हिन्दू में लगभग सन्नाटा है। भाजपा सरकार से संबंधित इन गंभीर खुलासों पर द हिन्दू के पहले पन्ने पर कुछ नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि इंडियन एक्सप्रेस की खबर सीएजी की रिपोर्ट और दूसरे खुलासों पर आधारित थी जो सार्वजनिक है। इससे पहले सीएजी की ऐसी ही रिपोर्ट के बाद संबंधित अधिकारी का तबादला हो गया था। हालांकि, इन्हें प्रशासनिक कहकर तबादलों का बचाव किया जाता है। ऐसे में रिपोर्ट थी तो खबर होनी चाहिए थी लेकिन अखबारों में सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने इन्हें प्राथमिकता दी है। मनमोहन सिंह के समय सरकार का विरोध करने वाले आम लोग और हस्तियां अब इन खबरों से परेशान नहीं होते। उल्टे 272 विशिष्ट नागरिक सरकार का प्रचार कर चुके हैं। ऐसे में सरकार के काम पर नजर रखना और भाजपाई प्रचार या दुष्प्रचार का मुकाबला अगर विपक्ष का काम भी हो तो उसके पास पैसे नहीं हैं और उसकी कहानी भी एक्सप्रेस में कल व आज छपी है। दूसरे कई अखबारों के पहले पन्ने पर मौसम की खबरें हैं। इंडियन एक्सप्रेस में अरावली में खनन की छूट पर केंद्रीय मंत्री का पक्ष है। उन्होंने कहा है कि अरावली रेंज 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर है और सिर्फ दो प्रतिशत में खनन हो सकता है। वह भी कतिपय अध्ययन के बाद। अगर 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर का सिर्फ दो प्रतिशत कम है और सत्ता में रहते भाजपा को मिलने वाला चंदा बढ़ता जा रहा है और कांग्रेस को मिलने वाला दान आधा हो गया है तो इस सिर्फ दो प्रतिशत का खेल समझ में आता है। नहीं भी समझ में आए तो संदेह होना स्वाभाविक है लेकिन खबर? वह सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में है। कल खबर थी कि इलेक्टोरल बांड की योजना रद्द किए जाने के बाद चुनावी ट्रस्ट से मिलने वाला 82 प्रतिशत दान भाजपा की झोली में गया है। आज खबर है कि ट्रस्ट बंद किए जाने के बाद के पहले पूरे वित्त वर्ष 2024-25 में भाजपा को मिलने वाले दान में भारी वृद्धि हुई है और चुनावी ट्रस्ट को बड़ा दान देने वालों में टाटा से महिन्द्रा, ओपी जिन्दल, एलएंडटी और मेघा इंजीनियरिंग सब शामिल है।

हाल में खबर थी कि सरकार ने सेमी कंडक्टर प्रोजेक्ट के लिए पचास फीसदी सबसिडी का एलान करते हुए आवेदन माँगे थे। टाटा को दो बड़े प्रोजेक्ट मिले – एक गुजरात के धोलेरा में 91,000 करोड़ का फैब्रिकेशन प्लांट और दूसरा असम में 27,000 करोड़ का असेंबली यूनिट। इसके साथ यह भी खबर थी कि फरवरी 2024 में टाटा को 44,000 करोड़ की सब्सिडी के साथ दो प्रोजेक्ट को मंज़ूरी मिली और अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले टाटा के प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट ने बीजेपी को 758 करोड़ रुपये दिये। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले यह किसी एक समूह द्वारा किसी दल को दिया गया सबसे बड़ा चंदा था। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनावी ट्रस्ट अगर (जनता या कॉरपोरेट से) पैसे इकट्ठा कर राजनीतिक दलों को देने के लिए बने हैं तो सबको बराबर या एक निश्चित अनुपात में दिया जाना चाहिए और सत्तारूढ़ दल को सबसे ज्यादा चंदा दिए जाने का मतलब भ्रष्टाचार भी हो सकता है। इलेक्टोरल ट्रस्ट के जरिए दिया जाए तो इसमें नाम छिपाना भी है और नहीं छिपाना है तो सीधे क्यों नहीं, ट्रस्ट किसलिए? जाहिर है यह पारदर्शिता के खिलाफ है। लेकिन चल रहा है और भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर सत्ता में आई सरकार ने न तो भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए और न चुनावी चंदे का मामला दुरुस्त व पारदर्शी करने के लिए कुछ किया है। सरकारी योजनाओं के धन की बंदरबांट का मामला तो है ही। 14500 करोड़ रुपए की प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में घपले की खबर पहले छप चुकी है। 

इंडियन एक्सप्रेस की खबर में कहा गया है कि 2015 से 2022 के बीच योजना के तीन चरणों में लगभग 14,450 करोड़ रुपये खर्च हुए, जिसका कुल लक्ष्य 1.32 करोड़ उम्मीदवारों को स्किल ट्रेनिंग और सर्टिफिकेशन देना था। पहला चरण 2015-16 में शुरू किया गया था, दूसरा 2016-20 के दौरान और तीसरा 2021-22 में, इस अवधि में 1.1 करोड़ उम्मीदवारों को प्रमाणित किया गया। सीएजी ने योजना के दूसरे और तीसरे चरण से जुड़े डेटा के एनालिसिस में पाया कि कुल 95,90,801 भागीदारों में 90,66,264 यानी 94.53 प्रतिशत मामलों में ‘बैंक अकाउंट डिटेल्स’ नहीं थे। 52,381 भागीदारों की खाता संख्या दो या ज़्यादा बार दोहराई गई थी। जहां खाता नंबर लिखे थे उनमें भी गलत नंबर मिले और ऐसा 472156 खातों के मामले में था। सीएजी ने नोट किया कि अकाउंट नंबर फील्ड के विश्लेषण से “इस स्कीम के भागीदारों की पहचान के बारे में पर्याप्त आश्वासन नहीं मिला”। मंत्रालय ने कहा, शुरू में एसआईपी पर अकाउंट डिटेल्स ज़रूरी था, लेकिन ग्राउंड लेवल पर लागू करने में समस्याओं के कारण बाद में इसे गैर-ज़रूरी बना दिया गया”। उल्लेखनीय है कि एसआईआर के फॉर्म डीटेल दिए बिना अपलोड नहीं हो रहे हैं। दबाव में बीएलओ ने आत्महत्या की, मर गए और नौकरी छोड़ दी। यहां कोई ढील नहीं दी गई जबकि सरकारी पैसे ट्रांसफर करने के मामले में ढील दी गई। सरकार की तरफ से योजना के बारे में यह भी कहा गया कि आधार लिंक्ड खातों में सीधे पैसे ट्रांसफर किए गए लेकिन उसमें भी गड़बड़ी मिली। यह सिर्फ 24.53 लाख प्रमाणित उम्मीदवारों के लिए था (यह 25.58 प्रतिशत हुआ)। इसमें सिर्फ 17.69 लाख (18.44 प्रतिशत उम्मीदवारों) का भुगतान ही सफल रहा। मंत्रालय ने कहा है कि 95.91 लाख उम्मीदवारों में से 61.14 लाख (63.75 प्रतिशत) को सीधे भुगतान किया गया है। इस विवरण से संकेत मिलता है 34 लाख प्रमाणित उम्मीदवारों को अभी तक भुगतान नहीं किया गया है जबकि योजना के संबंधित चरण पूरे हो चुके हैं।

सीएजी ने लाभार्थियों का ऑनलाइन सर्वेक्षण भी किया और पाया कि 36.51 प्रतिशत मेल डिलीवर नहीं हुए। सिर्फ 3.95 प्रतिशत का जवाब आया। इनकी संख्या 171 थी इनमें से 131 एक ही ई मेल आईडी के थे या फिर ट्रेनिंग पार्टनर या सेंटर के। सीएजी ने यह भी पाया कि कई प्रशिक्षण केंद्र बंद थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि सीएजी को ऐसे मामलों का भी पता चला है जहां एम्प्लॉयर्स ने ऐसे लोगों को स्किल सर्टिफिकेशन दिया है जो ‘बेस्ट-इन-क्लास’ क्लासिफिकेशन के लायक नहीं थे। इसमें ट्रेनिंग के फोटोग्राफिक सबूतों में भी गड़बड़ियां पाई गईं। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और राजस्थान में कई लाभार्थियों के लिए एक ही फोटो दी गई। जहां तक चुनावी चंदे की बात है, गुजरात के 10-11 राजनीतिक दलों को  2019-20 से 2023-24 तक कुल लगभग ₹4,300 करोड़ से ज़्यादा दान/चंदा प्राप्त होने की खबर थी। इन दलों में से कई गुजरात से हैं और इनके नाम आम परिचित पार्टियों में से नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन दलों ने कुछ ही चुनावों में हिस्सा लिया या बहुत ही कम खर्च दिखाया। लेकिन दान में इतनी भारी रकम दिखाई गई — जो संदेह पैदा करता है कि पैसा कहाँ से आया और किसने दिया? ईमानदार सरकार देने का दावा करने वाले नरेन्द्र मोदी इन मुद्दों पर चुप हैं। अखबारों में खबर नहीं होती है सो अलग। उल्लेखनीय है कि इस बहुप्रचारित कौशल योजना के सेंटर बंद होने, काम और पैसे नहीं मिलने की शिकायतें आती रही हैं और किसी मीडिया संस्थान ने उन्हें फॉलो नहीं किया। कांग्रेस के समय सरकारी मीडिया से भी अपेक्षा की जाती थी कि वह निष्पक्ष रहे और सरकार के खिलाफ भी खबरें दें। अभी पीआईबी से फैक्ट चेक करवाया जा रहा है और करोड़ों में भुगतान पर रखे गए तिहाड़ी लोकतंत्र की दिक्कतें बता रहे हैं। सरकार अपने प्रचार में करोड़ों फूंक रही है सो अलग। हाल में छह करोड़ रुपए में सोशल मीडिया इनफ्लूएंसर की सेवा लिए जाने की खबर थी।

ऐसे में आज अमर उजाला के पहले पन्ने पर मौसम की खबर है और दूसरे पहले पन्ने पर रेल किराया बढ़ने की खबर है। नवोदय टाइम्स की लीड गृह मंत्रालय की एडवाइजरी है कि जरा भी शंका हो तो क्रिसमस और नए साल के कार्यक्रम रद्द कर दें। देशबन्धु में मनरेगा को बदलने के विरोध और कांग्रेस के प्रदर्शन की खबर लीड है। देशबन्धु ने इलेक्टोरल ट्रस्ट के 3811 करोड़ रुपए के चंदे में भाजपा को 82 प्रतिशत यानी 3112 करोड़ रुपए मिलने की खबर को भी पहले पन्ने पर रखा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड बांग्लादेश में तनाव बढ़ने पर चटगांव में वीजा के काम बंद किए जाने की खबर को लीड बनाया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने दिल्ली में कोहरे की खबर को लीड बनाया है।  बताया है कि यह दो दिन और चलेगा। प्रधानमंत्री की सुई घुसपैठियों पर अटकी हुई है और प्रधानमंत्री ने असम में कहा, कांग्रेस वोट के लिए घुसपैठियों की मदद करती है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे पहले पन्ने पर सेकेंड लीड बनाया है। द हिन्दू ने बताया है कि बांग्लादेश मामले में भारत करीबी से नजर रख रहा है और यही अखबार की लीड है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, मोदी ने 2026 के असम चुनाव के लिए टोन तय कर दिया। फ्लैग शीर्षक है, 15.6 हजार करोड़ की योजनाएं शुरू कीं और कहा कि कांग्रेस भारत विरोधी है। कोलकाता के द टेलीग्राफ की लीड बांग्लादेश में बंगाली अल्पसंख्यकों को लेकर चिन्ता की खबर है। साथ में छपी खबर बता रही है कि गुजरात एसआईआर में इतने वोट कटे हैं कि बंगाल पीछे रह गया।   

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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